ज़र्राख जिन्न और नूर की इबादत कहानी के भाग 1 में आपने पढ़ा कि सदियों पुराना ज़र्राख जिन्न नूर के घर तक पहुँच गया।
अब सलीम चाचा, हिना और पूरा परिवार डर से काँप रहा था।
ज़र्राख जिन्न सिर्फ़ नूर को दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे वह नूर के मन और आत्मा पर अपना कब्ज़ा करता जा रहा था, जबकि पूरा परिवार उसे बचाने की कोशिश कर रहा था।
अब पढ़िए ज़र्राख जिन्न और नूर की इबादत – भाग 2…
क्या ज़र्राख जिन्न नूर को हमेशा के लिए अपने साथ दूसरी दुनिया में ले जाएगा? या फातिमा अपनी इबादत और हिम्मत से उसे रोक देगी?
आखिर तीन सौ साल पुराना ज़र्राख और सलमा का रहस्य क्या है? क्या उसी रहस्य के कारण आज नूर की जान सबसे बड़े खतरे में पड़ चुकी है?
सुबह होते ही हिना डरते हुए फातिमा के घर पहुँची। फातिमा, समीर, सायरा और अब्दुल हकीम तुरंत नूर के घर पहुँचे, लेकिन असली खौफ उनका इंतज़ार कर रहा था।
इस भाग में आपको मिलेगा पहले से भी ज़्यादा खौफ, रहस्य, इमोशन और ऐसा भयानक अंत, जिसे पढ़ने के बाद नूराबाद का नाम कभी नहीं भूल पाएँगे।
रात का खौफ और कमरे से आती रहस्यमयी आवाज़। Horror Story In Hindi
“नूर… डरना मत। दुनिया मुझे चाहे जैसा समझे… लेकिन तुम्हें देखकर मुझे किसी की याद आ गई…”
इतना कहकर ज़र्राख जिन्न दूसरे कमरे में चला गया।
कुछ ही देर में उसके लंबे-लंबे खर्राटे पूरे घर में गूँजने लगे।
लेकिन… नूर, हिना और सलीम चाचा की आँखों में नींद का नाम तक नहीं था। तीनों एक कोने में सिमटकर बैठे थे।
किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आवाज़ तक निकाले।
रात बहुत लंबी लग रही थी। अचानक… भीतर वाले कमरे से आवाज़ आई, “नूर…” नूर डरकर काँप उठी।
वह चुप रही। कुछ पल बाद फिर वही आवाज़ आई, “नूर… मुझे पानी चाहिए।”
नूर काँपते हाथों से पानी का लोटा लेकर कमरे के दरवाज़े तक पहुँची। अंदर वही मुसाफ़िर बैठा था। लेकिन उसकी आँखों में इस बार अजीब चमक थी।
उसने पानी पिया और बस नूर को देखता रहा। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह धीरे से बोला, “बिल्कुल… सलमा जैसी…”
नूर कुछ समझ नहीं पाई। वह धीरे से वापस आ गई। थोड़ी देर बाद फिर आवाज़ आई, “नूर…” इस बार वह बिना कुछ बोले उसके सामने खड़ी हो गई।
ज़र्राख जिन्न मुस्कराने लगा।
अचानक उसकी मुस्कान भयानक हँसी में बदल गई। पूरा घर उसकी डरावनी हँसी से काँप उठा। फिर वह अचानक चुप हो गया।
धीमी आवाज़ में बोला, “तुम्हें एक दिन मेरे साथ चलना ही होगा। देखो… सलमा भी मुझे छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई। अब मैं तुम्हें कभी नहीं खोऊँगा।”
नूराबाद में सुबह का सन्नाटा और हिना का डर

इतना कहकर वह फिर लेट गया। कुछ ही पलों में उसके लंबे-लंबे खर्राटे पूरे घर में गूँजने लगे।
उधर… नूर, हिना और सलीम चाचा पूरी रात बैठे-बैठे अल्लाह को याद करते रहे।
ख़ासकर जब सूरज निकला तो ख़ौफ और बढ़ गया।
सूरज निकलते ही हिना बिना कुछ कहे घर से भागी। उसके कदम सीधे फातिमा के घर की ओर बढ़ रहे थे।
