1948 का क्या था भयानक परछाई का रहस्य? परछाई का डर – भाग 2। Haunted Shadow Story In Hindi

1948 का क्या था भयानक परछाई का रहस्य? परछाई का डर - भाग 2। Haunted Shadow Story In Hindi। Hindirama.com

परछाई का डर भाग 2 कहानी में क्या, कबीर अपनी परछाई से आजाद हो पाएगा, या काला अँधेरा हमेशा के लिए उसका शरीर छिन लेगा?

इस भाग में एक खतरनाक श्रापित सुरंग,रहस्यमयी हवेली, 1948 का भयानक रहस्य और अनन्या क जिंदगी से जुड़ा ऐसा सच सामने आता हैं, जो हर पल डर बढ़ाता जाता हैं। 

रात 2:17 बजे हुआ यह डरावना खेल अब यह कहानी बहुत हइ खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी हैं। 

क्या इस बार कोई जिंदा लौट पाएगा? अब पढ़िए पूरी भयानक कहानी परछाई का डर – भाग 2  

कब्रिस्तान में मेरा इंतजार कर रही थीं मेरी परछाई। Haunted Shadow Story In Hindi 

और उसी पल कबीर ने महसूस किया कि उसके पैरों के नीचे से उसकी अपनी परछाई गायब हो चुकी थी।

उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। वह घबराकर पीछे हट गया, लेकिन जमीन पर उसकी जगह केवल अंधेरा दिखाई दे रहा था।

उसकी परछाई जैसे बिना कोई निशान छोड़े कहीं गायब हो चुकी थी।

तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

उसी अनजान नंबर से फिर एक संदेश आया, “अगर अनन्या को जिंदा देखना चाहते हो, तो आज रात यहीं रुको।

भागने की कोशिश मत करना, क्योंकि अब तुम्हारी परछाई मेरे साथ है।”

संदेश पढ़ते ही कबीर के हाथ काँपने लगे और निखिल भी पहली बार पूरी तरह डर गया।

कब्र के पीछे खुला वह रास्ता, जहाँ जाने वाले लोग कभी वापस नहीं लौटे

चानक टूटी हुई कब्र के पीछे लगी पत्थर की दीवार अपने आप खिसकने लगी।

भीतर जाने वाली पुरानी सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं। नीचे से बर्फ जैसी ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों से बंद कोई जगह अचानक जाग उठी हो और किसी का इंतजार कर रही हो।

कबीर ने डर के बावजूद टॉर्च जलाई और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।

निखिल उसके पीछे था, लेकिन उसके कदम बार-बार रुक रहे थे।

सुरंग की दीवारों पर अजीब निशान बने थे और हर कुछ दूरी पर किसी इंसान के हाथों के काले निशान दिखाई दे रहे थे।

सुरंग की दीवारों पर लिखा था उन लोगों का सच, जिन्हें उनकी परछाई छोड़कर चली गई थी

कुछ दूर पहुँचने के बाद कबीर की नजर दीवार पर लिखे सैकड़ों नामों पर पड़ी।

हर नाम के नीचे एक तारीख थी और उसके बाद केवल एक शब्द लिखा था, “गायब।”

अचानक उसकी टॉर्च की रोशनी एक नए नाम पर जाकर रुकी।

वहाँ धीरे-धीरे “कबीर” शब्द उभर रहा था, जबकि कुछ पल पहले वह नाम वहाँ मौजूद नहीं था।

निखिल ने काँपती आवाज़ में कहा, “हमें यहाँ से तुरंत निकल जाना चाहिए।

” तभी सुरंग के भीतर किसी लड़की के रोने की आवाज़ गूँजी।

कबीर उस आवाज़ को तुरंत पहचान गया। वह अनन्या थी।

उसने बिना देर किए उसी दिशा में दौड़ लगा दी और निखिल भी मजबूरी में उसके पीछे भागा।

हवेली के उस कमरे में समय आज भी 1948 की रात पर रुका हुआ था

सुरंग खत्म होते ही दोनों एक विशाल पुरानी हवेली में पहुँचे। हवेली के अंदर धूल तक नहीं थी, जबकि बाहर सब कुछ खंडहर बन चुका था।

दीवारों पर लगी हर घड़ी ठीक 2:17 पर रुकी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे समय ने इस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दिया हो।

कमरे की सबसे बड़ी दीवार पर अर्जुन मल्होत्रा की तस्वीर लगी थी।

उसके सामने एक पुरानी कुर्सी रखी थी, जिस पर किसी के अभी-अभी उठकर जाने के निशान दिखाई दे रहे थे।

तभी कमरे में बहुत धीमी आवाज़ गूँजी, “तुम आखिर आ ही गए…”

