पृथ्वीराज चौहान का इतिहास – History Of prithviraj Chauhan
⇒ भारत के मध्यकालीन इतिहास में कई वीर योद्धाओ का नाम आता है। लेकिन जिन योद्धाओ की गाथा आज भी लोगों के दिलों में गर्व और प्रेरणा जगाती है उनमे पृथ्वीराज चौहान का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। पृथ्वीराज चौहान सिर्फ एक राजा नही थे बल्कि वह राजपूत वीरता, स्वाभिमान और साहस के प्रतीक थे ।
⇒ उनकी कहानी केवल युद्धों कि कहानी नही है बल्कि यह एक ऐसे महान शासक की कथा है, जिसने कम उम्र में ही राज्य संभाला , अपने दुश्मनों का सामना किया और अपनी वीरता से इतिहास में अमर हो गया।
———————————————————
पृथ्वीराज का जन्म Birth Of Prithviraj Chauhan
⇒ पृथ्वीराज चौहान का जन्म लगभग 1149 ईस्वी में हुआ था जन्म स्थान राजस्थान के अजमेर में हुआ, माना जाता है। उस समय चौहान वंश उत्तर भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। उनके पिता राजा सोमेश्वर चौहान था जो अजमेर के शक्तिशाली शासक थे, उनकी माता का नाम रानी कर्पूरी देवी था।
⇒ जब राजमहल में यह समाचार फैला कि रानी ने के पत्र को जन्म दिया है, तब पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। मंदिरों में घंटियों बजीं, ब्राह्मणों को दान दिया गया और प्रजा ने अपने भावी राजा के जन्म पर खुशियां मनाई।
⇒ ऐसा कहा जाता है कि , पृथ्वीराज के जन्म के समय कई ज्योतिषियो को राजदरबार में बुलाया गया था। उन जयोषियों ने ग्रह, नक्षत्रो को देखकर भविष्यवाणी की थी, यह बालक साधारण नही है। वह आगे चलकर एक महान योद्धा बनोगे उसका नाम दूर – धूर्तक प्रसिद्ध होगा।
⇒ उसकी वीरता की गाथाएं पीढ़ियों तक सुनाई जाएगी, हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि उसके जीवन में बहुत बड़े युद्ध और कठिनईयां आएगी । यह भविष्यवाणी सुनकर राजा सोमेश्वर गर्व और चिंता दोनों से भर गए थे।
———————————————————
⇒ बचपन से ही पृथ्वीराज चौहान में कुछ ऐसी विशेषताए दिखाई देने लगी थी जो उन्हे अन्य लोगों से अलग दिखाता था। वह बहुत ही समझदार और जिज्ञासु थे जो हर बात को समझने की कोशिश करते थे। राजमहल में रहते थे परंतु उनके अंदर जरा सा भी घमंड नही था ।
⇒ वह प्रजा के लोगों से बह बहुत प्रेम पूर्वक बाते किया करते थे। उनके स्वभाव में साहस , आत्मविश्वास और तेजस्विता स्पष्ट दिखाई देती थी। जैसे – जैसे पृथ्वीराज बड़े होने लगे, पूरे राज्य में यह चर्चा होने लगी कि , बालक अपने पूर्वजों के तरह महान राजा बनेगा।
⇒ उनके माता – पिता ने यह निश्चय किया कि उन्हे बचपन से हइ ऐसी शिक्षा दी जाएगी जिससे वह केवल एक राजा ही नही बल्कि , एक महान योद्धा और न्यायप्रिय शासक बन सके।
बचपन और शिक्षा Childhood And Education
⇒ पृथ्वीराज चौहान का बचपन राजमहल की सुविधाओ में जरूर बीता , लेकिन उन्हे केवल सुख सुविधाओ में नही रखा गया। उनके माता – पिता का यह कहना था कि एक सच्चा राजा वही है , जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में बहुत मजबूत बना रहे ।
⇒ इसलिए बचपन से ही उन्हे अनुशासन और परिश्रम का महत्व सिखाया गया। राजमहल में विद्वान आचार्यों और गुरुओ को बुलाकर उन्हे शिक्षा दी जाने लगी। उनकी शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नही थी। उन्हे संस्कृत ,राजनीति , धर्मशास्त्र और इतिहास की शिक्षा दी गई ताकि वह राज्य की व्यवस्था को समझ सके।
