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How Krishna Broke Three Egos ? कृष्ण नें गरुड़ , सत्यभामा और सुदर्शन चक्र का अहंकार कैसे तोड़ा ?

How Krishna Broke Three Egos ? कृष्ण नें गरुड़ , सत्यभामा और सुदर्शन चक्र का अहंकार कैसे तोड़ा ?

 कृष्ण नें तोड़ा तीनों का अहंकार । How Krishna Broke Three Egos ?


एक बार की बात हैं । भगवान श्री कृष्णा द्वारिका में रानी सत्यभामा के साथ बैठे हुए थें। उनके पास ही निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी विराजमान थें । तभी कोई बात ऐसी छिड़ गयी , कि रानी सत्यभामा नें श्री कृष्ण से प्रश्न किया।

कि प्रभु ! त्रेतायुग में आपनें राम के रूप में अवतार लिया था। और सीता आपकी पत्नी थी। लेकिन क्या वे मुझसे भी अधिक रूपवान और सुंदर थीं।

श्री कृष्ण समझ गए कि रानी सत्यभामा को अपनी सुंदरता पर अभिमान हो गया।

रानी सत्यभामा की बात समाप्त होते ही गरुड़ बड़े ही अहंकार से बोल पड़े।

कि भगवान इस धरती पर मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई नहीं उड़ सकता। जैसे मैं इस हवा को चीरता हुआ इतनी तेज गति से उड़ता हूँ।

इसके बाद सुदर्शन  चक्र का भी अहंकार जाग गया । और वे भी बोल पड़े कि प्रभु, इस संसार में मुझसे ज्यादा शक्तिशाली कोई भी नहीं। अगर मैं आपके साथ न होता तो आपका क्या होता।

भगवान श्री कृष्ण समझ गए कि इन तीनों को अपनें ऊपर अहंकार कुछ ज्यादा ही हो चुका हैं।

अब मुझे कुछ ऐसी लीला करनी होगी । जिससे इन तीनों का अहंकार चूर-चूर हो जाए।

कृष्ण की लीला और कैसे टूटा तीनों का अहंकार    

 श्री कृष्ण जी ने फैसला लिया । कि अब समय आ गया हैं इन तीनों का भ्रम दूर करने का।

तभी कृष्ण गरुड़ से बोले— कि गरुड़ तुम शीघ्र जाओ और हनुमान को बुला लाओ।

और उनसे कहना कि भगवान राम माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहें हैं। गरुड़ श्री कृष्ण की आज्ञा लेकर हनुमान को बुलाने के लिए उड़ चले।

और सत्यभामा से कृष्ण नें कहा ! कि देवी तुम माता सीता के रूप में श्रंगार करके तैयार हो जाओ । व श्री कृष्ण नें राम जी का रूप धारण कर लिया।

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भगवान कृष्ण ने सुदर्शन से कहा , कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो।

और जब तक मैं सवय किसी को न बुलाऊँ तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश करनें मत देना।

सुदर्शन ने कहा कि प्रभु जब आप नहीं कहेंगे तब तक कोई परिंदा भी अंदर प्रवेश नहीं कर पाएगा। यह कहकर सुदर्शन चक्र प्रवेश द्वार पर बैठ गए।

उधर गरुड़ हनुमान जी के पास पहुँचे और प्रभु का संदेश सुनाया।

उन्होंने कहा कि वानर राज हनुमान भगवान श्री राम माता सीता जी के साथ द्वारका में आपसे मिलनें के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहें हैं।

आप तत्काल मेरे साथ चलें । मैं आपकों अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहाँ ले जाऊँगा।

गरुड़ का अहंकार चूरचूर कैसे हुआ   

तभी हनुमान जी नें उनसे कहा ! कि आप चलिए मैं आता हूँ। गरुड़ नें मुस्कुरातें हुए मन में विचार किया । कि हनुमान जी इतनें वृद्ध हो चलें हैं। ये कैसे पहुँचेंगे।

हनुमान जी के कहनें पर गरुड़ द्वारिका के लिए उड़ चलें। लेकिन जैसे ही वह महल में दाखिल हुए , वैसे ही गरुड़ के होश उड़ गए।

उनके सामनें पहलें से ही हनुमान जी विराजमान थें। जो उनसे बहुत पहलें ही महल पहुँच गए थें । यह देखकर गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया।

हनुमान जी नें सुदर्शन चक्र को डाला मुहँ में 

 हनुमान नें देखा कि, महल के द्वार पर सुदर्शन खड़ा था । हनुमान के द्वार प्रवेश करते ही सुदर्शन नें उन्हे रोक लिया , और बोला कौन हो तुम?

 और अंदर मेरी बिना आज्ञा के प्रवेश कैसे कर सकते हों?

 तो हनुमान नें कहा मुझे महल में मेरे प्रभु से मिलने जाना हैं । उनका आदेश हैं । कि मैं तुरंत उनके पास जाऊँ। 

 इस बात पर सुदर्शन क्रोधित होकर बोला , कि मेरी आज्ञा के बिना तुम अंदर नहीं जा सकतें , यह  कहकर सुदर्शन चक्र नें अपना विराट रूप कर लिया। 

  मगर हनुमान जी को तो अपने प्रभु से मिलना था , उनको बहुत जल्दी थीं । तभी हनुमान जी नें सुदर्शन को पकड़कर अपनें मुहँ में रख लिया। 

 और वे अंदर भगवान श्री कृष्ण के पास चले गए चले गए।     

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 अब हनुमान जी महल के अंदर श्रीराम जी के सामने जाकर खड़े हो गए ।

और उन्हें प्रणाम किया । तभी श्री राम जी नें पूछा कि पवनपुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए।

क्या तुम्हें किसी नें रोका नहीं ? तो हनुमान जी नें विनम्रता पूर्वक सिर झुकाकर अपने मुहँ मे से सुदर्शन चक्र को बाहर निकाला, और उनके सामने प्रस्तुत कर दिया।

सुदर्शन चक्र को सौंपने के बाद , हनुमान जी बोले ! कि प्रभु मुझे प्रवेश द्वार पर इस चक्र नें रोका था।

इसलिए मैंने इसे अपनें मुहँ मे रख लिया । और आपसे मिलनें अंदर आ गया । इस बात पर भगवान मन ही मन मुस्कुरानें लगे।

क्योंकि सुदर्शन चक्र जब हनुमान के मुहँ से निकले तो , वे हांफने लगे। 

 उनके चेहरे से साफ दिख रहा था , कि हनुमान जी की विशाल शक्ति का रूप देखकर शायद वो अब अपनी शक्ति पर कभी घमंड नहीं करेंगे।

अब टूटा सत्यभामा का भी घमंड 

हनुमान जी यहीं पर नहीं रुकें उन्होंने भगवान श्री राम जी से  कहा, कि आज आपने माता सीता के स्थान पर यह किस तुच्छ दासी को इतना सम्मान दे दिया।

कि वह आपकें साथ इस सिंहासन पर विराजमान हैं। इतना सुनकर रानी सत्यभामा का अहंकार दूर हों गया । वह समझ गई कि सीता जी के आगे मैं तो कुछ भी नहीं।

इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण नें एक बार में ही तीनों का अहंकार समाप्त कर दिया।

और तीनों ही भगवान श्री कृष्ण के आगे लज्जित अवस्था में थें । सभी ने प्रभु से माफी माँगी। और उन्हें सारी बात समझ में आ गयी।

यह थी भगवान श्री कृष्ण की लीला । हरे कृष्णा।  

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