दगाबाज बड़ा भाई धनंजय लालच और घमंड में डूबा था, जबकि देवराज मेहनती और नेकदिल था।
बंटवारे में धनंजय ने चालाकी से बड़ी जमीन और धन अपने नाम कर लिया। देवराज को थोड़ी जमीन मिली, लेकिन उसने मेहनत और सेवा नहीं छोड़ी।
गरीबों की मदद, किसानों का साथ और पशुओं की सेवा करते-करते देवराज पूरे गांव का प्यारा बन गया। यही बात धनंजय के मन में जलन पैदा करती थी।
फिर एक रहस्यमयी स्वामी देवराज की परीक्षा लेने आते हैं और उसे एक ऐसे मायावी जंगल में ले जाते हैं, जहां अनमोल खजाना छिपा है।
लेकिन असली रहस्य खजाने से भी बड़ा है। लालच में डूबा धनंजय उसी जंगल में पहुंच जाता है, जहां एक भयानक नागराज उसकी राह देख रहा है।
क्या देवराज अपने दगाबाज भाई को बचा पाएगा? क्या नागराज उसे छोड़ देगा? और आखिर रहस्यमयी स्वामी सत्यदेव कौन हैं? जानने के लिए पूरी कहानी पढ़िए।
बंटवारे के बाद शुरू हुई दो भाइयों की अलग-अलग जिंदगी। Moral Story In Hindi
बहुत समय पहले पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा एक सुंदर गांव हुआ करता था। गांव में मिट्टी के घर और चारों ओर हरे-भरे खेत थे।
गांव के लोग मेहनत करके अपना जीवन बिताते थे। कोई किसान था, कोई पशुपालक और कोई छोटा-मोटा काम करके अपने परिवार का पालन करता था।
उसी गांव में दो सगे भाई रहते थे, जिनके नाम धनंजय और देवराज थे। दोनों भाइयों के पिता अपने समय के सम्मानित किसान थे।
पिता के पास गांव के आसपास काफी जमीन, एक बड़ा मकान, कई पशु और जमा किया हुआ अच्छा-खासा धन मौजूद था।
पिता की मृत्यु के बाद दोनों भाइयों के बीच जमीन-जायदाद का बंटवारा होना था। गांव के कुछ बुजुर्ग भी उस बंटवारे के समय मौजूद थे।
धनंजय बड़ा भाई था और चालाक भी था। उसने अपनी बातों में लोगों को उलझाकर पिता की अधिकतर बड़ी और उपजाऊ जमीन अपने नाम करवा ली।
उसने झूठ बोलकर कई लोगों को यह विश्वास दिला दिया कि पिता ने मरने से पहले अधिक जमीन उसी के नाम करने की बात कही थी।
देवराज सीधा और सरल था। उसने अपने बड़े भाई की बातों पर भरोसा किया और बंटवारे को लेकर ज्यादा सवाल नहीं किए।
आखिर में देवराज के हिस्से में गांव से दूर थोड़ी-सी खेती की जमीन, एक छोटी झोंपड़ी, एक गाय और एक भैंस आई।
धनंजय के हिस्से में बड़ा मकान, बहुत सारी उपजाऊ जमीन, अनाज के भरे भंडार और पिता का जमा हुआ अधिकतर धन चला गया।
गांव के लोगों को सच्चाई मालूम थी। सभी जानते थे कि धनंजय ने चालाकी करके अपने छोटे भाई के साथ अन्याय किया है।
लेकिन देवराज ने किसी से शिकायत नहीं की। उसने अपनी पत्नी यामिनी से कहा कि जो मिला है, उसी में मेहनत करके जीवन बिताएंगे।
यामिनी बहुत समझदार और दयालु महिला थी। उसने पति की बात सुनी और बिना किसी शिकायत के छोटी-सी झोंपड़ी में उसके साथ रहने लगी।
दूसरी ओर धनंजय की पत्नी कुसमा बहुत स्वार्थी और घमंडी स्वभाव की थी। उसे गरीब लोगों की सहायता करना बिल्कुल पसंद नहीं था।
कुसमा अक्सर देवराज और यामिनी को देखकर उनका मजाक उड़ाती थी। उसे लगता था कि उनके पास कुछ भी नहीं है और वे हमेशा गरीब ही रहेंगे।
धनंजय भी कुसमा की बातों पर हंसता था। दोनों को अपने बड़े मकान और जमीन पर बहुत घमंड था।
देवराज की मेहनत से बदलने लगी जिंदगी

देवराज ने अपनी छोटी-सी जमीन को देखकर हिम्मत नहीं हारी। उसने उसी दिन से खेत को अच्छी तरह तैयार करने का काम शुरू कर दिया।
सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठता और सबसे पहले अपनी गाय तथा भैंस के लिए चारा काटकर लाता था।
इसके बाद वह खेत में पहुंचकर मिट्टी तैयार करता, बीज डालता और पूरे दिन पसीना बहाकर खेती करता था।
दोपहर की तेज धूप हो या सर्दियों की ठंडी हवा, देवराज ने कभी अपनी मेहनत में कमी नहीं की।
यामिनी भी घर के काम पूरे करने के बाद खेत में पहुंच जाती और पति की सहायता करने लगती थी।
दोनों पति-पत्नी कम साधनों में भी खुश रहते थे। उनके घर में धन कम था, लेकिन आपसी प्रेम और संतोष बहुत अधिक था।
धीरे-धीरे खेत में फसल लहलहाने लगी। देवराज अपनी मेहनत देखकर खुश होता और मन ही मन भगवान को धन्यवाद देता था।
फसल तैयार होने पर उसने सबसे पहले अपने घर के लिए जरूरी गेहूँ अलग रखा। उसके बाद कुछ गेहूँ गरीब परिवारों के लिए निकाल दिया।
यामिनी ने पूछा, “इतनी कम फसल में से भी आप गरीबों को गेहूँ क्यों दे रहे हैं? हमारे घर की जरूरतें भी तो बहुत हैं।”
देवराज मुस्कुराकर बोला, “हमारे पास थोड़ा है, लेकिन किसी के घर चूल्हा जल जाए तो इससे बड़ी खुशी और क्या होगी?”
