सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा करना आसान लगता है, लेकिन जब रिश्तों की परीक्षा शुरू होती है, तब सच्चे प्यार की असली कीमत समझ में आती है।
इंसान अक्सर अपने सबसे करीब रहने वाले व्यक्ति की अहमियत तब तक नहीं समझता, जब तक उसकी खामोशी हमेशा के लिए उसकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बन जाती।
यह कहानी सिर्फ एक अधूरे प्यार और तड़पन की नहीं, बल्कि उस पछतावे की भी है, जो हर रात आँखों में आँसू और दिल में अनगिनत सवाल छोड़ जाता है।
अगर आपने भी कभी किसी अपने को देर से समझा है, किसी अपने को खोकर उसकी कीमत महसूस की है, तो यह कहानी पढ़ते ही आपको आपका प्यार याद जरूर आ जाएगा।
मुंबई की नई शुरुआत। Love Story In Hindi
मुंबई का आसमान हर सुबह नए सपनों का स्वागत करता था। उसी शहर में माइक्रोसॉफ्ट की विशाल इमारत हजारों युवाओं की मेहनत की गवाह बनती थी।
रोहन उसी कंपनी में ऊँचे पद पर कार्यरत था। शांत स्वभाव, ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता ने उसे सबका सम्मान दिलाया था।
दूसरी ओर, सिया उसी कंपनी में जूनियर पद पर काम करती थी। वह बनारस के पास एक छोटे गाँव से आई, संस्कारी और मेहनती लड़की थी।
सिया की सादगी पूरे कार्यालय में अलग पहचान रखती थी। वह अक्सर सुंदर पटियाला सूट पहनती और हमेशा मुस्कुराकर सभी से नम्रता से बात करती।
रोहन भी मूल रूप से बनारस का रहने वाला था। शायद यही अपनापन उसे अनजाने में सिया की ओर बार-बार खींच लाता था।
रोज़ सुबह किसी न किसी बहाने रोहन उस विभाग के पास पहुँच जाता, जहाँ सिया काम करती थी। वह कुछ कहे बिना लौट जाता।
शुरुआत में सिया ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि रोहन उसे अक्सर देखता रहता है।
सिया मन ही मन सोचती, “शायद रोहन सर किसी काम से आते होंगे।” वह हमेशा अपनी मर्यादा बनाए रखती और अनावश्यक बातें करने से बचती।
कुछ ही दिनों में पूरे स्टाफ के बीच यह चर्चा फैल गई कि रोहन अक्सर सिया के विभाग में दिखाई देता है।
इन बातों से सिया थोड़ी असहज हो जाती, लेकिन उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की। वह केवल अपने काम पर ध्यान देती रही।
रोहन ने सिया साथ गए एक बड़े इवेंट में
एक दिन कंपनी में विदेशी प्रतिनिधियों के स्वागत के लिए भव्य समारोह आयोजित होने वाला था। केवल वरिष्ठ अधिकारियों को निमंत्रण दिया गया था।
रोहन को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसे लगा कि मेहनत करने वालों का सम्मान भी उतना ही होना चाहिए।
उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी से विनम्रता से कहा, “सर, सिया हमारी सबसे मेहनती कर्मचारियों में से एक है। उसे भी इस समारोह में होना चाहिए।”
बॉस ने कुछ क्षण विचार किया। फिर मुस्कुराते हुए सिया के नाम भी विशेष निमंत्रण जारी कर दिया।
जब सिया को निमंत्रण मिला, वह हैरान रह गई। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसका नाम भी सूची में शामिल है।
समारोह वाले दिन सिया हल्के गुलाबी रंग के पटियाला सूट में पहुँची। उसकी सादगी और आत्मविश्वास सबका ध्यान आकर्षित कर रहे थे।
रोहन ने मुस्कुराकर कहा, “सिया, अगर तुम्हें ठीक लगे तो आज हम दोनों साथ रहेंगे।”
सिया ने झिझकते हुए उत्तर दिया, “सर, मैं कहाँ और आप कहाँ।”
रोहन हँस पड़ा। “दोस्ती में पद नहीं देखा जाता। हम दोनों पहले इंसान हैं, फिर सहकर्मी।”
रोहन की सादगी ने सिया का संकोच कम कर दिया। उसने हल्की मुस्कान के साथ हामी भर दी।
दोनों समारोह में साथ खड़े रहे। बातचीत के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि दोनों की सोच और संस्कार काफी मिलते हैं।
दोनों में हुई पहली बार दोस्ती

रात बढ़ती गई। संगीत शुरू हुआ और लगभग सभी लोग डांस फ्लोर पर पहुँच गए।
रोहन ने मुस्कुराकर पूछा, “सिया, क्या तुम मेरे साथ डांस करोगी?”
सिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “सर, मुझे डांस करना नहीं आता।”
रोहन ने हँसते हुए जवाब दिया, “तो आज मैं भी सीख लूँगा। जितना आएगा, उतना कर लेंगे।”
दोनों डांस फ्लोर पर पहुँचे। संगीत की धुन के साथ सिया के कदम बेहद सहज और सुंदर थे।
रोहन आश्चर्य से बोला, “तुमने तो कहा था कि तुम्हें डांस नहीं आता।”
सिया हल्के से मुस्कुरा दी। “थोड़ा-बहुत आता है, बस झिझक रही थी।”
गाना समाप्त हुआ। भावनाओं में बहकर रोहन ने अनजाने में सिया को अपनी बाँहों में उठाकर घुमा दिया।
सिया तुरंत घबरा गई। उसने धीमे स्वर में कहा, “सर, कृपया मुझे नीचे उतार दीजिए।”
रोहन को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तुरंत सिया को नीचे उतार दिया और बार-बार माफी माँगने लगा।
सिया बिना कुछ कहे गार्डन की ओर चली गई। रोहन भी उसके पीछे पहुँचा। उसके चेहरे पर सच्चा पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
माफ़ी से हुई मोहब्बत की शुरुआत
गार्डन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। सिया की आँखें नम थीं, जबकि रोहन शर्मिंदगी से सिर झुकाए उसके सामने खड़ा था।
रोहन ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “सिया, मुझे माफ़ कर दो। सच कहूँ, मुझे समझ ही नहीं आया कि मैंने ऐसा क्यों किया।”
सिया कुछ क्षण शांत रही। फिर धीमे स्वर में बोली, “सर, मेरे माता-पिता ने हमेशा सिखाया है कि लड़का और लड़की दोस्त बनें, लेकिन अपनी मर्यादा कभी नहीं भूलनी चाहिए।”
सिया की बात सुनकर रोहन कुछ पल तक उसे देखता रहा। आज के समय में इतने स्पष्ट संस्कार वाली लड़की देखकर उसका सम्मान कई गुना बढ़ गया।
रोहन तुरंत घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था। वह बार-बार केवल एक ही बात कह रहा था, “मुझे माफ़ कर दो।”
यह दृश्य देखकर सिया घबरा गई। उसने तुरंत रोहन के हाथ पकड़ लिए और उसे खड़ा करते हुए मुस्कुराकर कहा, “इतनी बड़ी गलती भी नहीं हुई।”
रोहन ने राहत की साँस ली। उसकी आँखों में पहली बार खुशी दिखाई दी। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल का भारी बोझ उतार दिया।
सिया ने मुस्कुराकर कहा, “आप बहुत अच्छे इंसान हैं। मेरी नज़रों में आपकी इज़्ज़त पहले से भी ज़्यादा बढ़ गई है।”
रोहन ने भावुक होकर कहा, “आज से मैं तुम्हें कभी दुख नहीं दूँगा। अगर तुम चाहो, तो आज से हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं।”
सिया ने हल्की मुस्कान के साथ अपना हाथ आगे बढ़ाया। रोहन ने मुस्कुराकर उसका हाथ थाम लिया। वहीं से उनकी दोस्ती की नई शुरुआत हुई।
दोस्ती से गहरा हुआ रिश्ता
उस रात के बाद दोनों रोज़ साथ चाय पीने लगे। ऑफिस का हर छोटा-बड़ा काम अब मिलकर पूरा करने लगे।
धीरे-धीरे पूरी कंपनी समझ गई कि दोनों की दोस्ती बेहद सच्ची है। फिर भी दोनों ने कभी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
रोहन हमेशा सिया का सम्मान करता। कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता और हर छोटी परेशानी में उसकी सहायता करता।