———————————————————
⇒ इसके साथ हइ उन्हे युद्धकला की भी विशेष शिक्षा दी जाती थी क्योंकि उस समय राजाओ को अपने राज्य की रक्षा के लिए स्वयं युद्धभूमि में उतरना पड़ता था। पृथ्वीराज को तलवार चलाना , धनुष चलाना , भाला फेंकना और घुड़सवारी सिखाई गई।
⇒ बचपन में ही पृथ्वीराज ने अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था । कहा जाता है कि वह किसी भी कला को बहुत जल्दी सीख लेते थे । उनके गुरु अक्सर कहते थे कि ऐसा शिष्य उन्हे पहले कभी नही मिला। जब अन्य राजकुमार एक कला सीखने में कई वर्ष लगा देते थे, तब पृथ्वीराज उसे कुछ ही महीनों में सीख लेते थे।
⇒ पृथ्वीराज की सबसे प्रसिद्ध कला थी शब्दभेदी बाण चलाना । इस कला में योद्धा केवल आवाज सुनकर लक्ष्य को भेद सकता था। यह कला बहुत कठिन मानी जाती थी, और इसे सीखने में वर्षों लग जाते थे। लेकिन पृथ्वीराज ने इसे भी कम उम्र में ही सीख लिया था।
⇒ उनके गुरु जब उन्हे इस कला का अभ्यास कराते थे तो वह आँखों पर पट्टी बाँधकर केवल आवाज के आधार पर निशाना लगा देते थे। यह देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। पृथ्वीराज के जीवन में एक महत्वपूर्ण मित्र भी थे जिनका नाम था चंदबरदाई ।
———————————————————
⇒ चंदबरदाई बाद में उनके दरबार के कवि बने और उन्होंने पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओ को पृथ्वीराज रासो नामक ग्रंथ में लिखा। बचपन से ही दोनों में गहरी मित्रता थी। चंदबरदाई पृथ्वीराज की वीरता और बुद्धिमता से बहुत प्रभावित थे और अक्सर उनके साहस की प्रशंसा किया करते थे।
⇒ पृथ्वीराज केवल युद्ध कला में में ही बल्कि बुद्धि और नीति में भी बहुत तेज थे। जब राजदरबार में किसी विशप पर चर्चा होती थी , तो वह ध्यान से सबकी बाते सुनते थे और कभ – कभी ऐसी बुद्धिमत्ता बाते कहते थे कि, बड़े – बड़े मंत्री भी आश्चर्यचकित रह जाते थे ।
⇒ धीरे – धीरे यह स्पष्ट हो गया की आगे चल कर यह बालक एक महान शासक बनेगा । जैसे – जैसे वह किशोरावस्था की ओर बढ़े उनकी शक्ति और आत्मविश्वास भी बढ़ता गया । अब वह केवल राजकुमार ही नही बल्कि एक ऐसे योद्धा बन चुके थे कि वह किसी भी चुनौती कर सकते थे ।

कम उम्र में सिंघासन Ascending The Throne At A Young Age
⇒ पृथ्वीराज चौहान के जीवन के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वह अभी किशोर ही थे। उनके पिता राजा सोमेश्वर चौहान का अचानक निधन हो गया । यह घटना पूरे राज्य के लिए दुखद था। क्योंकि सोमेश्वर एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे।
⇒ उनके निधन के बाद राज्य को एक नए शासक की जरूरत थी और वह शासक कोई और नही बल्कि युवा पृथ्वीराज हइ थे। उस समय पृथ्वीराज की उम्र लगभग 13 वर्ष थी। इतनी कम उम्र में किसी राज्य का शासन संभालना बहुत कठिन कार्य था।
———————————————————
⇒ लेकिन राजदरबार के मंत्रियों और सेनापतियों ने यह विश्वास जताया कि पृथ्वीराज में वह क्षमता है जो उन्हे एक महान राजा बना सकती है इसलिए उन्हे अजमेर के सिंहासन पर बैठाया गया। शुरुआत में उनकी माता रानी कर्पूरी देवी और राज्य के अनुभवी मंत्रियों ने शासन चलाने में उनकी सहायता की।
