परिधि का दर्द: कहानी के भाग 1 में आपने पढ़ा कि B.Ed पढ़ी-लिखी परिधि ने धन-दौलत नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार और सम्मान को चुनते हुए मोहित से शादी की।
विदाई के बाद वह अपने नए ससुराल पहुँची, जहाँ पति मोहित का प्यार और ससुर हरिराम का अपनापन तो मिला, लेकिन सास कमला और ननद स्नेहा के मन में उसके लिए नफ़रत की आग धीरे-धीरे भड़कने लगी।
अब पढ़िए कहानी के भाग 02 में…
गृह प्रवेश के पहले दिन से ही परिधि के सपने टूटने लगते हैं। कमला और स्नेहा उसे नौकरानी की तरह पूरे घर का काम करवाती हैं, फिर भी हर बात पर ताने, अपमान और बेइज़्ज़ती उसके हिस्से में आती है।
उसकी हर मुस्कान को दबाने और हर खुशी छीनने की कोशिश की जाती है।
जब रिश्तेदार परिधि की तारीफ़ करते हैं, तब कमला और स्नेहा की जलन ज़हर बनकर बाहर आने लगती है।
बात केवल तानों तक नहीं रुकती, बल्कि एक ऐसा झूठा आरोप लगाया जाता है, जिससे परिधि का सम्मान और उसका पूरा भविष्य दाँव पर लग जाता है।
इतना ही नहीं, परिधि का सबसे बड़ा सपना एक सफल B.Ed शिक्षिका बनने का था। लेकिन घर के अंतहीन काम, ताने और रोज़ की परेशानियों के कारण उसे अपनी पढ़ाई के लिए एक पल भी नहीं मिल पाता।
अब उसे लगने लगा है कि शायद उसका सपना अधूरा ही रह जाएगा।
क्या परिधि अपनी B.Ed की पढ़ाई पूरी कर पाएगी? क्या वह कभी एक सफल शिक्षिका बन सकेगी, या कमला और स्नेहा उसकी ज़िंदगी के साथ-साथ उसके सपनों को भी हमेशा के लिए कुचल देंगी?
पढ़िए परिधि का दर्द कहानी का दूसरा भाग, “Family Story In Hindi” जहाँ हर अध्याय के साथ रिश्तों का असली चेहरा और भी दर्दनाक होता जाता है।
गृहप्रवेश की पहली परीक्षा। Family Story In Hindi
कमला ने धीमे स्वर में कहा, “दाहिना पैर आगे रखो और ध्यान रखना, इस घर के नियम बहुत अलग हैं।”
परिधि ने भगवान का स्मरण किया। उसने धीरे से कलश को पैर से आगे बढ़ाया और लाल रंग से सजे फर्श पर अपने कदम रख दिए।
हरिराम ने संतोष से मुस्कुराकर कहा, “बेटी, यह घर अब तुम्हारा भी है। इसे अपनेपन और प्रेम से भर देना।”
कमला ने तुरंत हरिराम की ओर देखा। उसकी निगाहों में जैसे कोई अनकही नाराज़गी छिपी हुई थी, जिसे परिधि ने भी महसूस किया।
स्नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “भाभी, अभी तो सब अच्छा लग रहा होगा। धीरे-धीरे हमारे घर के तौर-तरीके भी समझ जाएँगी।”
परिधि ने विनम्रता से उत्तर दिया, “दीदी, मैं पूरी कोशिश करूँगी कि किसी को मुझसे कभी शिकायत का अवसर न मिले।”
मोहित अपनी पत्नी की सादगी देखकर मन ही मन खुश था। उसे विश्वास था कि परिधि अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लेगी।
कुछ ही दिनों में घर का बदलता माहौल
आरती पूरी होते ही कमला ने थाली स्नेहा को थमाई और गंभीर स्वर में बोली, “अब बहू को सीधे रसोई दिखा दो।”
परिधि ने आश्चर्य से कमला की ओर देखा। उसने सोचा था कि पहले कुछ देर परिवार के साथ बैठेगी, लेकिन उसने चुप रहना उचित समझा।
रसोई में पहुँचते ही स्नेहा बोली, “हमारे घर में नई बहू पहले दिन से ही काम सीखना शुरू कर देती है।”