सिया भी रोहन का बहुत ध्यान रखने लगी। समय पर खाना खाना, ज़्यादा काम न करना और दवा लेना, वह हमेशा याद दिलाती रहती।
दोनों अक्सर लंच ब्रेक में बनारस की गलियों, घाटों और बचपन की यादों पर बातें किया करते थे।
एक दिन सिया ने हँसते हुए कहा, “सर, पता है। कभी-कभी लगता है कि मुंबई में भी बनारस मिल गया है।”
रोहन मुस्कुरा उठा। उसने जवाब दिया, “क्योंकि बनारस तो इंसानों के दिल में बसता है, शहरों में नहीं।”
दोनों की बातचीत सुनकर कई कर्मचारी मुस्कुरा देते। सभी को उनकी सादगी और अपनापन अच्छा लगता था।
समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा। दोस्ती कब दिल की धड़कन बन गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।
अब एक-दूसरे के बिना ऑफिस का एक दिन भी अधूरा लगने लगा था। दोनों की मुस्कान एक-दूसरे से जुड़ चुकी थी।
जन्मदिन और पहले प्यार का इज़हार

कुछ महीनों बाद सिया का जन्मदिन आया। सुबह ऑफिस पहुँचते ही सबने उसे शुभकामनाएँ दीं, लेकिन रोहन कहीं दिखाई नहीं दिया।
सिया ने सोचा, शायद वह किसी ज़रूरी मीटिंग में होंगे। उसने मन को समझाया और अपने काम में लग गई।
दोपहर होते ही ऑफिस के बाहर एक नई चमचमाती स्कूटी खड़ी दिखाई दी। उसके हैंडल पर रंगीन रिबन बँधा हुआ था।
रोहन मुस्कुराते हुए सिया के सामने आया। उसने चाबी बढ़ाते हुए कहा, “जन्मदिन मुबारक हो, यह मेरी तरफ़ से छोटा-सा उपहार है।”
सिया एकदम घबरा गई। उसने दोनों हाथ पीछे करते हुए कहा, “नहीं सर, मैं यह नहीं ले सकती।”
रोहन ने प्यार से पूछा, “क्यों? इसमें क्या बुराई है?”
सिया मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं। वह बोली, “मुझे स्कूटी नहीं चाहिए। मुझे आपका जैसा सच्चा दोस्त चाहिए। मेरे लिए वही सबसे बड़ा उपहार है।”
सिया की बात सुनकर रोहन का दिल भर आया। उसने पहली बार महसूस किया कि सच्ची खुशी महँगे उपहारों से नहीं, बल्कि अपनेपन से मिलती है।
शाम को रोहन ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा, स्कूटी मत लो। लेकिन जन्मदिन की पार्टी तो दोगी?”
सिया हँस पड़ी। “ज़रूर दूँगी। आप जो कहेंगे, वही होगा।”
रोहन कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “अगर पार्टी की जगह मैं तुमसे कोई और उपहार माँग लूँ, तो दोगी?”
सिया ने बिना सोचे मुस्कुराकर कहा, “अगर मेरी क्षमता में होगा, तो कभी मना नहीं करूँगी।”
रोहन ने धीरे से कहा, “तो चलो… आज ऑफिस के बाद एक जगह चलते हैं। मुझे तुमसे दिल की सबसे ज़रूरी बात कहनी है।”
दिल की बात और प्यार का इज़हार
शाम ढल चुकी थी। मुंबई की सड़कें रोशनी से जगमगा रही थीं। दोनों चुपचाप एक सुंदर पार्क की ओर बढ़ रहे थे।
पार्क में हल्की हवा चल रही थी। पेड़ों की पत्तियाँ सरसराहट कर रही थीं, जबकि चारों ओर सुकून भरा वातावरण फैला हुआ था।
सिया मुस्कुराकर बोली, “सर, अब तो बता दीजिए। आखिर ऐसा कौन-सा उपहार माँगने वाले हैं, जिसे कहने में इतनी देर लग रही है?”
