तीर लगी चिड़िया – महात्मा बुद्ध की कहानी । Mahatma Buddha Story In Hindi । Story Of Mahatma Buddha ।

तीर लगी चिड़िया - महात्मा बुद्ध की कहानी । Mahatma Buddha Story In Hindi । Story Of Mahatma Buddha । by Hindirama.com

तीर लगी चिड़िया – Mahatma Buddha Story In Hindi

कपिलवस्तु का राजमहल सुबह की सुनहरी रोशनी में नहा रहा था । महल के बगीचों में खिले फूलों की खुशबू हवा में घुलकर वातावरण को और भी मधुर बना रही  थी  । राजकुमार सिद्धार्थ अपने स्वभाव के अनुसार महल की चहल – पहल से दूर प्रकृति के बीच टहल रहे थे।

उनके मन में बचपन से ही एक अनोखी  शांति और करुणा का भाव था। वे पेड़ों की पत्तियों को हिलते हुए देखती , पक्षियों की चहचहाहट सुनते और हर जीव में जीवन की धड़कन को  महसूस करते थे।  उन्हे ऐसा लगता था जैसे प्रकृति उनसे कुछ कह रही हो, जैसे हर जीव का दुख और सुख उनके अपने ह्रदय से  जुड़ा हो।

उसी समय आकाश में उड़ती हुई एक सुंदर सफेद चिड़िया अचानक दर्द से चीखती हुई नीचे गर पड़ी। उसके पंखों को चीरता हुआ एक तेज तीर उसके शरीर में गुस गया , वह तड़प रही थी उसकी आँखों में भय साफ दिखाई दे रहा था।

राजकुमार सिद्धार्थ का ह्रदय यह देख कर कांप उठा , वे तुरंत दौड़  कर उस चिड़िया के पास पहुंचे, और उसे अपनी गोद में उठा लिया उनके हाथ कांप रहे थे लेकिन आँखों में करुणा का सागर उमड़ आया था।

⇒  सिद्धार्थ  ने बड़े प्यार से उस तीर को देखा जो उस चिड़िया के शरीर पर लगा था। उन्होंने तुरंत अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़ा और बहुत सावधानी से तीर निकालने लगे ताकि चिड़िया को और अधिक पीड़ा ना हो।

चिड़िया दर्द से कांप रही थी लेकिन सिद्धार्थ के कोमल स्पर्श से जैसे उसको फिर से जीवन मिल गया हो। तीर निकलते ही रक्त की एक पतली धारा बहने लगी ।  सिद्धार्थ ने अपने हाथों से उसके घाव को दबाया और पास के जल से उसको साफ किया ।

उन्होंने चिड़िया को गोद में रख कर धीरे – धीरे सहलाया । उनकी आँखों में आँसू थे, जैसे किसी अपने की पीड़ा  को देखकर निकल आते हैं। वे बार – बार कहते – डर मत, अब तुम सुरक्षित हो। उनकी आवाज में इतना प्रेम था कि चिड़िया धीरे – धीरे शांत होने लगी।

ऐसा लग रहा था मानो वह भी समझ रही हो कि यह बालक उसका शत्रु नहीं, बल्कि जीवनदाता है।

तभी वहाँ देवदत्त आ पहुँचा , जो सिद्धार्थ का चचेरा भाई था, उसके हाथ में धनुष था, और चेहरे पर घमंड भरी मुस्कान । उसने आते ही कहा सिद्धार्थ ! वह चिड़िया मेरी है। मैंने ह उसपे तीर चलाया है उसेे मुझे लौटा दो , उसकी आवाज में अधिकार और अहंकार दोनों झलक रहे थे।

