क्या हुआ सभी पांडव और द्रोपदी का ? Mahabharata Seccret Story In Hindi
⇒ सभी पांडव युद्ध जीत चुके थें । और महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था। कुरुक्षेत्र की धरती लाल होने के बाद अब शांत थी, लेकिन इतनी सारी मृत्यु होने के बाद वहाँ खुशी बिल्कुल नही थी ।
⇒ कुरुक्षेत्र में हर तरफ अपनों की ही लाशे टूटी हुई चीजे, भारी मात्रा में हथियार और सिर्फ युद्ध के निशान ही थे। करुक्षेत्र का यह हाल देखकर पांडवों का मन बहुत दुखी हो चुका था ।
⇒ सभी पांडव युद्ध जीत गए थे, मगर उनका दिल बहुत ज्यादा टूट गया था क्योंकि पांडवों नें अपने हीपरिवार के लोगो को अपनी आँखों के सामने खो दिया था ।
⇒ जैसे – अभिमन्यु , कर्ण , गुरु द्रोणाचार्य , भीष्म पितामह, और बहुत सारे ।
⇒ सभी पांडवों में से युधिष्ठिर सबसे ज्यादा दुखी थे। उन्हे बार- बार यह लगता था कि यह सब युद्ध रोक भी सकते थे ।इन्होंने युद्ध को क्यों नहीं रोका ।
⇒ फिर कृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा, कि यह युद्ध धर्म और सच्चाई की रक्षा के लिए बहुत जरूरी थी। अब तुम पांडवों का काम राज्य संभालना है।
⇒ तुम्हें प्रजा की सेवा और रक्षा करनी हैं ।
युधिष्ठिर का राजा बनना और राज्य का चलना
⇒ तभी श्री कृष्ण की बात मानकर युधिष्ठिर राजा बने । उनका राजतिलक हुआ और वे हस्तिनापुर के राजा बने , लोग बहुत खुश थे क्योंकि उनका राजा सच्चा और न्याय करने वाला था।
⇒ पूरा राज्य चलाने में सभी पांडवों ने अलग – अलग काम संभाला। भीम सुरक्षा देखते थे, अर्जुन सारी सेना चलाते थे, नकुल और सहदेव प्रशासन में मदद करते थे।
⇒ द्रौपदी भी लोगो की सेवा करती थी। राज्य धीरे – धीरे फिर से खुशहाल हो गया।
वनवास और संसार से दूर जाने का समय
⇒ कुछ समय पश्चात धृतराष्ट्र , गंधारी और कुंती मोह माया सब कुछ त्याग कर जंगल चले गए और वहाँ ध्यान करने लगे ।
⇒ तभी एक दिन अचानक जंगल मे आग लग गई और उनका अंत हो गया।
⇒ फिर कुछ ही दिनों में इसके बाद श्रीकृष्ण के देह त्याग की खबर आई। अर्जुन द्वारका गए और देखा कि सब खत्म हो चुका था।
⇒ वहां यदुवंश का नाश हो चुका था। अर्जुन की शक्ति भी धीरे – धीरे कम होने लगी, जिससे उन्हे समझ आया कि अब समय आया कि अब समय बदल रहा है।
⇒ युधिष्ठिर ने समझ लिया कि अब उनका समय पूरा हो गया है। उन्होंने राज छोड़ दिया और परीक्षित को राजा बना दिया।
⇒ इसके बाद सभी पांडवों ने राजसी जीवन छोड़ दिया और अंतिम यात्रा पर निकल पड़े जिसे महाप्रस्थान कहते हैं।
महाप्रस्थान यात्रा और गिरने का असली कारण
⇒ फिर सभी पांडव उत्तर दिशा की ओर हिमालय की तरफ चल पड़े। रास्ता बहुत कठिन था, ठंड , बर्फ और ऊँचे पहाड़ थे।
⇒ उनके साथ -साथ एक कुत्ता भी चल रहा था।
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⇒ अब चलते – चलते सबसे पहले द्रौपदी धरती पर गिर गई और उनका देहांत हो गया।
⇒ तब युधिष्ठिर ने चारों भाईयों को बताया कि द्रौपदी के मन में अर्जुन के लिए थोड़ा ज्यादा लगाव था।
