महाकंजूस छेदीलाल की मजेदार कहानी। गाँव का सबसे बड़ा कंजूस कौन? The Biggest Miser In The Village


यह एक कंजूस छेदीलाल और उसकी पत्नी सरला की मजेदार हास्य कहानी हैं।

छेदीलाल की यह कहानी आपको हँसी, मनोरंजन, और हल्के-फुल्के रोमांच से भरपूर सफर पर जरूर ले जाएगी। 

इस कहानी में छेदीलाल हद से ज्यादा कंजूस होता हैं, और उसकी कंजूसी से उसकी पत्नी बहुत परेशान थीं। 

पूरे गाँव में उसकी कंजूसी को हर व्यक्ति जानता था। छेदीलाल कीआदते व हरकते पूरे गाँव को हँसने पर मजबूर कर देती हैं। 

तो यह हास्य मजेदार कहानी पढ़िए और कहानी के चुलबुले कंजूस छेदीलाल का पूरा हाल जानिए।             

गाँव का सबसे अनोखा आदमी छेदीलाल The Biggest Miser In The Village 

एक छोटे से गाँव में छेदीलाल नाम का व्यक्ति अपनी अजीब आदतों के कारण दूर-दूर तक मशहूर था।

लोग उसे मेहनती या अमीर नहीं, बल्कि पूरे गाँव का सबसे बड़ा कंजूस आदमी कहकर पुकारते थे।

छेदीलाल को ऐसा लगता था कि खर्च किया गया हर रुपया उससे हमेशा के लिए नाराज़ हो जाता है।

उसकी पत्नी सरला स्वभाव से हँसमुख, समझदार और बेहद मिलनसार थी। वह हर मुश्किल में भी मुस्कुराना जानती थी।

शादी के कुछ दिनों तक सरला को लगा कि उसका पति बहुत सादा जीवन जीना पसंद करता है।

लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि यह सादगी नहीं, बल्कि कंजूसी की ऐसी आदत है जिसकी कोई सीमा नहीं।

गाँव के बच्चे भी उसे देखते ही मुस्कुराने लगते थे, क्योंकि उसके नए-नए कारनामे रोज़ चर्चा का विषय बन जाते थे।

एक रुपया बचाने की छेदीलाल की अनोखी आदत

एक सुबह सरला ने देखा कि घर की झाड़ू पूरी तरह घिस चुकी थी और उससे सफ़ाई करना लगभग असंभव था।

उसने प्यार से कहा, “सुनिए, आज बाज़ार से नई झाड़ू ले आइए। पुरानी अब बिल्कुल काम नहीं करती।”

छेदीलाल ने झाड़ू को ध्यान से देखा, फिर मुस्कुराकर बोला, “अरे, इसमें अभी बहुत जान बाकी है।”

उसने झाड़ू के टूटे हिस्से को रस्सी से बाँधा और गर्व से बोला, “देखो, बिल्कुल नई जैसी हो गई।”

सरला ने झाड़ू उठाई तो उसका आधा हिस्सा फिर ज़मीन पर गिर गया।

वह हँसते हुए बोली, “नई नहीं बनी, बल्कि दो टुकड़ों में बँट गई है।”

छेदीलाल ने तुरंत जवाब दिया, “अच्छा ही हुआ, अब एक झाड़ू की जगह दो झाड़ू हो गईं।”

यह सुनते ही सरला अपनी हँसी रोक नहीं पाई और ज़ोर से खिलखिलाकर हँसने लगी।

चाय में भी चीनी का पूरा हिसाब 

हर सुबह छेदीलाल बड़े आराम से चाय बनाता, लेकिन चीनी डालते समय उसका चेहरा किसी बड़े व्यापारी जैसा हो जाता।

वह चम्मच में चीनी भरता, फिर आधी चीनी वापस डिब्बे में डाल देता।

सरला ने मुस्कुराकर पूछा, “इतनी बचत किस दिन काम आएगी?”