परिधि मुस्कुराई और बोली, “काम करना मेरे लिए नया नहीं है। माँ ने घर का हर काम अच्छी तरह सिखाया है।”
स्नेहा ने अलमारी खोलते हुए कहा, “देखते हैं, तुम्हारे संस्कार हमारे घर में कितने दिन टिकते हैं।”
यह बात सुनकर परिधि कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने महसूस किया कि बातों में छिपी तल्ख़ी अब साफ़ दिखाई देने लगी थी।
उधर हरिराम ने मोहित से कहा, “बेटा, बहू बहुत समझदार लगती है। उसका हमेशा सम्मान करना।”
मोहित ने सिर झुकाकर कहा, “पिताजी, मैं कभी उसका साथ नहीं छोड़ूँगा।”
कमला ने दोनों की बातें सुन लीं। उसने बिना कुछ कहे अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
सास और ननद की नफ़रत की पहली झलक

कुछ देर बाद कमला रसोई में आई और बोली, “बहू, आज शाम की चाय तुम ही बनाओ। देखते हैं तुम्हारे हाथों का स्वाद कैसा है।”
परिधि ने बिना किसी हिचकिचाहट के मुस्कुराकर कहा, “जी माँजी, मैं अभी बनाती हूँ।”
उसने पूरी लगन से चाय तैयार की। इलायची की हल्की खुशबू पूरे घर में फैल गई और हरिराम ने मुस्कुराते हुए कप उठा लिया।
हरिराम ने पहला घूँट पीते ही कहा, “बहुत अच्छी चाय बनाई है बेटी। बिल्कुल संतुलित स्वाद है।”
लेकिन कमला ने कप मेज़ पर रखते हुए कहा, “इतनी भी अच्छी नहीं है। हमारे घर में इससे बेहतर चाय बनती है।”
स्नेहा ने तुरंत माँ की बात का समर्थन किया और बोली, “भाभी, अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना बाकी है।”
परिधि ने बिना कोई जवाब दिए शांत स्वर में कहा, “जी, मैं सीखने की पूरी कोशिश करूँगी।”
उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन चेहरे पर सम्मान और धैर्य अब भी वैसा ही बना हुआ था। उसे नहीं पता था कि यह तो उसके कठिन सफ़र की केवल पहली शुरुआत थी।
पहली सुबह ही सास और ननद के ताने
अगली सुबह परिधि सूरज निकलने से पहले ही उठ गई। उसने स्नान किया और चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गई।
रसोई में पहुँचकर उसने सबसे पहले भगवान के सामने दीपक जलाया। फिर पूरे मन से चाय और नाश्ते की तैयारी करने लगी।
हरिराम बाहर अख़बार पढ़ रहे थे। रसोई से आती इलायची और अदरक की खुशबू महसूस करके उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
मोहित भी तैयार होकर बाहर आया। उसने देखा कि परिधि बिना किसी शिकायत के पूरे घर का काम संभाल रही थी।
उसी समय कमला रसोई में पहुँची। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई और बिना मुस्कुराए बर्तनों की ओर इशारा कर दिया।
कमला बोली, “बहू, हमारे घर में काम जल्दी होता है। धीरे-धीरे नहीं, समय देखकर हाथ चलाना सीखो।”
परिधि ने शांत स्वर में कहा, “जी माँजी, मैं आपकी हर बात सीखने की पूरी कोशिश करूँगी।”
स्नेहा भी रसोई में आ गई। उसने सिंक में रखे कुछ बर्तन देखकर भौंहें चढ़ा लीं।
वह बोली, “भाभी, इतने बर्तन अभी तक क्यों पड़े हैं? हमारे यहाँ किसी को इंतज़ार करना पसंद नहीं।”
परिधि ने बिना बहस किए तुरंत बर्तन धोने शुरू कर दिए। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन शब्दों में सम्मान बना रहा।