उसी समय समीर बाज़ार की तरफ़ से लौट रहा था। उसने हिना को इस तरह भागते देखा तो वह भी उसके पीछे दौड़ पड़ा।
कुछ ही देर में दोनों फातिमा के घर पहुँच गए। फातिमा और सायरा बाहर ही खड़ी थीं। हिना उन्हें देखते ही फूट-फूटकर रोने लगी।
उसने रात की पूरी घटना बता दी। उसका पूरा शरीर बुरी तरह काँप रहा था।
साँसें तेज़ चल रही थीं। ऐसा लग रहा था… जैसे कोई अदृश्य शैतानी साया अभी भी उसका पीछा कर रहा हो।
फातिमा ने बिना एक पल गँवाए अपनी आँखें बंद कीं। उन्होंने इबादत की। फिर अपने हाथों से एक काला ताबीज़ उठाया।
फातिमा का इबादती ताबीज़ और आसमान का रहस्य
धीरे से वह ताबीज़ हिना के गले में पहना दिया। ताबीज़ पहनते ही… हिना का काँपता शरीर धीरे-धीरे शांत होने लगा।
उसकी साँसें सामान्य हो गईं। वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। फातिमा ने उसे अपने सीने से लगा लिया। समीर और सायरा यह सब देखकर हैरान रह गए।
फातिमा ने एक और ताबीज़ उठाया। वह समीर को देते हुए बोली, “बेटा… यह ताबीज़ हर हाल में नूर के गले में पहनाना होगा।
देर करने की ज़रा भी गुंजाइश नहीं है।”
इतना कहकर फातिमा घर से बाहर निकली। लेकिन बाहर का नज़ारा देखकर सबके कदम वहीं रुक गए।
पूरा आसमान काले बादलों से ढका हुआ था। जबकि… ऐसा कोई मौसम ही नहीं था। तेज़ ठंडी हवा चलने लगी।
पूरा नूराबाद गाँव अजीब सन्नाटे में डूब गया। फातिमा ने आसमान की ओर देखा। फिर धीरे से बोली, “या अल्लाह… लगता है वह हमारी आहट समझ चुका है।”
ज़र्राख जिन्न का सामना और नूर का बदलता रूप

फातिमा, सायरा, समीर और हिना… चारों तेज़ी से नूर के घर की ओर चल पड़े।
जैसे ही फातिमा ने दरवाज़ा खटखटाया… अंदर बैठा ज़र्राख जिन्न अचानक उठकर खड़ा हो गया।
उसकी आँखें पहले से कहीं बड़ी हो गईं। उसने गुस्से से दरवाज़े की ओर देखा।
उधर… नूर ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
फातिमा ने “बिस्मिल्लाह” पढ़ते हुए जैसे ही घर के अंदर कदम रखा… वैसे ही ज़र्राख जिन्न एक पल में गायब होकर घर के बाहर चला गया।
वह पहली बार… डर गया था।
ज़र्राख जिन्न एक पल में घर के बाहर चला गया। नूर धीरे-धीरे फातिमा की ओर देखने लगी।
उसकी आँखें बिल्कुल बदल चुकी थीं। चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी। फातिमा सब समझ गई। वह धीरे से नूर के पास गई। उसके सिर पर हाथ फेरा।
लेकिन… नूर बस एक ही बात बार-बार कह रही थी, “वह बहुत अच्छा है… वह मुझे कभी दुख नहीं देगा… मुझे उसके पास जाने दो…”
यह सुनते ही… सलीम चाचा फूट-फूटकर रो पड़े।
उनकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। वह फातिमा के पैरों में बैठ गए।
सलीम चाचा की चीख और धरती पर पैर के निशान
सलीम चाचा काँपती आवाज़ में बोले, “बहन… मेरी बेटी को बचा लो। पूरी रात वह कहता रहा कि नूर को अपने साथ ले जाएगा।
मैं अपनी बेटी को नहीं खो सकता।” फातिमा ने सलीम चाचा को उठाया। फिर शांत स्वर में पूछा, “वह कहाँ है?”
