माया-मसान: भयानक मौत की आखरी बस। पुराना नेशनल हाइवे 13। The Ghost Bus Of Highway 13 


गोपाल उस भयानक काली रात से कैसे बचा? कैसे उस हाइवे की पुरानी भूतिया बस में वह फँसा?

लेकिन उसके डर नें आज बह उसके दिल में दहशत बना रखी हैं।

आज भी उसे आधी रात में उसी डरवानी बस का इंजन, आत्माओं की चीखें और भैरव काका की सफेद आँखें याद आती हैं।

पुराना नेशनल हाइवे 13 पर आज भी हर इंसान रात में नहीं जाता, क्योंकि वहाँ हैं माया मसान की भयानक आत्माओ का राज। 

तो पढ़िए पुराना नेशनल हाइवे 13, माया-मसान की बुरी आत्माएं और भैरव काका एक खतरनाक मौत के सोदागर।     

पुराना नेशनल हाइवे 13 की वह मनहूस रात। The Ghost Bus Of Highway 13 

पुराना नेशनल हाइवे 13 पर बहुत अंधेरा था। गोपाल की बाइक अचानक बंद हो गई और कोहरा छा गया।

वह बहुत थक चुका था। उसने फोन निकाला पर सिग्नल नहीं था। उसे बहुत डर लग रहा था।

जंगल से अजीब सी आवाजें आ रही थीं। गोपाल को महसूस हुआ कि कोई उसे घूर रहा है।

उसने बाइक को फिर चालू करने की कोशिश की। पर इंजन बिल्कुल ठंडा और बेजान पड़ा हुआ था।

हवा में कुछ बहुत ही अजीब गंध थी। गोपाल ने खुद को अकेला और बहुत लाचार महसूस किया।

उसे याद आया कि घर पर माँ इंतजार कर रही है। वह डर के मारे कांपने लगा था।

अंधेरी रात में उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। उसका दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।

आसपास के पेड़ ऐसे लग रहे थे जैसे वे उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हों।

ठंडी हवा उसकी जैकेट के अंदर तक जा रही थी। उसे मौत का साया पास दिख रहा था।

उसने अपनी जेब में टॉर्च ढूंढी। रोशनी जलाते ही उसे सड़क पर खून के धब्बे दिखाई दिए।

′सफ़र-ए-मौत′ की शुरुआत: भयानक बस और एक नया पैसेंजर     

तभी दूर से दो पीली रोशनी दिखीं। वह एक बहुत पुरानी बस थी जो आ रही थी।

वह बस बहुत डरावनी लग रही थी। उसका इंजन बहुत शोर कर रहा था। गोपाल ने हाथ हिलाया।

बस उसके पास आकर रुक गई। दरवाजा अपने आप खुला। गोपाल ने धीरे से अंदर कदम रखा।

बस के अंदर बहुत अंधेरा था। हवा में सड़ी हुई राख की गंध भरी हुई लग रही थी।

ड्राइवर की सीट पर कोई नहीं था। फिर भी बस अपने आप बहुत तेज चलने लगी थी।

गोपाल बहुत घबरा गया था। उसने खिड़की के बाहर देखा पर बाहर कुछ नहीं दिख रहा था।

बस का रंग पूरी तरह उखड़ा हुआ था। उस पर ‘सफ़र-ए-मौत’ शब्द साफ लिखे हुए थे।

बस का फर्श बहुत चिपचिपा था। गोपाल को लगा कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है।

हर जगह डरावनी खामोशी थी। बस के चलने की एक अजीब सी आवाज आ रही थी।

उसे लगा कि बस अब सड़क पर नहीं चल रही। वह हवा में उड़ रही है।

भैरव काका: जिंदा इंसान के मौत के सौदागर  

तभी बस के पीछे से एक बूढ़ा आदमी आया। उसका नाम भैरव काका था। वह डरावना था।

भैरव काका ने फटे कपड़े पहने थे। उनकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं। बहुत डर लग रहा था।

