गाँव का रक्षक देवा एक बहुत प्यारा, नेकदिल और बहादुर लड़का है। वह अभी केवल 14 साल का है, लेकिन उसके अंदर अपार शक्ति छिपी है।
शिवगढ़ के प्राचीन श्री अंबिका मंदिर में कुलदेवी अंबिका का देवा पर पूरा आशीर्वाद है। मंदिर का दिव्य पंचामृत पीते ही उसकी शक्ति जाग जाती है।
उस समय देवा केवल एक साधारण लड़का नहीं रहता, बल्कि एक शक्तिशाली योद्धा बन जाता है। उसकी असली शक्ति अभी भी एक रहस्य है।
देवा के साथ उसके चार खास दोस्त बंसी, गोपाल, नंदू और बिंदिया हमेशा खड़े रहते हैं। उसका वफादार मोती और बहादुर घोड़ा तेजस भी साथ रहते हैं।
काशी दादा का आशीर्वाद और फूलमती चाची का प्यार हमेशा देवा के साथ रहता है। शिवगढ़ गाँव में सभी लोग मिलजुलकर खुशी से रहते हैं।
लेकिन इस शांत गाँव पर अब बड़ी मुसीबतें आने वाली हैं। जंगल का शक्तिशाली शेर वनराज अचानक गाँव की सीमा पर आ जाता है।
वनराज कभी-कभी किसी जानवर का शिकार करके वापस जंगल चला जाता है। क्या वह शिवगढ़ के लोगों को चैन से रहने देगा?
दूसरी ओर खूँखार डाकू बलिया भी गाँव के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। क्या राजा सूर्यपाल और राजकुमारी राजनंदिनी सुरक्षित रह पाएँगे?
जंगल के अंदर आखिर ऐसा कौन-सा रहस्य छिपा है, जिसका किसी को पता नहीं? क्या देवा आने वाली सभी मुसीबतों का सामना कर पाएगा?
देखिए देवा कार्टून की यह रोमांचक कहानी, जिसमें हर भाग के साथ एक नया रहस्य, नई चुनौती और नया रोमांच सामने आएगा।
शिवगढ़ की शांत सुबह। Deva Cartoon Story In Hindi
सुबह की पहली किरण ऊँचे पहाड़ों के पीछे से निकली। उसकी सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे पूरे शिवगढ़ में फैलने लगी।
ठंडी हवा हरे खेतों को छूती हुई गुजर रही थी। पेड़ों पर बैठे पक्षी मीठी आवाज़ में नए दिन का स्वागत कर रहे थे।
शिवगढ़ चारों तरफ़ घने जंगलों से घिरा एक सुंदर गाँव था। पास बहती नदी उसकी सुंदरता को और बढ़ा देती थी।
गाँव के कच्चे रास्तों पर लोग धीरे-धीरे निकलने लगे थे। कोई खेत जा रहा था, कोई अपने जानवरों को चारा दे रहा था।
घरों के आँगन में औरतें सफ़ाई कर रही थीं। बच्चे मुस्कुराते हुए बाहर निकलकर अपने दोस्तों को ढूँढने लगे थे।
गाँव के बाहर श्री अंबिका मंदिर बहुत शांत दिखाई देता था। सुबह की घंटियों की आवाज़ दूर तक सुनाई दे रही थी।
मंदिर के अंदर भगवान शिव का बहुत पुराना शिवलिंग था। गाँव का हर परिवार उसे अपनी सबसे बड़ी आस्था मानता था।
मंदिर के नीचे एक रहस्यमयी गुफा थी। गाँव वाले कहते थे, वहीं कुलदेवी अंबिका का दिव्य वास है।
कोई भी गाँव वाला उस गुफा के पास शोर नहीं करता था। सभी उस पवित्र स्थान का दिल से सम्मान करते थे।
गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बरगद का पेड़ खड़ा था। उसी जगह को पूरे शिवगढ़ में बरगद चौक कहा जाता था।
सुबह होते ही बरगद चौक लोगों से भरने लगा। हर तरफ़ राम-राम और मुस्कुराहट का प्यारा माहौल दिखाई दे रहा था।
गाँव के बुजुर्ग काशी दादा
बरगद के नीचे काशी दादा हमेशा की तरह बैठे थे। उनके चेहरे की मुस्कान देखकर हर किसी का मन खुश हो जाता था।
गाँव का हर आदमी उनके पास रुकता था। आशीर्वाद लेकर ही अपने काम के लिए आगे बढ़ता था।
तभी एक चौदह साल का लड़का मुस्कुराता हुआ बरगद चौक की तरफ़ चला आया। उसकी चाल में आत्मविश्वास साफ़ दिखाई देता था।
वह देवा था। पूरे शिवगढ़ का सबसे प्यारा और सबसे मददगार लड़का, जिसे हर कोई अपने परिवार जैसा मानता था।
देवा झुककर काशी दादा के पैर छूने लगा। काशी दादा ने उसके सिर पर प्यार से हाथ रख दिया।
काशी दादा बोले, “खुश रहो बेटा। भगवान शिव की कृपा हमेशा तुम्हारे साथ रहे।”
देवा मुस्कुराकर बोला, “दादा, आपका आशीर्वाद मिल जाए, तो हर मुश्किल आसान लगती है।”
उसी समय सफेद रंग का बलवान घोड़ा धीरे-धीरे चलता हुआ देवा के पास आकर खड़ा हो गया।
उस घोड़े का नाम तेजस था। पूरा शिवगढ़ जानता था कि वह कुलदेवी अंबिका का प्रिय घोड़ा है।
तेजस ने प्यार से अपना सिर देवा के कंधे से लगाया। उसे देखकर आसपास खड़े लोग मुस्कुराने लगे।
देवा हँसकर बोला, “क्या बात है दोस्त, आज तो तू बहुत खुश दिखाई दे रहा है।”
तेजस ने ज़ोर से हिनहिनाकर जैसे देवा की बात का जवाब दिया। उसकी आँखों में अपने दोस्त के लिए प्यार साफ़ दिखाई देता था।
उसी समय मोती दौड़ता हुआ बरगद चौक में पहुँचा। वह खुशी से पूँछ हिलाते हुए सीधे देवा के पास आ गया।
बरगद चौक की मस्ती

देवा झुककर बोला, “आ गया मेरे बहादुर दोस्त। चल, आज देखते हैं शिवगढ़ में क्या नया होने वाला है।”
मोती खुशी से दो बार भौंका। वह पूँछ हिलाते हुए देवा के चारों तरफ़ गोल-गोल घूमने लगा।
तभी पीछे से किसी ने हँसते हुए देवा की पीठ पर हल्की थपकी मारी। देवा तुरंत पलटकर मुस्कुरा दिया।
बंसी बोला, “अरे देवा, तू फिर सबसे पहले बरगद चौक पहुँच गया। हमारा इंतज़ार भी नहीं किया।”
देवा हँसकर बोला, “मैं तो कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था। देर तो तुम लोगों ने की है।”
गोपाल मुस्कुराकर बोला, “बातें बाद में करना। पहले आज का खेल तय कर लेते हैं।”
नंदू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में छोटी लकड़ी थी और चेहरे पर शरारत साफ़ दिखाई दे रही थी।
नंदू बोला, “आज जो हारेगा, उसे सबके लिए नदी से पानी भरकर लाना पड़ेगा।”
बिंदिया हँसते हुए वहाँ पहुँची। उसके हाथ में ताँबे की छोटी शीशी सुरक्षित बँधी हुई थी।