रोहन कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने धीरे से सिया का हाथ अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में देखने लगा।
काँपती आवाज़ में रोहन बोला, “सिया… मुझे कोई चीज़ नहीं चाहिए। अगर तुम देना चाहो, तो मुझे सिर्फ़ तुम चाहिए।”
यह सुनते ही सिया का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसकी आँखें झुक गईं और होंठ काँपने लगे। जैसे समय वहीं ठहर गया हो।
कुछ देर तक दोनों के बीच गहरा सन्नाटा छाया रहा। केवल हवा की आवाज़ उनके धड़कते दिलों की गवाही दे रही थी।
आँखों में आँसू भरकर सिया बोली, “सर… इंसान को अपनी औकात देखकर प्यार करना चाहिए। मैं आपकी बराबरी कभी नहीं कर सकती।”
रोहन तुरंत बोला, “फिर वही सर। आज भी अपने और मेरे बीच दीवार खड़ी कर रही हो। प्यार में पद नहीं देखा जाता।”
उसने भावुक होकर कहा, “मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ। तुम्हारी मुस्कान मेरी सुबह है और तुम्हारी आवाज़ मेरी हर शाम का सुकून।”
रोहन की बातें सुनकर सिया की आँखों से आँसू बह निकले। उसने काँपते हाथों से रोहन का हाथ कसकर पकड़ लिया।
धीमे स्वर में सिया बोली, “सच कहूँ, मैं भी आपको बहुत चाहती हूँ। लेकिन डरती थी कहीं यह सपना टूट न जाए।”
रोहन ने मुस्कुराकर उसे अपने सीने से लगा लिया। उसकी आँखों में भी खुशी के आँसू थे और होंठों पर सुकून भरी मुस्कान।
उसने धीरे से कहा, “मुझे छोड़कर कभी मत जाना, सिया। मैं सच में तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगा।”
सिया ने रोते हुए जवाब दिया, “अगर साथ रहना हमारी किस्मत में हुआ, तो सात जन्म भी कम पड़ जाएँगे।”
दोनों ने सात जन्मों का लिया वादा

उस दिन के बाद दोनों का रिश्ता और भी गहरा हो गया। अब हर सुबह एक-दूसरे की मुस्कान देखकर ही उनकी शुरुआत होती थी।
ऑफिस का हर लंच साथ होता, छुट्टियों की हर योजना साथ बनती और हर छोटी खुशी दोनों मिलकर मनाया करते थे।
दोनों ने कभी अपने प्यार का दिखावा नहीं किया। उनके रिश्ते में सम्मान, विश्वास और सच्चाई सबसे बड़ी ताकत थी।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा। देखते ही देखते उनके रिश्ते को लगभग ढाई वर्ष पूरे हो चुके थे।
इन ढाई वर्षों में दोनों के बीच कभी ऐसी लड़ाई नहीं हुई, जिसने उनके विश्वास को तोड़ा हो। छोटी नाराज़गी भी मुस्कान में बदल जाती थी।
रोहन कई बार बनारस गया। उसने सिया के गाँव की गलियाँ देखीं, उसके माता-पिता से मिला और सभी का सम्मान जीता।
सिया भी रोहन के परिवार से मिली। दोनों परिवारों को उनके बीच की सच्ची दोस्ती पसंद आने लगी, हालाँकि किसी ने अभी रिश्ते की बात नहीं की।
एक शाम गंगा किनारे बैठे दोनों ने डूबते सूरज को देखा। उस पल उनके दिलों में एक ही इच्छा थी, कभी अलग न होने की।
रोहन ने अपनी हथेली आगे बढ़ाकर कहा, “सिया, वादा करो, चाहे कितनी भी मुश्किल आए, हम एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।”
सिया ने अपनी हथेली उसके हाथ पर रख दी। मुस्कुराते हुए बोली, “सिर्फ़ इस जन्म में नहीं, सातों जन्म तुम्हारा साथ निभाऊँगी।”
दोनों ने आसमान की ओर देखकर भगवान को साक्षी मानते हुए साथ जीने और साथ मरने का वादा किया। उन्हें क्या पता था कि किस्मत चुपचाप मुस्कुरा रही थी।
शातिर नई लड़की प्रीति की एंट्री
कुछ ही दिनों बाद कंपनी में एक नई कर्मचारी ने जॉइन किया। उसका नाम प्रीति था और वह असाधारण बुद्धिमान मानी जाती थी।
प्रीति का काम करने का तरीका तेज़ था। वह हर अवसर को अपने पक्ष में करना अच्छी तरह जानती थी।
जॉइन करते ही उसने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से नज़दीकियाँ बढ़ानी शुरू कर दीं। उसका अगला लक्ष्य रोहन था।