⇒ लेकिन पृथ्वीराज केवल नाम का राजा नही रहना चाहता था , वह स्वयं राज्य की स्थिति को समझना चाहते थे । इसलिए वह दरबार की बैठकों में ध्यान से सबकी बाते सुनते थे और धीरे – धीरे प्रशासन के सभी कार्य सीखने लगे।
⇒ कुछ ही वर्ष मे पृथ्वीराज ने यह साबित कर दिया, कि वह केवल नाम के राजा नही बल्कि एक सच्चे शासक हैं। उन्होंने सेना को मजबूत किया , किलो की सुरक्षा बधाई और राज्य की सीमाओ पर विशेष ध्यान दिया
⇒ उनके नेतृत्व में सेना का मनोबल भी बहुत बढ़ गया था क्योंकि सैनिक जानते थे कि उनका राजा स्वयं एक महान योद्धा है। पृथ्वीराज की वीरता के चर्चे हर जगह होने लगी थी। कई छोटे राजाओ ने उनसे मित्रता करना खुद का भला समझा। वही कुछ ऐसे राजा भी थे जो उनकी बढ़ती शक्ति को देखकर डरने लगे थे।
———————————————————
⇒ लेकिन पृथ्वीराज कभी किसी से नही डरे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने राज्य की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान कम उम्र में एक शक्तिशाली राजा बन गए थे। लेकिन उनके जीवन की असली कहानी अभी शुरू हुई थी।
⇒ आगे चल कर उनके जीवन में प्रेम की एक ऐसी कहानी आने वाली थी, जिसने उत्तर भारत के इतिहास को बदल दिया । यह कहानी थी राजकुमारी संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान के प्रेम की कथा , जिसमे आगे चलकर कई बड़े युद्धों और घटनाओ को जन्म दिया।

संयोगिता और पृथ्वीराज की प्रेम कहानी Love Story Of Prithviraj Chauhan And Sanyogita
⇒ भारत के मध्यकालीन इतिहास में कई प्रेम कहानियाँ प्रसिद्ध हैं, लेकिन जो कहानी वीरता , साहस और रोमांच से भरी हुई है, वह है पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की कहानी । यह केवल एक साधारण प्रेम कथा नही थी, बल्कि इसमे राजाओ का अभिमान , राज्यो की राजनीति , युद्ध की आहट और दो प्रेमियों का विश्वास शामिल था।
⇒ यह कहानी उस समय की है जब उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजाओ का शासन था और उनमे से दो प्रमुख राजा थे अजमेर और दिल्ली के वीर शासक पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज के राजा जयचंद ।
⇒ पृथ्वीराज चौहान उस समय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध राजाओ में गिने जाते हैं। उनकी वीरता , कौशलता की चर्चा दूर – दूर तक फैली थी। कहा जाता था कि वह एक ऐसे योद्धा थे , जो युद्ध भूमि में दुश्मनों के दिल में भय पैदा कर देती है।
———————————————————
⇒ उनकी सेना मजबूत थी और उनके पास अनेक किले और विशाल राज्य था । उनकी इसी वीरता और प्रसिद्धि के लिए चर्चा कन्नौज के महल में भी पहुँच चुकी थी। जहा राजा जयचंद की सुंदर और बुद्धिमन पुत्री राजकुमारी संयोगिता रहती थी।
यह कहानी भी पढ़ें — तलाक की रात – शादी टूटने की कहानी । Emotional Story In Hindi । Divorce Hindi Story । Magazine Style Story In Hindi ।
⇒ संयोगिता केवल सुंदर हइ नही बल्कि अत्यंत बुद्धिमान भी थी। उन्हे बचपन से हइ शस्त्रों , कला और राजनीति की शिक्षा दी गई है। महल में अक्सर दूर – दूर के राज्यो की बाते होती थी और कई बार वीर राजाओ की कहानियाँ सुनाई जाती थी।
