जोधपुर के राजा के पाँच खजाने । Lost Treasure Mystery
⇒ बाली गाँव का राजा राजस्थान के जोधपुर राज्य के पास स्थित बाली गाँव में सूरज नाम का एक युवक रहता था। वह पूरे इलाके में अपनी ताकत और बहादुरी के लिए प्रसिद्ध था। गाँव के अखाड़े में उसे हराना लगभग मुश्किल माना जाता था ।
⇒ कई बार उसने अकेले ही कई पहलवानों को धूल चटा दी थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका साहस और बुद्धि थी ।
⇒ सूरज के दादाजी हरिनारायन अक्सर उसे राजा वीर प्रताप सिंह की कथा सुनाते थे ।
⇒ कहते है कि राजा ने अपने राज्य का बड़ा खजाना पाँच अलग – अलग स्थानों पर छिपा के रखा। उन्होंने ऐसा इसलिए किया था ताकि कोई लालची इंसान उसपर कब्जा ना कर सके ।
⇒ राजा चाहता था भविष्य में उस खजाने को खोजकर कोई ईमानदार व्यक्ति उसको गरीबों में बांटे ।
⇒ एक रात सूरज को अपने दादाजी के पुराने सन्दूक में एक डायरी मिली, डायरी के अंतिम पन्ने पर केवल एक वाक्य लिखा था — खजाने की पहली निशानी वहाँ मिलेगी जहाँ पीपल की छाया रात में गायब हो जाती है ।
⇒ अगले दिन सूरज अपनी बचपन की मित्र निशा के साथ उस रहस्य की खोज में निकल पडा ।
⇒ कई घंटों की तलाश के बाद वे एक पुराने पीपल के पेड़ तक पहुंचे । सूरज ने देखा कि शाम ढलने के बाद भी पेड़ की छाया दिखाई नही दे रही थी ।
⇒ दोनों ने पेड़ के नीचे खुदाई शुरू की । कई घंटे बाद उन्हे एक लोहे का बक्सा मिला ।
⇒ बक्से में कुछ सोने के सिक्के और नक्शा था। नक्शे पर पाँच लाल निशान बने हुए थे। तभी निशा बोली यह तो शुरुआत है,,, राजा ने खजाना तीन हिस्सों में बाँटा था।
पहले नक्शे का रहस्य
⇒ नक्शे का पहला संकेत उन्हे एक पुराने कुए तक ले गया। सूरज और निशा ने पूरे दिन खुदाई की , लेकिन कुछ नहीं मिला,। सूरज को पहली बार लगा की शायद नक्शा गलत है।
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⇒ तभी कुएं के दीवार पर उसको एक पत्थर दिखाई देता है। जिस पर राजा वीर प्रताप सिंह का चिन्ह बना हुआ था। पत्थर हटाते ही एक छोटा सा गुप्त कक्ष दिखाई दिया। अंदर एक सन्दूक रखा था।
⇒ सुन्दूक में सोने की अशर्फियाँ और दूसरा नक्शा रखा था। साथ ही एक संदेश लिखा था — सच्चा खोजी कभी पहली असफलता से नही डरता।
डाकुओ की नजर खजाने पर
⇒ सूरज को नही पता था कि उसकी हर गतिविधि पर कुछ लोग नजर रख रहे हैं। जोधपुर के आसपास सक्रिय डाकुओ का एक गिरोह भी इस खजाने के पीछे पड़ा हुआ था।
⇒ उनके सरदार का नाम था — कालिया । कालिया को खबर मिल चुकी थी की सूरज को पहला खजाना मिल चुका है।
⇒ एक रात जब सूरज और निशा जंगल से लौट रहे थे तब डाकुओ ने उन पर हमला कर दिया ।
⇒ डाकुओ की संख्या 8 थी । सूरज ने पुरी ताकत से मुकाबला किया ।
⇒ उसने एक डाकू को जमीन पर पटक दिया । दूसरे को मुक्का मारकर गिरा दिया । लेकिन इतने सारे डाकुओ से अकेले लड़ना आसान नही था।
⇒ तभी बाली गाँव के युवक उच्च वहाँ पहुँच गए। गाँववालों ने भी डाकुओ का सामना किया । डाकुओ को भागना पड़ा। उस दिन सूरज को समझ आ गया की यह काम बहुत कठिन है।
दूसरा खजाना और पहाड़ी गुफ़ा
⇒ दूसरा नक्शा उन्हे एक पहाड़ी गुफ़ा तक ले गया । गुफ़ा के अंदर अजीब आवाजें गूंज रही थी।
⇒ कई बार उन्हे लगा कि कोई उनका पीछा कर रहा है। लेकिन पीछे मुड़ने पर उनको कोई दिखाई नही दे रहा था।
⇒ गुफ़ा के अंत मे एक विशाल पत्थर का दरवाजा था। अंदर दूसरा खजाना छिपा था।