सलीम चाचा काँपती आवाज़ में बोले, “अभी तो इसी कमरे में सो रहा था… पता नहीं अचानक कहाँ चला गया।”
फातिमा ने नूर का हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे उसे लेकर घर के बाहर आ गई। समीर… सायरा… हिना… और सलीम चाचा भी पीछे-पीछे आ गए।
बाहर चारों ओर अजीब सन्नाटा था। काले बादल पूरे आसमान पर छा चुके थे।
ठंडी हवा लगातार चल रही थी। तभी… नूर मुस्कराने लगी। उसने सामने एक जगह उँगली करते हुए कहा, “देखिए… वह वहीं खड़े हैं।”
लेकिन… उसे छोड़कर किसी को भी वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था। समीर ने ध्यान से देखा। सायरा ने भी देखा। सलीम चाचा ने भी देखा।
वहाँ सिर्फ़ खाली जगह थी। अचानक… फातिमा की नज़र ज़मीन पर पड़ी।
भयानक आँधी और तीन सौ साल पुरानी दर्दनाक दास्तान

मिट्टी पर किसी के बहुत बड़े पैरों के निशान बने हुए थे। हर कदम इंसान से कहीं बड़ा था।
निशान ऐसे थे… जैसे कोई बहुत विशाल आदमी अभी-अभी वहाँ खड़ा रहा हो। फातिमा का चेहरा गंभीर हो गया।
वह समझ चुकी थी। ज़र्राख जिन्न यहीं खड़ा था।
नूर अब भी उसी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी। धीरे से बोली, “मुझे उसके पास जाने दो…” इतने में… समीर को फातिमा की बात याद आई।
उसने चुपचाप अपनी जेब से अल्लाह का ताबीज़ निकाला। धीरे से पीछे जाकर… नूर के गले में बाँध दिया।
ताबीज़ गले में पड़ते ही… नूर ज़ोर से चीख उठी। उसकी आँखें बंद हो गईं।
कुछ ही पल बाद उसने घबराकर चारों ओर देखा, “अम्मी… अब्बू जान… मैं यहाँ कैसे आई?”
इतना सुनते ही… सलीम चाचा दौड़कर अपनी बेटी को गले लगा लिया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
तभी… पूरे नूराबाद में एक भयानक आँधी चलने लगी। पेड़ ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे।
आसमान में काले बादल और गहरे हो गए। अचानक… पूरा गाँव एक डरावनी आवाज़ से गूँज उठा। वह आवाज़ इंसान की नहीं थी, “फा…ति…मा…”
तस्बीह की इबादत और अब्दुल हकीम की आमद
आवाज़ सुनते ही फातिमा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उन्होंने ताबीज़ को कसकर पकड़ा और इबादत शुरू कर दी… फातिमा की इबादत की आवाज़ पूरे आँगन में गूँजने लगी।
तेज़ हवा और भी तेज़ हो गई। पेड़ ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे।
अचानक… बाहर खड़ा ज़र्राख जिन्न दर्द से चीख उठा।
उसकी डरावनी आवाज़ पूरे नूराबाद में गूँज गई, “फातिमा… तुम मुझे ज़्यादा देर नहीं रोक पाओगी…” फातिमा ने बिना डरे इबादत जारी रखी।
कुछ ही पलों में… ज़र्राख जिन्न पीछे हटने लगा।
काले बादलों के बीच वह तेज़ी से जंगल की ओर चला गया। धीरे-धीरे आँधी भी शांत होने लगी। पूरे घर में सन्नाटा छा गया। नूर अब पूरी तरह होश में थी।
वह घबराकर अपने अब्बू जान से लिपट गई। सलीम चाचा की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
वह बार-बार बस एक ही बात कह रहे थे, “या अल्लाह… मेरी बेटी की हिफाज़त करना।”
फातिमा ने गहरी साँस ली। फिर समीर की तरफ़ देखकर बोली, “बेटा समीर… अभी इसी वक्त अब्दुल हकीम भाईजान को बुलाकर लाओ।
अब सच छिपाने का समय खत्म हो गया है।” समीर बिना एक पल रुके घर से बाहर दौड़ पड़ा।
बेगुनाह ज़र्राख का कत्ल और रूह का जिन्न बनना
कुछ ही देर बाद… वह गाँव के सबसे बुजुर्ग और सम्मानित आदमी… अब्दुल हकीम भाईजान को अपने साथ लेकर लौट आया।
सफ़ेद दाढ़ी… सफ़ेद कुर्ता-पायजामा… सिर पर सफ़ेद टोपी… हाथ में पुरानी लकड़ी की लाठी… चेहरे पर वर्षों का अनुभव साफ़ दिखाई दे रहा था।
फातिमा उन्हें देखते ही सम्मान से खड़ी हो गई। अब्दुल हकीम… फातिमा के धर्म के भाई थे।
