| 🗓️ 25 जुलाई 2026

परिधि का दर्द। अच्छे संस्कारों के बदले ससुराल में क्यों मिली सिर्फ़ नफ़रत और अत्याचार? Family Story In Hindi

परिधि का दर्द। अच्छे संस्कारों के बदले ससुराल में क्यों मिली सिर्फ़ नफ़रत और अत्याचार? Family Story In Hindi। Hindirama.com
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आज परिधि B.Ed करके भी एक मोटर मैकेनिक लड़के से शादी क्यों कर रही है? क्योंकि उसके लिए डिग्री नहीं, बल्कि अच्छा दिल, सम्मान और नारी की इज़्ज़त सबसे बड़ी पहचान है।

मोहित अपनी पत्नी का सम्मान करता है, लेकिन उसकी माँ कमला का स्वभाव बिल्कुल अलग है। वह हर छोटी बात पर परिधि को ताने देती है और उसे चैन से जीने नहीं देती।

स्नेहा अपनी माँ से भी दो कदम आगे है। चुगलखोरी, जलन और हर बात का बतंगड़ बनाना उसकी आदत है। वह हर दिन परिधि के लिए नई मुसीबत खड़ी करने की कोशिश करती है।

घर में केवल ससुर हरिराम ही परिधि का दर्द समझते हैं, लेकिन क्या उनका साथ उसे टूटने से बचा पाएगा? या कमला और स्नेहा की साज़िशें उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल देंगी?

क्या परिधि इन हालात का डटकर सामना करेगी, या हर दिन मिलने वाला अपमान उसे अंदर से तोड़ देगा? यह जानने के लिए कहानी आगे पढ़िए।

परिधि की शादी की वह रात। Family story In Hindi  

मुंबई की जगमगाती रात आज एक घर के आँगन में खुशियों का समंदर लेकर उतरी थी। शहनाइयों की मधुर धुन हर तरफ़ गूँज रही थी।

रंग-बिरंगी रोशनियों से सजा विवाह मंडप मेहमानों की हँसी से महक रहा था। कुछ देर पहले ही सात फेरे पूरे हुए थे।

बारहवीं पास मैकेनिक मोहित ने अग्नि को साक्षी मानकर बी.एड. की पढ़ाई कर रही परिधि का हाथ जीवनभर के लिए थाम लिया था।

हर कोई नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दे रहा था। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी तो किसी की आँखों में विदाई का दर्द उतरने लगा था।

परिधि लाल जोड़े में बेहद सुंदर लग रही थी। माथे का सिंदूर और गले का मंगलसूत्र उसके नए जीवन की शुरुआत की गवाही दे रहे थे।

मोहित बार-बार चुपके से परिधि की ओर देख रहा था। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन विदाई का ख्याल आते ही मन भारी हो जाता।

विदाई की घड़ी

धीरे-धीरे वह पल भी सामने आ गया, जिसका नाम सुनते ही हर बेटी और हर माँ-बाप की आँखें भर आती हैं।

बाहर फूलों से सजी गाड़ी खड़ी थी। रिश्तेदार धीरे-धीरे इकट्ठा होने लगे। शहनाइयों की धुन अब पहले से कहीं अधिक भावुक लग रही थी।

सुमित्रा ने जैसे ही अपनी बेटी की ओर देखा, उनकी आँखों से आँसू अपने आप बहने लगे। वह दौड़कर परिधि के गले लग गईं।

“बेटी… आज से वह घर ही तुम्हारा घर है। सबका सम्मान करना, लेकिन कभी अपना सम्मान मत खोना।”

इतना सुनते ही परिधि अपने आँसू रोक नहीं पाई। उसने अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।

जगदीश कुछ दूर खड़े अपनी बेटी को देख रहे थे। उनकी आँखें लाल हो चुकी थीं, लेकिन वह खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे।

कुछ पल बाद वह धीरे-धीरे आगे बढ़े और परिधि के सिर पर काँपता हुआ हाथ रख दिया।

“मेरी गुड़िया…” उनके होंठ काँपे, “तुझे हमने बड़े प्यार से पाला है। कभी किसी बात की कमी नहीं होने दी।”