बहुत बुरी सास लेकिन परिधि ने सब सहा

नाश्ता तैयार होने के बाद परिधि ने सबसे पहले हरिराम की थाली लगाई। उन्होंने प्यार से उसे अपने पास बैठने का इशारा किया।
कमला ने तुरंत बीच में कहा, “पहले सबको खाना परोस दो। बहू बाद में आराम से खा सकती है।”
परिधि ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उसने बिना कुछ कहे सभी की थालियाँ सजा दीं।
सबके खाने के बाद जब वह अपनी थाली लेने पहुँची, तब तक सब्ज़ी लगभग समाप्त हो चुकी थी। उसने बची हुई रोटी और थोड़ी सी दाल लेकर चुपचाप खाना शुरू कर दिया।
परिधि ने किसी से कोई शिकायत नहीं की।
हरिराम ने यह दृश्य देख लिया। उनके मन को बहुत दुख हुआ, लेकिन उन्होंने उस समय कुछ कहना उचित नहीं समझा।
मोहित दफ़्तर जाने की जल्दी में था। उसे इस बात का पूरा पता नहीं चल पाया कि परिधि ने ठीक से भोजन भी नहीं किया।
ससुर हरिराम का फैसला
दोपहर में हरिराम ने परिधि को पानी का गिलास देते हुए कहा, “बेटी, अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा करो।”
परिधि ने सम्मान से उत्तर दिया, “जी पिताजी, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आपको मेरी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।”
हरिराम समझ चुके थे कि बहू अपनी तकलीफ़ छिपा रही है। उन्होंने मन ही मन एक महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया।
उन्होंने सोचा, “अगर घर में किसी ने परिधि के साथ अन्याय किया, तो मैं कभी चुप नहीं बैठूँगा।”
उधर कमला दूर खड़ी दोनों की बातचीत देख रही थी। उसके चेहरे पर असंतोष साफ़ दिखाई दे रहा था।
उसे बिल्कुल पसंद नहीं आया कि हरिराम बहू का इतना पक्ष ले रहे थे। उसके मन में ईर्ष्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
परिधि अभी भी अनजान थी। उसे विश्वास था कि एक दिन उसका धैर्य और अच्छे संस्कार पूरे परिवार का दिल जीत लेंगे।
परिधि को मिली पहली बड़ी जिम्मेदारी
अगले दिन कमला ने सुबह ही परिधि को आवाज़ दी। उसके चेहरे पर पहले जैसी कठोरता और आवाज़ में वही सख्ती साफ़ सुनाई दे रही थी।
कमला बोली, “आज दोपहर का पूरा खाना तुम अकेले बनाओगी। हमें देखना है कि तुम्हारे काम में कितनी समझदारी है।”
परिधि ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जी माँजी, आप चिंता मत कीजिए। मैं पूरी मेहनत और मन से सब तैयार कर दूँगी।”
उसने रसोई में जाकर सब्ज़ियाँ काटीं, दाल चढ़ाई और सावधानी से सभी के स्वाद का ध्यान रखते हुए भोजन बनाना शुरू किया।
मोहित काम पर जाने से पहले रसोई में आया। उसने धीमे स्वर में कहा, “ज़्यादा थक जाना तो मुझे फ़ोन कर देना।”
परिधि मुस्कुराई और बोली, “आप निश्चिंत रहिए। मैं सब संभाल लूँगी। आपका काम समय पर पहुँचना अधिक ज़रूरी है।”
मोहित उसकी समझदारी देखकर संतुष्ट हुआ। उसने भगवान से मन ही मन प्रार्थना की कि घर का वातावरण जल्द ही सामान्य हो जाए।
अपमान का नया बहाना
दोपहर होते ही पूरा परिवार खाने की मेज़ पर बैठ गया। परिधि ने सभी की थालियों में आदरपूर्वक भोजन परोसना शुरू किया।