दोनों बचपन से एक-दूसरे पर पूरा भरोसा करते थे। उसी समय… शबनम के अब्बू भी वहाँ आ पहुँचे।
उन्हें भी खबर मिल चुकी थी कि नूर के घर कोई बड़ी घटना हुई है।
सलीम चाचा ने सबको घर के बड़े कमरे में बैठाया। एक तरफ़ फातिमा और सायरा बैठीं। दूसरी तरफ़ सलीम चाचा, नूर और हिना।
समीर दरवाज़े के पास बैठ गया। अब्दुल हकीम और शबनम के अब्बू सामने चारपाई पर बैठ गए।
कुछ देर तक… पूरा कमरा बिल्कुल शांत रहा। सिर्फ़ बाहर चलती ठंडी हवा की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
अब्दुल हकीम ने धीरे से अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई।
फिर फातिमा की ओर देखते हुए बोले, “बहन… अब इन्हें वह बात बता दो। इतने सालों से हमने इस रहस्य को छिपाकर रखा है।
लेकिन अब वक्त आ गया है कि ये सब ज़र्राख जिन्न और सलमा की पूरी कहानी जान लें। सच जानना ही इनकी हिफाज़त का पहला रास्ता है।”
तीन सौ साल पुराना अतीत और सलमा से मोहब्बत

फातिमा ने अपनी तस्बीह हाथ में ली। धीरे से “बिस्मिल्लाह…” पढ़ा। फिर सबकी तरफ़ देखा।
नूर की आँखों में आँसू थे। सायरा और हिना डर के मारे एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठी थीं।
सलीम चाचा सिर झुकाकर रो रहे थे। समीर की नज़र दरवाज़े पर थी… कहीं ज़र्राख जिन्न फिर वापस न आ जाए।
फातिमा ने गहरी साँस ली और बोली… “आज से लगभग तीन सौ साल पहले… नूराबाद में ज़र्राख नाम का एक नौजवान रहता था…”
फातिमा ने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया।
पूरा कमरा बिल्कुल शांत था। सभी लोग उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे।
फातिमा बोली, “ज़र्राख बहुत गरीब था। उसका कोई बड़ा कारोबार नहीं था। वह जंगल से लकड़ियाँ काटकर बाज़ार में बेचता था।
उसी कमाई से अपना पेट भरता था।” वह मेहनती था। ईमानदार था। और पूरे गाँव में उसकी सच्चाई की मिसाल दी जाती थी।
उसी गाँव में… सलमा रहती थी। सलमा बहुत बड़े और अमीर घर की बेटी थी। उसके अब्बू पूरे इलाके के सबसे रसूखदार आदमी थे। सलमा के चार भाई भी थे। लेकिन… चारों के दिल में घमंड भरा हुआ था।
चारों भाइयों का ज़ुल्म और बेगुनाह पर पत्थरों की बारिश
एक दिन… सलमा और ज़र्राख की मुलाक़ात जंगल के रास्ते में हुई।
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे से मोहब्बत करने लगे। दोनों निकाह करना चाहते थे। लेकिन… किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
एक दिन… सलमा के एक भाई ने दोनों को नदी किनारे बात करते देख लिया।
वह दौड़कर घर पहुँचा। उसने अपने अब्बू और भाइयों को सब कुछ बता दिया। चारों भाइयों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
उन्होंने पूरे गाँव में झूठ फैलाना शुरू कर दिया। किसी से कहा… “ज़र्राख चोर है।”
किसी से कहा… “उसकी नीयत गाँव की लड़कियों पर खराब है।” किसी से कहा… “उसने हमारे घर से चोरी की है।”
धीरे-धीरे… पूरा गाँव उनके झूठ पर यक़ीन करने लगा। एक सुबह… गाँव वालों ने ज़र्राख को घेर लिया। कोई उसे धक्का दे रहा था।
कोई गालियाँ दे रहा था। कोई पत्थर मार रहा था। बेचारा ज़र्राख… बार-बार बस एक ही बात कह रहा था, “मैं बेगुनाह हूँ… मैंने कुछ नहीं किया…”
जिन्न का आखिरी अल्टीमेटम और अमावस्या की ललकार

लेकिन… उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। डर के मारे वह जंगल की ओर भागा।
गाँव वाले उसके पीछे दौड़ पड़े। कुछ दूर जाकर… गाँव वाले रुक गए। उन्होंने कहा, “अब रहने दो… इसे छोड़ दो।”
लेकिन… सलमा के चारों भाई नहीं रुके। वे जंगल के अंदर तक उसका पीछा करते रहे।
उन्होंने ज़र्राख को घेर लिया। पत्थरों से… लाठियों से… और लात-घूँसों से उसे मारते रहे।