यामिनी पति की बात सुनकर मुस्कुरा दी। वह जानती थी कि देवराज को दूसरों की मदद करके सचमुच मन का सुकून मिलता था।
पशुओं की सेवा में भी आगे था देवराज

देवराज को पशुओं से बहुत प्रेम था। उसकी गाय और भैंस उसके लिए केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों जैसी थीं।
वह रोज उनकी सफाई करता, समय पर चारा देता और उनकी तबीयत पर हमेशा ध्यान रखता था।
उसे गायों की छोटी-मोटी बीमारियों और उनके इलाज की अच्छी जानकारी थी। गांव के किसान भी जरूरत पड़ने पर देवराज के पास आने लगे।
किसी किसान की गाय खाना छोड़ देती, तो देवराज उसके घर जाकर गाय को ध्यान से देखता और उचित इलाज बताता था।
एक दिन खेत से लौटते समय देवराज को कच्चे रास्ते के किनारे एक गाय घायल अवस्था में पड़ी दिखाई दी।
गाय के शरीर पर चोट के निशान थे और वह दर्द के कारण बार-बार कराह रही थी। देवराज का मन बेचैन हो गया।
उसने अपना काम छोड़ दिया और गाय के पास बैठ गया। पहले उसने उसे पानी पिलाया, फिर उसके घावों को साफ करना शुरू किया।
गाय की हालत देखकर देवराज ने तय किया कि वह उसे अकेला नहीं छोड़ेगा। वह देर रात तक उसकी देखभाल करता रहा।
यामिनी ने घर लौटकर देखा कि देवराज अभी तक नहीं आया है। वह चिंतित होकर उसे ढूंढने निकली और रास्ते में गाय के पास उसे बैठा पाया।
यामिनी ने कहा, “आप सुबह से काम कर रहे हैं, अब घर चलिए। रात बहुत हो गई है और आपको भी आराम चाहिए।”
देवराज ने गाय की ओर देखते हुए कहा, “यामिनी, इसे अभी हमारी जरूरत है। जब तक इसकी हालत ठीक नहीं होती, मेरा मन घर जाने को नहीं मानता।”
उस रात देवराज ने वहीं रहकर गाय की सेवा की। सुबह गाय ने जब थोड़ा पानी पी लिया, तो उसके चेहरे पर खुशी दिखाई दी।
कुछ दिनों की देखभाल के बाद गाय ठीक हो गई। उसका मालिक देवराज के पास आया और भावुक होकर उसका धन्यवाद करने लगा।
उस घटना के बाद गांव में देवराज की इज्जत और बढ़ गई। किसान कहते थे कि देवराज गरीब जरूर है, लेकिन उसका दिल बहुत अमीर है।
यामिनी भी जरूरतमंदों का सहारा बनी

यामिनी भी अपने पति से कम दयालु नहीं थी। घर में जितना दूध बचता, उसमें से कुछ दूध वह जरूरतमंद महिलाओं को दे देती थी।
किसी गरीब महिला के घर गेहूँ खत्म हो जाता, तो यामिनी अपनी छोटी-सी बचत में से थोड़ा गेहूँ निकालकर उसे दे देती थी।
वह कभी किसी की मदद करके उसका एहसान नहीं जताती थी। उसका मानना था कि जरूरतमंद की सहायता करना इंसान का धर्म है।
धीरे-धीरे गांव की महिलाएं भी यामिनी को अपनी बहन जैसी मानने लगीं। किसी के घर परेशानी आती, तो वह सबसे पहले यामिनी के पास पहुंचती थी।
यह सब देखकर धनंजय और कुसमा को बहुत चिढ़ होती थी। उन्हें समझ नहीं आता था कि गरीब होकर भी दोनों की इतनी इज्जत क्यों है।
धनंजय के मन में बढ़ती जलन
एक शाम धनंजय अपने बड़े मकान के बाहर बैठा था। उसने देखा कि कुछ किसान देवराज से बातें करते हुए उसकी प्रशंसा कर रहे हैं।
किसी ने कहा, “देवराज ने मेरी गाय को ठीक कर दिया।” दूसरा किसान बोला, “उसने हमारे घर भी गेहूँ भिजवाया था।”
धनंजय यह सुनकर अंदर ही अंदर जलने लगा। कुसमा ने भी उसके चेहरे का बदला हुआ रंग देख लिया।
कुसमा ने कहा, “आपके पास इतनी जमीन और धन है, फिर भी गांव वाले उस गरीब देवराज की तारीफ करते हैं।”
धनंजय ने गुस्से में कहा, “मुझे भी यही बात सबसे ज्यादा चुभती है। उसके पास कुछ नहीं है, फिर भी लोग उसे अच्छा इंसान कहते हैं।”
कुसमा हंसते हुए बोली, “वह दूसरों को देता ही क्या है? थोड़ा-सा गेहूँ और थोड़ा दूध देकर खुद को बहुत बड़ा समझता है।”
धनंजय ने कहा, “लेकिन गांव वाले उसकी इसी आदत के कारण उसे सम्मान देते हैं। मुझे लगता है वह जानबूझकर मेरे सामने अच्छा बनने की कोशिश करता है।”
कुसमा ने पति के मन में और जहर भरते हुए कहा, “आप उसे समझा दीजिए कि दूसरों की मदद करना बंद कर दे।”
दोनों भाइयों के बीच पहली बड़ी टकराहट

एक दिन धनंजय ने देवराज को खेत से लौटते समय रास्ते में रोक लिया। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
धनंजय ने कहा, “तू दूसरों की मदद करना छोड़ दे, वरना एक दिन बहुत पछताएगा। अपने घर की चिंता कर, दूसरों की नहीं।”
देवराज ने शांत आवाज में कहा, “भैया, मुझे सबकी मदद करना बहुत अच्छा लगता है। किसी के काम आकर मुझे मन का सुकून मिलता है।”
देवराज की बात सुनकर धनंजय का गुस्सा और बढ़ गया। उसने अचानक आगे बढ़कर देवराज की गिरेबान पकड़ ली।
धनंजय ने गुस्से में कहा, “तेरी वजह से ही गांव में मुझे कोई नहीं पूछता। तू अच्छे काम करता है, इसलिए हर इंसान मुझे बुरा समझता है।”
देवराज ने अपने भाई की आंखों में देखा। उसके मन में गुस्सा नहीं, बल्कि अपने भाई के लिए दुख था।
देवराज ने धीरे से कहा, “भैया, आपको भी सबकी सेवा और अच्छे काम करने चाहिए। तभी लोग आपको भी अच्छा समझेंगे।”
धनंजय ने कुछ पल उसे घूरकर देखा। फिर गुस्से में उसका हाथ छोड़ दिया और बिना कुछ बोले वहां से चला गया।
देवराज वहीं खड़ा रहा। उसने अपने भाई के लिए भगवान से प्रार्थना की कि एक दिन धनंजय के मन में भी दया जरूर जागे।
समय बीतता रहा, लेकिन देवराज नहीं बदला
समय बीतता रहा। खेतों में कई बार फसलें आईं और चली गईं, मौसम बदले, लेकिन देवराज की आदतें नहीं बदलीं।
वह अपनी थोड़ी-सी जमीन में मेहनत करता और फसल तैयार होने पर अपने परिवार के साथ गरीबों का भी ध्यान रखता था।
