सनकी राजा , मजबूर रानी और चार वीर योद्धा – Story Of brave Warrior In Hindi ।

सनकी राजा , मजबूर रानी और चार वीर योद्धा - Story Of brave Warrior In Hindi । Hindi Story । By Hindi Rama

सनकी राजा , मजबूर रानी और चार वीर योद्धा – Story Of brave Warrior In Hindi

एक सनकी राजा हर रोज सुबह अपनी रानी को खड़ी कर उसकी नथ मे से 100 तीर निकालता और पूछता है, क्या है कोई इस धरती पर मेरा जैसा और कोई भी वीर मर्द रानी बेचारी कहती कि नही महाराज आप जैसा वीर पुरुष और कोई नही इस धरती पर ।

  समय बीतता गया और एक बार रानी की माँ रानी से मिलने आई , माँ ने जब रानी की हालत देखि तो उसकी आँखों मे आशु भर  आए और बोली , बेटी यह तूने कैसी हालत बना रखी है , बिल्कुल सुखी लकड़ी के जैसे हो गई हो तुम्हें कोईं बीमारी है या कोई दुख दे रहा है, या फिर तुम्हें समय से रोटी नही मिल रही है।

आखिर ऐसी कौन सी  बात है, जो अपने  मन मे दबा के बैठी है। अब रानी भी कैसे अपना दुख अपनी माँ को बताती , कि राजा हर रोज सुबह उसे खड़ी करके उसकी नाथ मे से 100 बार तीर निकालते हैं, और हर तीर मे मानो उसका कलेजा  बाहर आने को होता है ।

  अगर वह जरा सि भी हिली तो या राजा का थोड़ा सा निशाना चुका तो बात जान पर आ जाएगी । जब माँ ने बार बार दबाव देकर रण से पूछा तो क्या बताऊ माँ किसी चीज की कोई कमी नही अन्न का भंडार भरा हुआ है पीने का अच्छा पानी  है । तो फिर और क्या बात है बेटी , ।

  जब रानी का हाथ पकड़ और अत्यंत रुदन स्वर मे पुछा तो रानी टूट गई और अपनी वेदना प्रकट करते हुए कहा माँ तुम्हारे जमाई राज मेरी नाक की नाथ पर हर रोज सुबह 100 बार तीर निकालते  है, जिससे मेरा हृदय  थर-थर काँपता है मेरी तरफ आता हर तीर मेरी जिंदगी का अखिरी तीर प्रतीत होता है।

यही बात मुझे  हर समय अंदर ही अंदर खाए जाते हैं कि आज तेरा आखिरी दिन है , बस माँ इसी चिंता के कारण कुछ भी खाना पीना मेरे हलक से नीचे नही उतरता, रानी की माने हैरान होते हुए कहा , यह तुम क्या कह रही हो बेटी यह कब हुआ  रानी बोली माँ ,,, यह मत पूछो कब हुआ बल्कि यह पूछो कि कब  नही हुआ ।

राजा हर रोज सुबह सबसे पहले मुझे खड़ी करके मेरी नाक की  नथ पर 100 तीर का निशाना लगते है। उसके बाद ही अपना दिन शुरू करते है। उसकी माँ ने क्या राजा कुछ बोलते भी हैं, तो रानी बोली हा माँ वो कहते हैं कि इस धरती पर कोई होगा मेरे जैसा वीर पुरुष ।

रानी की माँ कुछ सोचते हुए बोली , बेटी चिंता मत कर कल जब राजा तुझसे ऐसा पूछे , तो कहना दुनिया मे मर्द बहुत है घर मे नही तो बाहर है, और  बाहर  निकलो शेर को शवा शेर बहुत ।

बस इतना कुछ कहकर रानी कि माँ रानी से विदाई ले के चली जाति है अपने घर । अब  रानी को इंतजार था तो बस अगली सुबह का राजा ने सोती हुई  रानी का हाथ पकड़ कर उठाया और कहा रानी अब उठ जाओ समय हो गया है।