भैरव काका के हाथ में एक पुराना बैग था। उससे राख गिर रही थी। हर जगह राख थी।

काका ने गोपाल के कंधे को छुआ। उनका स्पर्श बहुत ठंडा था। गोपाल कांपने लगा था।

भैरव काका ने धीमी आवाज में टिकट मांगा। उनकी सांसों से बहुत गंदी बदबू आ रही थी।

गोपाल ने पैसे दिए पर काका ने नहीं लिए। काका ने एक काला पत्र निकाल दिया।

उस पत्र पर खून जैसा कुछ लिखा था। गोपाल समझ गया कि अब सब खत्म होने वाला है।

भैरव काका बहुत जोर से हंसे। उनकी हंसी किसी जंगली जानवर जैसी थी। बहुत भयानक आवाज थी।

काका ने बताया कि यह बस माया-मसान जा रही है। गोपाल के पसीने छूटने लगे थे।

काका का चेहरा बहुत डरावना था। उनकी सफेद आंखों में गोपाल को अपनी मौत दिख रही थी।


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बस के अंदर बैठी थीं लाशें…  जो गोपाल को घूर रही थीं  

गोपाल ने बाकी यात्रियों की ओर देखा। वे सब बहुत चुप थे। सब मृत लग रहे थे।

किसी का चेहरा नीला था तो किसी के कपड़े फटे थे। वे सब पत्थर जैसे बैठे थे।

गोपाल ने एक यात्री को छुआ। उसका हाथ आर-पार हो गया। वे सब रूहें थीं।

बस में रोने की आवाज आने लगी। पर कोई हिल नहीं रहा था। बहुत डरावना था।

खिड़की पर किसी ने नाखून खुरचे। गोपाल का गला सूख गया था। वह बहुत डरा हुआ था।

पास बैठी महिला की गर्दन घूम गई। वह बहुत जोर से चिल्लाई। गोपाल सन्न रह गया।

फर्श अब धीरे-धीरे पिघल रहा था। वहां से काला धुआं निकल रहा था। सब कुछ काला था।

सभी यात्रियों ने एक साथ गोपाल को देखा। सबकी आंखों से काला खून बहने लगा था।

वे सब धीरे-धीरे गोपाल की ओर बढ़ने लगे। गोपाल पीछे की सीट पर जाकर सिमट गया।

उसे समझ आया कि ये सब माया-मसान की रूहें हैं। अब वो यहां से नहीं निकल पाएगा।

माया-मसान का शापित द्वार: अंदर गया, तो लौटना मुश्किल  

बस एक भयानक काले दरवाजे के पास जहाँ रुकती हैं । उसे माया-मसान कहते थे। वह बहुत बड़ा था।

उस दरवाजे पर हड्डियां लटकी थीं। हवा में लाशों की महक थी। फिर बस तेजी से चल पड़ी।  गोपाल जोर से रोने लगा।

भैरव काका ने कहा कि बस अब नहीं रुकेगी। गोपाल ने दरवाजा तोड़ने की कोशिश की।

बस का दरवाजा बहुत सख्त था। बाहर आग और राख थी। रूहें वहां तड़प रही थीं।

गोपाल ने बस की खिड़की देखी। वह थोड़ी टूटी थी। उसने वहां वार करना शुरू किया।

पास खड़ी रूहों ने गोपाल का गला पकड़ लिया। उनकी पकड़ बहुत सख्त थी। वह मर रहा था।

उसने पूरी ताकत लगा दी। उसने कोहनी से शीशे पर मारा। शीशा बहुत जोर से टूटा।

जहरीली हवा बस के अंदर भर गई। गोपाल ने अपनी आँखें बंद कीं और छलांग लगा दी।

वह सड़क पर तेजी से गिरा। उसका सिर पत्थर से टकराया। उसे बहुत दर्द हो रहा था।

उसने पीछे देखा तो बस गायब हो चुकी थी। वहां सिर्फ काला धुआं बचा हुआ था।

हजारों आत्माओं नें गोपाल को घेरा, तो गोपाल की आत्मा भी रो पड़ी     

गोपाल जब गिरा, तो उसे लगा कि रूहें भी बस से बाहर निकल आई हैं। वे उसे घेर रही थीं।