⇒ वहाँ सोने के , चांदी के बर्तन और तीसरे खजाने का नक्शा मिला। लेकिन एक और रहस्य उनका इंतजार कर रहा था।
⇒ दीवार पर लिखा था — तीसरे खजाने तक पहुंचे वाला रास्ता सच नहीं दिखाता ।
तीसरा खजाना और खतरनाक रेगिस्तान
⇒ तीसरे खजाने की खोज उन्हे जोधपुर के विशाल रेगिस्तान में ले गई। नक्शे में बने संकेत बार – बार बदलते हुए प्रतीत हो रहे थे। कई बार सूरज और निशा गलत दिशा में चले गए।
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⇒ उन्होंने तीन दिन एक लगातार खोज की लेकिन कुछ नही मिला। चौथे दँ सूरज को रेत में दबा रक पत्थर दिखाई दिया।
⇒ उस पर राजा की मुहर बनी हुई थी। पत्थर हटाने पर नीचे एक सूरंग मिली। सुरंग के अंदर तीसरा खजाना रखा हुआ मिला ।
⇒ वहाँ उन्हे हीरे – ज्वारत और चौथे खजाने का नक्शा मिला।
बूढ़ा रघुबीर और धोखा
⇒ चौथे खजाने के खोज के दौरान उन्हे रघुवीर नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति मिला।
⇒ उसने दावा किया की वह राजा के वंशजों के बारे में जानता है। शुरुआत में उसने उनकी मदद कि ।लेकिन बाद में पता चला की वह डाकुओ के साथ मिला है।
⇒ एक रात उसने नक्शा चुराने की कोशिश की और सूरज ने उसको रंगे हाथों पकड़ लिया। रघुवीर भाग गया लेकिन नक्शा नही ले जा पाया।
चौथा खजाना
⇒ मंदिर में एक गुप्त रास्ता था जिसे ढूँढना बहुत मुश्किल था। कई घंटों के बाद निशा को दीवार पर बना एक गुप्त चिन्ह नजर आया।
⇒ चिन्ह दबाते ही दीवार खुल गई। अंदर एक कक्ष था, जिसमे चौथा खजाना रखा हुआ था।
⇒ वहाँ सोने से भरे सन्दूक और पंचावे खजाने का अंतिम नक्शा मिला।
⇒ अब कालिया और उसके डाकुओ को अंतिम खजाने के बारे में भी पता चल चुका था, उन्होंने सूरज और निशा का पीछा किया, जैसे ही सूरज वहा पहुँचा डाकुओ ने उन्हे घेर लिया।
⇒ इस बार डाकुओ की संख्या बीस से ज्यादा थी। सूरज बहादुर टों था लेकिन इतना बड़ा मुकाबला नही कर सकता था,
⇒ तभी गाँव के लोग वहाँ पहुँच गए। मोहन काका ने पहले ही पूरे गाँव को इकट्ठा कर लिया था ।
⇒ गाँव वालों ने डाकुओ का सामना किया , कई देर तक संघर्ष चलता रहा। अंत में डाकू हार कर भाग गए।
पाँचवा खजाना और राजा वीर प्रताप का पेगाम
⇒ किले के नीचे एक बड़ा गुप्त कक्ष था। वहाँ सोने , चांदी और बहुमूल्य रत्नों से भरे कई सन्दूक रखा हुआ था।
⇒ लेकिन सबसे कीमती चीज एक पत्र था। वह पत्र स्वयं राजा वीर प्रताप ने लिखा था।
⇒ उसमे लिखा था — यदि तुम यहाँ तक पहुँच चुके हो तो समझो कि तुम धन से अधिक मूलवान चीज पा चुके हो।
⇒ यह खजाना केवल उस व्यक्ति के लिये है, जो इसे अपने लिए नही बल्कि लोगों के लिए उपयोग करें।
खजाने का सही मालिक
⇒ सूरज ने पांचों खजनों को अपने पास रखने का विचार कभी नही किया । उसने बाली गाँव और आसपास के गाँवों में धन बांटना शुरू कर दिया ।
⇒ कई गरीब परिवार के घर बन गए, स्कूल और अस्पताल बनाए गए।
⇒ किसानों की सहायता की गई। जिन लोगों के पास खाने तक के पैसे नही थे उनके जीवन बदल गए । धीरे – धीरे पूरा इलाका समृद्ध होने लगा।
आखिर रहस्यमयी खजाना
⇒ जब सूरज अंतिम संदूक को देखने गया तो उसमे एक और छोटा नक्शा रखा मिला ।
⇒ उस नक्शे में केवल एक पंक्ति लिखी थी — यह कहानी समाप्त नही हुई है । सूरज और निशा एक दूसरे को देखने लगे।
⇒ क्या राजा वीर प्रताप सिंह ने को और रहस्य भी छिपा रखा है। इसका उत्तर आज तक किसी को नही मिला।
⇒ और शायद यही राजा वीर प्रताप सिंह के खजाने का सबसे बड़ा रहस्य था।