तेनाली रामा की पहली परीक्षा उस समय हुई, जब राजा कृष्णदेव राय ने अपने दरबारियों को एक अनोखा काम दिया। उन्हें दो हाथ धुआँ लाकर देना था। सभी दरबारी परेशान हो गए, लेकिन तेनाली रामा ने अपनी समझदारी से इस मुश्किल काम का हल निकाल लिया।
तेनाली रामा की पहली परीक्षा कैसे शुरू हुई?
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय का दरबार बहुत प्रसिद्ध था। उनके दरबार में कई मंत्री, विद्वान और समझदार लोग थे। राजा सभी की बातें ध्यान से सुनते थे और राज्य के जरूरी फैसले सोच-समझकर लेते थे।
उसी दरबार में तेनाली रामा भी थे। वह अपनी तेज बुद्धि, मजेदार बातों और सही समय पर जवाब देने के लिए जाने जाते थे। राजा कृष्णदेव राय उनकी समझदारी से बहुत खुश रहते थे। जब भी दरबार में कोई ऐसी परेशानी आती, जिसका हल आसानी से नहीं मिलता, तब राजा तेनाली रामा की राय जरूर लेते थे।
लेकिन दरबार के कुछ मंत्री इस बात से खुश नहीं थे। उन्हें लगता था कि राजा हर बार तेनाली रामा को ही सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। वे भी चाहते थे कि राजा उनकी बुद्धि की तारीफ करें और उन्हें भी खास सम्मान मिले। इसी कारण उनके मन में तेनाली रामा के लिए जलन बढ़ती जा रही थी।
दरबारियों ने राजा के सामने रखी अपनी बात
एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे थे। सभी मंत्री और दरबारी अपने-अपने काम की बातें कर रहे थे। तभी एक मंत्री अपनी जगह से उठा और राजा से बोला, “महाराज, हम आपसे एक बात कहना चाहते हैं।”
राजा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “हाँ मंत्री जी, बताइए। क्या बात है?”
मंत्री ने कहा, “महाराज, आपके दरबार में बहुत से समझदार लोग हैं, लेकिन जब भी किसी की बुद्धि की बात होती है, तो केवल तेनाली रामा का नाम लिया जाता है। हम भी अपनी योग्यता दिखाना चाहते हैं। हमें भी कोई ऐसा काम दीजिए, जिससे हम अपनी बुद्धि साबित कर सकें।”
उसकी बात सुनकर दूसरे दरबारी भी बोलने लगे। सभी ने राजा से कहा कि उन्हें भी अपनी समझदारी दिखाने का मौका मिलना चाहिए।
राजा उनकी बात सुनकर मुस्कुराए। वह समझ गए थे कि कुछ दरबारी तेनाली रामा से जलते हैं। फिर भी उन्होंने उनकी इच्छा पूरी करने का फैसला किया।
राजा ने दरबारियों को दी दो हाथ धुआँ लाने की चुनौती
राजा ने कुछ देर सोचा। तभी उनकी नजर पास में जल रही एक धूपबत्ती पर पड़ी। उससे हल्का-हल्का धुआँ निकल रहा था। उसे देखकर राजा के मन में एक अनोखा विचार आया।
उन्होंने सभी दरबारियों को अपने पास बुलाया और कहा, “आप सभी अपनी बुद्धि दिखाना चाहते हैं, तो मैं आपको एक काम देता हूँ। इस धूपबत्ती से निकलने वाला दो हाथ धुआँ मुझे लाकर दीजिए। जो भी यह काम पूरा करेगा, मैं उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा करूँगा।”
राजा की बात सुनते ही सभी दरबारी हैरान रह गए। वे सोचने लगे कि धुआँ तो हवा में फैल जाता है। उसे हाथों से पकड़ा भी नहीं जा सकता। फिर उसे दो हाथ नापकर राजा के सामने कैसे लाया जाए?
लेकिन राजा का आदेश था, इसलिए सभी दरबारियों ने इस काम को पूरा करने के लिए अपने-अपने तरीके सोचने शुरू कर दिए।
धुएँ को पकड़ने में असफल हुए सभी दरबारी
सबसे पहले एक मंत्री आगे आया। उसने धुएँ को दोनों हाथों से पकड़ने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उसने हाथ बढ़ाए, धुआँ उसकी उँगलियों के बीच से निकलकर हवा में फैल गया। उसने कई बार कोशिश की, मगर हर बार खाली हाथ ही रह गया।
इसके बाद दूसरा दरबारी एक छोटा बर्तन लेकर आया। उसने सोचा कि अगर धुएँ को बर्तन में भर लिया जाए, तो उसे आसानी से राजा के पास ले जाया जा सकता है। उसने बर्तन को धूपबत्ती के ऊपर रखा, लेकिन धुआँ बर्तन में रुकने के बजाय उसके किनारों से बाहर निकल गया।
एक अन्य मंत्री ने कपड़े की मदद से धुएँ को रोकने की कोशिश की। उसने कपड़े को धुएँ के ऊपर रखा, लेकिन कुछ ही पल में धुआँ चारों तरफ फैल गया। उसका तरीका भी काम नहीं आया।
इस तरह एक-एक करके सभी दरबारियों ने कोशिश की, लेकिन कोई भी धुएँ को पकड़कर नहीं ला पाया। कुछ देर बाद सभी अपनी जगह लौट आए। उनके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वे इस काम को पूरा नहीं कर पाए हैं।
राजा ने तेनाली रामा को भी दिया मौका
सभी दरबारियों को असफल देखकर राजा कृष्णदेव राय ने पूछा, “क्या आप लोगों में से कोई भी इस छोटे से काम को पूरा नहीं कर पाया?”