जब मेरी अपनी परछाई मेरे सामने खड़ी होकर मुस्कुराने लगी

कबीर ने पीछे मुड़कर देखा तो उसका दिल जैसे धड़कना भूल गया। उसके सामने उसकी अपनी परछाई खड़ी थी।

वह जमीन पर नहीं थी, बल्कि किसी इंसान की तरह सीधे खड़ी होकर उसे देख रही थी।

उसके चेहरे पर कोई आकृति नहीं थी, लेकिन उसकी मुस्कान साफ महसूस हो रही थी।

परछाई ने बिल्कुल कबीर की आवाज़ में कहा, “मैं तुम्हारे साथ वर्षों तक रही, लेकिन अब मैं आजाद हूँ।

तुमने अनन्या को देखा और उसने मुझे भी देख लिया।

अब वह मेरी है और बहुत जल्द तुम्हारा शरीर भी मेरा होगा।” यह सुनकर कबीर के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अनन्या का रहस्य सुनकर कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई

उसी समय कमरे का दूसरा दरवाजा अपने आप खुल गया। अंदर अनन्या खड़ी थी।

उसकी आँखें बंद थीं और वह बिल्कुल शांत दिखाई दे रही थी।

ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गहरे सम्मोहन में हो।

उसके पीछे दर्जनों काली परछाइयाँ बिना आवाज़ किए लगातार हिल रही थीं।

चानक अनन्या ने आँखें खोलीं और बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “यह मेरी तलाश नहीं कर रहा था।

यह तुम्हारी परछाई की तलाश कर रहा था।

जब तुम्हारी नजर मुझ पर पड़ी थी, उसी दिन इसने तुम्हें चुन लिया था। अब यह तुम्हारे बिना भी जिंदा रह सकता है।”

वह अंतिम टकराव जिसने पूरी हवेली को हिला दिया

कबीर ने पूरी हिम्मत जुटाकर अनन्या का हाथ पकड़ लिया और निखिल से बाहर भागने को कहा। उसी पल पूरी हवेली काँपने लगी।

दीवारों पर बनी काली आकृतियाँ चीखने लगीं और चारों तरफ तेज हवा चलने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी इमारत उनके ऊपर गिरने वाली हो।

तीनों पूरी ताकत से सुरंग की तरफ भागे। पीछे से वह काली परछाई बिना आवाज़ किए उनका पीछा कर रही थी। उसकी चाल इंसानों जैसी नहीं थी।

वह कभी दीवार पर दिखाई देती, कभी छत पर और अगले ही पल उनके बिल्कुल पीछे पहुँच जाती।

जितना वे भागते, वह उतनी ही तेजी से उनके करीब आती जाती।

 

सुबह तो हो गई, लेकिन अंधेरा खत्म नहीं हुआ

किसी तरह तीनों कब्रिस्तान से बाहर निकल आए। जैसे ही सूरज की पहली किरण जमीन पर पड़ी, हवेली और सुरंग दोनों अचानक गायब हो गए।

वहाँ केवल टूटी हुई कब्र बची थी। निखिल ने राहत की साँस ली, लेकिन कबीर के चेहरे पर अब भी डर साफ दिखाई दे रहा था।

उसने धीरे से नीचे देखा। इस बार उसकी परछाई वापस आ चुकी थी, लेकिन एक अजीब बात थी।

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जब भी वह रुकता, उसकी परछाई दो पल बाद रुकती थी।

जैसे वह अब भी किसी और के आदेश का पालन कर रही हो।

आखिरी तस्वीर ने साबित कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ

एक सप्ताह बाद तीनों ने फैसला किया कि वे उस रात की बात कभी किसी से नहीं करेंगे। सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था।

तभी निखिल ने पुराने मोबाइल की गैलरी खोली। उसमें अपने आप एक नई तस्वीर सेव हो चुकी थी, जबकि किसी ने फोटो खींची ही नहीं थी।

तस्वीर में कबीर, निखिल और अनन्या सड़क पर खड़े थे, लेकिन उनके पीछे एक चौथी आकृति मुस्कुरा रही थी।

सबसे डरावनी बात यह थी कि उस आकृति के पैरों के नीचे कोई परछाई नहीं थी, जबकि कबीर की परछाई उसके साथ खड़ी दिखाई दे रही थी।

तस्वीर के नीचे केवल एक वाक्य लिखा था, “मैं अब तुम्हारे पीछे नहीं चलता… अब तुम मेरे पीछे चलोगे।”

कहानी समाप्त : यह डरावनी कहानी आपको कैसी लगी? आपके लिए ऐसी ही डरवानी और खतरनाक कहानी हम लाते रहेंगे।      

––––कहानी समाप्त ––––

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