उसके घर पर कोई जरूरतमंद आता, तो वह उसे खाली हाथ नहीं जाने देता था। कभी गेहूँ देता, कभी दूध और कभी अपनी क्षमता के अनुसार कुछ और।
गांव में किसी किसान की गाय बीमार पड़ती, तो देवराज अपना काम छोड़कर उसकी मदद करने पहुंच जाता था।
यामिनी हमेशा उसके साथ खड़ी रहती। दोनों की गरीबी के बावजूद उनके घर में आने वाला कोई इंसान खाली हाथ वापस नहीं जाता था।
दूसरी ओर धनंजय की जमीन हर साल बढ़ती जा रही थी। उसके अनाज के भंडार भरते जा रहे थे, लेकिन गांव में उसकी इज्जत नहीं बढ़ रही थी।
कुसमा को यह बात सबसे ज्यादा परेशान करती थी। वह अक्सर कहती कि गरीब होकर भी देवराज सबका प्यारा बन गया है।
धनंजय भी देवराज को देखकर भीतर ही भीतर जलता रहता। उसे लगता था कि उसके पास सब कुछ होते हुए भी वह अपने भाई से हार रहा है।
रहस्यमयी स्वामी का गांव में आगमन

एक दिन दोपहर के समय गांव में एक अजीब स्वामी आए। उनके कपड़े साधारण थे, हाथ में लकड़ी की छड़ी थी और चेहरे पर गहरी शांति दिखाई देती थी।
स्वामी धीरे-धीरे गांव की गलियों से गुजरते हुए सबसे पहले धनंजय के बड़े मकान के सामने पहुंचे। उन्होंने दरवाजे पर खड़े होकर भोजन और पानी मांगा।
धनंजय बाहर आया और स्वामी को देखकर उसका चेहरा सिकुड़ गया। उसने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और घृणा से बोल पड़ा।
धनंजय ने कहा, “जाओ-जाओ, यहां से निकलो। हमारे घर में तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। आगे किसी और के घर चले जाओ।”
स्वामी ने शांत नजरों से धनंजय को देखा। उन्होंने न पानी मांगा, न दोबारा भोजन की बात की और चुपचाप वहां से आगे बढ़ गए।
कुसमा भी दरवाजे के पास खड़ी थी। उसने स्वामी की सहायता नहीं की और अपने पति को रोकने की कोशिश भी नहीं की।
स्वामी धीरे-धीरे गांव के दूसरे छोर की ओर चल पड़े। उनके चेहरे पर नाराजगी नहीं थी, बल्कि जैसे वह किसी विशेष स्थान की तलाश कर रहे हों।
दयालु देवराज के घर पहुँचे स्वामी

कुछ दूर जाने के बाद वह देवराज की छोटी-सी झोंपड़ी के पास पहुंचे। उस समय दोपहर की धूप बहुत तेज थी और पेड़ के नीचे भी हल्की छाया ही थी।
देवराज ने स्वामी को देखा तो तुरंत अपना काम छोड़कर उनके पास पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर विनम्रता से उनका अभिवादन किया।
देवराज ने कहा, “स्वामी जी, इतनी तेज धूप में आप यहां क्यों खड़े हैं? कृपया मेरे साथ आइए, आप थोड़ी देर आराम कर लीजिए।”
वह तुरंत पेड़ के नीचे गया और वहां एक साफ आसन बिछा दिया। उसने स्वामी को आदर से उस आसन पर बैठाया।
यामिनी ने स्वामी को देखा तो बिना कुछ पूछे घर के अंदर गई और हाथ वाला पंखा लेकर बाहर आ गई।
वह स्वामी के पास बैठकर पंखे से हवा करने लगी। फिर कुछ देर बाद अंदर गई और उनके लिए ठंडा पानी लेकर आई।
यामिनी ने दोनों हाथों से पानी देते हुए कहा, “स्वामी जी, पहले पानी पी लीजिए। इतनी धूप में चलकर आए हैं, आपको बहुत थकान हुई होगी।”
स्वामी ने पानी लिया और शांत होकर दोनों को देखते रहे। उनकी आंखों में अब भी वही रहस्यमयी चमक थी।
देवराज ने यामिनी की ओर देखकर कहा, “यामिनी, तुम फटाफट भोजन की तैयारी करो। आज हमारे घर स्वामी जी आए हैं, हम इन्हें भोजन जरूर कराएंगे।”
यामिनी तुरंत घर के अंदर चली गई। घर में बहुत ज्यादा सामान नहीं था, लेकिन उसने जो कुछ उपलब्ध था, उसी से भोजन तैयार करना शुरू कर दिया।
स्वामी ने देवराज को रोकते हुए कहा, “बेटा, इसकी जरूरत नहीं है। तुम लोग पहले ही बहुत साधारण जीवन जी रहे हो। मैं भोजन किए बिना भी चला जाऊंगा।”
देवराज ने हाथ जोड़कर कहा, “नहीं स्वामी जी, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। हमारे घर आए अतिथि को बिना भोजन कराए मैं आपको जाने नहीं दूंगा।”
स्वामी ने फिर मना किया, लेकिन देवराज प्रेम और आदर से अपनी बात पर अड़ा रहा। उसके चेहरे पर कोई दिखावा नहीं था।
वह बार-बार स्वामी से पूछता कि उन्हें किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं है। यामिनी भी अंदर भोजन बनाने में पूरी लगन से जुटी हुई थी।
स्वामी दोनों पति-पत्नी की सेवा और उनके सच्चे व्यवहार को ध्यान से देखते रहे। उनके चेहरे पर धीरे-धीरे संतोष की मुस्कान दिखाई देने लगी।
स्वामी ने मन ही मन आकाश की ओर देखा और कहा, “हे प्रभु, ऐसा इंसान मैंने पहली बार देखा है, जो इतनी सेवा और लगन से मेरी सेवा कर रहा है।”
उन्होंने मन ही मन आगे कहा, “मैं बार-बार मना कर रहा हूं, फिर भी यह प्रेम से मुझे भोजन कराने पर अड़ा हुआ है। सचमुच देवराज का हृदय बहुत नेक है।”
स्वामी की आंखों में अब एक अलग ही चमक थी। देवराज और यामिनी को बिल्कुल पता नहीं था कि उनके सामने बैठे स्वामी साधारण यात्री नहीं थे।
वह यहां किसी संयोग से नहीं आए थे। उनके आने के पीछे एक ऐसा रहस्य था, जो आगे चलकर देवराज और धनंजय दोनों का जीवन बदलने वाला था।
और उसी दोपहर से देवराज की जिंदगी में एक ऐसी परीक्षा शुरू होने वाली थी, जिसकी कल्पना उसने कभी सपने में भी नहीं की थी।
रहस्यमयी जंगल का खजाना और दगाबाज भाई की लालच भरी चाल

अगले दिन स्वामी ने देवराज को पास बुलाया और शांत स्वर में कहा, “बेटा, कल साँझ के समय तुम्हें मेरे साथ जंगल में चलना होगा।”
देवराज ने आश्चर्य से स्वामी की ओर देखा और विनम्रता से पूछा, “स्वामी जी, आखिर मुझे उस जंगल में क्यों जाना होगा?”
