
» राजस्थान के अमर इतिहास मे आज हम आपके लिए ऐसी रानी की कहानी लाए है, जिसकी बलिदान की यशोगाथा राजस्थान के हर एक अंचल मे आज भी सुनाई पड़ती है तो आइए जानते हैं हाड़ी रानी का इतिहास …..
» राजस्थान में गाया जाने वाले यह गीत इस वीरांगना कए अमर बलिदान को कहता है। मेवाड़ कए स्वर्णिम इतिहास मे हाड़ी रानी का नाम अपने स्वर्णिम बलिदान के लिए अंकित किया गया है । यह उस समय की बात है, जब मेवाड़ मे महाराणा राजसिंघ (1652-1680ई.) का शासन था। इनके समन्तर सलूमबर के राव चुंड़ावत रत्न सिंह थे। जिनसे हाल ही मे हाड़ा राजपूत सिंह की बेटी से शादी हुई थी। लेकिन शादी के साथ दिन बाद ही चुंड़ावत रत्न सिंह को महाराणा राजसिंघ का संदेश प्राप्त हुआ, जिसमे उन्हे राव चुंड़ावत रत्न सिंह को दिल्ली से औरंगजेब के सहायता के लिए अा रही अतिरिक्त सेना को रोकने का निर्देश दिया गया। चुंड़ावत रत्न सिंह के लिए यह संदेश उनका मित्र शार्दूल सिंह ले कर आया था।
» यह संदेश मिलते ही चुंड़ावत रतन सिंह ने अपनी सेना युद्ध के लिए तैयार कर लिया । वह इस संदेश को लेके अपनी पत्नी हाड़ी रानी के पास पहुँचे , और सारी कह सुनाई । जिसके बाद हाड़ी रानी ने अपने पति को युद्ध मे जाने के लिए तैयार किया। उनके लिए विजय की कामना के साथ उन्हे युद्ध के लिए विदाई दी।
» सरदार अपनी सेना के साथ हवा से बाते करते उड़ा जा रहा था । किंतु उसके मन मे रह रह के आ रहा था की कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे बिसार ना दे ? वह मन को समझता पर उसका मन उधर ही चला जाता । अंत मे उससे रहा ना गया, उसने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिकों को रानी के पास भेज दिया । उसको फिर से स्मरण कराया था की, मुझको भूलना मत । मै जरूर लौटूँगा ।
» संदेश वाहक को आश्वस्त कर रानी ने लौटाया । दूसरे दिन एक और वाहक आया। फिर वही बात तीसरे दिन फिर एक और आया । इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था। प्रिय मै यहाँ शत्रुओ से लोहा ले रहा हूँ । अंगद के समान पैर जमाकर उनको रोक दिया है। मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाए। यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारे बड़ी याद आ रही है। पत्र वाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवश्य भेज देना । उसे ही देखकर मै मन को हल्का कर लिया करूंगा ।
» हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में ही पड़ गई । युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद मे ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओ से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वर्ण कैसे करेंगे ? उसके मन में एक विचार कौंधा । वह सैनिक से बोली वीर ? मै तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूँ। इसे ले जाकर उन्हे दें देना।
» थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किंतु इसे कोई और न देखे , वे ही खोल कर देखे । साथ मे मेरा यह पत्र भी दे देना । हाड़ी रानी के पत्र मे लिखा था। प्रिय मै तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूँ । तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूँ। अब बेफिक्र होकर अपने कर्तव्य का पालन करे मै तो चली… स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूँगी।
» पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल , एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया। वह धरती पर लुढ़क पड़ा। सिपाही के नेत्रों से अश्रुधार बह निकली । कर्तव्य कर्म कठोर होता है, सैनिक ने हाड़ी रानी के सिर को सोने के थाल मे सजाया । सुहाग की चुनर से उसको धका । भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा ।
» उसको देखकर हाड़ा सरदार स्तब्ध रह गया उसे समझ में न आया की उसके नेत्रों से अश्रुधारं बहने लगे , उसके अश्रुधारा क्यों बह रही है? धीरे से वह बोला क्यों यदुसिंह । रानी की निशानी ले आए? यदु ने काँपते हुए हाथ से ताल को उसकी ओर बढ़ा दिया । हड़ा सरदार फटी आखों से पत्नी का सिर देखता रह गया। उसके मुख से केवल इतना निकाला उफ़ हाय रानी । तुमने यह क्या कर डाला । संदेही पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली खैर । मै भी तुमसे मिलने आ रहा हूँ। हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर टूट पड़ा ।
» इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था की उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। जीवन की आखिरी सांस तक वह लड़ता रहा। औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नहीं ही बढ़ने दिया, जब तक मुगल बादशाह मैदान छोड़कर भाग नही गया था।
» इस विजय का श्रेय आज भी राजस्थान के अंचलों में हाड़ी रानी को उनके अमर बलिदान की यशोगाथाओ में दिया जाता है। जिसके चलते इसी वीरांगना के नाम पर राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान पुलिस मे एक महिला बटालियन का गठन किया गया। गठन के बाद इस महिला बटालियन का नामकरण इसी वीरांगना के नाम पर हाड़ी रानी महिला बटालियन रखा गया है।