छठ पूजा बिहार और पूर्वांचल की सबसे श्रद्धापूर्ण धार्मिक परंपराओं में से एक है। सूर्य देव की उपासना और छठी मैया की आराधना से जुड़ा यह पर्व संतान के सुख, परिवार की खुशहाली और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती कठोर नियमों का पालन करते हैं और अस्त होते तथा उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठी मैया कौन हैं और उनकी पूजा की परंपरा से जुड़ी प्राचीन कथा क्या है? इसके पीछे राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की ऐसी कथा है, जिसमें एक मृत बालक को देवी की कृपा से जीवन मिलने का वर्णन मिलता है।
कहा जाता है कि देवी षष्ठी बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं और उनकी कृपा से संतान, दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य तथा परिवार के मंगल का आशीर्वाद मिलता है।
छठी मैया कौन हैं और क्यों होती है उनकी पूजा। Story Of chhathi Maiya
हिंदू धार्मिक परंपरा में छठी मैया को देवी षष्ठी के रूप में पूजा जाता है। उन्हें विशेष रूप से बच्चों की रक्षा करने वाली और संतान का आशीर्वाद देने वाली देवी माना जाता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के कई अन्य हिस्सों में लोग उन्हें श्रद्धा से छठी मैया कहकर पुकारते हैं।
पुराणों में देवी षष्ठी का संबंध देवसेना से बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वे प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई थीं, इसलिए उनका नाम षष्ठी पड़ा। उन्हें संतान की प्राप्ति, बच्चों की रक्षा और उनके अच्छे स्वास्थ्य से जुड़ी देवी के रूप में पूजा जाता है।
इसी धार्मिक मान्यता के कारण छठ पर्व में सूर्य देव की उपासना के साथ छठी मैया की भी आराधना की जाती है। माता-पिता अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-शांति के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं।
छठी मैया की महिमा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध प्राचीन कथाओं में राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की कथा भी सुनाई जाती है। इस कथा में संतान के लिए तरसते एक राजा के जीवन में ऐसा चमत्कार हुआ, जिसने देवी षष्ठी की महिमा को अमर कर दिया।
राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की संतान की इच्छा
बहुत प्राचीन समय की बात है। राजा प्रियव्रत का विवाह रानी मालिनी से हुआ था। राजा के पास धन, वैभव, राज्य और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ा दुख था। उनके कोई संतान नहीं थी।
राजा और रानी संतान प्राप्ति की इच्छा में दिन-रात दुखी रहते थे। महल में हर तरह की खुशियाँ थीं, लेकिन संतान के बिना उन्हें अपना जीवन अधूरा लगता था। दोनों ने अनेक उपाय किए, फिर भी उनकी मनोकामना पूरी नहीं हुई।
आखिरकार, राजा प्रियव्रत ने ऋषि कश्यप की शरण लेने का निर्णय किया। वे अपनी पत्नी मालिनी के साथ ऋषि कश्यप के आश्रम पहुँचे और उनके सामने अपने मन की पीड़ा रख दी।
राजा ने ऋषि कश्यप से कहा कि उनके पास राज्य और वैभव सब कुछ है, लेकिन संतान के बिना उनके जीवन की सारी खुशियाँ अधूरी लगती हैं।
राजा की बात सुनकर ऋषि कश्यप ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी। राजा ने ऋषि की आज्ञा स्वीकार की और यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी।
विधि-विधान के साथ यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ के बाद ऋषि कश्यप ने रानी मालिनी को प्रसाद स्वरूप खीर दी और उसे ग्रहण करने के लिए कहा। राजा और रानी के मन में एक बार फिर संतान प्राप्ति की आशा जाग उठी।
रानी मालिनी को मिला पुत्र, लेकिन खुशी मातम में बदल गई