सिद्धार्थ ने शांत होकर जवाब दिया – देवदत्त यह चिड़िया अब मेरी शरण  में हैं, यह घायल है, और इसे जीवन की आवश्यकता है। इसे मन तुम्हें कैसे दे दूँ ,,, ? देबदत्त ने हँसते हुए कहा, जिसपर मेरी तीर लगी हो वह सिर्फ मेरा ही शिकार है। यह मेरा अधकर है । लेकिन सिद्धार्थ की आँखों में दृढ़ता थी।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और अंततः यह निर्णय लिया गया कि राजा शुद्धोधन के दरबार में इसका न्याय होगा। दरबार सजाय गया । मंत्री , गुरु और विद्वान वहाँ उपस्थित थे। बीच में यह घायल चिड़िया सिद्धार्थ की गोद में  थी, जो अब कुछ शांत हो चुकी थी।

देवदत्त ने अपनी  बात  रखते हुए कहा, महाराज ! यह चिड़िया मेरी है , क्योंक मैंने इसका शिकार किया है। शिकार करने वाले का ही उस पर अधिकार होता है। दरबार में बहुत से लोग उसकी बात से सहमत थे ।

फिर सिद्धार्थ की बारी आई , उन्होंने बहुत शांत और करूना से भरी आवाज में कहा – महाराज , यह सत्य है कि देवदत्त ने इस पर तीर चलाया, लेकिन उसके इसे मारने का प्रयास किया। मैंने इसके प्राण बचाए हैं। क्या जीवन लेने वाले का अधिकार है या जीवन देने वाला का ?

यह प्रश्न सुनकर पूरा दरबार मौन हो गया। हर कोई इस बालक की बुद्धिमता और करुणा को देखकर आश्चर्य में थे। राजा शुद्धोधन भी कुछ क्षण के लिए विचार में डूबे थे। उन्हे लगा यह केवल चिड़िया का विवाद नही , बल्कि जीवन के मूल्य का प्रश्न है ।

दरबार में बैठे वृद्ध और ज्ञानी मंत्री ने कहा महाराज ! जीवन पर अधिकार उसी का होना चाहिए जो उसे बचाए , न कि उसको जो नष्ट करना चाहता हो। राजकुमार सिद्धार्थ का पक्ष ही धर्म और न्याय के अनुसार सही है।

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यह सुनते ही दरबार में सहमति की आवाज उठने लगी । राजा शुद्धोधन ने निर्णय सुनाया – यह चिड़िया सिद्धार्थ के पास ही रहेगी। क्योंकि जीवन बचाने वाला ही सच्चा स्वमी होता है।

देवदत्त क्रोध से भर उठा लेकिन वह कुछ कर ना सका । सिद्धार्थ ने अब उस चिड़िया को और भी  प्यार से अपने पास रखा और देखभाल करने लगा । कुछ ही दिनों में वह चिड़िया फिर से उड़ने लायक हो गई।

जिस दिन चिड़िया पंख फैलाकर आसमान में उड़ने को तैयार हुई सिद्धार्थ मुस्कुरा रहे थे, उनके चेहरे पर एक अद्भुत शांति थी उन्हे ऐसा लगा जैसे केवल वह एक जीव को नहीं बल्कि पूरी करुणा से मुक्त कर दिया।

यह घटना सिद्धार्थ के जीवन की एक चोटी सी घटना थी, लेकिन इसमे उनके अंदर बसे बुद्धत्व को दिखाता है। बचपन से ही उनके ह्रदय में हर जीव के लाइ समान प्रेम और करुणा थी ।

इस घटना ने दिखाया कि सच्चा अधिकार शक्ति से नही करुणा से मिलता है। किसी का जीवन लेना आसान है लेकिन उसे बचाना महानता है।

आगे चलकर यह सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने और उन्होंने पूरी दुनिया को अहिंसा और करुणा का मार्ग दर्शन करवाया। तीर लगी चिड़िया को यह आज भी हमे यह याद दिलाती है कि हर जीव में जीवन  है, और उस जीवन की रक्षा करना ही हमारा कर्तव्य है।

सीख :करुणा ही सच्ची शक्ति है। जीवन बचाने वाला ही सच्चा विजेता होता है।

 

Author: Hindi Rama

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