रानी ने सोचा हे भगवान बस आज – आज और बच जाऊ , उसके बाद तो जो माँ कह कर गईं थी वही बोल दूँगी । रानी उठकर बाग मे जाकर आँख बंद करके अपनी  नथ पकड़ कर खड़ी हो गई । राजअ ने रोज कि तरह आज भी एक के बाद एक तीर कुल 100 तीर रानी के नथ से होते हुए निकाली ।

राजा ने फिर से वही दोहराया कि बोल रानी क्या है कोई मेरे जैसा इस दुनिया मे कोई शूर वीर मदर रानी ने हिम्मत  जुटा कर बोला , महाराज दुनिया ने शूरवीर मर्द बहुत हैं, घर नही तो बाहर ,,,, बाहर निकल के देखो शेर को शवा शेर बहुत ,,,,राजा होते हुए बोला ठीक है , रानी अगर यही बात है तो, कुछ खाने का समान दो  मै जा रहा हूँ बाहर ।

 बाहर शूर  वीर मर्द बहुत है मई भी तो देखू है कोई मेरे जैसा  या मुझसे ज्यादा शूर वीर मर्द  इस दुनिया मे । और फिर थोड़ा बहुत खाने पीने का समान लेके राजा निकल पड़ा चलते चलते एक कच्चे रास्ते पर हो लिया । थोड़ी दूर चला तो देखा एक आदमी रास्ते के किनारे पर लेटा ऊपर की तरफ एक टक देख रहा है,।

राजा को बहुत ही आश्चर्य हुआ , ऊपर की तरफ देखा तो, उसे शिवाय सूर्य की तेज किरणो के कुछ दिखाई नही दिया । जिज्ञासा बस राजा उसके पास गया और पूछा और भाई ऐसा क्या देख रहे हो?

काणा आदमी ने कहा इन्द्र के अखाड़े मे पारियों का नाच हो रहा है । वही देख रहा हूँ। राजा ने एक बार फिर से ऊपर देखा , पर उसे कुछ दिखाई ना दिया । तो उसका आश्चर्य और ज्यादा बढ़ गया । काणे आदमी ने ऊपर की ओर ध्यान लगाए राजा से पुछा तुम कौन हो भाई और कहाँ जा रहे हो ?

राजा बोला.. मै ,,, मैं मालवा का राजा उत्पल राज हूँ। मैं दुनिया मे शूरवीर मर्द देखने जा रहा हूँ। काने को बड़ा ही कौतुक हुआ , तो थोड़ी देर बाद सोच कर बोला , तो थोड़ी देर मेरी प्रतीक्षा करो भाई । नाचते – नाचते एक परी की पाजेब टूट गई है वो नीचे गिरने वाली है बस उसको लेकर मैं भी तुम्हारे साथ शूरवीर मर्द देखने चलूँगा ।

कुछ ही देर मे आकाश से छम की आवाज से उसे उठाया और जेब मे रख दिया और बोला अब चलो भाई मर्द देखने , मर्द आखिर होते कैसे हैं। मै भी तो देखू राजा के आश्चर्य की कोई सीमा नही थी, उसका अहंकार तो यहीं नष्ट हो चुका था उसकी हवाईयां उड़ चुकी थी।

सोचा की तू तो अपनी रानी की नथ से तीर निकाल कर खुद को बहुत बड़ा शूर वीर समझता था । तुझसे ज्यादा तो यह काना है । एक आँख से अंधा होते हुए भी इन्द्र के अखाड़े की पारियों का  नाच देख रहा है । अब राजा और काना आदमी दोनों एक साथ चल पड़े ।

राजा और काना आदमी अभी कुछ दूर ही चले थे कि, आगे एक नौजवान व्यक्ति धनुष बाण लिए किसी की प्रतीक्षा मे बैठा  था । राजा ने उससे भी पूछ लिया क्यों भाई  ऐसे क्यों  बैठे हो ? वो व्यक्ति बोला  अपने दोस्त  का इंतजार कर रहा हूँ ।