एक मंत्री ने सिर झुकाकर जवाब दिया, “महाराज, हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन धुएँ को पकड़ना बहुत मुश्किल है। हम इसे आपके सामने नहीं ला सके।”
फिर मंत्री ने तेनाली रामा की ओर देखते हुए कहा, “महाराज, अब तेनाली रामा को भी यह काम करने का मौका दीजिए। हम देखना चाहते हैं कि वह इस चुनौती को कैसे पूरा करते हैं।”
राजा ने तेनाली रामा की ओर देखा और पूछा, “तेनाली, तुमने सबकी कोशिश देख ली। अब बताओ, क्या तुम मुझे दो हाथ धुआँ लाकर दे सकते हो?”
तेनाली रामा ने मुस्कुराते हुए कहा, “महाराज, कोशिश करने में क्या परेशानी है? आप मुझे थोड़ा समय दीजिए। मैं कोई रास्ता जरूर निकालूँगा।”
तेनाली रामा ने खोजा धुआँ पकड़ने का अनोखा तरीका
तेनाली रामा धूपबत्ती के पास गए और कुछ देर तक ध्यान से धुआँ देखते रहे। वह समझ गए कि धुएँ को हाथों से पकड़ना संभव नहीं है। इसलिए उसे किसी ऐसी चीज में भरना होगा, जिसमें वह बाहर न निकल सके।
कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने पास खड़े एक सेवक को बुलाया और उसके कान में धीरे से कुछ कहा। सेवक उनकी बात सुनकर तुरंत वहाँ से चला गया।
दरबार में बैठे सभी लोग यह जानने के लिए उत्सुक थे कि तेनाली रामा ने सेवक से क्या मँगवाया है। थोड़ी देर बाद सेवक वापस आया। उसके हाथ में एक लंबी काँच की नली थी।
तेनाली रामा ने नली को देखा और फिर धूपबत्ती से निकलते धुएँ के पास ले गए। उन्होंने नली का एक सिरा धुएँ के रास्ते में रखा। धीरे-धीरे धुआँ नली के अंदर भरने लगा।
जब नली के अंदर काफी धुआँ भर गया, तो तेनाली रामा ने उसके दोनों सिरों को बंद कर दिया। अब धुआँ उस नली के अंदर बंद था और आसानी से बाहर नहीं निकल सकता था।
तेनाली रामा ने नली को उठाया और राजा कृष्णदेव राय के सामने पहुँच गए। उन्होंने आदर से कहा, “महाराज, आपने मुझसे दो हाथ धुआँ माँगा था। यह लीजिए, आपके लिए दो हाथ धुआँ।”
तेनाली रामा की बुद्धि देखकर राजा हुए खुश
राजा कृष्णदेव राय ने नली को अपने हाथ में लिया और ध्यान से देखा। उसके अंदर धुआँ भरा हुआ था। यह देखकर राजा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें तेनाली रामा का तरीका बहुत पसंद आया।
राजा ने दरबारियों से कहा, “आप सभी ने धुएँ को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि उसे किसी चीज के अंदर भी रखा जा सकता है। तेनाली रामा ने अपनी समझदारी से इस काम को आसान बना दिया।”
राजा की बात सुनकर सभी दरबारी चुप हो गए। उन्हें समझ आ गया कि तेनाली रामा हर समस्या को अलग नजर से देखते हैं। केवल ज्ञान होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका सही समय पर उपयोग करना भी जरूरी है।
तेनाली रामा ने राजा को प्रणाम किया और अपनी जगह पर जाकर बैठ गए। राजा उनकी बुद्धिमानी से बहुत खुश थे। वहीं दरबारियों को भी अपनी गलती का एहसास हो गया था। उस दिन के बाद उन्होंने तेनाली रामा की बुद्धि का सम्मान करना शुरू कर दिया।
तेनाली रामा की कहानी से सीख
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि किसी भी मुश्किल काम को देखकर घबराना नहीं चाहिए। शांत मन से सोचने पर उसका हल मिल सकता है। हमें अपनी बुद्धि का सही उपयोग करना चाहिए और दूसरों से जलने के बजाय उनसे अच्छी बातें सीखनी चाहिए।