छेदीलाल ने गर्व से कहा, “बूँद-बूँद से घड़ा भरता है और दाना-दाना बचाकर आदमी अमीर बनता है।”

तभी पड़ोसी भोलारम वहाँ आ पहुँचा और सारी बातें सुनकर हँसी रोकने लगा।

भोलारम बोला, “भाई, तुम तो एक दिन चाय की भाप भी बोतल में भरकर रख दोगे।”

छेदीलाल ने पूरी गंभीरता से उत्तर दिया, “अगर उससे अगली चाय बन जाए, तो इसमें बुराई ही क्या है?”

इतना सुनते ही भोलारम ज़ोर से हँसा और उसकी हँसी सुनकर आसपास के लोग भी इकट्ठा हो गए।

एक बुज़ुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “बेटा, तुम्हारी कंजूसी पर तो किताब लिखी जा सकती है।”

छेदीलाल ने सीना चौड़ा करके कहा, “अगर किताब छपेगी, तो उसे भी मैं आधे दाम में ही खरीदूँगा।”

यह सुनते ही पूरा चौपाल ठहाकों से गूँज उठा और सरला हँसते-हँसते अपनी आँखों के आँसू पोंछने लगी।


कॉन्ट्रेक्ट वाली दुल्हन भाग 1 

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शादी का न्योता और छेदीलाल की नई योजना

उसी शाम पड़ोस के घर से शादी का निमंत्रण आया और पूरे परिवार को अगले दिन आने के लिए बुलाया गया।

निमंत्रण पढ़ते ही सरला खुशी से तैयारियों की बातें करने लगी, लेकिन छेदीलाल के चेहरे पर अलग ही चमक दिखाई दे रही थी।

उसने मन ही मन ऐसा हिसाब लगाना शुरू किया, जिसे सुनकर अगले दिन पूरा गाँव हँसी से लोटपोट होने वाला था…

शादी में छेदीलाल का ऐसा कारनामा कि सब हँसते-हँसते लोटपोट हुए 

अगले दिन सुबह से ही छेदीलाल बार-बार घड़ी देख रहा था, जैसे उसे किसी बहुत बड़े इनाम का इंतज़ार हो।

सरला ने मुस्कुराकर पूछा, “इतनी जल्दी किस बात की है? शादी तो शाम को है।”

छेदीलाल धीरे से बोला, “जल्दी पहुँचेंगे, तो गरम-गरम पकवान सबसे पहले मिलेंगे।”

सरला ने हँसते हुए कहा, “तुम्हें दूल्हा-दुल्हन से ज़्यादा खाने की चिंता रहती है।”

शाम होते ही दोनों तैयार होकर शादी में पहुँच गए। पूरा पंडाल रोशनी और सजावट से चमक रहा था।

मेहमान एक-दूसरे से मिल रहे थे, बच्चे खेल रहे थे और हर तरफ़ खुशी का माहौल था।

लेकिन छेदीलाल की नज़र केवल भोजन वाले हिस्से पर टिकी हुई थी।

उसने धीरे से सरला से कहा, “पहले खाना खा लेते हैं, बाद में सबको बधाई दे देंगे।”

सरला ने सिर पकड़ लिया और बोली, “तुम कभी नहीं सुधरोगे।”

छेदीलाल बिना किसी की परवाह किए सीधे भोजन की पंक्ति में जाकर सबसे आगे खड़ा हो गया।

जैसे ही खाना परोसना शुरू हुआ, उसने अपनी थाली में हर पकवान दुगुनी मात्रा में रखवा लिया।

परोसने वाला युवक हैरानी से बोला, “भैया, और लोग भी लाइन में खड़े हैं।”

छेदीलाल मुस्कुराकर बोला, “मैं उनका हिस्सा नहीं ले रहा, बस अपना भविष्य सुरक्षित कर रहा हूँ।”

पास खड़े कुछ लोग उसकी बात सुनकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

तभी एक छोटा बच्चा अपने पिता से मासूमियत से बोला, “पापा, क्या अंकल होटल भी साथ ले जाएँगे?”