राजा ने बोला कहाँ है तुम्हारा दोस्त , वो व्यक्ति बोला  मैंने  100 कोस पर तीर मारा है उसे लेने के लिए गया है। इतना सुनते  ही राजा के पैरों से जमीन खिसक गई।

कहानी की जानकारी के लिए आपको बता दूँ कि पुराने समय मे दूरी को मापने के लिए किलोमीटर या मीटर  नही बल्कि, तब के लोग कोसों के द्वारा ही दूरी को मापते  थे । उस समय एक कोस का  मतलब आज का लगभग 3 किलोमीटर है । 

नौजवान व्यक्ति ने राजा और काने आदमी से पूछा की तुम दोनों लोग कहा जा रहे हो ? काने ने कहा मर्द देखने जा रहे है। उत्सुकता वश नौजवान ने कहा , तो भाई हम भी चलेंगे तुम्हारे साथ मर्द देखने बस थोड़ा इंतजार करो मेरा दोस्त आता ही होगा।

राजा बोला , 100 कोस से आज ही थोड़ी ना  आ  जाएगा उसेतो काय दिन लग जाएंगे, नौजवान ने मुसकुराते हुए कहा नही मानवर उसे 100 कोस से आने और जाने मे सिर्फ एक घंटा लगता है। थोड़ी ही देर मे एक लंगड़ा व्यक्ति नौवजवाँ व्यक्ति द्वारा छोड़े हुए तीर को लेकर  आ ही रहा था , ।


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अब राजा को काटो तो खून नही , हर दिन वह रानी की नथ से 100 तीर निकल जाने से खुद को शूर वीर कहता था । आज उससे बहुत से सुरमा टकरा रहे हैं। वो जिस बिल मे हाथ डाल रहा था वही से सांप फुफकार हुए निकल रहे थे ।

एक काना आदमी जो एक ही आँख से इन्द्र के अखाड़े की परियों का नाच देख रहा था , एक युवा पराक्रमी नौजवान 100 कोश तक तीर मार रहा है। एक अपाहिज लंगड़ा आदमी 100 कोस से सिर्फ 1 घंटे मे नाप देता है। बोझल कदमों से राजा अब उन तीनों लोगों के साथ आगे चल पड़े।

चलते चलते वे एक नगर मे पहुंचे जहाँ एक राजा की लड़की स्वयंबर रचा रही थी। स्वयंबर की शर्त थी जो व्यक्ति 50 कोस से हँसता पान सुपाड़ी ला देगा तो उसी के साथ रानी का विवाह कर दिया जाएगा । चारों मे से लंगड़ा ही एक काबिल था जो कोसों की दूरी मिनटों के हिसाब से तय कर सकता था।

अंततः चारों की सलाह पर लंगड़ा व्यक्ति स्वयंबर की शर्त पूरी करने के लिए तैयार हो गया और शर्त अनुसार हँसता पान बोल सुपारी लाने के लिए चल पड़ा रानी के स्वयंबर के शर्त के अनुसार लंगड़ा व्यक्ति तेजी के साथ उस दिशा मे बढ़ने लगा गति से थोड़े ही समय बाद वह उस पेड़ के पास जा पहुँचा  । उसने सुपारी तोड़ी  और जेब मे डाल ली। सोचा अभी तो बहुत समय है क्यों ना थोड़ी देर सुस्ता लिया जाएगा ।

यह सोच कर वह व्यक्ति पेड़ के नीचे थोड़ी देर सुस्ताने के लिए लेट गया । ठंडी हवा के झोंकों के कारण ही उसकी आँख जल्द ही लग गई, उधर तीनों की समय बीतने के साथ ही चिंता बढ़ रही थी। दो घंटे पूरे होने को आए थे । बस थोड़ा सा ही समय बचा था ।

