नकली साधु और असली भूत । साधु और भयानक भूत की मजेदार कहानी । Majedar Kahani

नकली साधु और असली भूत । साधु और भयानक भूत की मजेदार कहानी । Majedar Kahani
Hindi Rama | सीखभरी कहानी

कैसे फँसा एक नकली साधु असली भूत के चंगुल में? लोगों को डराकर पैसे कमाने निकला भोलानाथ एक रात ऐसे भूत से टकराया कि उसकी सारी अकड़ निकल गई। फिर जंगल में उसके साथ जो हुआ, उसे जानकर आप हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएँगे। पढ़िए एक चालाक साधु और असली भूत की मजेदार कहानी।

नकली साधु की नई चाल । Majedar Kahani

एक गाँव में भोलानाथ नाम का आदमी रहता था। वह बहुत आलसी था और बिना मेहनत किए पैसे कमाना चाहता था। दिनभर इधर-उधर घूमता और दूसरों को देखकर सोचता कि काश, उसे भी बैठे-बैठे खूब पैसे मिल जाएँ।

एक दिन उसके दिमाग में साधु बनने का विचार आया। उसने बाजार से भगवा कपड़े खरीदे, लंबी नकली दाढ़ी लगाई और माथे पर बड़ा-सा तिलक लगा लिया। फिर हाथ में कमंडल लेकर गाँव की गलियों में घूमने लगा।

वह लोगों से कहता, “बच्चा, मैं बहुत पहुँचा हुआ साधु हूँ। मुझे भविष्य की बातें पता चल जाती हैं। जो मेरी बात मानेगा, उसका भला होगा!”

गाँव के कुछ लोग उसकी बातों में आ गए। कोई उसे खाना देता, तो कोई पैसे देकर आशीर्वाद माँगता। भोलानाथ खूब खुश होता और सोचता कि उसकी तरकीब काम कर गई।

कुछ दिनों बाद उसने गाँव वालों को एक नई कहानी सुनाई। उसने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ पर एक भयानक भूत रहता है। वह रात में जंगल से गुजरने वालों को डराता है। अगर उसे नहीं रोका गया, तो बड़ी मुसीबत आ सकती है।”

गाँव वाले घबरा गए। एक बुजुर्ग ने पूछा, “महाराज, अब हम क्या करें?”

भोलानाथ ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए कहा, “उस भूत को शांत करने के लिए विशेष पूजा करनी होगी। उसके सामान पर पाँच हजार रुपये खर्च होंगे।”

लोगों ने मिलकर उसे पैसे दे दिए। भोलानाथ ने रुपये अपनी थैली में रख लिए। अब उसने तय किया कि रात को खुद भूत बनकर लोगों को डराएगा और सुबह दावा करेगा कि उसने सबको बचा लिया है।

बरगद के पेड़ पर मिला असली भूत

रात होते ही भोलानाथ अपनी झोपड़ी से निकला। उसने एक सफेद चादर और नकली दाँत अपने थैले में रखे और जंगल की ओर चल पड़ा। रास्ते में अँधेरा था। पेड़ों के पत्ते हवा से हिल रहे थे और झींगुरों की आवाज सुनाई दे रही थी।

बरगद के पेड़ के पास पहुँचकर उसने सफेद चादर ओढ़ ली। फिर एक मोटी, डरावनी आवाज में चिल्लाया, “भाग जाओ! मैं इस जंगल का भूत हूँ!”

अपनी आवाज सुनकर वह खुद ही मुस्कुराने लगा। उसने सोचा कि सुबह गाँव वाले उसकी बहादुरी के किस्से सुनाएँगे। मगर काफी देर तक वहाँ कोई नहीं आया।

भोलानाथ ने चादर हटाई और बड़बड़ाया, “अरे, आज तो कोई डरने भी नहीं आया! इतनी मेहनत बेकार गई।”

तभी पेड़ के पीछे से आवाज आई, “किसे डरा रहे हो भाई?”

भोलानाथ ने सोचा कि शायद कोई गाँव वाला उसे देख रहा है। उसने तुरंत चादर फिर से ओढ़ ली और गरजकर बोला, “दूर हट जा! मैं बहुत खतरनाक भूत हूँ!”

आवाज फिर आई, “अच्छा! तो तुम भूत हो? जरा इधर मुड़कर तो देखो।”

भोलानाथ अकड़कर पीछे मुड़ा, लेकिन अगले ही पल उसकी सारी बहादुरी गायब हो गई। सामने एक लंबा-चौड़ा भूत खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखें चमक रही थीं और पैर जमीन से ऊपर हवा में लटक रहे थे।

भोलानाथ की चादर हाथ से छूटकर नीचे गिर गई।

असली भूत के सामने निकली नकली साधु की अकड़

भूत ने भोलानाथ को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा, “तुम कौन हो? और मेरे जंगल में सफेद चादर ओढ़कर क्या कर रहे हो?”