वह किसी न किसी बहाने रोज़ रोहन के केबिन पहुँच जाती। कभी फ़ाइल पूछती, कभी प्रोजेक्ट, तो कभी अनावश्यक सलाह लेने लगती।
कई बार मीटिंग के नाम पर वह रोहन को घंटों उलझाए रखती। नए विदेशी प्रोजेक्टों की रिपोर्ट, क्लाइंट प्रेज़ेंटेशन और लगातार बैठकों में उसका साथ अनिवार्य बना देती।
रोहन का पूरा ध्यान केवल काम पर रहता। उसके मन में प्रीति के लिए कोई भावना नहीं थी, लेकिन व्यस्तता लगातार बढ़ती जा रही थी।
दूसरी ओर सिया दूर से यह सब देखती रहती। उसे लगता, जैसे धीरे-धीरे कोई उसके अपने इंसान को उससे दूर ले जा रहा हो।
एक दिन उसने देखा कि प्रीति हँसते हुए रोहन के बहुत करीब खड़ी है। यह दृश्य देखकर पहली बार सिया का दिल बिना किसी कारण बुरी तरह टूट गया।
उस रात सिया बहुत रोई। मगर उसने अपने आँसू किसी को नहीं दिखाए। उसे विश्वास था कि उसका रोहन कभी उसका भरोसा नहीं तोड़ेगा।
सच्चे प्यार में बढ़ती दूरियाँ और अनकही गलतफहमियाँ

अगली सुबह सिया मुस्कुराकर ऑफिस पहुँची, लेकिन उसकी मुस्कान अब पहले जैसी नहीं रही। दिल में अनगिनत सवाल चुपचाप जन्म लेने लगे थे।
उधर रोहन लगातार नए प्रोजेक्टों में व्यस्त रहने लगा। विदेशी क्लाइंट, ऑनलाइन मीटिंग और लगातार यात्राओं ने उसका अधिकांश समय घेर लिया।
प्रीति जानबूझकर हर महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में अपना नाम शामिल करवाती। फिर किसी न किसी बहाने रोहन के साथ घंटों बैठकर काम करती रहती।
कभी रिपोर्ट तैयार करवानी होती, कभी विदेशी टीम से वीडियो कॉन्फ्रेंस करनी होती, तो कभी देर रात तक प्रेज़ेंटेशन बनानी पड़ती थी।
रोहन को यह सब केवल काम लगता था। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी बढ़ती व्यस्तता सिया के दिल को हर दिन थोड़ा-थोड़ा तोड़ रही है।
अब लंच भी पहले जैसा साथ नहीं होता था। कई बार सिया अकेले बैठकर खाना खाती, जबकि रोहन मीटिंग रूम में व्यस्त रहता।
सिया रोज़ खुद को समझाती, “शायद काम ज़्यादा होगा। मेरा रोहन ऐसा नहीं है। वह मुझे कभी नहीं भूलेगा।”
लेकिन हर दिन वही दृश्य दोहराया जाता। प्रीति किसी न किसी काम के बहाने रोहन को अपने साथ उलझाए रखती।
धीरे-धीरे पाँच महीने बीत गए। अब ऑफिस में हर किसी को लगने लगा कि रोहन और प्रीति हमेशा साथ दिखाई देते हैं।
टूटता और चूर-चूर होता भरोसा
एक दिन कंपनी में प्रमोशन की घोषणा हुई। सभी कर्मचारी उत्सुकता से परिणाम का इंतज़ार कर रहे थे।
घोषणा होते ही पता चला कि प्रीति को सिया से भी ऊँचे पद पर पदोन्नति मिल गई है।
पूरे ऑफिस ने तालियाँ बजाईं, लेकिन सिया के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। उसका दिल चुपचाप टूटने लगा।
बाद में उसे पता चला कि इस प्रमोशन की सिफारिश रोहन ने की थी। यह सुनते ही उसकी आँखें भर आईं।
सिया मन ही मन सोचने लगी, “शायद मुझमें ही कोई कमी थी। इसलिए रोहन ने कभी मेरे लिए एक शब्द भी नहीं कहा।”
उसे यह नहीं पता था कि रोहन ने जानबूझकर उसकी सिफारिश कभी नहीं की। वह चाहता था कि सिया उसी शाखा में रहे और उससे दूर न जाए।
रोहन अच्छी तरह जानता था कि ऊँचा पद मिलने पर सिया को विदेश या दूसरे शहर भेजा जा सकता था। वह उसे अपने सामने देखना चाहता था।
लेकिन उसने यह बात कभी सिया को बताई ही नहीं। यही चुप्पी धीरे-धीरे उनके रिश्ते की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई।
अब सिया को हर मुस्कान बनावटी लगने लगी। वह चाहकर भी अपने मन का दर्द किसी से कह नहीं पा रही थी।
उसकी आँखों के आँसू अब केवल रात के अँधेरे में निकलते थे, जहाँ उन्हें देखने वाला कोई नहीं होता था।
दोनों का प्यार बिछड़ने की शुरुआत

एक शाम सिया ने रोहन को फोन किया। उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा बुझी हुई लग रही थी।
उसने धीरे से कहा, “रोहन… आज थोड़ा जल्दी मिल सकते हो? मुझे तुमसे बहुत ज़रूरी बात करनी है।”