उन्होंने परिधि को अपने सीने से लगा लिया। बरसों का सारा स्नेह उस एक आलिंगन में समा गया।

“आज मैं अपनी सबसे प्यारी अमानत किसी और के हवाले कर रहा हूँ। बस इतना चाहता हूँ कि तू हमेशा खुश रहे।”

परिधि ने रोते हुए कहा, “पापा… मैं आपको छोड़कर कैसे जाऊँ? आपके बिना तो मैंने कभी एक दिन भी नहीं बिताया।”

जगदीश की आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे। उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए खुद को संभालने की कोशिश की।

“बेटी… यही दुनिया का नियम है। एक दिन हर बेटी को अपने नए घर जाना पड़ता है। लेकिन याद रखना, यह घर हमेशा तेरा रहेगा।”

सुमित्रा ने परिधि के आँसू पोंछे और उसके माथे को चूम लिया। आसपास खड़े कई रिश्तेदार भी अपनी आँखें पोंछ रहे थे।

मोहित यह सब चुपचाप देख रहा था। उसने पहली बार महसूस किया कि एक पिता के लिए बेटी की विदाई कितनी कठिन होती है।

वह धीरे-धीरे जगदीश के पास आया और सम्मान से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

“पिताजी…” उसकी आवाज़ धीमी थी, “मैं वादा करता हूँ कि परिधि को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दूँगा।”

जगदीश ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में विश्वास भी था और अपनी बेटी की चिंता भी।

“बेटा, हमें धन-दौलत नहीं चाहिए। बस हमारी बेटी का सम्मान हमेशा बनाए रखना। यही हमारी सबसे बड़ी दौलत है।”

मोहित ने बिना एक पल गँवाए सिर झुका दिया।

“मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि परिधि की आँखों में कभी जानबूझकर आँसू नहीं आने दूँगा। मैं उसका सम्मान करूँगा और जीवनभर उसका साथ निभाऊँगा।”

परिधि ने यह वादा सुना तो उसकी भीगी आँखों में पहली बार हल्की-सी मुस्कान लौट आई। उसे लगा कि शायद भगवान ने उसके लिए सही जीवनसाथी चुना है।

बाहर से आवाज़ आई, “विदाई का समय हो गया है।”

पूरा विवाह स्थल एक पल के लिए जैसे शांत हो गया। कुछ देर पहले जहाँ हँसी की आवाज़ें गूँज रही थीं, वहीं अब सिसकियाँ सुनाई देने लगीं।

अपनी प्यारी परिधि की विदाई का दर्द

परिधि का दर्द। अच्छे संस्कारों के बदले ससुराल में क्यों मिली सिर्फ़ नफ़रत और अत्याचार? Family Story In Hindi। Hindirama.com

सुमित्रा ने काँपते हुए हाथों से परिधि का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आँखें लगातार नम थीं और होंठ बार-बार काँप रहे थे।

उन्होंने परिधि के माथे को चूमा और धीरे से कहा, “बेटी, जब तू छोटी थी, तब हर रात मेरे सीने पर सिर रखकर सोती थी।”

“आज वही बेटी हमेशा के लिए अपने नए घर जा रही है। माँ का दिल कैसे समझाए कि अब उसका कमरा खाली हो जाएगा।”

यह सुनते ही परिधि फिर से माँ से लिपट गई। उसके आँसू सुमित्रा के कंधे को भिगो रहे थे।

“माँ… अगर कभी मेरी याद आए तो मुझे तुरंत फोन कर लेना। मैं चाहे जहाँ रहूँ, आपकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी चली आऊँगी।”

सुमित्रा ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा, “नहीं बेटी, अब तू अपने नए घर की जिम्मेदारियाँ निभाएगी। बार-बार मायके की चिंता मत करना।”

“लेकिन इतना ज़रूर याद रखना कि इस घर का दरवाज़ा तेरे लिए कभी बंद नहीं होगा। यह घर पहले भी तेरा था और हमेशा तेरा ही रहेगा।”

आसपास खड़ी कई महिलाएँ भी अपनी आँखों से आँसू पोंछ रही थीं। हर किसी को अपनी बेटी या अपनी विदाई का दिन याद आने लगा था।