⇒ जब भी पृथ्वीराज चौहान की वीरता की चर्चा होती, संयोगिता बड़े ध्यान से उन कथाओ को सुनती थी । धीरे – धीरे उनके मन में उस वीर राजा के प्रति एक विशेष आकर्षण पैदा होने लगा। कहा जाता है कि एक दिन संयोगिता ने अपने महल के दसियों से बहुत हइ विस्तार में पुछा , ।
⇒ दसियों ने उनको उनके बारे में सब कुछ बताया कि पृथ्वीराज चौहान न केवल एक महान योद्धा हैं बल्कि अत्यंत सुंदर और तेजस्वी भी हैं। यह सुनकर संयोगिता के मन में उनके प्रति प्रेम और सम्मान की भावना और भी बढ़ गई।
⇒ वह अक्सर उनके बारे में सोचने लगी और मन ही मन उन्हे अपना जीवनसाथी मानने लगी। इसी बीच एक दिन कन्नौज के महल मे अजमेर से आए एक चित्रकार ने कई राजाओ के चित्र बनाए । उनके एक चित्र को देखा, तो वह उसे देखती ही रह गई ।
———————————————————
⇒ चित्र में पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई दे रहा है – हाथ में तलवार , सिर पर मुकुट और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक । उस पर चित्र ने संयोगिता के मन में उनके प्रति प्रेम को और गहरा कर दिया।
⇒ धीरे – धीरे संयोगिता का प्रेम इतना गहरा हो गया कि उन्होंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह विवाह करेंगी तो केवल पृथ्वीराज चौहान से ही करेंगी। लेकिन समस्या यह थी कि उनके पिता राजा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच पहले से ही राजनीतिक मतभेद थे।
⇒ दोनों राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और अहंकार की भावना थी। इसलिए यह प्रेम कहानी आगे चलकर एक बड़े संघर्ष का कारण बनने वाली थी। दूसरी ओर पृथ्वीराज को भी संयोगिता की सुंदरता और बुद्धिमता के बारे में कई बार सुनने को मिला ।
⇒ धीरे- धीरे यह बात उन तक पहुंची की कन्नौज की राजकुमारी पृथ्वीराज को बहुत सम्मान और प्रेम करती हैं। यह सुनकर पृथ्वीराज के मन में भी स्नेह और आकर्षण उत्पन्न हुआ । उस समय राजाओ को संदेश भेजने के लिए दूतों का उपयोग किया जाता था।
———————————————————
⇒ कहा जाता है कि संयोगिता ने अपनी एक विश्वसनीय दासी के जरिए पृथ्वीराज चौहान को संदेश भेजा था । उस संदेश में लिखा था की वह उन्हे अपना जीवनसाथी मान चुकी है। और जीवन भर उन्हे के लिए प्रतीक्षा करेंगी।
⇒ जब यह संदेश पृथ्वीराज चौहान तक पहुँचा तो, उनके मन संयोगिता के लिए और प्रेम बढ़ गया और उन्होंने उनको स्वीकार कर लिया । इस प्रकार बिना मिले ही दोनों के बीच एक गहरा प्रेम संबंध स्थापित हो गया था। लेकिन उन्हे ये भी पता था कि , यह प्रेम आसन नही हैं। उनके रास्ते में सबसे बड़ा बाधा राजा जयचंद थे , जो पृथ्वीराज को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानते थे।
संयोगिता का स्वयंबर The Swayamvar Of Princess Sanyogita
⇒ समय बीतता गया और राजकुमारी संयोगिता विवाह के लिए योग्य हो चुकी थी। उस समय राजघरानों में विवाह के लिए स्वयंवर परंपरा थी। स्वयंवर में कई राजाओ और राजकुमारो को आमंत्रित किया गया। और राजकुमारी स्वयं अपने पति का चीन करती हैं।
⇒ कन्नौज के महल मे इस स्वयंवर की तैयारियां शुरू हो गई। दूर- दूर के राज्यो के राजाओ और राजकुमारों को निमंत्रण भेजा गया। महल को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया पूरे नगर में उत्सव जैसा वातावरण था। लेकिन इस स्वयंबर के पीछे राजा जयचंद के मन में एक विशेष योजना थी।