बच्चे की बात सुनते ही पूरा पंडाल ठहाकों से गूँज उठा।

छेदीलाल ने शर्म छिपाने के लिए मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसके कान लाल हो चुके थे।

मुफ्त की मिठाई शादी में से चुराई 

खाना समाप्त होने के बाद मिठाइयाँ परोसी जाने लगीं और छेदीलाल की आँखें फिर चमक उठीं।

उसने जेब से एक साफ़ रूमाल निकाला और धीरे-धीरे उसमें मिठाइयाँ रखने लगा।

सरला ने आश्चर्य से पूछा, “ये क्या कर रहे हो?”

छेदीलाल फुसफुसाकर बोला, “कल चाय के साथ काम आएँगी।”

तभी पीछे खड़े भोलारम ने यह नज़ारा देख लिया।

वह हँसते हुए ज़ोर से बोला, “अरे भाई, मिठाई खाओ… दुकान मत खोलो।”

आसपास खड़े सभी मेहमान खिलखिलाकर हँस पड़े।

छेदीलाल ने जल्दी से रूमाल जेब में रखने की कोशिश की।

लेकिन रूमाल खुल गया और सारी मिठाइयाँ सीधे ज़मीन पर बिखर गईं।

बच्चों ने तालियाँ बजाईं और कोई बोला, “लगता है मिठाइयाँ भी आज़ादी चाहती थीं।”

सरला अपनी हँसी बिल्कुल नहीं रोक पाई।

छेदीलाल चुपचाप मिठाइयाँ उठाने लगा, लेकिन जितनी उठाता, उतनी ही दूसरी तरफ़ लुढ़क जातीं।

पूरा माहौल हँसी से भर गया और दूल्हे तक को अपनी हँसी रोकना मुश्किल हो गया।


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अब तो घर लौटते समय भी नहीं बदली आदत

रात को घर लौटते समय सरला मुस्कुराते हुए पूरी घटना याद करके हँस रही थी।

छेदीलाल धीरे-धीरे चल रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि आखिर गलती कहाँ हुई।

अचानक रास्ते में उसे आधी टूटी हुई चप्पल दिखाई दी।

उसने तुरंत चप्पल उठाई और बोला, “इसे ठीक कर लेंगे, किसी दिन काम आ जाएगी।”

सरला ने माथा पकड़ लिया और हँसते हुए कहा, “घर में पहले से चार टूटी चप्पलें पड़ी हैं।”

छेदीलाल गर्व से बोला, “अच्छा है, अब पाँच हो जाएँगी।”

यह सुनकर सरला ज़ोर से हँसी और बोली, “अब तुम्हारी कंजूसी का इलाज करना ही पड़ेगा।”

उसी रात सरला ने मन ही मन एक ऐसी योजना बनाई, जिससे छेदीलाल की कंजूसी हमेशा के लिए यादगार बनने वाली थी…

पत्नी सरला नें किया कंजूसी का सबसे मज़ेदार इलाज

अगली सुबह सरला जल्दी उठी और पुराने लोहे का एक डिब्बा साफ़ करके बैठक के बीच में रख दिया।

उसने डिब्बे पर बड़े अक्षरों में लिखा, “बेवजह कंजूसी करने पर सौ रुपये जमा करें।”

थोड़ी देर बाद छेदीलाल वहाँ पहुँचा और डिब्बा देखकर चौंक गया।

उसने हँसते हुए पूछा, “यह नया नियम किसने बनाया है?”

सरला मुस्कुराकर बोली, “आज से घर में जो भी बिना वजह कंजूसी करेगा, उसे इसमें सौ रुपये डालने होंगे।”

छेदीलाल ने तुरंत कहा, “फिर तो यह डिब्बा हमेशा खाली रहेगा।”

सरला ने धीरे से जवाब दिया, “यह बात शाम तक पता चल जाएगी।”

छेदीलाल की पहली ही गलती महँगी पड़ गई

सुबह चाय बनाते समय छेदीलाल ने फिर चीनी आधी कर दी और गर्व से मुस्कुराने लगा।

सरला बिना कुछ बोले डिब्बा उसके सामने रखकर खड़ी हो गई।

छेदीलाल ने कहा, “इतनी-सी बात पर भी रुपये देने पड़ेंगे?”