भोलानाथ की आवाज काँपने लगी। वह बोला, “महाराज, मैं एक साधु हूँ। बस रास्ता भटककर यहाँ आ गया।”

भूत ने उसकी नकली दाढ़ी की ओर इशारा किया। “अच्छा! तो साधु महाराज की दाढ़ी एक तरफ से क्यों लटक रही है?”

भोलानाथ ने दाढ़ी ठीक करने की कोशिश की, लेकिन वह उसके हाथ में ही आ गई। अब भूत जोर-जोर से हँसने लगा।

“वाह महाराज! ऐसी दाढ़ी तो मैंने पहली बार देखी है। इसे देखकर तो मैं भी डर जाऊँ!”

भोलानाथ शर्म से लाल हो गया। उसने दाढ़ी जेब में रखी और हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, मुझे जाने दीजिए। मैं किसी को नहीं बताऊँगा कि आप यहाँ रहते हैं।”

भूत ने आँखें तरेरकर कहा, “मुझे सब पता है। तुम गाँव वालों को डराकर पैसे लेते हो और फिर खुद ही भूत बनने चले आते हो। क्या तुम्हें लगता है कि जंगल में रहने वाले भूतों को कुछ पता नहीं चलता?”

भोलानाथ हैरान रह गया। उसने पूछा, “आपको यह सब कैसे पता चला?”

भूत बोला, “शाम को तुम इसी पेड़ के नीचे बैठकर अपनी योजना की बातें कर रहे थे। मैं पास ही बैठा सब सुन रहा था। तुमने तो यह भी कहा था कि भूत बनना दुनिया का सबसे आसान काम है!”

भोलानाथ ने सिर झुका लिया। अब उसके पास झूठ बोलने का कोई बहाना नहीं था।

भूत ने कहा, “चलो, तुम्हें एक ऐसी जगह दिखाता हूँ जहाँ तुम्हारी सारी अकड़ निकल जाएगी।”

भोलानाथ ने डरते-डरते पूछा, “वहाँ कोई खजाना तो नहीं है?”

भूत मुस्कुराया। “खजाना भी समझ लो। चलो, खुद देख लेना!”

कुएँ में फँसा ढोंगी साधु

भूत भोलानाथ को जंगल के अंदर ले जाने लगा। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था और दोनों तरफ घनी झाड़ियाँ थीं। भोलानाथ बार-बार पीछे मुड़कर देखता, लेकिन भूत उसे आगे चलने का इशारा करता।

कुछ दूर जाने के बाद वे एक पुराने कुएँ के पास पहुँचे। कुएँ के आसपास लंबी घास उगी थी और किनारे की मिट्टी गीली थी।

भूत ने कहा, “महाराज, जरा नीचे झाँककर देखो। तुम्हारे लिए एक खास चीज रखी है।”

भोलानाथ ने सावधानी से नीचे देखा। उसे कुएँ में पानी और अपनी परछाईं दिखाई दी। तभी भूत ने पीछे से हल्की-सी आवाज निकाली।

भोलानाथ घबराकर पीछे हटा, लेकिन उसका पैर गीली मिट्टी पर फिसल गया।

धड़ाम!

वह सीधे कुएँ में जा गिरा। सौभाग्य से कुएँ में ज्यादा पानी नहीं था, लेकिन गिरने से उसके कपड़े मिट्टी से भर गए। उसकी सफेद चादर एक निकली हुई जड़ में अटक गई।

वह चिल्लाया, “बचाओ! कोई मुझे बाहर निकालो! भूत महाराज, मुझे ऊपर खींच लीजिए!”

भूत कुएँ के ऊपर खड़ा होकर हँसने लगा। उसने पूछा, “क्यों महाराज, खजाना कैसा लगा?”

भोलानाथ बोला, “मुझे खजाना नहीं चाहिए। मुझे बस बाहर निकाल दीजिए। मैं आज के बाद किसी को धोखा नहीं दूँगा!”

भूत ने कहा, “पहले बताओ, गाँव वालों से लिए पाँच हजार रुपये कहाँ रखे हैं?”

भोलानाथ तुरंत बोला, “मेरी झोपड़ी में पुराने बक्से के अंदर! आप चाहें तो सारे पैसे ले लीजिए, बस मुझे बाहर निकाल दीजिए।”

भूत ने सिर हिलाया। “मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। वे पैसे गाँव वालों को लौटाने होंगे।”

इसके बाद भूत ने पास पड़ी एक मजबूत बेल नीचे लटका दी। भोलानाथ ने उसे कसकर पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। काफी कोशिश के बाद वह कुएँ से बाहर निकल आया।

बाहर आते ही उसने राहत की साँस ली। मगर भूत ने तुरंत कहा, “अभी तुम्हारी मुसीबत खत्म नहीं हुई। सुबह गाँव वालों को तुम्हारी सारी सच्चाई पता चलेगी।”

सुबह गाँव वालों के सामने खुली पोल

सुबह कुछ गाँव वाले लकड़ियाँ लेने जंगल की ओर आए। उन्होंने कुएँ के पास भोलानाथ को बैठे देखा। उसके कपड़ों पर मिट्टी लगी थी, नकली दाढ़ी गायब थी और माथे का तिलक भी मिट चुका था।

एक आदमी ने हैरानी से पूछा, “महाराज, आपकी यह हालत किसने कर दी? क्या रातभर भूत से लड़ते रहे?”