हरिराम ने पहला कौर खाते ही कहा, “बेटी, खाना बहुत स्वादिष्ट बना है। तुम्हारे हाथों में सचमुच अपनापन दिखाई देता है।”
मोहित ने भी मुस्कुराकर कहा, “परिधि, आज का खाना बहुत अच्छा बना है। मुझे बिल्कुल घर जैसा स्वाद महसूस हो रहा है।”
कमला ने तुरंत भौंहें सिकोड़ लीं। उसने बिना पूरी तरह चखे ही थाली एक ओर सरका दी।
वह बोली, “दाल में नमक थोड़ा ज़्यादा है। इतनी छोटी बात भी अगर समझ नहीं आई, तो अभी बहुत सीखना बाकी है।”
परिधि ने तुरंत क्षमा माँगी। उसने विनम्र स्वर में कहा, “माँजी, अगली बार मैं और अधिक ध्यान रखूँगी।”
हरिराम ने दोबारा दाल चखी। उन्हें नमक बिल्कुल सामान्य लगा, लेकिन उन्होंने उस समय विवाद बढ़ाना उचित नहीं समझा।
स्नेहा मुस्कुराते हुए बोली, “माँ सही कह रही हैं। नई बहू को हर बात धीरे-धीरे समझनी पड़ती है।”
परिधि चुपचाप सबकी बातें सुनती रही। उसने अपने सम्मान से अधिक परिवार की शांति को महत्व देना उचित समझा।
एक अनदेखा सच
शाम को मोहित अपने कमरे में कपड़े बदल रहा था। तभी हरिराम धीरे से उसके पास आकर बैठ गए।
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “बेटा, तुम्हारी पत्नी बहुत सहनशील है। वह हर बात मुस्कुराकर सह रही है।”
मोहित ने आश्चर्य से पूछा, “पिताजी, क्या घर में कुछ ऐसा हुआ है जो मुझे नहीं पता?”
हरिराम कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “अभी समय आने दो। पहले तुम स्वयं सब ध्यान से देखना शुरू करो।”
इतने में बाहर से कमला की तेज़ आवाज़ सुनाई दी, “बहू, ज़रा जल्दी बाहर आओ। तुम्हें अभी एक और काम करना है।”
परिधि तुरंत कमरे से बाहर निकल गई। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि इस बार उसके सामने कैसी नई परीक्षा आने वाली है।
रिश्तेदारों के सामने परीक्षा

कमला ने गंभीर स्वर में कहा, “आज शाम तुम्हारी बुआ सास और कुछ रिश्तेदार घर आने वाले हैं। सारी तैयारी तुम्हें अकेले करनी होगी।”
परिधि ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया, “जी माँजी, आप निश्चिंत रहिए। मैं पूरी कोशिश करूँगी कि किसी को कोई कमी महसूस न हो।”
उसने पूरे घर की सफाई शुरू की। फिर बैठक को व्यवस्थित किया और रसोई में मेहमानों के लिए नाश्ते की तैयारी करने लगी।
स्नेहा बीच-बीच में आकर केवल निर्देश देती रही। उसने किसी काम में हाथ नहीं लगाया, लेकिन छोटी-छोटी कमियाँ निकालती रही।
परिधि हर बात ध्यान से सुनती रही। उसने किसी भी बात का बुरा माने बिना अपने काम पर पूरा ध्यान बनाए रखा।
शाम होते ही घर की घंटी बजी। कमला ने मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला और सभी मेहमानों का स्वागत किया।
परिधि ने आदरपूर्वक सभी के चरण स्पर्श किए। उसके विनम्र व्यवहार ने आते ही रिश्तेदारों का मन जीत लिया।
तारीफ़ से बढ़ी नाराज़गी
कुछ देर बाद परिधि ने सभी मेहमानों के सामने गरमागरम नाश्ता और चाय परोसनी शुरू कर दी।
एक बुज़ुर्ग महिला मुस्कुराकर बोलीं, “कमला, तुम्हारी बहू बहुत संस्कारी और समझदार लग रही है। इसका व्यवहार सचमुच प्रशंसा के योग्य है।”