नौजवान तीर अंदाज ने  कहा इतना समय तो उसे कभी नही लगता जरूर कुछ बात है काने आदमी ने कहा रुको मैं देखता  हूँ । जब काने आदमी ने देखा तो लंगड़ा आदमी सो रहा था पेड़ के नीचे। और पेड़ सएएक खूंखार जहरीला सांप उसे काटने के लिए उसकी तरफ बढ़ रहा था ।

जब यह बात उसने साथियों को बतायी कि वो तो सो रहा है। और एक जहरीला सांप उसकी तरफ उसको काटने के लिए बढ़ रहा रहा है ।  तब तीर अंदाज ने नौजवान ने काने से कहा तुम मेरे तीर का निशाना सांप के फन पर लगाओ काने ने कहा हाँ ये ठीक है।

निशाना लगाकर हुंकारा भरू तब तुम तीर छोड़ देना  । काने ने तीर को सांप के फन की दिशा मे लगाकर जैसे ही हूँ कहा तीरंदाज ने तीर छोड़ दिया तीर सीधा जाकर सांप के फन पर लगा , और धड़ा के आवाज के साथ सांप नीचे जाकर गिर गया । आवाज सुन  कर लँगड़ा आदमी उठ गया ।

फिर उसने जब देखा तो एक जहरीला सांप नीचे गिर हुआ पड़ा था , और उसके दोस्त का तीर सांप को लगा हुआ है सारा माजरा समझते हुए उसे फिर देर ना लगी वो दिव्य गति से नगर की ओर दौड़ा,,,,,  समय रहते ही वह हँसता पान बोल सुपारी लेकर राजमहल मे जा पहुँच गया ।

अब समस्या यह थी कि राजकुमारी पर असली हक किसका था । राजा अगर घर से बाहर मर्द देखने को ना जाता तो , यह सारा किस्सा ही नही शुरू होता काना अगर अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर व्यक्ति को सांप से नही बचाता तो, राजकुमारी के स्वयंबर की शर्त कैसे  पूरी होती ।

नौजवान तीरंदाज के पास 100 कोस से तीर चलाने की क्षमता ना होती तो भी उसके मित्र को सांप डस लेता और शर्त ना पूरी होती लंगड़े व्यक्ति के पास दिव्य गति ना होती तो राजकुमारी का पति कौन होता जब इसके ऊपर उनमे आपस मे सलाह मशवरा हुआ तो राजा को चुना गया क्योंकि यह सारी कहनी ही उससे शुरू हुई थी ।

राजा ने अपनी सारी बीती बात बता दी। कहा मै पहले से ही शादीशुदा हु और फिर से राजकुमारी से शादी करने का कोई सवाल ही नही उठता। मई तो तुम सबका शुक्र गुजार हूँ। मेरा खोखला वहम तोड़ने के लिए काने ने कहा  मैं तो इन्द्र के अखाड़े मे परियों का नाच देख कर ही खुदह हूँ ।

और वैसे भी मेरे लिए दिन अब उस ऊपर वाले को याद करने को हैं। बारी आयी युवा तीरंदाज की उसने अपने मित्र से कहा मित्र राजकुमारी का विवाह तुम्हारे साथ होना चाहिए । क्योंकि तुमने ही स्वयंबर की शर्त का सीधा पालन किया है।

और राजमहल मे हँसता पान बोल सुपारी  लेकर आए हो इसलिए शर्त की दृष्टि कोण से देखे तो राजकुमारी पर सिर्फ तुम्हारा  ही हक बनता है। तीरंदाज की बात सबको सही लगी और सबने संघर्ष सहमति जताई । और फिर लंगड़े  के साथ राजकुमारी का विवाह हो जाता है ।

सभी  बहुत खुश थे । राजा सभी को अपने राज्य मे आने का निमंत्रण देते हैं और खुशी – खुशी उनसे विदा लेटे हैं और अपने मन मे वह रानी के साथ दुरवयहार ना करने की शपथ लेते हैं।

जीवन मे कभी भी खुद की ताकत को अपनों के ऊपर आजमाने की कोशिश नही करनी चाहिए ।

Author: Hindi Rama

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