जगदीश अब तक अपने आँसू रोकने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन बेटी की बातें सुनकर उनका धैर्य भी टूट गया।

उन्होंने धीरे से परिधि का हाथ अपने हाथों में लिया और उसे कुछ क्षण बिना बोले देखते रहे।

पिता की सबसे बड़ी अमानत

“परिधि…” उनकी भारी आवाज़ निकली, “जब तू पहली बार मेरी उँगली पकड़कर चली थी, उस दिन मुझे लगा था कि मेरी दुनिया पूरी हो गई।”

“जब तू स्कूल के पहले दिन रो रही थी, तब मैं तुझसे ज़्यादा रोया था। बस तुझे दिखाया नहीं था।”

“तेरी हर छोटी खुशी के लिए मैंने भगवान का धन्यवाद किया। जब तू बीमार होती थी, तो रातभर मुझे नींद नहीं आती थी।”

परिधि रोते हुए बोली, “पापा… आपने मेरे लिए जो किया है, उसका कर्ज़ मैं कभी नहीं चुका सकती।”

जगदीश ने तुरंत उसकी बात रोक दी।

“बेटी, माँ-बाप कभी अपनी संतान पर एहसान नहीं करते। जो कुछ किया, अपना फ़र्ज़ समझकर किया।”

उन्होंने एक गहरी साँस ली और फिर मोहित की ओर देखा।

“बेटा मोहित, आज मैं अपनी सबसे कीमती दौलत तुम्हें सौंप रहा हूँ। इसे कभी अकेला मत छोड़ना।”

मोहित तुरंत आगे आया और झुककर जगदीश के चरण स्पर्श किए।

“पिताजी, मैं जानता हूँ कि बेटी को विदा करना कितना कठिन होता है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि परिधि हमेशा सम्मान के साथ रहेगी।”

जगदीश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“धन कम या ज़्यादा होना मायने नहीं रखता बेटा। इंसान का चरित्र सबसे बड़ी पूँजी होता है।”

मोहित ने दृढ़ स्वर में कहा, “मैं अपने जीवन की हर खुशी से पहले परिधि की खुशी का ध्यान रखूँगा।”

परिधि ने मोहित की ओर देखा। उसके मन में विश्वास की एक नई किरण जाग उठी।

डोली की ओर बढ़ते कदम

बाहर फूलों से सजी गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया गया। रिश्तेदार धीरे-धीरे रास्ता बनाने लगे।

सुमित्रा ने परिधि की चुनरी ठीक की, उसके माथे को फिर से चूमा और काँपती आवाज़ में बोलीं, “हमेशा मुस्कुराते रहना बेटी।”

परिधि ने एक बार पूरे घर की ओर नज़र घुमाई। वही दीवारें, वही आँगन, वही दरवाज़ा, जहाँ उसने अपना पूरा बचपन बिताया था।

उसकी आँखों के सामने बचपन की अनगिनत यादें एक-एक करके तैरने लगीं। हर कोना जैसे उसे रोक लेना चाहता था।

धीरे-धीरे उसने काँपते कदमों से गाड़ी की ओर चलना शुरू किया…

पीछे खड़े जगदीश और सुमित्रा अपनी बेटी को जाते हुए देखते रहे। उनकी आँखों से बहते आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

परिधि ने गाड़ी में बैठने से पहले एक बार फिर मुड़कर अपने माता-पिता को देखा…

उसकी आँखों में हजारों भाव थे, और होंठों पर सिर्फ़ एक शब्द आया—

“माँ…”

सुमित्रा अपनी बेटी की आवाज़ सुनते ही खुद को संभाल नहीं सकीं। वह फिर दौड़कर गाड़ी के पास पहुँचीं और खिड़की से परिधि का चेहरा अपने हाथों में ले लिया।

उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो बरसों का सारा प्यार उसी पल आँखों के रास्ते बाहर निकल आया हो।

“बेटी… अपना ख़याल रखना। समय पर खाना खा लेना। ज़्यादा काम मत करना। अगर कभी मन भारी हो, तो बिना सोचे मुझे फोन कर देना।”