सरला बोली, “जब चाय फीकी होगी, तो हँसी भी फीकी हो जाएगी।”

मजबूरी में छेदीलाल ने सौ रुपये डिब्बे में डाल दिए।

दोपहर में उसने पुरानी रस्सी जोड़कर कपड़े सुखाने की कोशिश की।

रस्सी बीच से टूट गई और सारे कपड़े फिर ज़मीन पर गिर पड़े।

सरला मुस्कुराई और फिर से डिब्बा उसकी ओर बढ़ा दिया।

छेदीलाल ने गहरी साँस ली और एक बार फिर सौ रुपये डाल दिए।

शाम तक डिब्बे में कई सौ रुपये जमा हो चुके थे।

पूरे गाँव में डब्बे की फैल गई खबर

अगले दिन पड़ोसी भोलारम घर आया और डिब्बा देखकर मुस्कुरा दिया।

उसने पूछा, “भाई, यह दान का डिब्बा है क्या?”

सरला हँसते हुए बोली, “नहीं, यह कंजूसी सुधारने का डिब्बा है।”

बात पूरे गाँव में फैल गई और लोग हँसते हुए यह डिब्बा देखने आने लगे।

बच्चे दरवाज़े पर खड़े होकर कहते, “आज कितने रुपये जमा हुए?”

छेदीलाल शर्म से मुस्कुरा देता और धीरे से अंदर चला जाता।

अब वह हर काम करने से पहले सोचने लगा कि कहीं फिर सौ रुपये न देने पड़ जाएँ।

छेदीलाल में आया सबसे बड़ा बदलाव

कुछ दिनों बाद घर का पुराना बल्ब फिर से खराब हो गया।

पहले की तरह उसे जोड़ने की जगह छेदीलाल इस बार नया बल्ब खरीद लाया।

सरला ने हैरानी से पूछा, “आज पुराना क्यों नहीं जोड़ा?”

छेदीलाल हँसते हुए बोला, “नया बल्ब सस्ता है, लेकिन सौ रुपये का जुर्माना महँगा पड़ता है।”

दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

उसी शाम उसने घर के लिए नई झाड़ू, नया डिब्बा और रसोई का ज़रूरी सामान भी खरीद लिया।

सरला की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

उसने मुस्कुराकर कहा, “लगता है अब मेरे पुराने वाले पति वापस आ गए हैं।”

छेदीलाल हँसते हुए बोला, “अब समझ गया हूँ कि समझदारी और कंजूसी दोनों अलग बातें हैं।”

मज़ेदार कहानी का मज़ेदार अंत

अगले रविवार छेदीलाल पूरे गाँव के बच्चों के लिए गरमा-गरम समोसे और मीठी जलेबी लेकर आया।

बच्चों ने खुशी से तालियाँ बजाईं और उसका धन्यवाद किया।

भोलारम मुस्कुराकर बोला, “आज तो लगता है सूरज पश्चिम से निकला है।”

छेदीलाल हँसते हुए बोला, “नहीं, बस मेरी अक्ल सही समय पर आ गई।”

पूरा गाँव ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा और सरला की आँखों में खुशी साफ़ दिखाई दे रही थी।

उस दिन के बाद लोग छेदीलाल को कंजूस नहीं, बल्कि समझदार और हँसमुख इंसान कहने लगे।

जब भी गाँव में उसकी बात होती, लोगों के चेहरे पर अपने-आप मुस्कान आ जाती।

छेदीलाल की इस कहानी से सीख

बचत करना अच्छी आदत है, लेकिन ज़रूरत की चीज़ों पर सही समय पर खर्च करना भी उतना ही ज़रूरी है।

समझदारी वहीं है, जहाँ बचत के साथ परिवार की खुशी और ज़रूरतों का भी ध्यान रखा जाए। इतनी ज्यादा कंजूसी घर बर्बाद करता है। 

तो मैं आशा करता हूँ, कि यह कंजूस छेदीलाल की कहानी नें आपका मनोरंजन और एक छोटी सिख जरूर दी होगी।   

समाप्त।

 

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