क्या ज़र्राख जिन्न सिर्फ नूर को ही क्यों दिखाई देता है? क्या गाँव की लड़कियों को छोड़ेगा ज़र्राख जिन्न?
नूराबाद गाँव में हर शाम एक नया डर जन्म लेने लगा है। लोग जंगल का नाम सुनते ही काँप उठते हैं।
समीर लकड़ियाँ लेने जंगल जाता है, जहाँ उसकी मुलाकात एक लंबे चौड़े खतरनाक मुसाफ़िर से होती है। उसका चेहरा इंसान जैसा है, लेकिन उसकी आँखें अजीब डर पैदा करती हैं।
फ़ातिमा की इबादत, अल्लाह का ताबीज़ और नूर की मासूमियत इस अँधेरे रहस्य से जुड़ने लगती है। हर दिन कोई नया संकेत पूरे गाँव को बेचैन कर देता है।
धीरे-धीरे ज़र्राख जिन्न की नज़र सिर्फ नूर पर टिकने लगती है। जंगल की खामोशी और रात की परछाइयाँ किसी बड़े खतरे का इशारा देती हैं।
क्या अल्लाह का ताबीज़ इस खतरनाक जिन्न की ताकत को रोक पाएगा? जानिए इस डरावनी कहानी में, ज़र्राख जिन्न और नूराबाद की इबादत।
भयानक जंगल और ज़र्राख जिन्न। Horror Story In Hindi
“बेटी नूर, क्या तुम जंगल अकेली जा रही हो?”
सलीम चाचा ने आँगन से आवाज़ लगाई। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। सुबह की धूप अभी हल्की ही थी।
नूर मुस्कुराकर बोली, “जी अब्बू जान। जल्दी लकड़ियाँ लेकर लौट आऊँगी। आप फ़िक्र मत कीजिए।”
इतने में पीछे से किसी ने हँसते हुए कहा, “अकेली कहाँ जाओगी? मैं भी चल रही हूँ।”
नूर ने पलटकर देखा। सामने उसकी चचेरी बहन सायरा खड़ी मुस्कुरा रही थी। सायरा, फातिमा की इकलौती बेटी थी। पूरे नूराबाद गाँव में उसकी सादगी और नेकदिल स्वभाव की चर्चा रहती थी।
नूर खुशी से बोली, “सायरा आपा, अच्छा हुआ आप आ गईं। रास्ते भर बातें भी होती रहेंगी।”
सायरा ने सिर हिलाया और बोली, “चलो, जल्दी चलते हैं। फिर अम्मी जान के साथ खाना भी बनाना है। दोपहर तक बाज़ार वाले आने लगेंगे।”
दोनों हाथ में रस्सी और कुल्हाड़ी लेकर जंगल की ओर चल पड़ीं।
रास्ते में मिट्टी की सँकरी पगडंडी थी। दोनों धीरे-धीरे चलते हुए हँसती-बोलती जा रही थीं। तभी सामने से एक गधा दिखाई दिया।
जंगल में समीर से मुलाकात

गधे की रस्सी पकड़े समीर चला आ रहा था। वह रोज़ जंगल से लकड़ियाँ लाता था। फिर वही लकड़ियाँ बाज़ार में बेचकर अपना गुज़ारा करता था।
नूर मुस्कुराकर बोली, “अस्सलामु अलैकुम, समीर भाईजान!”
समीर हँस पड़ा।
“वअलैकुम अस्सलाम… लेकिन मैं तुम्हारा भाईजान नहीं हूँ। मैं तो तुम्हारा जीजू हूँ।”
इतना सुनते ही सायरा ने आँखें बड़ी कर लीं।
“समीर! तुम बिल्कुल भी नहीं सुधरोगे। नूर अभी बच्ची है और तुम उसके सामने ऐसी बातें कर रहे हो?”
समीर हँसते हुए बोला, “अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था।”
नूर दोनों की बातें सुनकर खिलखिलाकर हँसने लगी।
तीनों अब साथ-साथ जंगल की ओर बढ़ने लगे।
कुछ दूर चलने के बाद समीर अचानक थोड़ा गंभीर हो गया।
समीर ने डराया जंगल के बारे में बताकर
उसने धीमी आवाज़ में कहा, “नूर… जंगल में ज़्यादा अंदर मत जाना।”
नूर ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”
समीर ने चारों तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोला, “सुना है, इस जंगल में ज़र्राख जिन्न रहता है। वह किसी भी इंसान का रूप ले सकता है। यह बात मुझे तुम्हारे अब्बू जान और गाँव के कई बुज़ुर्गों ने बताई है।”
नूर का चेहरा उतर गया। “सच में…?” उसने डरते हुए पूछा।
सायरा ने तुरंत नूर का हाथ पकड़ लिया।
“अरे, इसकी बातों पर ध्यान मत दो। यह तुम्हें डराने के लिए ऐसी बातें करता है।”
समीर मुस्कुराया।
“अच्छा बाबा, अब नहीं डराऊँगा। चलो, जल्दी लकड़ियाँ काटते हैं। सूरज सिर पर चढ़ने से पहले वापस भी लौटना है।”
तीनों जंगल के अंदर चले गए।
घने पेड़ों के बीच ठंडी हवा चल रही थी। पक्षियों की आवाज़ पूरे जंगल में गूँज रही थी। थोड़ी ही देर में तीनों ने मिलकर खूब सारी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कर लीं।
समीर ने भारी गट्ठर अपने गधे पर रख दिया।
सायरा और नूर ने भी अपने-अपने सिर पर लकड़ियों का छोटा गट्ठर रखा।
समीर ने मुस्कुराकर कहा, “चलो, अब घर चलते हैं। वरना फातिमा अम्मी जान मुझे ही डाँटेंगी कि मैं तुम दोनों को देर तक जंगल में घुमाता रहा।”
सायरा हँस पड़ी।
तीनों हँसते-बोलते वापस गाँव की ओर चल दिए…
फातिमा की रसोई और पुराना घर

