राजा और भिखारी का सत्य – Mahatma Buddha Story In Hindi
⇒ मगध राज्य की राजधानी राजग्रह अपने वैभव , ऊँचे महलों और समृद्धि के लिए दूर – दूर तक प्रसिद्ध थी । सड़कों पर बहुत से बुद्धिमन , विद्वान चलते दिखाई थे, बाजारों में रत्नों की चमक आखों को चकाचौंध कर देती और महल के द्वारों पर सजे सैनिक राजा की शक्ति का बखान करते थे।
⇒ उस राज्य के राजा अपनी अपार दौलत और सामर्थ्य पर बहुत गर्व करता था। उसे लगता था कि संसार में उससे अधिक सुखी कोई नही है। उसके पास सोने – चांदी के खजाने ,अनगिनत सेवक , सुंदर उद्यान , और हर प्रकार की भोग – विलास की वस्तुएं थी, फिर भी उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सी बेचैनी रहती थी, जिसे वह समझ नही पाता था।
⇒ उसी राज्य के बाहर नगर की सीमा के पास एक पुराना वृक्ष था, जिसके नीचे एक भिखारी हर रोज बैठा करता था। उसके पास ना धन था, ना सुंदर वस्त्र , ना भोजन ना कोई निश्चित साधन । उसके शरीर पर पुराने फटे हुए कपड़े थे और हाथ में एक कटोरा था।
⇒ लेकिन उसके चेहरे पर अलग सी एक शांति थी , जैसे संसार की कोई भी दुविधा उसे छु नही सकती थी, लोग उसे देखते और आगे बढ़ जाते , पर जो भी लोग उसके पास थोड़ी देर के लिए रुकता , उसे उसके चेहरे पर एक अलग सि मुस्कान दिखाई देता।
⇒ एक दिन राजा अपने रथ में बैठकर नगर के भ्रमण के लिए निकले, उसके साथ मंत्री , सैनिक और सेवक भी थे। अचानक उसकी दृष्टि उस भिखारी पर पड़ी , राजा ने देखा जहाँ वह अनेक सुखों के बाद भी चिंतित रहता है , वही ये एक साधारण सा भिखारी कितना खुश नजर आ रहा हा।
⇒ यह दृश्य राजा के मन में एक प्रश्न बनकर रह गया। उसने अपने रथ को रुकवाया और भिखारी के पास जा खड़ा हुआ।
⇒ राजा ने उससे पुछा – तुम्हारे पास ना धन है, ना भोजन का ठिकाना और ना ह कोई अपना , फिर भी तुम्हारे चेहरे पर इतनी शक्ति क्यू हैं ? भिखर ने धीरे से सिर उठाया और शांति पूर्वक उसने उत्तर दिया , महाराज जिसके पास इच्छाएं कम होती हैं। वही सबसे अधिक सुखी होता है।
⇒ यह उत्तर सुनकर महाराज चकित रह गए क्योंकि उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसा विचार सुना था।
⇒ राजा ने हँसते हुए कहा – क्या तुम जानते हो मैं कौन हूँ ? मै इस राज्य का राजा हूँ । मेरे पास सब कुछ हैं , जो एक मनुष्य को चाहीये । भिखारी मुस्कुराया और कहा महाराज आपके पास सब कुछ है, लेकिन क्या आपके मन में शांति है ?
⇒ यह सुन कर राजा कुछ क्षण के लिए शांत हो गया। उसे ऐसा लगा जैसे किस ने उसके मन में छिपे प्रश्न को उसके सामने रख दिया।
⇒ उस रात राजा अपने महल में सो नही सका। उसने सोचा की जिस भिखारी के पास कुछ नही है, वह इतना शांत कैसे है ? और मेरे पास सब कुछ होने के बावजूद इतनी बेचैनी कैसे है ? यह प्रश्न उसे बार – बार परेशान कर रहा था ।
⇒ अंततः उसने यह निश्चित किया कि वह महात्मा बुद्ध के पास जाएगा। जो उस समय राज ग्रह के पास विहार कर रहे थे।
⇒ अगले दिन राजा साधारण वेश में बुद्ध के पास पहुँचा। वहाँ उसने देखा है कि अनेक भिक्षु शांत भाव से बैठे हैं और बुद्ध उन्हे उपदेश दे रहे हैं। उनके चेहरे पर एक दिव्य तेज था तथा उनकी वाणी में ऐसी करुणा थी कि राजा का मन स्वयं शांत था।
⇒ राजा उनके चरणों में बैठ गया , और बोला भगवान मन संसार का सबसे धनी राजा हूँ , फिर भी मेरे मन में शांति नही हैं । और एक भिखारी है, जिसके पास कुछ बह नही , फिर भी वह सुखी है। सका क्या कर्ण है ?
⇒ बुद्ध ने शांत स्वर में कहा – राजन ,, धन से सुख नह मिलता , बल्कि इच्छाओ के समाप्त होने से सुख मिलता , जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि वह संसार नश्वर है ,,, उस दिन उसके दुख समाप्त होने लगते हैं। राजा ध्यान से उनकी बात सुनता रहा …।
⇒ बुद्ध ने आगे कहा – राजन तुम अपने धन के स्वामी नही हो बल्कि तुम्हारा धन तुम्हारा स्वामी बन गया है। तुम उसके खो जाने के भय से दुखी रहते हो । और वह भिखारी किसी भी वस्तु से बंधा नही है इसलिए वह आजाद है।
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⇒ यह सुनकर राजा की आँखों में आँसू आ गए। उसे पहली बार अपने जीवन का सत्य समझ आया , उसने अनुभव किया कि वह बाहरी वैभव में इतना खो गया था कि अपने भीतर के सुख को भूल गया था।
⇒ उसी समय वह भिखारी भी वहाँ पहुँचा । उसने बुद्ध को प्रणाम किया और राजा कि ओर देखा । बुद्ध मुस्कुराये और बोले – राजन यही वह व्यक्ति है , जिससे तुमने प्रश्न किया था यह तुम्हें वह सीखने आया है जो तुम्हारे खजाने नही सिखा सके।
⇒ राजा ने भिखारी के चरणों में सिर झुका दिया उन्होंने कहा सच्चा सुख धन में नही, बल्कि शांति में है संतोष में । भिखारी ने उठाया उसे और बोला महाराज ,,,,, जब मन शांत हो जाता है तब मनुष्य राजा हो या भिखारी दोनों समान होते हैं ।
⇒ उस दिन के बाद राजा का जवन पूरी तरह बदल गया , उसने अपने धन का उपयोग प्रजा के भलाई के लिए करना शुरू कर दिया, उसके मन में अब गरीबों के लिए बहुत प्रेम था और अपने महल के द्वार उन लोगों के लिए खोल दिया।
⇒ राजा जब भी उस वृक्ष के पास से गुजरता , तब भिखारी को प्रणाम करता । अब उसके चेहरे पर भी वही शांति दिखाई देने लगी , जो पहले केवल भिखारी के चेहरे पर थी।
⇒ महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा जिसने संतोष को पा लिया , उसने संसार को पा लिया है। वह वचन वहाँ बैठे हर व्यक्ति के ह्रदय में बैठ गया।
⇒ यह कथा हमे सिखाती हैं कि, सच्चा सुख बाहरी वस्तु में नही बल्कि हमारे मन की स्थिति में होता है। धन , वैभव और शक्ति क्षणिक हैं, लेकिन संतोष और शांति ही जीवन का सबसे बड़ा खजाना हैं।
सीख : संतोष ही सबसे बड़ा धन होता है, इच्छाओ का अंत ही सच्चा सुख है ।