परिधि ने रोते हुए सिर हिलाया। उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई थी। वह चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रही थी।

आख़िरी बार मायके की ओर नज़र

परिधि का दर्द। अच्छे संस्कारों के बदले ससुराल में क्यों मिली सिर्फ़ नफ़रत और अत्याचार? Family Story In Hindi। Hindirama.com

जगदीश धीरे-धीरे गाड़ी के पास आए। उन्होंने खिड़की से अंदर बैठे अपनी बेटी के सिर पर काँपता हुआ हाथ रखा।

कुछ पल तक वह बिना कुछ बोले उसे देखते रहे। जैसे वह अपनी बेटी का चेहरा अपनी आँखों में हमेशा के लिए बसा लेना चाहते हों।

उन्होंने भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “बेटी, बचपन से जब भी तू घर से बाहर जाती थी, मैं दरवाज़े पर खड़ा होकर तेरे लौटने का इंतज़ार करता था।”

“आज पहली बार ऐसा दिन आया है कि मुझे पता है, अब तू इस घर में मेहमान बनकर आएगी।”

यह सुनते ही परिधि ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसने खिड़की से बाहर हाथ निकालकर अपने पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“पापा… मैं चाहे जहाँ रहूँ, आपकी बेटी हमेशा रहूँगी। मुझे कभी अपने से दूर मत समझिएगा।”

जगदीश ने उसके हाथ को धीरे से थपथपाया।

“कभी नहीं बेटी। पिता और बेटी का रिश्ता दूरी से नहीं बदलता। तू जहाँ रहेगी, मेरी दुआ हमेशा तेरे साथ रहेगी।”

मोहित यह सब चुपचाप देख रहा था। उसके मन में जगदीश और सुमित्रा के प्रति सम्मान और भी बढ़ गया।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि एक बेटी केवल अपने घर से विदा नहीं होती, बल्कि अपने माँ-बाप के दिल का एक हिस्सा भी साथ ले जाती है।

परिधि का नए सफर की शुरुआत

ड्राइवर ने धीरे से गाड़ी स्टार्ट की। इंजन की हल्की आवाज़ सुनते ही सभी रिश्तेदारों की आँखें फिर भर आईं।

परिधि ने काँपते हाथों से खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे किया। उसकी नज़रें अब भी अपने माता-पिता के चेहरे से हट नहीं रही थीं।

सुमित्रा हाथ हिलाकर उसे विदा कर रही थीं, लेकिन उनके हाथ लगातार काँप रहे थे। उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

जगदीश ने अपने आँसू छिपाने की कोशिश की, पर हर कोशिश नाकाम हो रही थी। उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की ताकि उनकी बेटी उन्हें टूटता हुआ न देख सके।

गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

परिधि पीछे मुड़कर लगातार अपने घर को देखती रही। वह घर, जहाँ उसने अपना बचपन जिया था, अब हर पल उससे दूर होता जा रहा था।

कुछ ही क्षणों में घर की दीवारें धुँधली दिखाई देने लगीं। फिर गली मुड़ी और उसका मायका उसकी आँखों से ओझल हो गया।

परिधि ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।

मोहित ने बिना कुछ कहे अपनी जेब से रूमाल निकाला और चुपचाप उसकी ओर बढ़ा दिया।

परिधि ने भीगी आँखों से उसकी ओर देखा। उसने धीरे से रूमाल ले लिया, लेकिन उसके आँसू अब भी रुक नहीं रहे थे।

मोहित ने धीमे स्वर में कहा, “रो लो… जितना मन करे रो लो। मैं जानता हूँ कि आज तुम्हारे लिए सबसे कठिन दिन है।”

परिधि ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने केवल हल्का-सा सिर झुका लिया और खिड़की के बाहर देखने लगी।

मुंबई की चमचमाती सड़कें सामने थीं, लेकिन परिधि की आँखों में अब भी अपने मायके का आँगन ही घूम रहा था…

उसने धीरे-धीरे अपना सिर नीचे झुका लिया। आँसू अब भी उसके गालों पर बह रहे थे। वह उन्हें रोकना चाहती थी, लेकिन हर कोशिश बेकार हो रही थी।