ऋषि कश्यप के आशीर्वाद और यज्ञ के प्रभाव से रानी मालिनी गर्भवती हो गईं। यह समाचार सुनकर राजा प्रियव्रत की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वर्षों से जिस संतान की प्रतीक्षा थी, अब उसके आने की उम्मीद दिखाई दे रही थी।
समय बीतता गया और आखिर वह दिन भी आ गया, जब रानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया। महल में खुशियों की तैयारी थी, लेकिन जन्म के बाद जो हुआ, उसने राजा और रानी की सारी खुशियाँ पलभर में छीन लीं।
जन्म लेने वाला बालक जीवित नहीं था। जिस पुत्र को पाने के लिए राजा और रानी ने वर्षों तक प्रार्थना की थी, उसे मृत देखकर दोनों का हृदय टूट गया। रानी मालिनी अपने पुत्र को देखकर फूट-फूटकर रोने लगीं। राजा प्रियव्रत भी अपने दुख को संभाल नहीं सके।
राजा ने अपने मृत पुत्र को गोद में उठा लिया। उनके सामने अंधेरा छा गया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि जिस संतान के आने की खुशी में उन्होंने इतने सपने देखे थे, वह जन्म लेते ही उन्हें छोड़कर कैसे चली गई।
राजा का दुख इतना बढ़ गया कि उनके मन में जीवन समाप्त करने तक का विचार आने लगा। वे अपने मृत पुत्र को लेकर अंतिम संस्कार के लिए निकल पड़े।
जिस महल में पुत्र के जन्म की खुशी मनाई जानी थी, वहीं कुछ ही समय बाद एक मृत शिशु के कारण राजा और रानी के विलाप की आवाज गूँज रही थी।
राजा प्रियव्रत के सामने प्रकट हुईं देवी देवसेना
राजा प्रियव्रत अपने मृत पुत्र को लेकर आगे बढ़ रहे थे। उनका मन पूरी तरह टूट चुका था। उन्हें लग रहा था कि अब उनके जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा है। तभी अचानक उनके सामने एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया।
उस प्रकाश के बीच एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं। उनका रूप अत्यंत सुंदर और अलौकिक था। उनके तेज से पूरा वातावरण प्रकाश से भर गया। राजा ने देवी को देखा, तो तुरंत उनके सामने सिर झुका दिया।
राजा ने हाथ जोड़कर पूछा कि वे कौन हैं और उनके सामने क्यों प्रकट हुई हैं। देवी ने बताया कि उनका नाम देवसेना है। धार्मिक परंपरा में उनका संबंध षष्ठी देवी से बताया जाता है।
देवी ने राजा को बताया कि प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण उनका एक नाम षष्ठी है। वे संतान की इच्छा रखने वाले लोगों और बच्चों के कल्याण से विशेष रूप से जुड़ी देवी मानी जाती हैं।
राजा प्रियव्रत ने देवी के सामने अपनी पूरी पीड़ा रख दी। उन्होंने बताया कि संतान के लिए उन्होंने वर्षों तक प्रतीक्षा की और जब उन्हें पुत्र मिला, तो वह जन्म लेते ही उनसे दूर हो गया।
देवी ने राजा को धैर्य रखने का आश्वासन दिया और कहा कि उनकी भक्ति तथा श्रद्धा व्यर्थ नहीं जाएगी, क्योंकि देवी की कृपा से उनका दुख दूर हो सकता है।
छठी मैया ने मृत पुत्र को दिया जीवन
राजा प्रियव्रत ने देवी के सामने सिर झुका दिया और अपने पुत्र के लिए उनसे प्रार्थना करने लगे। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने देवी से कहा कि उनके जीवन में अब यही पुत्र उनकी आखिरी आशा था।
राजा की भक्ति और पीड़ा देखकर देवी देवसेना प्रसन्न हुईं। पुराणों में वर्णित इस कथा के अनुसार, देवी ने राजा के मृत पुत्र को अपने हाथों में लिया और उसे जीवन प्रदान कर दिया।
कुछ ही क्षणों में वह बालक जीवित हो उठा। राजा प्रियव्रत को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जिस पुत्र को वे मृत समझकर अंतिम संस्कार के लिए लेकर आए थे, वही पुत्र अब उनके सामने जीवित था।
राजा ने अपने पुत्र को फिर से गोद में उठा लिया। उनके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसी खुशी आई, जिसे शब्दों में बयान करना कठिन था। उनकी आँखों से अब दुख के नहीं, बल्कि खुशी के आँसू बह रहे थे।
