
वराह अवतार मे किया पृथ्वी का उद्धार । वराह अवतार » Varaha Avatar :
» ऐसा कहा जाता है की जगतपालक भगवान श्री विष्णु से प्रेम करना और बैर रखना दोनों ही मंगलप्रद होता है। जो भी प्रभु से निस्वार्थ प्रेम करता है, उसे तो बैकुंठ की प्राप्ति होती ही है। मगर जो प्रभु से शत्रुता करने का दुस्साहस दिखाता है, प्रभु उस पर भी भगवान अपनी दया की दृष्टि करते हुए विष्णुलोक मे जाने का सौभाग्य प्रदान करते है।
» तभी तो क्या खूब कहा गया है की , श्री हरी मनुष्य हृदय की समस्त भावनाओ से परे हैं। भगवान श्री विष्णु के दशावतारों मे से उनका तीसरा अवतार भी ऐसी ही एक रोचक कथा बताता है । हिरण्याक्ष नामक एक दश्यू के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्ति दिलाने के लिए प्रभु ने वराह रूप मे अवतार लिया था।
» आज हम आपको इसी कथा के बारे मे बताने जा रहे है। जब कश्यप ऋषि की पत्नी दिती की गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशीप नाम के दो जुड़वा शिशुओ ने जन्म लिया, तब समस्त पृथ्वी जैसे एक नकारात्मक ऊर्जा से भर गई। प्रकृति का हर कण जैसे यह दर्शाने लगा की इन दो दैत्यों के अत्याचार से आगामी दिनों मे पृथ्वी बहुत कंपित हो गई।
» कहा जाता है, की जो दैत्य पैदा होने के साथ ही बड़े हो जाते है, उनके उत्पात की कोई सीमा नही होती। यह दो जुड़वा भाई भी कुछ इसी प्रकार बड़े हो गए थे, दोनों भाइयों ने मिलकर , प्रजापति ब्रह्मा का कठोर तप किया और उनसे किसी भी मानव शरीर से मृत्यु ना प्राप्त करने का वरदान माँग लिया । बस फिर क्या था, ब्रह्मा से अजेयता व अमरता का वरदान प्राप्त कर, दोनों दैत्यों की स्वेच्छाचरिता और उद्दंडता की जैसे सभी सीमाये खत्म हो गई।
» हिरण्याक्ष ने अब तीनों लोको मे विजय प्राप्त करने का निर्णय कर लिया। और गदा लेकर इंद्रलोक चल पड़ा । सभी देवताओ को जब इस बात की सूचना मिली , तब वह सब इंद्रलोक छोड़ कर भाग गए। इंद्रलोक मे किसी को ना पाकर , हिरण्याक्ष तब वरुण देव की नगरी विभावरी की ओर चला। वहाँ जाकर उसने वरुण देव को युद्ध के लिए ललकारा , वरुण देव अत्यंत क्रोधित हुए, लेकिन उन्होंने उस क्रोध को मन मे दबाते हुए हिरण्याक्ष से कहा, आप इतने वीर योद्धा , मुझमे आपसे युद्ध करने की क्षमता कहां है? इस संसार मे अगर किसी मे आप से युद्ध करने की क्षमता है, तो वह श्री विष्णु है। आप उन्ही के पास जाए। ”
» वरुण देव की बात सुनकर , श्री हरी की खोज मे हिरण्याक्ष , देवर्षि नारद के पास पहुँचा और तब देवर्षि ने उसे बताया की श्री हरी अभी अपने वराह रूप मे पृथ्वी को रसातल से निकालने के लिए गए हुए हैं। नारद की बात सुन, हिरण्याक्ष रसातल पहुँचा तो उसने देखा की एक वराह अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाए लिए जा रहा है।
» ऐसा विस्मयकारी दृश्य कर हिरण्याक्ष मन ही मन सोचने लगा की कही यह वराह असल मे विष्णु तो नहीं ? सहसा उसने उस वराह से कहा,” अरे जंगली पशु! तू जल मे कहां लिए जा रहा है? इसे तो ब्रह्मा जी ने हमे दे दिया है । टू मेरे रहते पृथ्वी को रसातल से नही ले जा सकता । तू दैत्य और दानवों का शत्रु है, इस लिए आज मै तेरा वध कर डालूँगा । ”
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» इसके बाद हिरण्याक्ष ने प्रभु से और भी कई तीखे शब्द कहे , लेकिन प्रभु अपने पथ से टस से मस न हुए। हिरण्याक्ष ने तब फिर कहा, अरे विष्णु ! तू इतना कायर क्यों हैं, मैंने तुझसे इतने कटु शब्द कहे , फिर भी तुम मुझसे युद्ध नही कर रहा। ”
» इतना कुछ सुनकर भी श्री हरी का ध्यान हिरण्याक्ष पर नहीं गया। एक बाद पृथ्वी को अपने स्थान मे स्थापित कर देने के पश्चात श्री विष्णु की नजर हिरण्याक्ष पर पड़ी। उन्होंने हिसण्याक्ष से कहा, “तुम तो अत्यंत बलवान हो । बलवान लोग प्रलाप नही करते , बल्कि कार्य करके दिखाते है । तुम इतनी बाते क्यों कर रहे हो ? आओ मुझसे युद्ध करो। ”
» यह सुनते ही जैसे हिरण्याक्ष का खून खौल गया और वह भगवान विष्णु पर टूट पड़ा। प्रभु बड़ी आसानी से उस असुर के सभी शस्त्रों को नष्ट करते चले जा रहे थे। इसके बाद हिरण्याक्ष त्रिशूल लेकर विष्णु की ओर दौड़ पड़ा और प्रभु ने तब सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र के प्रकट होते ही, भगवान विष्णु ने उससे हिरण्याक्ष के त्रिशूल के टुकड़े – टुकड़े कर दिए और इसके पश्चात उसके कानों पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। यह थप्पड़ इतना टेज था की हिरण्याक्ष की आखे बाहर निकल आई और वह निश्चेष्ट होते हुए जमीन पर जमीन पर धराशायी हो गया ।
» इसके बाद उसी सुदर्शन चक्र से श्री हरी ने हिरण्याक्ष का वध करते हुए धरती पर उसके अत्याचारों पर सदा के लिए विराम लगा दिया। भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ चला गया और वहाँ के द्वार प्रहरी के रूप मे अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
» इधर अपने दांतों से जल पर पृथ्वी को स्थापित और हिरण्याक्ष का वध करने के पश्चात प्रभु के वराह अवतार भी अंतरध्यान हो गए।