⇒ राजा जयचंद पृथ्वीराज चौहान से बहुत नाराज थे और उन्हे अपमानित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान को निमंत्रण नही भेजा। इतना ही नही , उन्होंने महल के प्रवेश द्वार पर पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति बनवाकर उसे द्वारपाल की तरह खड़ा कर दिया।
⇒ ताकि यह दिखाया जा सके कि वह उन्हे एक साधारण द्वारपाल से अधिक महत्व नही देते। जब यह बात संयोगिता को पता चला तो वह बहुत दुखी हुई । लेकिन उन्होंने अपने मन में एक साहसी योजना बनाई। उन्होंने तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान को ही अपना पति मन चुकी हैं।
———————————————————
⇒ स्वयंवर का दिन आ गया , कन्नौज के विशाल सभा मंडप में देश के कई राजा और राजकुमार उपस्थित थे। सभी राजकुमार सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजे हुए थे और उत्सुकता से उस क्षण की प्रतिक्षा कर रहे थे जब राजकुमारी संयोगिता सभा में आएंगी।
⇒ कुछ हइ देर बाद संयोगिता हाथों में वरमाला लेकर सभा में प्रवेश करती है। पूरे मंडप में सन्नाटा छा जाता है। वह एक – एक कर सभी राजकुमारों को देखती हुई आगे बढ़ती हैं, लेकिन उनके मन में केवल एक ही नाम था – पृथ्वीराज चौहान ।
⇒ जब वह सभा के अंत तक पहुँचती है और उन्हे पृथ्वीराज दिखाई नही देते , तब वह बिना रुके सीधे महल के द्वार की ओर बढ़ जाती है जहाँ पृथ्वीराज की मूर्ती खड़ी थी। सभी लोग आश्चर्य से उन्हे देख रहे थे । अचानक संयोगिता ने उस मूर्ति के गले मे वरमाला डाल दी और घोषणा कर दी कि वही उनके पति है ।
⇒ उस क्षण अचानक एक तेज घोड़े की टापों की आवाज सुनाई देती है । दरवाजे के पास खड़े सैनिक घबरा जाते हैं क्योंकि वहाँ स्वयं पृथ्वीराज चौहान अपने घोड़े पर सवार खड़े थे। उन्होंने संयोगिता को तुरंत अपने घोड़े पर बैठाया और बिजली की गति से वहाँ से निकल गए।
⇒ यह घटना पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हो गई। राजा जयचंद इस घटना से अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने इसे अपना सबसे बड़ा अपमान माना। यही घटना आगे चलकर पृथ्वीराज चौहान और जयचंद के बीच गहरी दुश्मनी का कारण बनी और इतिहास की दिशा बदलने वाली साबित हुई।

जयचंद की गद्दारी कैसे हुई Treachery of King Jaichand
⇒ राजकुमारी संयोगिता के स्वयंवर की घटना के बाद कन्नौज के राजा जयचंद का क्रोध चरम पर पहुँच गया था। उन्हे लगा कि पृथ्वीराज चौहान ने न केवल उनकइ पुत्री को उनसे छीन लिया बल्कि पूरे राजपुत समाज के सामने उनका अपमान किया ।
⇒ राजदरबार में बैठे मंत्रियों और सैनिकों के सामने वह बार – बार इस घटना को याद करते और प्रतिशोध लेने की कसं खाते थे । उस समय राजा का सम्मान सबसे उच्च माना जाता था । और राजा जयचंद को यह अपमान बिल्कुल भी बरदास नही था।
⇒ धीरे- धीरे जयचंद के मन में पृथ्वीराज चौहान के लिए गहरी दुश्मनी पैदा हो गई। उन्होंने सोचना शुरू किया कि यदि पृथ्वीराज चौहान को किसी तरह कमजोर किया जाए तो कन्नौज की शक्ति पूरे उत्तर भारत में सबसे बड़ी हो सकती है। इसी सोच ने उनके मन में एक खतरनाक योजना को जन्म दिया।