दूसरी रिश्तेदार ने कहा, “आजकल इतनी शालीन और धैर्यवान लड़कियाँ बहुत कम देखने को मिलती हैं। तुम्हारी किस्मत अच्छी है।”
कमला ने बनावटी मुस्कान के साथ सबकी बातें सुन लीं, लेकिन उसके मन की बेचैनी और अधिक बढ़ने लगी।
हरिराम गर्व से परिधि की ओर देख रहे थे। उन्हें अपनी बहू के संस्कारों पर पूरा विश्वास था।
मोहित भी काम से लौट चुका था। उसने देखा कि सभी मेहमान परिधि की खुले मन से प्रशंसा कर रहे थे।
परिधि ने सिर झुकाकर केवल इतना कहा, “आप सबका आशीर्वाद ही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।”
उसकी विनम्रता ने सभी का दिल जीत लिया। घर का वातावरण कुछ देर के लिए बहुत सुखद और शांत हो गया।
सास और ननद की एक नई साज़िश
मेहमानों के जाने के बाद कमला का चेहरा अचानक बदल गया। उसने तेज़ आवाज़ में परिधि को अपने पास बुलाया।
वह बोली, “बहू, लोगों के सामने ज़्यादा सीधी बनने की कोशिश मत किया करो। हमें दिखावा बिल्कुल पसंद नहीं है।”
परिधि ने शांत स्वर में कहा, “माँजी, मैंने किसी को प्रभावित करने के लिए कुछ नहीं किया। मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया है।”
कमला ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप वहाँ से चली गई, लेकिन उसके मन में नई योजना आकार लेने लगी।
स्नेहा ने माँ से धीरे से कहा, “अगर ऐसे ही सब इसकी तारीफ़ करते रहे, तो घर में इसकी ही चलने लगेगी।”
कमला ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, “चिंता मत करो। बहुत जल्द इसे ऐसी ज़िम्मेदारी दूँगी, जिसमें यह स्वयं गलती कर बैठेगी।”
उधर अपने कमरे में बैठी परिधि भगवान का धन्यवाद कर रही थी। उसे नहीं पता था कि उसके धैर्य की अगली परीक्षा पहले से भी कठिन होने वाली है।
बार-बार नई जिम्मेदारी का बोझ
अगली सुबह कमला ने परिधि को अपने कमरे में बुलाया। उसके चेहरे पर गंभीरता थी और मन में कोई नया निर्णय पहले से तैयार था।
कमला बोली, “आज से पूरे घर की सफाई, रसोई और कपड़ों की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। किसी काम में कमी नहीं दिखनी चाहिए।”
परिधि ने सम्मानपूर्वक सिर झुकाया। उसने शांत स्वर में कहा, “जी माँजी, मैं पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाने का प्रयास करूँगी।”
सुबह से दोपहर तक वह लगातार काम करती रही। उसने एक पल के लिए भी आराम नहीं किया और हर काम समय पर पूरा किया।
स्नेहा दूर बैठकर मोबाइल चला रही थी। बीच-बीच में वह केवल आदेश देती और छोटी-छोटी कमियाँ निकालने का प्रयास करती रही।
हरिराम ने यह सब देखा। उन्हें महसूस होने लगा कि घर का सारा बोझ धीरे-धीरे केवल परिधि के कंधों पर डाला जा रहा है।
मोहित काम पर निकल चुका था। उसे घर की वास्तविक परिस्थितियों का अभी भी पूरा अंदाज़ा नहीं था।
परिधि पर लगा झूठा आरोप

दोपहर में कमला अपनी अलमारी खोलने पहुँची। कुछ देर बाद उसने तेज़ आवाज़ में पूरे घर को पुकारना शुरू कर दिया।
वह बोली, “मेरे सोने के कंगन कहाँ गए? मैंने तो यहीं रखे थे। अब दिखाई क्यों नहीं दे रहे हैं?”