स्वामी मुस्कुराए और बोले, “वहां किसी को तुम्हारी जरूरत है। इसलिए तुम्हें मेरे साथ वहां आना ही होगा, बेटा।”
देवराज ने कुछ देर सोचा। उसे स्वामी की बात पूरी तरह समझ नहीं आई, लेकिन उनके प्रति उसके मन में पूरा विश्वास था।
उसने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आपकी आज्ञा, स्वामी जी। मैं कल साँझ के समय आपके साथ जंगल जरूर चलूंगा।”
अगले दिन देवराज सुबह से ही अपने खेतों में काम करता रहा। लेकिन उसके मन में स्वामी की रहस्यमयी बात बार-बार घूमती रही।
शाम होते ही उसने अपना काम पूरा किया और घर लौट आया। यामिनी ने देखा कि देवराज कुछ सोच रहा था।
यामिनी ने पूछा, “क्या बात है? आज आप इतने शांत क्यों हैं? सुबह से जैसे किसी चिंता में डूबे हुए दिखाई दे रहे हैं।”
देवराज ने मुस्कुराकर कहा, “स्वामी जी ने मुझे साँझ के समय जंगल चलने के लिए कहा है। उन्होंने बताया कि वहां किसी को मेरी जरूरत है।”
यामिनी थोड़ी चिंतित हुई, लेकिन उसे भी स्वामी की बातों पर विश्वास था। उसने पति से सावधानी बरतने के लिए कहा।
साँझ होते ही देवराज घर से निकल पड़ा। कुछ दूर जाकर उसे वही स्वामी रास्ते में खड़े दिखाई दिए।
स्वामी ने देवराज का हाथ थामा और उसे गांव से दूर जंगल की ओर ले जाने लगे। रास्ता धीरे-धीरे सुनसान और अंधेरा होता चला गया।
जंगल के पास पहुंचते ही देवराज के मन में हल्का डर पैदा हुआ। पेड़ों की लंबी शाखाएं हवा में हिल रही थीं और चारों ओर अजीब शांति थी।
देवराज ने स्वामी का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया। उसे जंगल डरावना लग रहा था, लेकिन स्वामी के साथ होने से उसका विश्वास बना रहा।
स्वामी ने उसकी ओर देखकर कहा, “डरो मत बेटा। जब तक तुम्हारा विश्वास सच्चा है, यह जंगल तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”
दोनों आगे बढ़ते रहे। अचानक स्वामी ने कुछ मंत्र पढ़े और पेड़ों के बीच एक चमकता हुआ रास्ता दिखाई देने लगा।
देवराज ने आश्चर्य से उस रास्ते को देखा। उसे लगा जैसे जंगल के भीतर कोई छिपी हुई दुनिया अचानक उसके सामने खुल गई हो।
कुछ ही देर बाद दोनों एक विशाल स्थान पर पहुंचे। वहां एक बड़ी गुफा थी, जिसके भीतर से हल्की सुनहरी रोशनी बाहर आ रही थी।
स्वामी देवराज को गुफा के अंदर ले गए। वहां का दृश्य देखकर कोई भी इंसान हैरान हो जाता, लेकिन देवराज बिल्कुल शांत खड़ा रहा।
गुफा के भीतर सोने की मुद्राएं, चांदी के बर्तन, चमकते हीरे, मोती और बहुमूल्य रत्न चारों ओर रखे हुए थे।
स्वामी ने देवराज की ओर देखकर कहा, “बेटा, यह सारा धन तुम्हारा है। आज से तुम इस धन के अधिकारी हो।”
देवराज ने सोने और रत्नों की ओर देखा, फिर स्वामी की तरफ मुस्कुराकर बोला, “स्वामी जी, मुझे इस धन की कोई आवश्यकता नहीं है।”
उसने आगे कहा, “अगर आपको यह धन देना ही है, तो किसी ऐसे व्यक्ति को दीजिए जिसे इसकी जरूरत हो। मेरे लिए इतना धन किसी काम का नहीं है।”
स्वामी देवराज की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें समझ आ गया कि इतनी संपत्ति सामने देखकर भी उसके मन में लालच नहीं आया।
स्वामी ने कहा, “देवराज, तुम सचमुच बहुत ईमानदार और नेक दिल इंसान हो। इसी कारण तुम्हारे गांव को तुम्हारी बहुत जरूरत है।”
देवराज शांत होकर स्वामी की बातें सुनता रहा। स्वामी ने गुफा में रखे धन की ओर संकेत किया और आगे समझाने लगे।
उन्होंने कहा, “इस धन से तुम अपने गांव में गौशाला बनवा सकते हो, जहां बीमार और बेसहारा पशुओं की सेवा हो सके।”
स्वामी ने कहा, “तुम चाहो तो गरीब बच्चों के लिए विद्यालय और जरूरतमंद यात्रियों के लिए आश्रम भी बनवा सकते हो।”
उन्होंने आगे कहा, “किसानों को जब बीज, गेहूँ या खेती से जुड़ी किसी सहायता की जरूरत हो, तब तुम उनकी मदद कर सकते हो।”
स्वामी ने कहा, “गांव की गरीब महिलाओं और जरूरतमंद बच्चों को भी तुम्हारी सहायता चाहिए होगी। तुम्हें उनकी परेशानी में हमेशा साथ खड़ा होना है।”
देवराज ध्यान से सब सुन रहा था। अब उसे समझ आने लगा था कि स्वामी उसे यहां क्यों लेकर आए हैं।
स्वामी ने गंभीर स्वर में कहा, “आने वाले समय में तुम्हें बहुत सारे काम करने होंगे। अभी तुम सब नहीं जानते, लेकिन समय आने पर सब समझ जाओगे।”
देवराज ने हाथ जोड़कर कहा, “स्वामी जी, मैं इस धन का उपयोग अपने सुख के लिए नहीं करूंगा। इसका उपयोग केवल दूसरों की भलाई में करूंगा।”
स्वामी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, अगर किसी समय तुम्हें अपनी आवश्यकताओं के लिए भी इस धन की जरूरत पड़े, तो संकोच मत करना।”
उन्होंने आगे कहा, “लेकिन तुम्हारे जीवन का मुख्य उद्देश्य सेवा होना चाहिए। आने वाले समय में तुम्हारा ध्यान गरीबों, किसानों, पशुओं और जरूरतमंदों की सहायता में रहना चाहिए।”
देवराज ने सिर झुकाकर स्वामी की बात स्वीकार कर ली। उसके मन में अब धन के प्रति कोई आकर्षण नहीं था, केवल सेवा की भावना थी।
उसने कहा, “स्वामी जी, अगर यह धन सचमुच मेरे गांव और लोगों के काम आएगा, तो मैं इसे स्वीकार करता हूं।”
स्वामी ने प्रसन्न होकर कहा, “यही तुम्हारे लिए सबसे सही निर्णय है। तुम्हारे अच्छे कर्म ही इस धन को सही दिशा देंगे।”
रात होने लगी थी। स्वामी ने गुफा में रखे धन में से उतना सोना और चांदी एक बड़ी बोरी में भरना शुरू किया, जितना देवराज को तत्काल ले जाना जरूरी था।
देवराज ने सोचा कि इतना धन अकेले ले जाना संभव नहीं होगा। तभी स्वामी ने अपने मंत्रों से वहां एक बैलगाड़ी प्रकट कर दी।
देवराज ने आश्चर्य से बैलगाड़ी को देखा, लेकिन उसने यही समझा कि शायद यह बैलगाड़ी स्वामी की ही होगी।
स्वामी ने बोरी बैलगाड़ी में रखवाई और देवराज के साथ उसे लेकर गांव की ओर चल पड़े। रास्तेभर देवराज धन से ज्यादा अपने आने वाले कार्यों के बारे में सोचता रहा।
रात के समय दोनों देवराज की झोंपड़ी के पास पहुंचे। उन्होंने बैलगाड़ी से बोरी उतारी और घर के भीतर सुरक्षित रख दी।
देवराज ने स्वामी की ओर देखकर कहा, “स्वामी जी, आपने आज मेरे ऊपर बहुत बड़ा विश्वास किया है। मैं इस धन को कभी गलत काम में नहीं लगाऊंगा।”
स्वामी ने केवल मुस्कुराकर कहा, “मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, बेटा।”
देवराज कुछ देर घर के भीतर धन को देखता रहा। फिर जब वह बाहर आया, तो बैलगाड़ी वहां दिखाई नहीं दे रही थी।
वह कुछ क्षण हैरान हुआ, लेकिन उसने ज्यादा विचार नहीं किया। उसने सोचा कि शायद स्वामी बैलगाड़ी लेकर वापस चले गए होंगे।
सुबह होते-होते धनंजय को भी किसी तरह इस रहस्यमयी धन की खबर मिल गई। धीरे-धीरे पूरे गांव में चर्चा फैल गई कि देवराज के घर अचानक बहुत धन आया है।
गांव वाले देवराज को जानते थे। उन्हें विश्वास था कि वह इस धन का गलत उपयोग नहीं करेगा और जरूरतमंदों की सहायता जरूर करेगा।
लेकिन धनंजय के मन में देवराज के लिए जलन और भी बढ़ गई। उसे लगा कि अब उसके पास जमीन और धन होने के बावजूद गांव में देवराज का सम्मान उससे कहीं अधिक हो जाएगा।
कुसमा ने भी धनंजय के चेहरे पर चिढ़ साफ देख ली। उसने धीरे से कहा, “अब तो देवराज के पास हमसे भी ज्यादा धन आ गया है।”
धनंजय ने दांत भींचते हुए कहा, “मुझे पता लगाना होगा कि उसे यह धन कहां से मिला और वह उस जगह तक कैसे पहुंचा।”
दगाबाज भाई ने बहाए झूठे आँसू

कुछ दिन तक धनंजय देवराज पर नजर रखता रहा। फिर एक दिन वह कुसमा के साथ उसके घर पहुंचा।
धनंजय के चेहरे पर उदासी थी और कुसमा की आंखों में भी बनावटी आंसू थे। दोनों को देखकर देवराज तुरंत बाहर आया।
देवराज ने पूछा, “भैया, भाभी, आप दोनों इतने परेशान क्यों हैं? सब ठीक तो है?”