⇒ उन्होंने अपने दूतों और जासूसों को विभिन्न राज्यों में भेजने का काम शुरू कर दिया । ताकि वह पृथ्वीराज की शक्ति और उनकी सेना की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सके । उसी समय उत्तर पश्चिम दिशा से एक और शक्ति भारत की ओर बढ़ रही थी।
———————————————————
⇒ यह शक्ति थी मोहम्मद गौरी की, जो अफगानिस्तान और गजनी के क्षेत्र से भारत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था। गौरी का उद्देश्य केवल लुटपाट नही था, बल्कि वह भारत मे अपना शासन स्थापित करना चाह रहा था।
⇒ उसे यह बात पता थी कि भारत में एक – दूसरे में मतभेद बहुत ही ज्यादा रहती है , तो इस चीज को जानते हुए उसने फायदा उठाने की कोशिश की । कहा जाता है कि इसी बीच जयचंद और मोहम्मद गौरी के बीच संपर्क हुआ था।
⇒ जयचंद ने अपने दूतों के जरिए मोहम्मद गौरी को संकेत भिजवाया । अगर वह पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध युद्ध करे तो उसको कन्नौज की तरफ से उनको कभी विरोध नही मिलेगा । और इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर मतभेद जरूर है, लेकिन कई लोककथाओ और परंपराओ में यह माना जाता है , कि जयचंद की इसी योजना ने पृथ्वीराज को कमजोर कर दिया था।
———————————————————
⇒ इसी प्रकार व्यक्तिगत अपमान और राजनितिक महत्वकांक्ष ने मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसने पूरे उत्तर भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया । पृथ्वीराज चौहान को अब केवल अपने राज्य की रक्षा ही बल्कि, बाहरी आक्रमणकारी से सामना करना भी था।
मोहम्मद गौरी साथ पृथ्वीराज चौहान के युद्ध
Battle between Prthvraj Chauhan and Mohammad Ghori
⇒ जब मोहम्मद गौरी ने भारत की और अपनी सेना बढ़ाई तो सबसे पहले उत्तर भारत के राज्यो को हराना था । उस समय सबसे शक्तिशाली राजाओ में से एक पृथ्वीराज चौहान थे। गौरी को पता था की जब तक पृथ्वीराज को ध्वस्त नही किया तब तक वो अपना राज्य स्थगित नही कर सकता है।
⇒ विभिन्न राजपूतों राजाओ को एकजुट करने की कोशिश की। उस समय राजपूत सेना अपनी वीरता और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध थी। उनके सेना तलवारबाजी , घुड़सवारी और धनुष चलाने में दक्ष थे। इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि पृथ्वीराज चौहान और गौरी के बीच कई बार संघर्ष हुआ, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण युद्ध तराईन के युद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए।
⇒ इस युद्धों ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। पृथ्वीराज चौहान की सेना में हजारों घुड़सवार और हाथी शामिल थे। दूसरी ओर मोहम्मद गौरी की सेना भी बड़ी और संगठित थी, जिसमे तुर्की घुड़सवार और कुशल धनुर्धर शामिल थे।
———————————————————
⇒ दोनों सेनाए जब युद्धभूमि मे आमने – सामने आई तो यह केवल दो राजाओ का युद्ध नही बल्कि दो शक्तियों का संघर्ष बन गया।

तराईन का पहला युद्ध (1191) First battle of Tarain
⇒ 1191 ईस्वी में तराईन के मैदान में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी की सेनाए पहली बार आमने – सामने आई। यह स्थान आज के हरीयाणा क्षेत्र के पास माना जाता है। युद्ध से पहले दोनों सेनाओ में जबरदस्त तैयारी हुई और सनिक युद्धभूमि में खड़े थे।