ज़र्राख का पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया। वह ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी साँसें टूटने लगीं।
मरने से पहले… उसने काँपती आवाज़ में कहा, “सलमा… मेरे अलावा किसी और की नहीं हो सकती…” फिर उसने चारों भाइयों की तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में दर्द था। गुस्सा नहीं… सिर्फ़ दर्द।
वह बोला, “आज तुमने एक बेगुनाह को मारा है। याद रखना… एक दिन तुम्हारे हर ज़ुल्म का हिसाब होगा…”
उसने आख़िरी बार आसमान की तरफ़ देखा। फिर पूरे गाँव को सुनाते हुए कहा, “तुम सबने मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाया है।
अगर मैं तुम्हारी नज़र में गंदा हूँ… तो अब अपनी बेटियों को मुझसे बचाकर रखना…” इतना कहते ही… उसकी साँस हमेशा के लिए थम गई।
जंगल की नदी पर महासंग्राम और जल का प्रहार
सलमा को जब यह खबर मिली… तो उसकी दुनिया उजड़ गई। वह कई दिनों तक रोती रही। न खाना खाया… न किसी से बात की।
कुछ ही दिनों बाद… ग़म सहते-सहते सलमा भी इस दुनिया से चली गई। कमरे में बैठे सभी लोगों की आँखें भर आईं।
नूर फूट-फूटकर रोने लगी। Salim चाचा ने सिर पकड़ लिया।
हिना की आँखों से आँसू बहने लगे। सायरा ने चुपचाप दुपट्टे से अपना चेहरा ढक लिया। समीर की मुट्ठियाँ गुस्से से भींच गईं। फातिमा ने गहरी साँस ली।
फिर बोली, “लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई… ज़र्राख की अधूरी मोहब्बत… उसका दर्द… और उसके साथ हुआ अन्याय…
जंगल की एक शैतानी ताक़त ने अपने अंदर समेट लिया। उसी दिन उसकी बेचैन रूह ज़र्राख जिन्न बन गई।”
“जब वह लौटा… तब तक सलमा इस दुनिया में नहीं थी। उसके बाद से वह हर उस चेहरे में सलमा को ढूँढ़ने लगा… जो उसे उसकी याद दिलाता था।”
फातिमा ने नूर की ओर देखा। धीरे से बोली, “जब उसने तुम्हें देखा… तो उसे लगा कि उसकी सलमा लौट आई है।
इसलिए वह तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता… बल्कि तुम्हें हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहता है।”
यह सुनते ही… नूर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
वह बोली, “मैं सलमा नहीं हूँ… मैं अपने अब्बू जान को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी…” सलीम चाचा ने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया।
अब्दुल हकीम भाईजान ने आसमान की ओर देखा और बोले, “अब यह लड़ाई सिर्फ़ नूर की नहीं… पूरे नूराबाद की है।”
नूर को लेने आया जर्राख जिन्न उसके दरवाजे पर

पता ही नहीं चला… बातें करते-करते कब शाम ढल गई। धीरे-धीरे… पूरा गाँव अँधेरे में डूब गया। घर के बाहर ठंडी हवा चलने लगी।
अचानक… ठक… ठक… ठक… “नूर……” बाहर से फिर वही भारी आवाज़ गूँजी, “नूर…… बाहर आओ…” पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
हिना डर के मारे फातिमा से लिपट गई। सलीम चाचा ने नूर को अपने पीछे कर लिया। समीर ने दरवाज़े के सामने खड़े होकर लाठी कसकर पकड़ ली।
अब्दुल हकीम भाईजान ने धीरे से कहा, “कोई भी दरवाज़ा नहीं खोलेगा।” लेकिन… दरवाज़ा अपने-आप हिलने लगा। धड़ाम… धड़ाम… धड़ाम…
ऐसा लग रहा था… जैसे कोई बहुत ताकतवर चीज़ उसे तोड़ देना चाहती हो। बाहर तेज़ हवा चलने लगी।
काले बादलों ने पूरे नूराबाद को ढक लिया। अचानक… नूर की आँखें फिर बदलने लगीं।
वह धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ने लगी। वह बोली, “मुझे जाने दो… वह मेरा इंतज़ार कर रहे हैं…”
फातिमा तुरंत आगे बढ़ी। उन्होंने नूर का हाथ पकड़ लिया। फिर उसके सिर पर हाथ रखकर इबादत करने लगी।