रोहन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “बस पाँच मिनट, सिया। पहले प्रीति को घर छोड़ दूँ, फिर सीधे तुम्हारे पास आता हूँ।”
यह सुनते ही सिया कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोश हो गई। उसके दिल में जैसे किसी ने गहरा घाव कर दिया हो।
उसने धीमे स्वर में कहा, “ठीक है… रहने दो। मैं घर जा रही हूँ। अपना ध्यान रखना।”
फोन कट गया। उधर रोहन जल्दी में प्रीति के साथ निकल गया। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसने अनजाने में सबसे बड़ी गलती कर दी है।
सिया वहीं सड़क किनारे खड़ी रही। तभी तेज़ बारिश शुरू हो गई। लोग भागकर छतों के नीचे पहुँच गए, लेकिन सिया वहीं भीगती रही।
बारिश की बूँदों के साथ उसके आँसू भी बह रहे थे। उसे पहली बार महसूस हुआ कि शायद उसका प्यार अब पहले जैसा नहीं रहा।
काफ़ी देर बाद वह भीगे हुए कदमों से अपने घर पहुँची। पूरी रात तकिए में चेहरा छिपाकर रोती रही और कोई उसकी सिसकियाँ सुन नहीं पाया।
सुबह होते ही उसने मन ही मन एक कठिन फैसला लिया। अब वह कभी रोहन के सामने अपने प्यार के लिए नहीं गिड़गिड़ाएगी।
कुछ दिनों बाद सिया ने कंपनी से दो महीने की छुट्टी ली और बिना किसी को बताए अपने गाँव, बनारस के लिए निकल गई।
रोहन ने सोचा, शायद सिया अपने परिवार से मिलने गई होगी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि किस्मत अब उनकी कहानी को एक बिल्कुल नया मोड़ देने वाली थी।
बनारस में सिया का रिश्ता जुड़ा जीत से

बनारस पहुँचते ही सिया ने अपने आँसू परिवार से छिपा लिए। उसने किसी को भी अपने टूटे हुए दिल की सच्चाई नहीं बताई।
कुछ दिनों बाद उसके माता-पिता ने एक रिश्ते की बात बताई। लड़के का नाम जीत था और वह शहर का सम्मानित रेस्टोरेंट मालिक था।
जीत केवल सफल व्यापारी नहीं था। उसने गरीबों की सहायता के लिए एक बड़ी गौशाला बनवाई थी और हर महीने जरूरतमंदों की मदद करता था।
पहली मुलाकात में जीत ने सिया से केवल इतना कहा, “अगर तुम्हें यह रिश्ता पसंद नहीं है, तो मैं कभी ज़बरदस्ती नहीं करूँगा।”
जीत की यह बात सुनकर सिया हैरान रह गई। उसने पहली बार किसी इंसान को रिश्ते से पहले सम्मान देते हुए देखा था।
धीरे-धीरे दोनों मिलने लगे। जीत ने कभी सिया के अतीत के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा। वह केवल उसके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहता था।
दो महीने कब बीत गए, किसी को पता ही नहीं चला। जीत ने अपने व्यवहार से सिया का विश्वास जीत लिया।
सिया आज भी रोहन को भूल नहीं पाई थी, लेकिन उसे यह समझ आने लगा कि सम्मान भी प्यार जितना ही जरूरी होता है।
कुछ ही दिनों बाद दोनों की सगाई हो गई। पूरे परिवार में खुशियों का माहौल था, लेकिन सिया के दिल का एक कोना अब भी खामोश था।
उधर मुंबई में रोहन अपनी दुनिया में व्यस्त रहा। उसे सिया की सगाई की खबर तक नहीं मिली।
पछतावे की तड़पती आग

एक दिन ऑफिस के एक कर्मचारी ने अनजाने में रोहन से कहा, “सुना है सिया की शादी अगले महीने बनारस में होने वाली है।”
यह सुनते ही रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके हाथ से फाइल गिर गई और आँखें पूरी तरह खाली हो गईं।
उसे उसी पल महसूस हुआ कि काम के पीछे भागते-भागते उसने अपनी पूरी दुनिया खो दी है।
रोहन बार-बार सिया को फोन करता रहा, लेकिन हर बार फोन बंद मिला। उसके हर संदेश का कोई उत्तर नहीं आया।
वह बिना देर किए बनारस पहुँच गया। कई घंटों की तलाश के बाद आखिरकार उसे जीत का रेस्टोरेंट मिल गया।
रोहन वहाँ केवल सिया से एक बार बात करना चाहता था। वह अपने दिल की हर बात कहकर माफी माँगना चाहता था।
उसी समय जीत बाहर आया। उसने शांत स्वर में पूछा, “आप रोहन हैं?”