धनंजय ने भारी आवाज में कहा, “भाई, हम बहुत मुश्किल में हैं। हमारे पास अब कुछ भी नहीं बचा है। तुम ही हमारी सहायता कर सकते हो।”
कुसमा भी रोते हुए बोली, “देवराज, अगर तुमने हमारी मदद नहीं की, तो हमारा घर बर्बाद हो जाएगा। हमें बहुत सहारे की जरूरत है।”
देवराज का मन पिघलने लगा। उसने अपने बड़े भाई को दुखी देखकर उनकी पुरानी बातें भी भूलने की कोशिश की।
धनंजय ने आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा, “भाई, अगर तुम मुझे उस जंगल का रास्ता बता दो, तो मैं वहां से थोड़ा धन लेकर अपनी परेशानी दूर कर सकता हूं।”
उसने आगे कहा, “मैं तुम्हारा यह उपकार जिंदगीभर नहीं भूलूंगा। तुम मेरे छोटे भाई हो और आज मुझे तुम्हारी ही जरूरत है।”
धनंजय की आंखों से गिरते आंसू देखकर देवराज को उसकी बात सच लगने लगी। लेकिन यामिनी को कुछ ठीक नहीं लग रहा था।
यामिनी ने देवराज को एक तरफ ले जाकर धीरे से कहा, “इनके आंसू सच्चे नहीं हैं। मुझे डर है कि ये फिर आपको धोखा देंगे।”
देवराज ने यामिनी की ओर देखकर कहा, “यामिनी, वह मेरे बड़े भाई हैं। पिता के समान हैं। पहली बार मेरे पास कुछ मांगने आए हैं, तो मैं उन्हें कैसे मना कर दूं?”
यामिनी ने कहा, “लेकिन आपको इनके पुराने व्यवहार को भी याद रखना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि आपकी अच्छाई फिर आपके लिए परेशानी बन जाए।”
देवराज ने शांत होकर कहा, “अगर मेरा भाई मुसीबत में है, तो उसकी मदद करना मेरा धर्म है। मैं उसे खाली हाथ वापस नहीं भेज सकता।”
आखिरकार देवराज ने धनंजय को जंगल तक पहुंचने का रास्ता बता दिया। उसने उसे अंदर जाने और बाहर निकलने के मंत्र भी समझाए।
देवराज ने कहा, “भैया, इस मंत्र का उच्चारण करके ही जंगल के भीतर जाना और लौटते समय दूसरा मंत्र बोलना। एक शब्द भी गलत मत करना।”
धनंजय ने सिर हिलाया और कहा, “भाई, मैं तुम्हारी बात बिल्कुल नहीं भूलूंगा। तुमने आज मेरा बहुत बड़ा उपकार किया है।”
देवराज को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसका भाई उसके विश्वास का गलत फायदा उठाने वाला है।
धनंजय की लालची यात्रा

अगली सुबह धनंजय बैलगाड़ी लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। उसके मन में अब गरीबी की चिंता नहीं, बल्कि छिपे हुए खजाने को पाने की लालसा थी।
कुसमा ने उसे जाते समय कहा, “जितना धन मिले, उतना लेकर आना। फिर देखना, गांव में सबसे बड़ा मकान हमारा होगा।”
धनंजय ने मुस्कुराकर कहा, “इस बार मैं देवराज से बहुत आगे निकल जाऊंगा।”
वह जंगल के पास पहुंचा और देवराज द्वारा बताया गया मंत्र बोलने लगा। मंत्र पूरा होते ही पेड़ों के बीच वही रहस्यमयी रास्ता दिखाई देने लगा।
धनंजय खुशी से भर गया। वह बैलगाड़ी लेकर जंगल के भीतर चला गया और कुछ ही समय बाद उस विशाल गुफा तक पहुंच गया।
गुफा में रखा सोना देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। उसने एक बोरी भरी, फिर दूसरी भरी और लालच में तीसरी बोरी भी भरने लगा।
वह सोच रहा था कि पूरा खजाना अपने घर ले जाएगा और फिर पूरे गांव को अपनी ताकत दिखाएगा।
लेकिन जैसे-जैसे वह धन भरता गया, गुफा के भीतर का अंधेरा और गहरा होता गया। हवा अचानक ठंडी हो गई और चारों ओर अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं।
धनंजय ने डरकर पीछे देखा। उसे कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन दूर से भारी फुफकार सुनाई दी।
उसने जल्दी से बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन उसे रास्ता दिखाई नहीं दिया। जिस रास्ते से वह अंदर आया था, वह अब गायब हो चुका था।
धनंजय घबराकर इधर-उधर भागने लगा। तभी गुफा के भीतर से एक भयानक गर्जना जैसी फुफकार सुनाई दी।
उसके हाथ से बोरी छूट गई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो अंधेरे में दो चमकती आंखें दिखाई दीं।
धनंजय के शरीर में डर की लहर दौड़ गई। वह पीछे हटने लगा, लेकिन तभी उसके पैरों के आसपास कुछ भारी चीज लिपट गई।
दो दिन बाद देवराज के घर छाया मातम

उधर दो दिन बीत गए, लेकिन धनंजय वापस नहीं आया। कुसमा की चिंता अब डर में बदल चुकी थी और वह रो-रोकर देवराज के घर पहुंची।
कुसमा ने रोते हुए कहा, “देवराज, तुम्हारे भैया अभी तक वापस नहीं आए। मुझे डर है कि उनके साथ कुछ बहुत बुरा हुआ है।”
देवराज यह सुनकर घबरा गया। उसने तुरंत अपने भाई को बचाने के बारे में सोचा, लेकिन उसे जंगल का रास्ता और वहां का खतरा याद था।
यामिनी की आंखों में भी आंसू आ गए। उसने कहा, “आपको कुछ करना होगा। आखिर वह आपके बड़े भाई हैं, चाहे उन्होंने हमारे साथ कितना भी बुरा किया हो।”
देवराज ने कहा, “मैं उन्हें ढूंढकर जरूर लाऊंगा। मैं अपने भाई को उस जंगल में अकेला नहीं छोड़ सकता।”
लेकिन उसके मन में एक बात बार-बार आ रही थी। उसे वही रहस्यमयी स्वामी याद आए, जिन्होंने उसे जंगल और खजाने का रास्ता दिखाया था।
देवराज ने आंखें बंद करके मन ही मन स्वामी को याद किया। तभी जैसे उसकी पुकार सुनकर स्वामी अचानक उसके सामने आ गए।
देवराज उन्हें देखते ही उनके पास गया और घबराकर बोला, “स्वामी जी, मेरा भाई उस जंगल में गया था, लेकिन दो दिनों से वापस नहीं आया है।”
स्वामी ने गंभीर होकर देवराज की ओर देखा और कहा, “अरे देवराज, तुमने यह क्या कर दिया? क्या तुमने उसे उस जंगल का रास्ता बता दिया?”