कुछ ही पलों में… नूर फिर सामान्य हो गई। वह डरकर फातिमा से लिपट गई। तभी… फातिमा ने दरवाज़ा खोल दिया। सब लोग घबरा गए।
फ़ातिमा की इबादत से जर्राख को आया गुस्सा
बाहर… घना अँधेरा था। ठंडी हवा पूरे गाँव में घूम रही थी। दूर… आम के पेड़ के पास… एक बहुत लंबी काली आकृति खड़ी थी। उसकी आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं।
उसके लंबे-लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे। विशाल हाथ… बड़े-बड़े नाखून… और काला कुर्ता-पायजामा… वह ज़र्राख जिन्न था।
लेकिन… उसे साफ़-साफ़ केवल नूर ही देख पा रही थी। बाकी लोगों को… सिर्फ़ उसकी परछाईं… और ज़मीन पर बने उसके बहुत बड़े कदम दिखाई दे रहे थे।
फातिमा ने ऊँची आवाज़ में कहा, “ज़र्राख… यह सलमा नहीं है। अल्लाह के लिए इस बच्ची का पीछा छोड़ दो।”
कुछ पल तक… कोई आवाज़ नहीं आई। फिर अचानक… पूरा जंगल उसकी डरावनी हँसी से गूँज उठा, “हा… हा… हा…”
ज़र्राख बोला, “तुम नहीं समझोगी फातिमा… मैंने अपनी सलमा खोई थी… अब मैं अपनी नूर को कभी नहीं खोऊँगा…”
फातिमा ने तस्बीह हाथ में कसकर पकड़ ली। वह लगातार इबादत करती रहीं। अचानक… बहुत तेज़ आँधी चलने लगी।
पेड़ों की डालियाँ टूटकर गिरने लगीं। पूरे नूराबाद के लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए। सबकी नज़र… सलीम चाचा के घर की तरफ़ थी।
अब्दुल हकीम भाईजान ऊँची आवाज़ में बोले, “डरो मत! सब लोग अल्लाह का नाम लो!” पूरा गाँव एक साथ इबादत करने लगा।
जैसे-जैसे… लोग अल्लाह का नाम लेते गए… वैसे-वैसे… ज़र्राख जिन्न पीछे हटने लगा। उसकी आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।
वह गुस्से से गरजा, “आज तुम सब बच गए…
लेकिन याद रखना… कल अमावस्या की आख़िरी रात है… अगर नूर मेरी नहीं हुई… तो पूरे नूराबाद में कोई भी अपनी बेटी को नहीं बचा पाएगा…”
इतना कहकर… ज़र्राख जिन्न काले धुएँ में बदल गया। कुछ ही पलों में… वह घने जंगल के अँधेरे में गायब हो गया।
आँधी भी धीरे-धीरे रुक गई। लेकिन… पूरे गाँव के चेहरों पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
फातिमा ने आसमान की ओर देखा। फिर बोली, “कल की रात… हमारी ज़िंदगी की सबसे कठिन रात होगी।
अगर हमने हिम्मत हार दी… तो नूर ही नहीं, पूरा नूराबाद हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा।”
अमावस्या की रात और जंगल में अंतिम मुकाबला

सभी लोग खामोश खड़े थे। किसी की भी आँखों में नींद नहीं थी। सबको अब… अमावस्या की आख़िरी रात का इंतज़ार था।
“अब फैसला जंगल में होगा…” फातिमा की बात सुनते ही… अगली रात पूरा नूराबाद जाग रहा था।
हर आदमी के हाथ में मशाल थी। सलीम चाचा… फातिमा… अब्दुल हकीम भाईजान… समीर… सायरा… हिना… और गाँव के सैकड़ों लोग… सब जंगल की ओर चल पड़े।
घना जंगल बिल्कुल शांत था। सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। अचानक… तेज़ ठंडी हवा चलने लगी।
एक भयानक हँसी पूरे जंगल में गूँज उठी, “हा… हा… हा…” ज़र्राख जिन्न सामने आ चुका था।
उसकी लाल आँखें आग की तरह चमक रही थीं। उसने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाए।
अचानक… गाँव वालों के पैर ज़मीन में धँस गए। सबने बहुत कोशिश की। लेकिन… कोई भी एक कदम आगे नहीं बढ़ा सका। समीर पूरी ताकत लगाने लगा।
सलीम चाचा रोने लगे। फातिमा लगातार इबादत करती रहीं। लेकिन… नूर के कदम नहीं रुके। वह धीरे-धीरे… अकेली… ज़र्राख जिन्न की ओर बढ़ने लगी।
ज़र्राख बिना कुछ बोले मुड़ा। नूर उसके पीछे चलती रही। कुछ देर बाद… दोनों नदी के किनारे पहुँच गए।
चाँद की हल्की रोशनी पानी पर पड़ रही थी। कुछ पल… दोनों बिल्कुल चुप रहे। फिर ज़र्राख बोला, “तुम जानना चाहती हो… मैं ऐसा क्यों बन गया?”