उसने अपने कान बंद कर लिए। चीखें उसकी हड्डियों के अंदर तक गूँज रही थीं। वह भागने लगा।

जमीन से ठंडी उंगलियां उसके पैरों को पकड़ रही थीं। यह किसी बुरे सपने से भी बदतर था।

उसने देखा कि उसकी अपनी परछाईं भी अब गायब हो गई थी। वह खुद रूह जैसा बन रहा था।

भैरव काका की गूँजती हुई आवाज सुनाई दी। काका अब कहीं भी, किसी भी कोने में छिपे थे।

रूहों के चेहरे बदलते जा रहे थे। कभी माँ, कभी दोस्त, वे सब उसे माया-मसान में खींच रहे थे।

गोपाल ने चिल्लाकर भगवान को याद किया। रोशनी की एक छोटी सी किरण उसे आसमान में दिखी।

माया-मसान का वह गेट धीरे-धीरे खुलने लगा था। लाखों मृत आत्माएं एक साथ बाहर आ रही थीं।

बस अब हवा में एक आग का गोला बन चुकी थी। उसका इंजन अब भी गूँज रहा था।

गोपाल ने पत्थर को पकड़ा और अपनी जेब से अपना क्रॉस (लॉकेट) निकाल कर जोर से दबाया।


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गोपाल की जिंदगी की आखरी लड़ाई या फिर मौत 

गोपाल का दिमाग अब पूरी तरह थक चुका था। वह बस रोना चाहता था, पर आंसू नहीं थे।

उसे लगा कि अगर उसने आँखें खोलीं, तो वह माया-मसान में ही रह जाएगा। वह लड़ रहा था।

उसकी यादें धुंधली हो रही थीं। उसका नाम, उसका घर, सब कुछ एक धुंध में खो रहा था।

उसने खुद को चांटा मारा ताकि उसे दर्द हो। दर्द का एहसास ही उसे जीवित रख रहा था।

बस की आवाजें अब और तेज हो गई थीं। रूहें उसके चारों तरफ एक घेरा बना चुकी थीं।

गोपाल ने महसूस किया कि भैरव काका उसके कान के पास आकर धीरे से कुछ कह रहे थे।

काका बोले कि तुम यहाँ से नहीं जा सकते। तुम अब बस के एक नए मुसाफिर हो।

गोपाल ने कहा कि मेरा समय अभी नहीं आया है। उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति को एक किया।

उसके पास से तेज रोशनी निकली। रूहें पीछे हट गईं। रास्ता अब थोड़ा साफ हो रहा था।

वह दौड़ता रहा। उसके पैर छिल गए थे, पर उसे रुकना नहीं था। अंधेरा उसका पीछा कर रहा था।

माया-मसान का असली नरक: जहाँ हर कदम पर मृत्यु थीं     

माया-मसान की जमीन से हाथ बाहर निकल रहे थे। वे सब उसे अंदर खींचना चाहते थे।

गोपाल को लगा कि वे उसके अपनों के हाथ हैं। वह रोते हुए अपनी आँखें बंद कर गया।

वह अब एक ऐसे जंगल में था जहाँ पेड़ नहीं थे, सिर्फ मृत शरीर लटके हुए थे।

हवा में एक मीठी और सड़न भरी गंध थी। उसने महसूस किया कि वह अकेला नहीं था।

हजारों रूहें एक साथ चल रही थीं। वे सब उसी दिशा में जा रही थीं जहाँ बस थी।

भैरव काका सबसे आगे चल रहे थे। उनका बैग अब और बड़ा हो गया था।

उन्होंने गोपाल की तरफ फिर देखा। इस बार उनकी आँखें पूरी तरह लाल और दहकती थीं।

गोपाल ने अपना संतुलन खो दिया। वह दलदल जैसी राख में डूबने लगा था। बहुत डर था।

उसने जोर से हाथ पैर चलाए। राख उसे अंदर खींच रही थी। वह अपनी जान के लिए लड़ा।

एक पुरानी लकड़ी को उसने पकड़ा और खुद को बाहर खींच लिया। वह हाँफ रहा था।

सफ़र-ए-मौत का अंतिम तांडव: चारों तरफ सिर्फ चीखें    

गोपाल ने देखा कि ‘सफ़र-ए-मौत’ बस अब माया-मसान की गहरी खाई में गिरने वाली थी।

भैरव काका चिल्ला रहे थे। उनका चिल्लाना किसी बिजली के गिरने जैसा खौफनाक सुनाई दे रहा था।

