पिछले भाग में हमने जाना कि राजा शांतनु और गंगा के आठवें पुत्र देवव्रत को गंगा ने शिक्षा देकर हस्तिनापुर वापस लाया था। देवव्रत अब एक योग्य और वीर राजकुमार बन चुके थे।
राजा शांतनु अपने पुत्र को पाकर बहुत खुश थे। उन्हें भरोसा था कि देवव्रत आगे चलकर हस्तिनापुर की जिम्मेदारी संभालेंगे। लेकिन महाभारत की कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंचने वाली थी, जहां एक पिता की इच्छा पूरी करने के लिए पुत्र को बहुत बड़ा त्याग करना पड़ा।
इसी घटना के कारण देवव्रत को आगे चलकर भीष्म के नाम से जाना गया। उनकी प्रतिज्ञा इतनी कठिन थी कि उसका असर आने वाली कई पीढ़ियों तक हस्तिनापुर के राजपरिवार पर पड़ा।
देवव्रत बने हस्तिनापुर के योग्य राजकुमार
गंगा के साथ शिक्षा पूरी करने के बाद देवव्रत अपने पिता राजा शांतनु के पास लौट आए। राजा ने अपने पुत्र को देखकर बहुत खुशी महसूस की।
देवव्रत ने युद्ध, राजकाज, धर्म और राज्य चलाने की जरूरी बातें अच्छी तरह सीख ली थीं। वह वीर होने के साथ-साथ समझदार और अपने पिता की बात मानने वाले पुत्र थे।
राजा शांतनु ने देवव्रत को हस्तिनापुर का योग्य उत्तराधिकारी माना। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यही राजकुमार अपने पिता की खुशी के लिए अपना पूरा भविष्य बदल देगा।
राजा शांतनु की मुलाकात सत्यवती से हुई
एक दिन राजा शांतनु नदी के किनारे गए। वहां उनकी मुलाकात सत्यवती नाम की एक युवती से हुई। सत्यवती नाव चलाने का काम करती थीं और अपने पिता के साथ रहती थीं।
राजा शांतनु सत्यवती से बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में सत्यवती से विवाह करने की इच्छा पैदा हुई। इसके बाद राजा ने सत्यवती के पिता के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
लेकिन सत्यवती के पिता ने राजा के सामने एक ऐसी शर्त रख दी, जिसने शांतनु को गहरी चिंता में डाल दिया।
सत्यवती के पिता ने रखी बड़ी शर्त
सत्यवती के पिता ने कहा कि यदि सत्यवती से राजा शांतनु का विवाह होता है, तो सत्यवती से पैदा होने वाला पुत्र ही आगे चलकर हस्तिनापुर का राजा बनेगा।
राजा शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर सके। उनके सामने पहले से ही देवव्रत थे, जो योग्य राजकुमार और सिंहासन के उत्तराधिकारी थे।
राजा सत्यवती को मन से चाहते थे, लेकिन वह अपने पुत्र देवव्रत के अधिकार को भी नहीं छीनना चाहते थे। इसलिए वह दुखी होकर हस्तिनापुर लौट आए।
शांतनु के दुख को देवव्रत ने समझ लिया
हस्तिनापुर लौटने के बाद राजा शांतनु चुप रहने लगे। उनके मन में सत्यवती की बात चलती रहती थी, लेकिन वह अपने पुत्र से कुछ नहीं कहते थे।
देवव्रत ने अपने पिता के व्यवहार में बदलाव देखा। उन्होंने महसूस किया कि राजा के मन में कोई बड़ा दुख है।
देवव्रत ने राजमहल के लोगों से कारण जानने की कोशिश की। तब उन्हें सत्यवती और उसके पिता की शर्त के बारे में पता चला।
देवव्रत सत्यवती के पिता के पास पहुंचे
अपने पिता का दुख देखकर देवव्रत ने देर नहीं की। वह स्वयं सत्यवती के पिता के पास पहुंचे और राजा शांतनु की ओर से विवाह की बात आगे बढ़ाई।