नूर ने धीरे से सिर हिला दिया। ज़र्राख की आँखों से आँसू बह निकले। वह बोला, “जब मैं जिन्न बना… तब तक मेरी सलमा इस दुनिया से जा चुकी थी।
मैंने उसके चारों भाइयों से बदला लिया… एक-एक करके सबको मार दिया… लेकिन मेरा बदला भी मेरी सलमा को वापस नहीं ला सका…”
नूर की आँखें भी भर आईं। वह धीरे से बोली, “अगर तुम सच में सलमा से इतनी मोहब्बत करते थे…
तो फिर मुझसे मोहब्बत करके उसकी रूह को कितना दुख पहुँचा रहे हो?” यह सुनते ही… ज़र्राख जैसे पत्थर का हो गया।
उसकी आँखें फैल गईं। कुछ पल बाद… वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
उसकी दर्द भरी चीख पूरे जंगल में गूँज उठी। इतनी भयानक चीख… कि दूर खड़े गाँव वालों का दिल काँप उठा। पेड़ हिलने लगे। नदी का पानी उफनने लगा।
आसमान में बिजली चमक उठी। ज़र्राख ने रोते हुए कहा, “हाँ… सलमा की रूह को दुख ज़रूर पहुँच रहा होगा… लेकिन मेरी सदियों की प्यास कौन बुझाएगा?”
वह धीरे-धीरे नूर के पास आने लगा। उसकी आँखों में फिर वही जुनून लौट आया। वह बोला, “सिर्फ़ तुम, नूर… सिर्फ़ तुम…” नूर एक कदम पीछे हटी।
फिर उसने दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं सलमा नहीं हूँ… मैं अल्लाह की बंदी हूँ… और मेरा भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर है।”
उसे अचानक… फातिमा की बात याद आई। उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ… इबादत के जल की छोटी-सी शीशी रखी थी।
नूर ने मन ही मन “बिस्मिल्लाह…” पढ़ा। फिर पूरी ताकत से… वह शीशी ज़र्राख जिन्न की ओर उछाल दी।
छपाक…! जैसे ही इबादत का जल उसके शरीर पर पड़ा… ज़र्राख दर्द से ऐसी चीख मारकर तड़पा… कि पूरा जंगल काँप उठा।
उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा। आग जैसी लपटें उसके चारों ओर उठने लगीं। वह दर्द से ज़मीन पर गिर पड़ा।
इबादत के जल का असर और आत्माओं का मुक्ति-मिलन

लेकिन… अगले ही पल… वह पहले से भी ज़्यादा भयानक रूप लेकर खड़ा हो गया। उसकी गर्जना से पूरा जंगल थर्रा उठा।
दूर खड़े गाँव वालों के पैरों की पकड़ भी ढीली पड़ने लगी… और फातिमा तेज़ आवाज़ में बोलीं— “सब लोग आगे बढ़ो… आख़िरी समय आ गया है!”