स्नेहा तुरंत कमरे में पहुँची। उसने बिना कुछ सोचे कहा, “माँ, आज सुबह इस कमरे में केवल भाभी ही सफाई करने आई थीं।”
परिधि यह सुनकर हैरान रह गई। उसने घबराते हुए कहा, “माँजी, मैंने आपकी किसी भी चीज़ को हाथ तक नहीं लगाया।”
कमला ने कठोर स्वर में कहा, “मैंने तुम्हारा नाम नहीं लिया, लेकिन सच तो सामने आना ही चाहिए।”
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हरिराम तुरंत कमरे में आए। उन्होंने शांत आवाज़ में कहा, “बिना किसी प्रमाण के किसी पर शक करना बिल्कुल उचित नहीं है।”
परिधि की आँखें भर आईं। फिर भी उसने संयम बनाए रखा और किसी के प्रति कठोर शब्द नहीं कहे।
झूठे आरोप का सच याया सबके सामने
इसी बीच मोहित भी अचानक घर लौट आया। उसने घर का तनावपूर्ण माहौल देखकर सबसे पहले कारण पूछा।
हरिराम ने पूरी बात शांतिपूर्वक उसे बता दी। मोहित ने बिना देर किए पूरे कमरे में ध्यान से खोज शुरू कर दी।
कुछ ही मिनटों बाद अलमारी के पीछे रखा एक छोटा डिब्बा दिखाई दिया। उसी के भीतर कमला के सोने के कंगन सुरक्षित रखे थे।
मोहित ने कंगन निकालकर सबके सामने रख दिए। कमरे में कुछ क्षणों के लिए पूरी तरह सन्नाटा छा गया।
हरिराम ने गंभीर स्वर में कहा, “देख लिया, बिना वजह किसी पर संदेह करना कितना बड़ा अन्याय हो सकता है।”
कमला कुछ पल तक चुप रही। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे, लेकिन उसने परिधि से क्षमा भी नहीं माँगी।
परिधि ने भगवान का मन ही मन धन्यवाद किया। उसे राहत मिली कि उसका सम्मान बच गया, लेकिन वह समझ चुकी थी कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है।
परिधि का दर्द कहानी का भाग 02 यहीं समाप्त होता है।
भाग 03 में रिश्तों की परीक्षा और भी खतरनाक होने वाली है। स्नेहा का गुस्सा इस हद तक बढ़ जाएगा कि वह परिधि पर हाथ तक उठा देगी।
क्या उस दिन कोई परिधि का साथ देगा, या वह फिर अकेली रह जाएगी?
इसी बीच कहानी में होगी राकेश की रहस्यमयी एंट्री। क्या वह परिधि के अतीत से जुड़ा कोई इंसान है, या उसकी ज़िंदगी में आने वाला एक नया मोड़?
स्नेहा दोनों की तस्वीर खींचकर मोहित के मन में शक का ऐसा ज़हर घोल देगी, जिससे पूरे परिवार में तूफ़ान खड़ा हो जाएगा।
क्या परिधि अपने चरित्र पर लगे इस शक को मिटा पाएगी?
क्या वह अपनी B.Ed पूरी करके एक सफल शिक्षिका बनने का सपना पूरा करेगी, या साज़िशों का यह जाल उसके सपनों को हमेशा के लिए तोड़ देगा?
जानिए परिधि का दर्द कहानी के अगले भाग में।




