
पुत्रदा एकादशी व्रत कथा – और वर्णन 〈 Putrada Ekadashi Vrat Katha In Hindi 〉
» पत्रदा एकादशी पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं । इस साल यह एकादशी 10 जनवरी 2025 को हैं । मान्यता हैं कि यदि संतान सुख से वंचित दंपत्ति इस व्रत को करे और विधि विधान से इसकी पूजा करें , व पूरी व्रत की कथा का पाठ सच्चे मन से करें । तो व्रत का सम्पूर्ण फल जरूर मिलता हैं । और शीघ्र ही उनके घर में खुशखबरी आती हैं । तो आपको बताएं पुत्रदा एकादशी व्रत कथा को पूरे विस्तार से ।
» भगवान श्री कृष्ण जी नें युधिष्ठिर से कहा – राजन ! पौष के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी हैं । उसे मैं तुम्हें बतलाता हूँ , सुनो ! संसार के हित की इच्छा से मैं इसका वर्णन करता हूँ । राजन ! पूर्वोत्तत विधि से ही यत्नपूर्वक इसका व्रत करना चाहिए इसका नाम पुत्रदा हैं यह सब पापों को हरनें वाली उत्तम तिथि हैं । समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता ” भगवान नारायण ” इस तिथि के अधिदेवता हैं चराचर गणियों सहित ” समस्त त्रिलोकी ” में इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं हैं ।
!! पुत्रदा एकादशी सम्पूर्ण कथा !!
» पूर्वकाल की बात हैं , भद्रावती पूरी में राजा सुकेतुमान राज्य करतें थें । उनकी रानी का नाम चम्पा था । राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र प्राप्त नहीं हुआ । इसलिए दोनों पति पत्नी सदा चिंता और शोक में डूबे रहते थें । राजा के पित्तर उनके दिए हुए जल को बड़े ही शोक के साथ पीते थे । और यह सोचते थें , कि राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखाई देता , जो हम लोगों का तर्पण करेगा । ” यह सोच – सोच कर उस राजा के पित्तर हमेशा दुखी रहतें थें ।
» एक राजा घोड़े पर सवार होकर गहन वन में चलें गए । पुरोहित आदि किसी को भी इस बात का पता न था । मृग और पक्षियों से सेवित उस सघन कानन वन में राजा भ्रमण करनें लगे । मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनाई पड़ती थीं । तो कहीं उल्लुओ की । जहाँ – तहाँ रीछ और मृग दृष्टिगोचर हो रहें थें । इस प्रकार राजा घूम – घूम कर राजा वन की शोभा देख रहें थें । इतने में दोपहर हो गई । अब राजा को भूख और प्यास सताने लगी ।
» वे जल की खोज में इधर उधर दौड़ने लगे । किसी पुण्य के प्रभाव से उन्हे एक उत्तम सरोवर दिखाई दिया । जिसके समीप मुनियों के बहुत से आश्रम थें । शोभाशाली नरेश नें उन आश्रमों की ओर देखा , तो उस समय शुभ की सूचना देने वाले शकुन होने लगे ।
» राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा । जो उत्तम फल की सूचना दे रहा था । सरोवरके तट पर बहुत से मुनि वेद पाठ कर रहें थें । उन्हे देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ । वेगहोडे से उतरकर मुनियों के सामने खड़े हो गए । और पृथक – पृथक उन सबकी वंदना करनें लगें । यह सब मुनि उत्तम व्रत का पालन करने वाले थें । तब राजा नें हाथ जोड़कर बारम्बार दण्डवत किया ।
» तब मुनि बोले – राजन् ! हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं । राजा बोले – आप लोग कौन हैं ? आपके नाम क्या हैं । तथा आप लोग किसलिए यहाँ एकत्रित हुए हैं ? यह सब सच बताइए ।
» मुनि बोले – राजन् ! हम लोग विश्वेदेव हैं । यहाँ स्नान के लिए आए हैं । माघ निकट आया हैं । आज से पाँचवे दिन माघ का स्नान हो जाएगा । आज श्री ” पुत्रदा नामकी ” एकादशी हैं । जो व्रत करनें वालें मनुष्यों को पत्र देती हैं ।
» राजा नें कहा – विश्वेदेवगण ! यदि आप लोग प्रसन्न हैं , तो मुझे पुत्र दीजिए । मुनि बोले – राजन् आज के ही दिन ” पुत्रदा नामकी ” एकादशी हैं । इसका व्रत बहुत ही विख्यात हैं । तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करों । महाराज भगवान केशव के प्रसाद से तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त होगा ।
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» इस प्रकार उन मुनियों के कहनें से उस राजा नें उत्तम व्रत का पालन किया । महर्षियों के उपदेश के अनुसार विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का अनुष्ठान किया फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारम्बार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आए । तदन्तर रानी नें गर्भ धारण किया ।
» प्रसवकाल आने पर पुण्यकर्मा राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट कर दिया । वह प्रजाओ का पालक हुआ ।
» इसलिए पुत्रदा एकादशी व्रत का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । यह व्रत पुत्र की प्राप्ति के लिए हर मनुष्य को पूरे पालन और निष्ठा के साथ अवश्य करना चाहिए । और इस व्रत को करके इस लोक मे पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात वह लोग स्वर्गगामी होते हैं । व भगवान नरयाण सभी एकादशी व्रत करने वालों की इच्छा जरूर पूरी करतें हैं । बोलो श्री नारायण