फातिमा की आवाज़ पूरे जंगल में गूँज उठी। गाँव वालों के पैरों का बंधन टूट चुका था। सभी मशालें लेकर नदी की ओर दौड़ पड़े। ज़र्राख दर्द से तड़प रहा था।
उसके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था। वह ज़ोर-ज़ोर से चीख रहा था। उसकी चीखों से पूरा जंगल काँप रहा था।
नदी की लहरें ऊँची उठने लगीं। पेड़ों की टहनियाँ टूटकर गिरने लगीं। गुस्से में उसने एक हाथ घुमाया।
कुछ गाँव वाले हवा में उछलकर नदी में जा गिरे। समीर नूर की तरफ़ दौड़ा। लेकिन… ज़र्राख ने उसे भी दूर फेंक दिया। समीर ज़मीन पर गिर पड़ा।
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सलीम चाचा घबरा गए। सायरा रोने लगी। फातिमा बिना डरे आगे बढ़ीं।
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “ज़र्राख… अब इस दर्द को यहीं खत्म कर दो।” नूर की आँखों में आँसू थे।
वह बोली, “तुम्हारी सलमा तुम्हें मोहब्बत करती थी… किसी और की ज़िंदगी छीनने की इजाज़त कभी नहीं देती।”
यह सुनते ही… ज़र्राख की चीख अचानक रुक गई। उसका सिर झुक गया। धीरे-धीरे… उसका भयानक रूप मिटने लगा। काला धुआँ हवा में बिखर गया।
कुछ ही पलों बाद… सबके सामने वही सीधा-सादा नौजवान खड़ा था। ज़र्राख… जिसकी आँखों में अब न गुस्सा था… न नफ़रत… सिर्फ़ आँसू थे।
ज़र्राख रोते हुए नूर के सामने आया। उसने काँपते हाथ जोड़ दिए, “नूर… तुमने मुझे हराया नहीं… तुमने मुझे मेरे पाप से आज़ाद कर दिया।
अगर आज तुम मुझे सच का रास्ता न दिखाती… तो मैं हमेशा अँधेरे में भटकता रहता।”
इतना कहते ही… पूरा जंगल एक सफ़ेद रोशनी से भर गया। उस रोशनी में… एक शांत मुस्कुराता चेहरा दिखाई दिया। वह… सलमा थी।
सलमा ने ज़र्राख की ओर हाथ बढ़ाया। धीरे से बोली, “अब चलो… बहुत इंतज़ार हो गया।”
ज़र्राख की आँखों से आँसू बह निकले। उसने आख़िरी बार नूर की ओर देखा, “तुम्हारा एहसान मैं कभी नहीं भूलूँगा।”
दोनों मुस्कुराए। फिर धीरे-धीरे… वह रोशनी आसमान की ओर उठती चली गई।
कुछ ही पलों में… दोनों हमेशा के लिए ओझल हो गए। जंगल बिल्कुल शांत हो गया।
सभी गाँव वाले अपने घर लौटने लगे। सलीम चाचा ने नूर को गले लगा लिया। हिना खुशी के आँसू रो रही थी।
अब्दुल हकीम भाईजान ने फातिमा से कहा, “बहन… आज एक अधूरी कहानी पूरी हो गई।” फातिमा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा।
कुछ दूर चलने के बाद… नूर अचानक रुक गई। जिस जगह ज़र्राख खड़ा था… वहाँ एक छोटी-सी पोटली पड़ी थी।
नूर ने उसे उठाया। उसमें… कुछ चमकती हुई सोने की मोहरें थीं। उसी पल… हल्की-सी हवा चली।
नूर को ऐसा लगा… जैसे ज़र्राख की आवाज़ फिर सुनाई दी, “यह तुम्हारे लिए है, नूर… मुझे पता है… तुम्हारा परिवार बहुत गरीब है।
नेकी का बदला नेकी ही होती है।”
आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। नूर की आँखें भर आईं। उसने पोटली अपने सीने से लगा ली।
अंत में समीर और सायरा का प्यार
थोड़ी दूर… समीर और सायरा धीरे-धीरे साथ चल रहे थे।
समीर ने मुस्कुराकर कहा, “सायरा… आज मुझे समझ आया कि सच्ची मोहब्बत कभी किसी को छीनती नहीं… उसका साथ निभाती है।”
फिर उसने धीरे से सायरा का हाथ थाम लिया। सायरा शर्माकर मुस्कुरा दी। उसी समय… फातिमा की आवाज़ आई, “सायरा… बेटी, जल्दी आ जाओ।
रात बहुत हो गई है। समीर बेटा, आज तुम भी हमारे घर ही रुक जाना।” समीर ने मुस्कुराकर सिर झुका दिया।
सब लोग साथ-साथ गाँव की ओर चल पड़े। उस रात के बाद… नूराबाद में फिर कभी ज़र्राख जिन्न का साया नहीं देखा गया।
लेकिन गाँव के बुज़ुर्ग आज भी कहते हैं… “मोहब्बत अगर सच्ची हो, तो वह इंसान को रोशनी की ओर ले जाती है…
और अगर दर्द में भटक जाए, तो उसे सही रास्ता दिखाने के लिए एक नेक दिल का होना ज़रूरी है।”
____कहानी समाप्त____