यह कहानी भी पढ़ें ⇾ प्यार में मिला थप्पड़! गरीब समझकर ठुकराया प्यार को। भाग 1 📖
रोहन ने सिर झुका दिया। उसकी आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। बातों-बातों में माहौल भारी हो गया और हल्की धक्का-मुक्की हो गई।
संतुलन बिगड़ने से जीत पीछे गिर पड़ा। उसका सिर दीवार के कोने से टकराया और हल्की चोट लग गई।
उसी समय सिया वहाँ पहुँच गई। उसने दौड़कर जीत को संभाला और घबराई हुई आँखों से रोहन की ओर देखने लगी।
रोहन घबराकर बोला, “सिया… मेरी बात सुनो। मैं लड़ने नहीं आया था। मैं सिर्फ़ तुमसे माफी माँगने आया था।”
सिया की आँखों में आँसू भर आए। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है, रोहन।”
बाद में जीत ने सिया को पूरी सच्चाई बता दी कि रोहन लड़ने नहीं, बल्कि माफी माँगने आया था। फिर भी सिया के दिल का टूटा विश्वास वापस नहीं लौट सका।
सात जन्मों का वादा बन गया एक अधूरा वादा

शादी का दिन आ गया। पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। शहनाइयों की आवाज़ हर दिशा में गूँज रही थी।
दुल्हन बनी सिया आईने के सामने बैठी थी। उसकी आँखों में काजल था, लेकिन दिल में पुराने आँसू अब भी सूखे नहीं थे।
जीत ने उसके सामने बैठकर केवल इतना कहा, “मैं तुम्हारे अतीत से कभी नहीं लड़ूँगा। मैं केवल तुम्हारे आज का सम्मान करूँगा।”
सिया की आँखों से दो आँसू धीरे-धीरे उसके हाथों पर गिर पड़े। उसने पहली बार बिना कुछ कहे जीत के सामने सिर झुका दिया।
उधर मंदिर के बाहर दूर खड़ा रोहन चुपचाप सब देख रहा था। वह चाहता तो सामने जा सकता था, लेकिन अब उसके पास कोई अधिकार नहीं बचा था।
मंगलसूत्र पहनाते समय सिया की पलकों से आँसू फिर बह निकले। शायद उन्हें कोई और नहीं समझ पाया, लेकिन रोहन सब समझ गया।
शादी पूरी होने के बाद सिया ने एक बार पलटकर दूर खड़े रोहन को देखा। दोनों की आँखें मिलीं, लेकिन कोई शब्द जन्म नहीं ले पाया।
रोहन ने काँपते होंठों से बस इतना कहा, “सात जन्मों का वादा… मैं इस जन्म में ही निभा नहीं सका।”
सिया ने आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर दर्द था, मगर कदम अब जीत के साथ आगे बढ़ चुके थे।
गाड़ी धीरे-धीरे घर से दूर चली गई। रोहन उसी सड़क पर देर तक खड़ा रहा, जहाँ कभी उसने साथ चलने का सपना देखा था।
उस रात पहली बार रोहन ने आसमान की ओर देखकर खुलकर रोया। उसकी आवाज़ किसी ने नहीं सुनी, लेकिन उसका टूटता हुआ दिल शायद भगवान ने ज़रूर सुन लिया।
दूर जाती हुई बारात आँखों से ओझल हो गई। सड़क खाली हो गई, मगर रोहन की निगाहें वहीं ठहरी रहीं, जहाँ उसकी पूरी ज़िंदगी उससे हमेशा के लिए बिछड़ गई।
____कहानी समाप्त____