⇒ जैसे ही युद्ध शुरू हुआ , राजपूत सेना ने अत्यंत साहस के साथ हमला किया पृथ्वीराज चौहान के सेनापति और सैनिक पूरी शक्ति के साथ दुश्मन पर टूट पड़े । तलवारों की टकराहट , घोड़ों की दौड़ और युद्ध के नारों से पूरा मैदान गूंज उठा।
⇒ इस युद्ध मे पृथवराज चौहान की सेना ने अत्यंत वीरता दिखाई। कहा जाता उनके सेना पति गोवंद राय ने स्वयं गौरी पर हमला किया था। और उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया गौरी की सेना में अफरा – तफरी मच गई। और अंततः उसे युद्धभूमि छोड़ कर भागना पड़ा।
⇒ और इस प्रकार तराईन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की विजय हुई और इस युद्ध के बाद उन्होंने मोहम्मद गौरी का फिर से पीछा नही किया और उसे पूरी तरह खत्म करने का अवसर खो दिया ।
तराईन का दूसरा युद्ध (1192) Secound battle of Tarain
⇒ पहले युद्ध में हराने के बाद मोहम्मद गौरी ने हार नही मानी। वह अपने देश वापस गया और एक वर्ष तक अपनी सेना को बहुत ज्यादा मजबूत करना शुरू कर दिया। उसने अपनी सेना बढ़ाई । नई रणनीति बनाई ।
⇒1192 ईस्वी मे वह फिर से भारत लौटा तराईन के मैदान में पृथ्वीराज को चुनौती दी। इस बार उसकी सेना बहुत अधिक और मजबूत थी। युद्ध शुरू हुआ और इस बार गौरी ने नई रणनीति अपनाई । उसकी सेना ने बार – बार हमला करके राजपूत सेनाओ को थका दिया ।
⇒ धीरे – धीरे युद्ध की स्थिति पृथ्वीराज के खिलाफ हो रही थी। अंततः इस भीषण युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना पराजित हो गई । कई वीर राजपूत योद्धा युद्धभूमि में शाहिद हो गए। पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया यह घटना भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटना में से एक है ।
कैद और शब्दभेदी बाण की अंतिम कहानी Capture and the legendary saund – guided arrow
⇒ युद्ध के बाद पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया। वहाँ उन्हे कैद करके रखा गया और कई कथाओ के अनुसार उनकी आंखे फोड़ दी गई थी। लेकिन उनका साहस आत्मसम्मान अभी भी जिंदा था। कुछ समय बाद उनके मटर और कवि चन्दबरदायी भी गजनी पहुंचे।
⇒ उन्होंने किसी तरह मोहम्मद गौरी से अनुमति प्राप्त की कि , वह पृथ्वीराज की धनुर्विद्या का प्रदर्शन देखना चाहता है। गौरी को लगा कि एक अंधा राजा क्या हइ कर पाएगा , इसलिए उसने यह अनुमति दे दी। जब प्रदर्शन का समय आयाा टों चंदबरदाई ने एक विशेष कविता के माध्यम से पृथ्वीराज को संकेत दिया कि गौरी कहां बैठा है।
⇒ यह वही क्षण था जब पृथ्वीराज ने अपनी प्रसिद्ध कला शब्दभेदी बाण का प्रयोग किया। उन्होंने केवल आवाज के आधार पर तीर चलाया और वह तीर सीधे मोहम्मद गौरी को जा लगी। कहा जाता है कि इसी तीर से गौरी की मृत्यु हो गई ।
⇒ इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई ने भी वीरगति प्राप्त की ताकि वह दुश्मनों के हाथों अपमानित न हो। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान की जीवन कथा का अंत हुआ,।
⇒ लेकिन उनकी वीरता , साहस और उनकी स्वाभिमान की गाथा इतिहास में अमर हो गई। आज भी भारत में उनका नाम एक महान राजपूत योद्धा के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है।