राजा प्रियव्रत ने देवी के चरणों में सिर रख दिया और उनका धन्यवाद किया। उन्होंने देवी से पूछा कि वे उनकी इस कृपा का बदला कैसे चुका सकते हैं।
जिस बालक को राजा अपनी आँखों के सामने खो चुके थे, वही बालक देवी की कृपा से फिर उनकी गोद में जीवित लौट आया और महल की बुझी खुशियाँ दोबारा लौट आईं।
देवी षष्ठी ने राजा को पूजा का मार्ग बताया
देवी ने राजा प्रियव्रत को अपनी पूजा करने और उनकी महिमा को लोगों तक पहुँचाने का संदेश दिया। राजा ने देवी की आज्ञा स्वीकार की और पूरी श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करने का संकल्प लिया।
राजा प्रियव्रत ने देवी षष्ठी की पूजा की। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कथा के कारण देवी षष्ठी की पूजा संतान की प्राप्ति और बच्चों के कल्याण से जुड़ गई। समय के साथ लोग उन्हें प्रेम और श्रद्धा से छठी मैया कहकर पुकारने लगे।
देवी षष्ठी की पूजा विशेष रूप से उन परिवारों में महत्वपूर्ण मानी जाने लगी, जो संतान के सुख की कामना करते हैं या अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए प्रार्थना करते हैं।
राजा प्रियव्रत की कथा के बाद देवी षष्ठी की आराधना संतान की कामना, बच्चों की रक्षा और परिवार के मंगल से जुड़ी एक प्राचीन परंपरा के रूप में आगे बढ़ती गई।
छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की आराधना
आज छठ पूजा भारत के प्रमुख धार्मिक पर्वों में गिनी जाती है। बिहार में इस पर्व के प्रति विशेष आस्था देखने को मिलती है। इसके अलावा, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के कई अन्य हिस्सों में भी लोग पूरी श्रद्धा के साथ छठ पूजा करते हैं।
छठ पूजा मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। इसके अलावा, चैत्र मास में भी छठ पूजा की परंपरा कई स्थानों पर निभाई जाती है। यह पर्व चार दिनों तक चलने वाली कठिन साधना और नियम-संयम से जुड़ा हुआ है।
इस पर्व में व्रती शुद्धता और संयम के साथ पूजा करते हैं। छठ के दौरान अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा का समापन किया जाता है। छठी मैया से परिवार की सुख-शांति और संतान के मंगल की प्रार्थना की जाती है।
जब छठ घाट पर श्रद्धालु अस्त और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तब सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता के साथ छठी मैया से परिवार और संतान के मंगल की प्रार्थना करते हैं।
छठी मैया की कहानी से क्या सीख मिलती है
छठी मैया की यह कथा केवल संतान प्राप्ति से जुड़ी धार्मिक कहानी नहीं है। इसमें एक ऐसे राजा की पीड़ा दिखाई देती है, जिसने अपनी सबसे बड़ी इच्छा पूरी होने के बाद भी अपने पुत्र को खो दिया और निराशा की गहराई में चला गया।
कथा के अनुसार, देवी षष्ठी की कृपा से राजा प्रियव्रत का मृत पुत्र फिर जीवित हुआ। इसी कारण देवी षष्ठी को बच्चों की रक्षा करने वाली और संतान के कल्याण से जुड़ी देवी माना जाने लगा।
आज भी लाखों श्रद्धालु छठी मैया की पूजा पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं। माता-पिता अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं। छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना और छठी मैया की भक्ति का सुंदर संगम दिखाई देता है।
छठी मैया की यह प्राचीन कथा आज भी श्रद्धालुओं के मन में विश्वास जगाती है और परिवार, संतान तथा सुख-समृद्धि के लिए भक्ति की प्रेरणा देती है।
तो यह थी छठी मैया की प्राचीन कथा, जिसमें राजा प्रियव्रत, रानी मालिनी और देवी षष्ठी की महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता के अनुसार, देवी की कृपा से राजा को अपना मृत पुत्र वापस मिला और इसी कथा के कारण छठी मैया की पूजा संतान तथा बच्चों के कल्याण से विशेष रूप से जुड़ी मानी जाती है।