बिंदिया बोली, “तुम लोग सुबह से बस शरारत ही सोचते रहते हो। कभी मेरी भी सुन लिया करो।”
बंसी हँसकर बोला, “अगर तेरी सुन ली, तो खेल कब होगा।”
चारों दोस्त ज़ोर से हँस पड़े। उनकी हँसी पूरे बरगद चौक में गूँजने लगी।
काशी दादा दूर बैठे बच्चों की मस्ती देख रहे थे। उनके चेहरे पर अपनापन और खुशी साफ़ दिखाई दे रही थी।
काशी दादा बोले, “बच्चों की हँसी से ही गाँव की रौनक बनी रहती है। हमेशा ऐसे ही मिलकर रहना।”
देवा बोला, “दादा, हम सब हमेशा साथ रहेंगे। कोई भी मुश्किल आए, मिलकर उसका सामना करेंगे।”
इतने में मोती अचानक आगे भागा। उसने पीछे मुड़कर देवा की तरफ़ देखा, जैसे कहीं चलने का इशारा कर रहा हो।
बंसी बोला, “लगता है मोती को कहीं जाने की जल्दी है।”
गोपाल मुस्कुराकर बोला, “मुझे तो लगता है इसे भूख लग गई है।”
नंदू हँसकर बोला, “भूख इसे नहीं, मुझे लगी है। सुबह से कुछ नहीं खाया।”
देवा मुस्कुराकर बोला, “तो फिर देर किस बात की। चलो, फूलमती चाची के बगीचे चलते हैं।”
बिंदिया बोली, “हाँ, वहाँ के मीठे आम याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है।”
बंसी खुशी से उछल पड़ा। उसने सबसे पहले कच्चे रास्ते की तरफ़ दौड़ लगा दी।
बंसी पीछे मुड़कर बोला, “जो सबसे बाद में पहुँचेगा, उसे सबसे छोटा आम मिलेगा।”
देवा हँसते हुए बोला, “अरे धीरे भाग। चाची से पूछे बिना कोई भी आम नहीं तोड़ेगा।”
फूलमती चाची का बगीचा

इतना सुनते ही सब दोस्त हँसते हुए फूलमती चाची के बड़े बगीचे की तरफ़ दौड़ पड़े।
कच्चे रास्ते पर दौड़ते हुए पाँचों दोस्त एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे। मोती भी उनके साथ उछलता-कूदता भाग रहा था।
बंसी हँसकर बोला, “आज सबसे पहले मैं बगीचे में पहुँचूँगा। कोई मुझे पकड़ नहीं पाएगा।”
नंदू बोला, “पहले पहुँच जाना आसान है। सबसे मीठा आम ढूँढ़कर दिखाओ, तब मानूँगा।”
गोपाल मुस्कुराकर बोला, “तुम दोनों हर बार बस शेखी मारते हो। काम कुछ भी नहीं करते।”
बिंदिया हँसते हुए बोली, “अरे, पहले चाची को राम-राम तो बोल लेना। फिर आम खाना।”
देवा मुस्कुराकर बोला, “बिंदिया ठीक कह रही है। फूलमती चाची हमेशा हमारा इंतज़ार करती हैं।”
कुछ ही देर में सभी दोस्त बड़े बगीचे के सामने पहुँच गए। चारों तरफ़ हरे पेड़ों की लंबी कतारें दिखाई दे रही थीं।
आम, अमरूद और जामुन के पेड़ फलों से लदे हुए थे। ठंडी हवा पूरे बगीचे में मीठी खुशबू फैला रही थी।
फूलमती चाची टोकरी लेकर पेड़ों के बीच घूम रही थीं। बच्चों को देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
फूलमती चाची बोली, “अरे वाह! आज तो मेरे सारे शैतान एक साथ आ गए।”
सब बच्चों ने एक साथ कहा, “राम-राम चाची!”