देवराज ने सिर झुका लिया और कहा, “स्वामी जी, वह मेरा बड़ा भाई है। उसने मदद मांगी थी, इसलिए मैंने उसे रास्ता बता दिया।”
स्वामी ने चिंता भरे स्वर में कहा, “तुम्हें पता नहीं था कि उस खजाने की रक्षा एक भयानक नाग करता है, जो लालच लेकर आने वाले इंसान को जीवित नहीं छोड़ता।”
देवराज का चेहरा पीला पड़ गया। उसने घबराकर कहा, “स्वामी जी, आप तो उसे जानते हैं। कृपा करके मेरे भाई को बचा लीजिए।”
स्वामी ने गंभीर स्वर में कहा, “बेटा, मैं वहां तुम्हारे भाई के लिए कुछ नहीं कर सकता। जो व्यक्ति लालच लेकर उस गुफा में जाता है, उसे अपनी करनी का परिणाम भुगतना पड़ता है।”
देवराज ने हाथ जोड़कर कहा, “लेकिन वह मेरा भाई है। उसकी गलती चाहे कितनी भी बड़ी हो, मैं उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकता।”
इतना कहकर देवराज जंगल की ओर भाग पड़ा। स्वामी भी उसके पीछे चल पड़े, क्योंकि वह जानते थे कि आगे बहुत बड़ा संकट उसका इंतजार कर रहा है।
देवराज जंगल के उस स्थान पर पहुंचा, जहां से वह पहले स्वामी के साथ अंदर गया था, लेकिन वहां कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया।
उसने चारों ओर देखा और घबराकर कहा, “स्वामी जी, जंगल का रास्ता तो यहां है ही नहीं। मैं अपने भाई तक कैसे पहुंचूंगा?”
तभी स्वामी उसके पास पहुंचे। उन्होंने आंखें बंद कीं और कुछ मंत्रों का उच्चारण किया।
मंत्र पूरा होते ही हवा अचानक तेज चलने लगी और पेड़ों के बीच वही रहस्यमयी रास्ता धीरे-धीरे दिखाई देने लगा।
स्वामी ने कहा, “जल्दी करो देवराज। तुम्हारे भाई की जान खतरे में है।”
देवराज बिना एक पल गंवाए जंगल के भीतर दौड़ पड़ा। उसके पीछे स्वामी भी तेजी से आगे बढ़ने लगे।
कुछ दूर जाने के बाद गुफा दिखाई दी। लेकिन वहां का दृश्य देखकर देवराज के पैरों तले जमीन खिसक गई।
एक विशाल काला नाग धनंजय को अपने शरीर में बुरी तरह लपेटे हुए था। उसका विशाल फन ऊपर उठा हुआ था और वह अपना मुंह फैलाकर धनंजय की ओर बढ़ रहा था।
धनंजय दर्द और डर से कांप रहा था। उसकी आंखों में अब धन की कोई चमक नहीं थी, केवल मौत का भय था।
देवराज ने अपने भाई को उस हालत में देखा तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
उसने कांपती आवाज में पुकारा, “भैया!”
नाग ने धीरे-धीरे अपना विशाल फन देवराज की ओर घुमाया।
और उसी क्षण देवराज समझ गया कि अब उसके सामने केवल अपने भाई को बचाने की चुनौती नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा खड़ी थी।
भाई का त्याग, नागराज की परीक्षा और सच्चे रिश्ते की जीत

देवराज अपने भाई को नागराज के फन के नीचे तड़पता देखकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कांपते हाथों से नागराज के सामने सिर झुका दिया।
देवराज ने रोते हुए कहा, “हे नागदेवता, मेरे भाई को छोड़ दीजिए। अगर आपको किसी इंसान की जरूरत है, तो मुझे खा लीजिए।”
उसकी आवाज में इतना दर्द था कि पीछे खड़े स्वामी सत्यदेव भी कुछ क्षणों के लिए बेहद उदास हो गए। उनकी आंखें नम हो उठीं।
स्वामी मन ही मन सोचने लगे, “एक भाई लालच में इतना डूब गया, लेकिन दूसरा भाई अपने प्राण देकर भी उसे बचाना चाहता है।”
उन्होंने आगे सोचा, “देवराज कितना मेहनती, साहसी और नेक दिल इंसान है। ऐसे भाई का मिलना सचमुच दुर्लभ होता है।”
नागराज ने अपना विशाल फन उठाकर देवराज को देखा और गंभीर आवाज में कहा, “नहीं, मैं तुम्हारे भाई को नहीं छोड़ सकता।”
नागराज ने कहा, “इसने मेरे खजाने को चुराने की कोशिश की है। लालच में अंधा होकर यह मेरे क्षेत्र में आया था।”
देवराज ने हाथ जोड़कर कहा, “नागदेवता, इस धन का दोष मेरे भाई का नहीं है। आपको यहां तक आने का रास्ता मैंने ही उसे बताया था।”
नागराज ने आश्चर्य से देवराज की ओर देखा और कहा, “तुम्हें यह धन देवताओं की इच्छा से मिला था, फिर भी तुम अपने भाई की गलती अपने ऊपर ले रहे हो।”
देवराज की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे। उसने फिर हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मेरे भाई को छोड़ दीजिए।”
वह रोते हुए बोला, “मेरी जान ले लीजिए, लेकिन मेरे भाई को जाने दीजिए। मैं उसके बिना अपने घर वापस नहीं जाना चाहता।”
देवराज की बातें सुनकर धनंजय का कठोर हृदय पूरी तरह टूट गया। उसकी आंखों से भी आंसू बहने लगे और वह फूटकर रो पड़ा।
धनंजय ने कांपती आवाज में कहा, “देवराज, आज तक मैंने तुमसे घृणा की और तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया।”
उसने कहा, “मैंने तुम्हारा हक छीना, तुम्हें सताया और तुम्हारी अच्छाई का मजाक उड़ाया। फिर भी आज तुम मेरी जान बचाने आए हो।”
धनंजय ने रोते हुए कहा, “ऐसा भाई मुझे पूरे जीवन में कभी नहीं मिल सकता। तुमने मेरी जान के बदले अपनी जान दांव पर लगा दी।”
वह नागराज की ओर देखकर बोला, “हे नागदेवता, मुझे ही दंड दीजिए। मेरी यही सजा है कि मैंने अपने छोटे भाई का हक छीना और उसे बहुत सताया।”
धनंजय ने कहा, “मैंने आज तक अच्छे काम नहीं किए। इसलिए अगर किसी को इस गलती की कीमत चुकानी है, तो वह मैं हूं।”