सत्यवती के पिता ने अपनी वही शर्त दोहराई। उन्होंने कहा कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा और देवव्रत सिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ दें।
देवव्रत ने बिना किसी झिझक के अपने पिता की खुशी के लिए राजसिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ने का वचन दे दिया।
देवव्रत ने छोड़ दिया राजसिंहासन का अधिकार
देवव्रत ने वहां मौजूद लोगों के सामने कहा कि वह हस्तिनापुर के सिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ते हैं। सत्यवती से जन्म लेने वाला पुत्र ही आगे चलकर राजा बनेगा।
सत्यवती के पिता को देवव्रत की बात सुनकर खुशी हुई, लेकिन उनके मन में अभी भी एक चिंता बाकी थी। उन्हें डर था कि भविष्य में देवव्रत के अपने पुत्र सिंहासन पर अधिकार मांग सकते हैं।
यही सवाल देवव्रत के सामने रखा गया। इसके बाद देवव्रत ने ऐसा फैसला लिया, जिसने उनका पूरा जीवन बदल दिया।
देवव्रत ने ली जीवन की सबसे कठिन प्रतिज्ञा
देवव्रत ने समझ लिया कि जब तक उनके अपने पुत्र होंगे, तब तक सत्यवती के पुत्रों के अधिकार को लेकर भविष्य में विवाद हो सकता है।
अपने पिता की खुशी और हस्तिनापुर के भविष्य के लिए देवव्रत ने जीवनभर विवाह न करने का वचन लिया। उन्होंने यह भी तय किया कि उनके कोई संतान नहीं होगी।
एक ऐसा वचन जिसने इतिहास बदल दिया
देवव्रत की यह प्रतिज्ञा साधारण नहीं थी। उन्होंने अपने सुख, विवाह और संतान का त्याग केवल इसलिए किया, ताकि उनके पिता राजा शांतनु की इच्छा पूरी हो सके।
उनके इस कठिन वचन को सुनकर वहां मौजूद सभी लोग हैरान रह गए। देवव्रत ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा और पिता की खुशी को अपने जीवन से भी बड़ा मान लिया।
देवव्रत कहलाए भीष्म
देवव्रत की इतनी कठिन प्रतिज्ञा के बाद आकाश से फूल बरसने लगे। वहां मौजूद लोगों ने उनकी महान प्रतिज्ञा की प्रशंसा की।
उनकी भयंकर और कठिन प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत को भीष्म नाम मिला। इसके बाद वह हमेशा के लिए भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
यह वही क्षण था, जिसने महाभारत की आगे की पूरी कहानी की नींव मजबूत कर दी। भीष्म अब केवल हस्तिनापुर के राजकुमार नहीं रहे थे, बल्कि कुरुवंश के सबसे बड़े रक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ चुके थे।
भीष्म सत्यवती को लेकर हस्तिनापुर पहुंचे
प्रतिज्ञा लेने के बाद भीष्म सत्यवती को अपने रथ पर लेकर हस्तिनापुर लौटे। उन्होंने राजा शांतनु को पूरी बात बताई और कहा कि उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए यह फैसला लिया है।
राजा शांतनु को जब अपने पुत्र के त्याग के बारे में पता चला, तो उनका हृदय भर आया। उन्हें अपने पुत्र पर गर्व भी हुआ और उसके कठिन फैसले का दुख भी हुआ।
सत्यवती के पिता की शर्त पूरी हो चुकी थी। अब राजा शांतनु के लिए सत्यवती से विवाह करने का रास्ता साफ हो गया।
राजा शांतनु ने भीष्म को दिया बड़ा वरदान
अपने पुत्र के महान त्याग से राजा शांतनु बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भीष्म को ऐसा वरदान दिया, जो आगे चलकर महाभारत की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में दिखाई देगा।