फूलमती चाची हँसते हुए बोली, “खुश रहो बच्चों। आओ, पहले बैठो, फिर मीठे फल खिलाती हूँ।”
बंसी धीरे से बोला, “चाची, आज सबसे बड़ा आम मुझे देना।”
फूलमती चाची हँसकर बोली, “सबसे बड़ा आम उसी को मिलेगा, जो सबसे पहले मेरी मदद करेगा।”
इतना सुनते ही बंसी, गोपाल और नंदू एक साथ टोकरी उठाने दौड़ पड़े। यह देखकर सब ज़ोर से हँसने लगे।
देवा मुस्कुराकर बोला, “देखा चाची, आम का नाम सुनते ही सब कितने सीधे बन गए।”
बिंदिया हँसते हुए बोली, “इनको बस खाने से मतलब है। काम तो बहाना है।”
फूलमती चाची ने टोकरी भरकर पके हुए आम बच्चों के सामने रख दिए। उनकी मीठी खुशबू चारों तरफ़ फैल गई।
बंसी बोला, “वाह! इतने बड़े आम तो मैंने पहले कभी नहीं देखे।”
नंदू जल्दी से आगे बढ़ा। उसने सबसे पहले एक बड़ा आम उठा लिया और मुस्कुराने लगा।
गोपाल भी पीछे नहीं रहा। उसने दूसरा बड़ा आम उठा लिया और बंसी को चिढ़ाने लगा।
बिंदिया सबको बराबर-बराबर आम बाँटने लगी। उसने मोती के लिए भी एक पका हुआ फल अलग रख दिया।
देवा बोला, “शाबाश बिंदिया। तू हमेशा सबका ध्यान रखती है।”
मोती खुशी से पूँछ हिलाने लगा। उसने पहले देवा की तरफ़ देखा, फिर धीरे से फल खाने लगा।
उसी समय अचानक मोती ने फल खाना बंद कर दिया। उसके कान खड़े हो गए और आँखें जंगल की तरफ़ टिक गईं।
जंगल की पहली खतरे की आहट

देवा का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। उसने बिना कुछ बोले जंगल की तरफ़ ध्यान से देखना शुरू कर दिया।
मोती धीरे-धीरे गुर्राने लगा। उसकी नज़रें एक ही दिशा में टिकी थीं। वह बार-बार हवा को सूँघ रहा था।
बंसी बोला, “देवा… क्या हुआ? तू अचानक इतना चुप क्यों हो गया?”
देवा बोला, “मोती कभी बिना वजह ऐसा नहीं करता। जंगल में कुछ ज़रूर हुआ है।”
गोपाल धीरे से बोला, “मुझे भी हवा कुछ अलग लग रही है। पहले जैसी शांति अब नहीं रही।”
नंदू पेड़ के पास चढ़कर दूर देखने लगा। उसे जंगल के ऊँचे पेड़ों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया।
नंदू बोला, “मुझे तो सब ठीक लग रहा है। शायद मोती किसी जानवर की गंध पहचान रहा होगा।”
बिंदिया ने ताँबे की छोटी शीशी को संभालकर पकड़ा। वह चुपचाप देवा के चेहरे को देखती रही।
फूलमती चाची बोलीं, “बेटा, जंगल की तरफ़ मत जाना। आज सुबह से मेरा मन भी घबरा रहा है।”
देवा मुस्कुराकर बोला, “चाची, चिंता मत कीजिए। हम सब यहीं हैं। पहले देखते हैं बात क्या है।”
अचानक जंगल की तरफ़ बैठे पक्षी एक साथ उड़ने लगे। उनके पंखों की आवाज़ पूरे बगीचे में गूँज उठी।
बंसी धीरे से बोला, “इतने सारे पक्षी एक साथ कभी नहीं उड़ते। कुछ तो गड़बड़ है।”
मोती अब ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। उसकी आवाज़ पहले से भी तेज़ होती जा रही थी।
तेजस ने दूर खड़े-खड़े ज़ोर से हिनहिनाया। उसने अपने अगले पैर ज़मीन पर मारने शुरू कर दिए।
गोपाल बोला, “देखो… तेजस भी बेचैन हो गया है। अब मुझे सच में डर लगने लगा है।”
देवा ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़र अब भी जंगल की तरफ़ ही थी।
तभी झाड़ियों के पीछे कुछ तेज़ी से हिलता दिखाई दिया। सूखे पत्ते हवा में उड़ने लगे।
नंदू घबराकर बोला, “देवा… वहाँ कुछ चल रहा है। मैंने अपनी आँखों से देखा है।”
बिंदिया बोली, “सब लोग एक साथ रहो। कोई भी अकेला आगे मत जाना।”
फूलमती चाची ने बच्चों को अपने पास बुलाना चाहा। लेकिन देवा वहीं खड़ा जंगल को देखता रहा।
अचानक पूरे जंगल में एक भयानक दहाड़ गूँज उठी। उसकी आवाज़ सुनकर बगीचे की हवा जैसे थम गई।
बंसी डरकर बोला, “यह… यह तो वनराज की दहाड़ है!”