देवराज ने तुरंत अपने भाई को रोकते हुए कहा, “भैया, ऐसा मत कहिए। मुझे आपका जीवन चाहिए, आपकी सजा नहीं।”
धनंजय ने देवराज की ओर देखा और दोनों भाई अचानक एक-दूसरे से गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगे।
कई वर्षों की शिकायत, दर्द, अपमान और दूरी उन आंसुओं के साथ बहती चली गई। दोनों भाइयों के दिल फिर से एक हो गए।
नागराज कुछ देर तक दोनों भाइयों को देखता रहा। उसके विशाल फन का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा।
नागराज ने कहा, “आज मैंने पहली बार देखा है कि सच्चा भाईचारा धन और लालच से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।”
नागराज ने कहा, “ठीक है, तुम दोनों यहां से चले जाओ। आज तुम्हारे प्रेम ने तुम्हें मेरी सजा से बचा लिया है।”
देवराज ने हाथ जोड़कर नागराज को प्रणाम किया। धनंजय ने भी सिर झुकाकर अपनी गलती स्वीकार की।
दोनों भाई धीरे-धीरे गुफा से बाहर निकलने लगे। तभी स्वामी सत्यदेव आगे आए और उन्होंने अपने मंत्रों से मायावी जंगल का रास्ता खोल दिया।
कुछ ही क्षणों में पेड़ों के बीच चमकता हुआ रास्ता दिखाई देने लगा। दोनों भाई उस रास्ते से निकलकर अपने गांव की ओर चल पड़े।
गांव के पास पहुंचते ही धनंजय ने देवराज का हाथ पकड़ लिया और कहा, “भाई, आज से हमारे बीच कभी कोई दीवार नहीं रहेगी।”
देवराज ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, मेरे लिए तो वह दीवार उसी दिन टूट गई थी, जिस दिन मैंने आपको अपना भाई समझकर माफ कर दिया था।”
दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उनके साथ चल रहे स्वामी सत्यदेव भी दूर से उन्हें देखकर प्रसन्न हो रहे थे।
लेकिन गांव के पास पहुंचते ही देवराज ने पीछे मुड़कर देखा। स्वामी सत्यदेव वहां दिखाई नहीं दे रहे थे।
देवराज ने चारों ओर देखा, लेकिन स्वामी का कहीं पता नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वह अचानक हवा में ही गायब हो गए हों।
देवराज ने भाई के लिए फिर खोला अपना दिल

घर लौटने के बाद देवराज ने धनंजय को अपने पास बैठाया। उसने कहा, “भैया, अब आप मेरे साथ रहिए। हम दोनों मिलकर गांव के लोगों की सेवा करेंगे।”
धनंजय ने सिर झुकाकर कहा, “भाई, मैंने पहले ही तुम्हारा बहुत कुछ ले लिया है। अब तुम्हारा धन लेना मेरे लिए संभव नहीं है।”
देवराज ने कहा, “भैया, आप मेरे बड़े भाई हैं। मेरे पास जो कुछ है, उसमें आपका भी अधिकार है।”
धनंजय ने साफ मना करते हुए कहा, “नहीं देवराज, मुझे तुम्हारा धन नहीं चाहिए। मैंने वैसे ही पहले तुम्हारा हक छीनकर बहुत बड़ा अपराध किया है।”
देवराज ने अपने भाई की बात नहीं मानी। उसने अपनी ओर से कुछ धन धनंजय को दे दिया और कहा, “यह मेरा नहीं, हमारे परिवार का धन है।”
धनंजय की आंखें भर आईं। उसने अपने भाई को गले लगाकर कहा, “देवराज, तुम्हारे जैसा भाई दुनिया में किसी को मिले, तो वह सचमुच भाग्यशाली है।”
कुछ ही समय बाद धनंजय ने देवराज की झोंपड़ी के पास ही एक छोटा-सा घर बनवा लिया। अब दोनों भाई बिल्कुल पास-पास रहने लगे।
सुबह दोनों साथ खेतों में जाते। शाम को गांव के लोगों की परेशानियां सुनते और जरूरत के अनुसार उनकी सहायता करते।
धनंजय अब पहले जैसा नहीं रहा था। वह गरीबों को देखकर रास्ता बदलने के बजाय उनके पास जाकर उनकी परेशानी पूछता था।
कुसमा ने भी अपने पति में आया बदलाव देखा। धीरे-धीरे उसे भी अपनी पुरानी गलतियों का एहसास होने लगा और उसका व्यवहार बदलने लगा।
गांव में शुरू हुए सेवा के नए काम

देवराज ने स्वामी की बात याद रखी। उसने सबसे पहले गांव के पशुओं के लिए एक बड़ी गौशाला बनवाने का काम शुरू किया।
गौशाला में घायल, बीमार और बेसहारा पशुओं के लिए चारा, पानी और इलाज की अच्छी व्यवस्था की गई।
देवराज ने गांव के बच्चों के लिए एक पुराना विद्यालय भी दोबारा बनवाया, ताकि गरीब परिवारों के बच्चे भी पढ़ाई कर सकें।
जिन किसानों के पास अच्छे बीज खरीदने के पैसे नहीं थे, देवराज उन्हें बीज और जरूरत के अनुसार गेहूँ भी देता था।
उसने गांव के गरीब परिवारों के लिए काम की व्यवस्था भी शुरू की, ताकि उन्हें किसी के सामने हाथ फैलाकर मदद न मांगनी पड़े।
देवराज ने एक बड़ी जमीन खरीदी और वहां खेती का काम शुरू करवाया। गरीब लोगों को वहां मेहनत के बदले उचित मजदूरी दी जाती थी।
देवराज हमेशा कहता था, “गरीब आदमी से मेहनत जरूर करवाओ, लेकिन उसकी मेहनत का पूरा सम्मान और उचित पैसा भी जरूर दो।”
इस काम से गांव के कई परिवारों की जिंदगी बदलने लगी। अब उनके घरों में नियमित भोजन आता और बच्चों की पढ़ाई भी चलने लगी।
गांव के लोग देवराज और धनंजय दोनों को सम्मान की नजर से देखने लगे। अब दोनों भाइयों की जोड़ी पूरे गांव में मिसाल बन चुकी थी।
स्वामी सत्यदेव की आखिरी रहस्यमयी वापसी

एक रात देवराज अपने घर के बाहर बैठा आकाश की ओर देख रहा था। उसके मन में अचानक स्वामी सत्यदेव की याद आने लगी।
वह सोचने लगा, “स्वामी जी आखिर कहां चले गए? उन्होंने हमारी इतनी सहायता की, लेकिन बिना बताए अचानक क्यों गायब हो गए?”