गाड़ी के अंदर कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। केवल इंजन की हल्की आवाज़ और बाहर दौड़ती गाड़ियों का शोर सुनाई दे रहा था।

मोहित ने परिधि की ओर देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस समय क्या कहे जिससे उसका मन थोड़ा हल्का हो जाए।

परिधि और मोहित में हुई सफर की पहली बातचीत

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मोहित ने धीमी आवाज़ में कहा, “अगर तुम्हें पानी चाहिए तो बताना। आगे एक बोतल रखी है।”

परिधि ने बिना उसकी ओर देखे धीरे से सिर हिला दिया। उसकी आँखें अब भी खिड़की के बाहर टिकी हुई थीं।

कुछ मिनट बीत गए। फिर मोहित ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “मुझे पता है, इस समय तुम्हारे मन में बहुत कुछ चल रहा होगा।”

“लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम एक बात हमेशा याद रखना। तुम इस सफर में अकेली नहीं हो।”

परिधि ने पहली बार उसकी ओर देखा। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और चेहरा आँसुओं से भीग गया था।

मोहित ने बहुत शांत स्वर में कहा, “आज तुमने अपना घर छोड़ा है, इसलिए दुख होना बिल्कुल स्वाभाविक है।”

“अगर मैं तुम्हारी जगह होता, तो शायद मैं भी इतना ही रोता। इसलिए अपने आँसू रोकने की कोशिश मत करो।”

परिधि की आँखों में पहली बार यह एहसास दिखाई दिया कि सामने बैठा व्यक्ति उसके दर्द को समझने की कोशिश कर रहा है।

उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि माँ-पापा को छोड़ना इतना कठिन होगा।”

मोहित ने उत्तर दिया, “कोई भी बेटी अपने माँ-बाप को छोड़कर आसानी से नहीं जाती। यही पल सबसे भारी होता है।”

मोहित ने किया एक छोटा-सा वादा

कुछ देर बाद मोहित ने अपनी जेब से पानी की बोतल निकाली और परिधि की ओर बढ़ा दी।

“थोड़ा पानी पी लो। बहुत देर से रो रही हो। तबीयत खराब हो जाएगी।”

परिधि ने बोतल ले ली। उसने दो घूँट पानी पिया और धीरे से बोली, “धन्यवाद।”

मोहित हल्का-सा मुस्कुराया।

“धन्यवाद कहने की ज़रूरत नहीं है। अब से हम दोनों एक ही परिवार का हिस्सा हैं।”

उसने कुछ पल रुककर फिर कहा, “मैं एक बात अभी कहना चाहता हूँ।”

परिधि चुपचाप उसकी बात सुनने लगी।

“मैं बहुत बड़ा पढ़ा-लिखा इंसान नहीं हूँ। मैं केवल बारहवीं तक पढ़ पाया और आज एक मैकेनिक का काम करता हूँ।”

“लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि रिश्ते सम्मान और विश्वास से चलते हैं, पैसे से नहीं।”

परिधि उसकी बात ध्यान से सुनती रही। उसके मन में मोहित के लिए सम्मान धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

परिधि पहुँची ससुराल 

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गाड़ी अब मुंबई की व्यस्त सड़कों से निकलकर उस इलाके की ओर बढ़ रही थी जहाँ मोहित का परिवार रहता था।

रास्ते भर रोशनी से जगमगाती ऊँची इमारतें दिखाई दे रही थीं। सड़क पर लोगों की भीड़ अब भी कम होने का नाम नहीं ले रही थी।

परिधि ने गहरी साँस ली और एक बार फिर खिड़की के बाहर देखा।

परिधि ने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—

“हे भगवान… मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं अपने नए परिवार का दिल जीत सकूँ और अपने माँ-पापा का सिर हमेशा ऊँचा रख सकूँ।”

गाड़ी धीरे-धीरे अपनी मंज़िल के और करीब पहुँचने लगी…

उसकी प्रार्थना पूरी भी नहीं हुई थी कि ड्राइवर ने धीरे से गाड़ी की रफ्तार कम कर दी।