गोपाल ने धीरे से सिर हिलाया। उसके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
देवा बोला, “हाँ… वनराज आ गया है। लेकिन इस बार उसकी दहाड़ पहले जैसी नहीं लग रही।”
उसी समय जंगल के अंदर से किसी की दर्द भरी आवाज़ सुनाई दी।
आवाज़ आई, “बचाओ… कोई बचाओ…”
जंगल से आई पुकार बचाओ-बचाओ

सबकी नज़रें एक साथ जंगल की ओर उठ गईं। किसी को समझ नहीं आया कि मदद के लिए कौन पुकार रहा था।
बंसी घबराकर बोला, “देवा… यह आवाज़ किसी इंसान की लग रही है। हमें कुछ करना चाहिए।”
गोपाल बोला, “पहले सोच लेते हैं। बिना समझे जंगल में जाना ठीक नहीं होगा।”
नंदू बोला, “मैं पेड़ पर चढ़कर देखता हूँ। शायद ऊपर से कुछ दिखाई दे जाए।”
देवा बोला, “नहीं नंदू। अभी कोई भी अकेला आगे नहीं जाएगा। हम सब साथ रहेंगे।”
बिंदिया ने धीरे से ताँबे की छोटी शीशी को छुआ। वह चुपचाप भगवान शिव का नाम लेने लगी।
मोती लगातार जंगल की तरफ़ भौंक रहा था। उसकी बेचैनी हर पल बढ़ती जा रही थी।
तेजस ने फिर ज़ोर से हिनहिनाकर ज़मीन पर अपने अगले पैर पटके। वह भी किसी खतरे को महसूस कर चुका था।
फूलमती चाची बोलीं, “बेटा, मेरा मन बहुत घबरा रहा है। आज जंगल की हवा पहले जैसी नहीं लग रही।”
देवा बोला, “चाची, आप गाँव वालों के साथ यहीं रहिए। हम पहले देखकर आते हैं कि बात क्या है।”
इतने में बरगद चौक की तरफ़ से कई गाँव वाले दौड़ते हुए बगीचे में पहुँच गए। सबके चेहरों पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
रामू काका हाँफते हुए बोले, “हमने भी वह चीख सुनी है। पूरा गाँव डर गया है।”
काशी दादा भी धीरे-धीरे वहाँ पहुँचे। उन्होंने जंगल की तरफ़ गहरी नज़र से देखा।
काशी दादा बोले, “यह साधारण बात नहीं है। जंगल आज कोई बड़ा राज छिपाए बैठा है।”
अचानक फिर वही आवाज़ सुनाई दी, “बचाओ… कोई तो बचाओ…”
इस बार आवाज़ पहले से भी ज़्यादा साफ़ सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई मंदिर की दिशा से पुकार रहा हो।
देवा बोला, “यह आवाज़ श्री अंबिका मंदिर की तरफ़ से आ रही है।”
गोपाल बोला, “अगर मंदिर की तरफ़ से आ रही है, तो देर करना ठीक नहीं होगा।”
बंसी बोला, “मैं भी तेरे साथ चलूँगा। चाहे जो हो जाए।”
नंदू बोला, “हम पाँचों हमेशा साथ रहे हैं। आज भी कोई पीछे नहीं हटेगा।”
बिंदिया बोली, “हम सब साथ चलेंगे, लेकिन बिना सोचे कोई जल्दबाज़ी नहीं करेगा।”
उसी समय जंगल के ऊपर बैठे पक्षी अचानक फिर उड़ गए। पूरे जंगल में अजीब सी खामोशी फैल गई।
देवा ने एक बार श्री अंबिका मंदिर की दिशा में देखा। फिर उसने अपने दोस्तों की तरफ़ मुस्कुराकर सिर हिलाया।
देवा बोला, “चलो दोस्तों… अब समय आ गया है। देखते हैं आखिर मंदिर की तरफ़ कौन मुसीबत में है।”
इतना कहकर देवा सबसे आगे बढ़ा। उसके पीछे बंसी, गोपाल, नंदू, बिंदिया, मोती और तेजस भी जंगल की ओर चल पड़े।
अगले भाग में…
क्या देवा की वनराज (शेर) से पहली बड़ी भिड़ंत होगी? और जंगल में रहने वाले डाकू बलिया ने आखिर जंगल में ऐसा किया? अगली कहानी में जानिए।