रूहें बस के अंदर वापस भाग रही थीं। गोपाल ने देखा कि यह मौका है भागने का।

उसने अपनी जेब से माचिस निकाली और सड़क पर पड़े सूखे पत्तों को आग लगा दी।

आग देखते ही रूहें पीछे हट गईं। यह आग उसे किसी ने पहले ही बताई थी—पवित्र आग।

गोपाल ने आग की लपटों के पीछे अपना रास्ता बनाया। वह बस की दहलीज से दूर भागा।

पूरी माया-मसान की दुनिया कांपने लगी। धरती फटने लगी थी और राख उड़ने लगी थी।

गोपाल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह बस दौड़ता गया, जब तक उसकी सांसें जवाब नहीं दे गईं।

उसे बस की आखिरी चीख सुनाई दी। एक धमाका हुआ और सब कुछ एकदम शांत हो गया।

वह एक पुराने पुराने पेड़ के नीचे गिर गया। अब वहाँ सिर्फ सुबह की हल्की रोशनी थी।

गोपाल बच तो गया… पर उसकी आत्मा आज भी उस भूतिया बस में कैद हैं        

गोपाल ने अपनी आँखें खोलीं। धूप उसकी आँखों में पड़ रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था।

वह अब पुराना हाईवे 13 पर नहीं था। वह अपने घर के पास के पार्क में था।

उसकी जैकेट फटी हुई थी और उस पर राख लगी थी। वह रोने लगा और घर भागा।

माँ ने उसे देखा और दौड़ कर गले लगा लिया। वह पूरा दिन बेहोश ही पड़ा रहा।

डॉक्टर आए और उन्होंने कहा कि गोपाल बहुत गहरे सदमे में है। वह बोल नहीं पा रहा।

उसने जो देखा था, वह सच था। लेकिन दुनिया को वह कैसे बताता कि मौत की बस थी।

उसने अपनी बाइक उसी दिन बेच दी। वह अब कभी भी रात में बाहर नहीं जाता था।

माया-मसान की वो रात उसकी रूह को आज भी डराती है। वह सपना नहीं था, सच था।

उसने अपना कमरा हमेशा रोशनी से भरा रखा। अंधेरे से उसे अब बहुत नफरत हो गई थी।

भैरव काका की वो सफेद आँखें और वो बस का शोर आज भी उसके कान में है।

निष्कर्ष: डरवानी कहानी से सीख

माया-मसान एक चेतावनी है। हम कभी नहीं जानते कि यह काली रात हमें कहाँ ले जा सकती है।

हमेशा सतर्क रहना बहुत जरूरी है। अनजान रास्ते और अनजान लोग अक्सर डरावनी मुसीबतें लेकर आते हैं।

गोपाल की किस्मत बहुत अच्छी थी जो वह माया-मसान के उस जाल से बाहर निकल आया।

रूहों का संसार वाकई में बहुत खतरनाक होता है। हमें उन रहस्यों को नहीं छूना चाहिए जो बहुत गहरे होते हैं।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि अंधेरे में रोशनी हमेशा जीतती है, बस होना हौसला चाहिए।

मौत को कोई नहीं टाल सकता, पर डर का सामना करना सबसे बड़ा बहादुरी का काम है।

गोपाल अब शांति से जीता है, लेकिन वह कभी उस भयानक रात की यादें नहीं भूला।

यह कहानी अब गांव के सभी लोग जान चूकें है। लोग अब उस रास्ते पर नहीं जाते।

मौत का सौदागर, भैरव काका, शायद आज भी किसी हाईवे पर अपना शिकार ढूंढ रहा है।

सावधान रहें, क्योंकि अगली बार हो सकता है कि ‘सफ़र-ए-मौत’ आपके सामने ही खड़ी हो।

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