समुद्र मंथन की पूरी कहानी – Samudra Manthan Story In Hindi । Samudra Manthan Ki Kahani ।

समुद्र मंथन की पूरी कहानी - Samudra Manthan Story In Hindi । Samudra Manthan Ki Kahani । by Hindirama.com

समुद्र मंथन की पूरी कहानी – Samudra Manthan Story In Hindi

बहुत प्राचीन समय की बात है। स्वर्ग में देवताओ  का राज था। वे सुख और शांति से रहते थे, इन्द्र उनके राजा थे । एक दिन इन्द्र को महर्षि दुर्वासा ने एक दिव्य माला दी। इन्द्र ने उस  माला की आदर नही की, और उसे अपनी हाथी ऐरावत के सिर पर रख दी।

हाथी ने उस माला को नीचे गिरा कर पैरों से कुचल दिया । महर्षि दुवसा  यह देख कर बहुत क्रोधित हुए , उन्होंने इन्द्र को श्राप दिया, की देवताओ की सारी शक्ति नष्ट हो जाए । श्राप के कारण देवताए धीरे – धीरे कमजोर होने लगे , ।

दैत्य शक्तिशाली जो गए और स्वर्ग   पर अधिकार करने लगे। हारकर सभी देवता गण विष्णु भगवान के पास पहुंचे , उन्होंने विनम्र होकर कहा प्रभु हमे बचाइए हमारी सारी शक्ति खत्म हो गई है, भगवान विष्णु ने कहा तुम्हें अमृत प्राप्त करना होगा ।

अमृत पीते ही तुम अमर और शक्ति शाली हो जाओगे , लेकिन अमृत क्षीर सागर में छिपा है। उसे निकलने के लिए समुद्र मंथन करना पड़ेगा देवता ने पुछा प्रभु यह कार्य कैसे होगा ? इस काम के लिए दैत्यों को भी साथ ले जाना होगा।

देवता दैत्यों के राजा बलि के पास गए , उन्होंने कहा समुद्र में अमृत छिपा है। चलो मिलकर उसे निकलते हैं और उसे बाँट लेते है , अमृत का नाम सुनते ही दैत्य भी तैयार हो गए, मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया ।

और वसुकी नाम की रस्सी , जब पर्वत को समुद्र में डाला गया तो वह डूबने लगा । तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया,,,,,, वे  एकविशाल कछुए का रूप लेकर समुद्र मे लेट गए , और अपनी पीठ पर पर्वत को संभाल लिया ।

अब मंथन शुरू हो चुका था। दैत्य  वासुकि के मुख की ओर और देवता उसकी पूछ की ओर खड़े थे जब मंथन होने लगा तो समुद्र में बड़ी हलचल होने लगी। लहरे उठने लगी और आकाश तक जल की बुँदे जाने लगी।

सबसे पहले समुद्र से भयानक विष निकला । उसका नाम …. हलाहल था। वह इतना खतरनाक था की उसकी गर्मी से तीनों लोक जलने लगा। देवता और दैत्य घबराकर भगवान शिव के पास पहुंचे उन्होंने कहा,,, प्रभु हमे बचाईए ..।

भगवन शिव ने संसार को बचाने के लिए वह विष पी लिया । माता पार्वती ने तुरंत उनका गला पकड़ लिया ताकि विष नीचे ना जाए । विष उनके कंठ में ही रुक गया। और उनका गला नीला हो गया , तभी से वे नीलकंठ कहलाये।

इसके बाद समुद्र  मंथन फिर से शुरू हुआ । समुद्र से सबसे पहले कामधेनु गाय निकली , फिर उच्चै: श्रवा घोडा निकला , उसके बाद ऐरावत हाथी निकला फिर कौस्तुभ मणि निकली जिसे भगवान विष्णु ने धारण किया।

इसके बाद कल्पवृक्ष निकला , जो  सभी इच्छयाएं पूरी करता है। फिर सुंदर अप्सराये निकली जो स्वर्ग में रहने लगी। कुछ समय बाद चंद्रमा निकला जिसे भगवान शिव ने मस्तक पर धारण कर लिया । तभी समुद्र में लक्ष्मी जी प्रकट हुई,,,,, वे कमल के फूल  पर बैठी थी सभी सभी देवता और दैत्य उन्हे देखते ही रह गए।

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लक्ष्मी जी ने विष्णु भगवान को अपने वर चुना , उनका विवाह सभी देवताओ ने बहुत प्रेम से  मनाया। मंथन चलता रहा फिर वारुणी देवी प्रकट हुई , उन्हे दैत्यों ने अपने पास रख लिया । अंत में भगवान धन्वन्तरित प्रकट हुए ।

उनके हाथ मे अमृत से भरा कलश था , अमृत को देखते ही दैत्यों ने उसे छीन लिया , देवता दुखी हो गए तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण  किया । मोहनी बहुत सुंदर थी दैत्य उन्हे देखती ही मोहित हो गए ।

मोहिनी ने कहा , मई अमृत सबको बराबर बाँट दूँगी, दैत्य मान  गए। मोहिनी ने दैत्यों और देवताओ को अलग – अलग बैठा दिया। फिर सारा अमृत देवताओ को पीला दिया । एक दैत्य राहू देवताओ के बीच बैठा था,,, जैसे ही उसने अमृत पिया सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया ।

भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया उसका सिर अमर हो गया , और राहू कहलाया। देवताओ को अमृत मिल गया वे फिर से शक्तिशाली हो गए । दैत्यों और देवताओ के बीच युद्ध हुआ और देवताओ की जीत हुई । स्वर्ग में फिर से सुख और शांति लौट आई।

इस प्रकार समुद्र मंथन पूरा हुआ और संसार को अनेक अनमोल रत्न मिले।

Author: Hindi Rama

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