कुछ ही क्षण बाद गाड़ी एक दो मंज़िला पुराने लेकिन साफ़-सुथरे मकान के सामने आकर रुक गई।

नए घर की पहली झलक

घर के मुख्य दरवाज़े पर गेंदे और आम के पत्तों की सुंदर सजावट की गई थी। रंग-बिरंगी लड़ियाँ हल्की हवा में झूल रही थीं।

दरवाज़े के सामने रंगोली बनी हुई थी और उसके बीचों-बीच पीतल का एक सुंदर कलश रखा हुआ था।

गाड़ी रुकते ही आसपास के पड़ोसी भी मुस्कुराते हुए बाहर आने लगे। सभी नई बहू की एक झलक देखने को उत्सुक थे।

मोहित पहले गाड़ी से उतरा। उसने तुरंत दूसरी ओर जाकर दरवाज़ा खोला और परिधि की ओर अपना हाथ बढ़ाया।

परिधि ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ में रखा और सावधानी से गाड़ी से नीचे उतरी।

यह कहानी भी पढ़ें  →  कॉन्ट्रैक्ट वाली दुल्हन । अरबपति लड़की नें चाय वाले से शादी क्यों की ? – भाग 1 📖

उसकी नज़र सबसे पहले उस घर पर गई जहाँ अब उसे पूरी ज़िंदगी बितानी थी।

उसके मन में उत्साह भी था, घबराहट भी थी और भविष्य को लेकर अनगिनत सवाल भी थे।

उसी समय घर के अंदर से एक मध्यम आयु के व्यक्ति मुस्कुराते हुए बाहर आए।

उनके चेहरे पर अपनापन साफ़ दिखाई दे रहा था।

ये थे मोहित के पिता हरिराम।

परिधि को मिला हरिराम का स्नेह

हरिराम ने परिधि को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “आओ बेटी… हमारे घर में तुम्हारा दिल से स्वागत है।”

उन्होंने आगे बढ़कर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा।

“आज से यह घर भी तुम्हारा अपना घर है। यहाँ कभी अपने आपको पराया मत समझना।”

परिधि ने तुरंत झुककर उनके चरण स्पर्श किए।

हरिराम ने उसे उठाकर कहा, “हमेशा खुश रहो बेटी। भगवान तुम्हारे जीवन में सुख ही सुख भर दे।”

उनकी बात सुनकर परिधि के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसे अपने पिता जैसी आत्मीयता महसूस हुई।

तभी दरवाज़े के पास खड़ी एक महिला ने ऊँची आवाज़ में कहा, “अरे, पहले गृहप्रवेश तो करवा लो।”

वह थीं कमला, मोहित की माँ। उनके हाथ में पूजा की थाली थी, लेकिन उनके चेहरे पर हरिराम जैसी सहज मुस्कान नहीं थी।

उनके ठीक पीछे मोहित की बड़ी बहन स्नेहा भी खड़ी थी, जो कुछ दिनों के लिए मायके आई हुई थी।

स्नेहा चुपचाप परिधि को ऊपर से नीचे तक देख रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन आँखों में अपनापन नहीं था।

परिधि ने विनम्रता से आगे बढ़कर कमला के चरण छुए।

कमला ने औपचारिक ढंग से आशीर्वाद देते हुए कहा, “सदा सुहागन रहो।”

इसके बाद उन्होंने पूजा की थाली उठाई और गृहप्रवेश की तैयारी करने लगीं।

परिधि ने एक बार फिर भगवान का स्मरण किया और नए जीवन की पहली दहलीज़ पर खड़ी हो गई।

परिधि का दर्द कहानी का भाग 01 यहीं समाप्त होता है।

अगले भाग में देखिए, कैसे कमला और चुगलखोर स्नेहा मिलकर परिधि की ज़िंदगी और कठिन बना देती हैं।

क्या मोहित अपनी पत्नी का साथ देगा, या परिधि को हर दिन नया अपमान सहना पड़ेगा?

आगे की कहानी और भी दर्दनाक मोड़ लेकर आने वाली है।

____भाग 1 कहानी समाप्त____ 


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