भोलानाथ ने थके हुए स्वर में कहा, “लड़ाई ऐसी हुई कि मेरी सारी साधु वाली ताकत बाहर निकल गई!”

गाँव वाले उसकी बात सुनकर एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। तभी पास के पेड़ के पीछे से भूत की जोरदार हँसी सुनाई दी। सब लोग डरकर पीछे हट गए।

भूत सामने आया और बोला, “डरो मत! मैं तुम लोगों को नुकसान पहुँचाने नहीं आया। मैं बस इस नकली साधु की सच्चाई बताने आया हूँ।”

गाँव के बुजुर्ग ने भोलानाथ से पूछा, “क्या यह सच है कि तुमने भूत की झूठी कहानी सुनाकर हमसे पाँच हजार रुपये लिए थे?”

भोलानाथ ने सिर झुका लिया। उसने डरते-डरते कहा, “हाँ, यह सच है। मैं आप सबको बेवकूफ बना रहा था। मुझे माफ कर दीजिए।”

तभी एक छोटा बच्चा आगे आया और बोला, “महाराज, अब भूत भगाने का कितना पैसा लोगे? या फिर पहले अपनी दाढ़ी वापस खरीदोगे?”

यह सुनते ही गाँव वाले हँस पड़े। भोलानाथ ने बच्चे को देखा और शर्म से अपना चेहरा छिपा लिया।

बुजुर्ग ने सख्ती से कहा, “मजाक बहुत हुआ। अब घर चलो और हमारे पैसे वापस करो। अगर दोबारा किसी को धोखा दिया, तो गाँव में तुम्हारी कोई मदद नहीं करेगा।”

भोलानाथ सबको अपनी झोपड़ी पर ले गया। उसने पुराने बक्से से पैसे निकाले और गाँव वालों को लौटा दिए। उसने वादा किया कि अब वह कभी झूठ बोलकर किसी से पैसा नहीं लेगा।

नकली साधु ने सीखा ईमानदारी का सबक

उस दिन के बाद भोलानाथ ने साधु का भेष बनाना छोड़ दिया। उसे समझ आ गया कि दूसरों को बेवकूफ बनाकर पैसा कमाना आसान लग सकता है, लेकिन इसका अंजाम बुरा होता है।

कुछ दिनों तक वह गाँव में लोगों से नजरें चुराता रहा। जब भी कोई उसे देखता, वह शर्म से सिर झुका लेता।

एक दिन गाँव के बुजुर्ग ने उसे समझाया, “भोलानाथ, गलती हर इंसान से होती है। लेकिन समझदार वही है जो अपनी गलती सुधार ले। अगर तुम्हें पैसे कमाने हैं, तो मेहनत करो।”

भोलानाथ ने उनकी बात मान ली। उसने बाजार में एक छोटी-सी चाय की दुकान खोल ली। शुरुआत में बहुत कम ग्राहक आते थे, लेकिन वह ईमानदारी से काम करता रहा।

धीरे-धीरे उसकी चाय मशहूर हो गई। अब गाँव वाले उससे चाय पीने आते और उसके साथ हँसी-मजाक भी करते।

एक दिन वही छोटा बच्चा दुकान पर आया और बोला, “भोलानाथ चाचा, आज चाय में भूत तो नहीं डाल दिया?”

भोलानाथ हँसकर बोला, “नहीं बेटा! अब मेरी चाय में सिर्फ दूध, चायपत्ती और चीनी पड़ती है। भूत तो अपने जंगल में ही रहता है!”

सब लोग हँस पड़े।

लेकिन रात में जब भी बरगद के पेड़ की तरफ से कोई अजीब आवाज आती, भोलानाथ दुकान जल्दी बंद कर देता। वह मन ही मन कहता, “मेहनत करना मंजूर है, लेकिन उस भूत से दोबारा मुलाकात नहीं चाहिए!”

कहानी से मिलने वाली सीख

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि दूसरों को धोखा देकर पैसा कमाना गलत है। झूठ और लालच से कुछ समय के लिए फायदा हो सकता है, लेकिन सच्चाई एक दिन सामने आ ही जाती है। हमें ईमानदारी से मेहनत करनी चाहिए और किसी के डर या विश्वास का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए। अपनी गलती मानकर उसे सुधार लेना भी अच्छी बात है। भोलानाथ ने जब धोखा छोड़कर मेहनत शुरू की, तभी उसे लोगों का भरोसा और सम्मान वापस मिला।

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