राजा शांतनु ने भीष्म को इच्छा के अनुसार मृत्यु पाने का वरदान दिया। यानी भीष्म की मृत्यु उनकी इच्छा के बिना नहीं होगी। वह जब चाहेंगे, तभी मृत्यु को स्वीकार करेंगे।
शांतनु और सत्यवती का विवाह
इसके बाद राजा शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। सत्यवती हस्तिनापुर की रानी बनीं और राजमहल में उनका नया जीवन शुरू हुआ।
भीष्म ने अपने पिता की खुशी के लिए जो त्याग किया था, वह अब पूरे हस्तिनापुर के सामने था। उन्होंने सिंहासन छोड़ दिया था और जीवनभर विवाह न करने का वचन भी ले लिया था।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सत्यवती से आगे जन्म लेने वाले राजकुमारों और उनके बाद होने वाली घटनाओं से कुरुवंश में कितने बड़े बदलाव आने वाले हैं।
भीष्म की प्रतिज्ञा का असर आगे तक गया
भीष्म ने अपने पिता के लिए अपना अधिकार छोड़ दिया, लेकिन उनका जीवन अब हस्तिनापुर की रक्षा के लिए समर्पित हो चुका था। वह राजसिंहासन पर नहीं बैठेंगे, फिर भी राजपरिवार के सबसे बड़े सहारे बने रहेंगे।
उनकी प्रतिज्ञा ने सत्यवती के पुत्रों के लिए राजगद्दी का रास्ता खोल दिया। आगे चलकर यही परिवार कई कठिन परिस्थितियों से गुजरेगा और कुरुवंश में नए रिश्ते बनेंगे।
यहीं से महाभारत की कहानी धीरे-धीरे उस परिवार की ओर बढ़ती है, जिसमें आगे चलकर पांडव और कौरव जन्म लेंगे और हस्तिनापुर का भविष्य बदल जाएगा।
इस भाग में हमने क्या जाना?
इस भाग में हमने जाना कि देवव्रत अपने पिता राजा शांतनु के दुख का कारण समझकर सत्यवती के पिता के पास पहुंचे। उन्होंने पहले राजसिंहासन का अधिकार छोड़ने का वचन दिया।
जब सत्यवती के पिता को देवव्रत की भविष्य की संतान को लेकर चिंता हुई, तब देवव्रत ने जीवनभर विवाह न करने की कठिन प्रतिज्ञा ले ली।
इसी महान प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत को भीष्म नाम मिला। उन्होंने सत्यवती को हस्तिनापुर पहुंचाया और राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा के अनुसार मृत्यु पाने का वरदान दिया।
महाभारत में आप अगले भाग में पढ़ेंगे
1. सत्यवती के पुत्रों का जन्म
राजा शांतनु और सत्यवती के जीवन में आगे क्या हुआ? उनके घर कौन-कौन से पुत्र जन्मे और हस्तिनापुर की गद्दी का भविष्य कैसे बदला?
2. चित्रांगद बने हस्तिनापुर के राजा
सत्यवती के बड़े पुत्र चित्रांगद आगे चलकर हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठेंगे, लेकिन उनका जीवन ज्यादा लंबा नहीं होगा।
3. विचित्रवीर्य का राजसिंहासन पर आना
चित्रांगद के बाद सत्यवती के छोटे पुत्र विचित्रवीर्य के सामने हस्तिनापुर की जिम्मेदारी आएगी और राजपरिवार की कहानी एक नए मोड़ पर पहुंचेगी।
4. काशी की राजकुमारियों का स्वयंवर
आगे भीष्म काशी की तीन राजकुमारियों के स्वयंवर में पहुंचेंगे। वहां लिया गया उनका एक बड़ा फैसला आगे कई घटनाओं को जन्म देगा।
5. अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका की कहानी
इन तीन राजकुमारियों से जुड़ी घटना आगे भीष्म के जीवन में एक बड़ी चुनौती लेकर आएगी और कुरुवंश की कहानी को एक नया मोड़ मिलेगा।