⇒ यानी द्रोपदी सभी से बराबर भाव नही रख पाई, इसलिए उनका यह फल हुआ।
⇒ इसके बाद सहदेव गिर पड़े। फिर युधिष्ठिर ने सबको बताया कि सहदेव बहुत ज्ञानी थे ।
⇒ लेकिन उन्हे अपने ज्ञान और बुद्धि पर थोड़ा गर्व था कि वह सबसे ज्यादा समझदार और ज्ञानी हैं। इसी गर्व के कारण वे आगे नही जा सके।
⇒ फिर नकुल गिर पड़े। नकुल बहुत सुंदर थे, और उन्हे अपने रूप और सुंदरता पर बहुत गर्व था कि वे सबसे आकर्षक हैं। यही घमंड उनकी रुकावट बना।
⇒ और नकुल को भी वहीं अंत हो गया ।
⇒ फिर अर्जुन गिर पड़े। तभी युधिष्ठिर नें भीम को बताया कि अर्जुन महान धनुर्धर थे, लेकिन उन्हे अपनी वीरता पर बहुत ज्यादा घमंड था ।
⇒ वे सोचते थे कि उनका जैसा कोई नहीं । यही अहंकार उनका पतन का कारण बना ।
⇒ अब अंत में भीम भी गिर पड़े। अब युधिष्ठिर से वहीं पड़े भीम ने पूछा कि भईया मैं क्यों नही चल पाया आपके साथ ।
⇒ युधिष्ठिर ने कहा – भीम तुम बहुत ताकतवर थे , लेकिन उन्हे अपनी शक्ति और खाने की आदत पर गर्व था। वह खुद को सबसे बलवान मानते थे ।
⇒ यही उनका दोष बना। अब केवल युधिष्ठिर और कुत्ता बचे थे। युधिष्ठिर बिना रुके आगे बढ़ते रहे।

युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा और स्वर्ग का सत्य
⇒ अब अंत में देवताओ के राजा इन्द्र रथ लेकर आए और युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने लगे, लेकिन युधिष्ठर ने कहा कि वे अपने साथ आए कुत्ते को नही छोड सकते ।
⇒ तभी इन्द्र ने युधिष्ठिर से कहा कुत्ता स्वर्ग नही जा सकता , लेकिन युधिष्ठिर अपने निर्णय पर अटल रहे ।
⇒ तभी वह कुत्ता अचानक गायब हो गया। और वह धर्म देव निकले । वह युधिष्ठिर की परीक्षा ले रहे थे।
⇒ इसके बाद युधिष्ठिर स्वर्ग मे पहुंचे और उन्होंने देखा वह पहले से ही दुर्योधन मौजूद थे। लेकिन उनके भाई और द्रौपदी वहाँ नही थे।
⇒ उन्हे एक अंधेरी जगह दिखाई गई जहाँ दर्द और कराहने की आवाज आ रही थी। युधिष्ठिर को बताया गया कि उनके भाई वहीं हैं।
⇒ यह सुनकर युधिष्ठिर बहुत दुखी हुए।
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⇒ उन्होंने कहा कि अगर मेरे भाई यहाँ हैं तो मैं भी यही रहूँगा। मुझे ऐसा स्वर्ग नही चाहिए जहाँ मेरा परीवर ही ना हो। यह उनकी सबसे बड़ीी परीक्षा थी।
⇒ तभी सब कुछ बदल गया अँधेरा केवल परीक्षा थी। असली नरक नही था।
⇒ फिर युधिष्ठिर को असली स्वर्ग दिखाया गया, जहाँ उनके भाई , द्रौपदी और सभी महान योद्धा मौजूद थे। सब दुख और दर्द खत्म हो चुका था।
निष्कर्ष Mahabharata
⇒ दोस्तों सच्चा धर्म , दिया हुआ दान , सच्चाई और बिना घमंड का जीवन ही सबसे बड़ा है। घमंड और गुरूर ही इंसान को बहुत नीचे गिराता है ।
⇒ और दान व धर्म उसे सबसे ऊपर ले जाता है।
⇒ अब अंत में सभी पांडवों को स्वर्ग और मोक्ष मिला। Mahabharata Seccret Story In Hindi
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