उस रात देवराज देर तक यही सोचता रहा। फिर थककर अपनी चारपाई पर लेट गया और उसकी आंखें लग गईं।
रात में उसे सपना आया। उसी सपने में स्वामी सत्यदेव एक तेज प्रकाश के बीच खड़े दिखाई दिए।
स्वामी ने मुस्कुराकर कहा, “देवराज, तुम मुझे याद कर रहे थे। इसलिए आज मैं तुम्हारे सपने में तुम्हारे सामने आया हूं।”
देवराज ने हाथ जोड़कर पूछा, “स्वामी जी, आप हमें छोड़कर अचानक कहां चले गए थे? मैंने आपको बहुत खोजा।”
स्वामी ने कहा, “बेटा, मेरा कार्य लगभग पूरा हो चुका था। अब तुम्हें अपने जीवन का रास्ता स्वयं आगे बढ़ाना था।”
इतना कहकर स्वामी धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन हो गए। तभी देवराज की अचानक आंख खुल गई।
घर में गहरी शांति थी। उसने बाहर देखा तो अभी रात बाकी थी। तभी उसे लगा जैसे दरवाजे के बाहर कोई खड़ा है।
देवराज तुरंत उठा और दरवाजे तक पहुंचा। उसने समय देखा तो सुबह के ठीक चार बज रहे थे।
उसने धीरे से दरवाजा खोला। सामने वही स्वामी सत्यदेव खड़े थे। उन्हें देखकर देवराज की आंखें खुशी और भावुकता से भर गईं।
देवराज तुरंत उनके चरणों में झुक गया और बोला, “स्वामी जी, आप सचमुच वापस आ गए।”
स्वामी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “देवराज, अब तुम्हें मेरे बारे में वह सत्य जानना चाहिए, जो तुमसे अब तक छिपा रहा।”
देवराज चुपचाप उनकी ओर देखने लगा। स्वामी ने कहा, “मैं कोई साधारण स्वामी नहीं हूं। मुझे देवताओं ने तुम्हारी सहायता के लिए धरती पर भेजा था।”
देवराज की आंखों से आंसू निकल आए। वह कुछ बोल नहीं पाया और हाथ जोड़कर स्वामी की बातें सुनता रहा।
स्वामी ने कहा, “देवराज, तुम बहुत नेक दिल इंसान हो। तुम्हारे अच्छे कर्मों ने तुम्हें उस धन के योग्य बनाया, जिसे तुमने अपने लिए नहीं मांगा था।”
उन्होंने कहा, “तुमने धन को अपने सुख का साधन नहीं बनाया, बल्कि उसे गरीबों, किसानों, बच्चों और पशुओं की सेवा में लगा दिया।”
स्वामी ने आगे कहा, “तुम्हारा दिल इतना बड़ा है कि तुम्हारे सामने देवताओं की दी हुई परीक्षा भी छोटी पड़ गई।”
देवराज की आंखों में आंसू थे। उसने कहा, “स्वामी जी, मैंने तो वही किया जो मुझे सही लगा। इसमें मेरा कोई बड़ा काम नहीं है।”
स्वामी मुस्कुराए और बोले, “यही तुम्हारी सबसे बड़ी अच्छाई है। जो इंसान अपने अच्छे कर्मों का घमंड नहीं करता, वही वास्तव में नेक होता है।”
उन्होंने कहा, “याद रखना, जिस इंसान के दिल में सच्चाई, दया और सेवा हो, उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।”
स्वामी ने कहा, “अब मेरा कार्य पूर्ण हो चुका है। तुम्हारे भाई का हृदय बदल गया है और तुम्हारे गांव में सेवा की नई शुरुआत हो चुकी है।”
देवराज ने भावुक होकर पूछा, “स्वामी जी, क्या अब आप फिर चले जाएंगे?”
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स्वामी ने मुस्कुराकर कहा, “हां बेटा। अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है। तुम्हारे अच्छे कर्म ही तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे।”
देवराज ने हाथ जोड़कर कहा, “स्वामी जी, मैं आपको कभी नहीं भूलूंगा।”
स्वामी ने कहा, “मेरी याद रखने की जरूरत नहीं है। बस अपनी नेकदिली और सेवा की भावना को कभी मत बदलना।”
इतना कहकर स्वामी ने देवराज के सिर पर हाथ रखा। अगले ही क्षण उनके चारों ओर हल्का प्रकाश फैला और वह अचानक वहां से गायब हो गए।
देवराज कुछ देर तक दरवाजे पर खड़ा रहा। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उसके चेहरे पर गहरा संतोष था।
सुबह होते ही उसने यामिनी को सारी बात बताई। यामिनी ने हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखा और स्वामी के लिए मन ही मन प्रार्थना की।
फिर देवराज ने धनंजय और कुसमा को भी स्वामी के बारे में सब बताया। धनंजय यह सुनकर भावुक हो गया और उसने अपने भाई को गले लगा लिया।
धनंजय ने कहा, “भाई, अब मैं समझ गया हूं कि भगवान ने तुम्हें क्यों चुना था। तुम्हारा दिल सचमुच हम सब से बड़ा है।”
देवराज ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, भगवान ने अगर मुझे कुछ दिया है, तो वह दूसरों के काम आने के लिए दिया है।”
दोनों भाइयों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। उस दिन के बाद उनका जीवन हमेशा के लिए सेवा, प्रेम और भाईचारे को समर्पित हो गया।
कहानी की सबसे बड़ी सीख
लालच इंसान को धन तो दे सकता है, लेकिन सच्चा सुख, सम्मान और रिश्तों का प्रेम कभी नहीं दे सकता। इसके लिए नेक दिल होना जरूरी है।
देवराज के पास शुरुआत में बहुत कम था, फिर भी उसने अपनी मेहनत, दया और सेवा से पूरे गांव का दिल जीत लिया।
धनंजय के पास बहुत धन था, लेकिन उसके भीतर लालच और घमंड था। जब उसने सच्चे भाई के प्रेम को समझा, तभी उसका जीवन वास्तव में बदल पाया।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि किसी के साथ किया गया अन्याय कभी इंसान को सच्चा सुख नहीं दे सकता।
सच्ची संपत्ति वह नहीं जो संदूकों में बंद हो, बल्कि वह है जो किसी गरीब के घर चूल्हा जलाए और किसी दुखी चेहरे पर मुस्कान लाए।
जो इंसान दूसरों की मदद करता है, पशुओं की सेवा करता है और अपने रिश्तों को दिल से निभाता है, उसके जीवन में अच्छाई हमेशा रास्ता बनाती है।
और सबसे बड़ा धन वही है, जो बांटने से कम नहीं होता— प्रेम, दया, सेवा और सच्चे रिश्तों का धन।
____कहानी समाप्त____