घर पहुँचते ही नूर ने लकड़ियों का गट्ठर नीचे रखा और गहरी साँस ली।
उधर सायरा बिना देर किए अपनी अम्मी जान के घर चली गई।
फातिमा उस समय आँगन में बैठकर आटा गूँथ रही थीं। पास ही मिट्टी का चूल्हा तैयार था।
सायरा मुस्कुराकर बोली, “अम्मी जान, लकड़ियाँ आ गई हैं। आज बहुत अच्छी सूखी लकड़ियाँ मिली हैं।”
फातिमा ने प्यार से बेटी के सिर पर हाथ फेरा।
“अल्लाह का शुक्र है, बेटी। चलो, जल्दी चूल्हा जलाओ। थोड़ी देर में बाज़ार वाले खाना लेने आने लगेंगे।”
दोनों माँ-बेटी मिलकर काम में लग गईं। किसी ने आटा बेलना शुरू किया तो किसी ने सब्ज़ी चढ़ा दी।
कुछ ही देर में पूरे आँगन में गरम रोटियों और सब्ज़ी की खुशबू फैल गई।
दोपहर होते-होते बाज़ार से लोग आने लगे।
एक मज़दूर बोला, “फातिमा बहन, आज चार रोटियाँ और सब्ज़ी दे दीजिए। सुबह से कुछ नहीं खाया।”
फातिमा मुस्कुराईं।
“बैठ जाइए भाईजान। अभी गरम-गरम रोटियाँ देती हूँ।”
इतने में एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे चलता हुआ आया।
उसने शर्माते हुए कहा, “बहन… आज मेरे पास पैसे नहीं हैं। अगर मुमकिन हो तो थोड़ा खाना दे दीजिए।”
फातिमा ने बिना एक पल सोचे थाली भर दी।
“रिज़्क देने वाला अल्लाह है। आप आराम से खाइए। पैसों की फ़िक्र मत कीजिए।”
बूढ़े आदमी की आँखें भर आईं। सायरा यह सब देखकर मुस्कुरा रही थी। उसे अपनी अम्मी जान पर हमेशा फ़ख्र होता था।
समीर का इंतज़ार
उधर समीर बाज़ार में लकड़ियाँ बेच रहा था। काम ख़त्म होते ही वह हमेशा की तरह फातिमा के घर की ओर चल पड़ा।
सायरा ने उसे देखते ही मिट्टी के घड़े से ठंडा पानी भरकर दिया।
समीर मुस्कुराकर बोला, “आज तो बहुत प्यास लगी थी। अल्लाह तुम्हें हमेशा खुश रखे।”
सायरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “दुआ देने में तुम्हारा कोई जवाब नहीं। अब जल्दी खाना खा लो।”
समीर बैठ गया। फातिमा ने अपने हाथों से उसके सामने गरम रोटियाँ और सब्ज़ी रख दी।
समीर खाते-खाते बोला, “अम्मी जान… आपके हाथों के खाने जैसा स्वाद पूरे इलाके में कहीं नहीं मिलता।”
फातिमा हँस पड़ीं। “हर रोज़ यही कहते हो।”
सायरा भी हँसी रोक नहीं पाई। समीर चोरी-चोरी एक नज़र सायरा की तरफ़ देख रहा था।
सायरा भी उसे देखती, लेकिन जैसे ही समीर की नज़र मिलती, वह तुरंत अपनी आँखें झुका लेती।
फातिमा दोनों की यह मासूम झिझक देख रही थीं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हल्की-सी मुस्कान उनके चेहरे पर आ गई।
शाम होते ही ज़र्राख जिन्न का डर

धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा। बाज़ार की दुकानें बंद होने लगीं।
लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों की ओर जाने लगे। तभी मस्जिद से ईशा की अज़ान की आवाज़ गूँज उठी।
उसी समय गली में एक बुज़ुर्ग ऊँची आवाज़ में बोले,
“जल्दी घर पहुँच जाओ… रात हो गई है। कोई भी अपनी बेटियों को बाहर मत रहने देना। ज़र्राख जिन्न का वक़्त शुरू होने वाला है।”
यह सुनते ही कई औरतों ने अपने बच्चों का हाथ कसकर पकड़ लिया।
नूर भी अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी यह सब सुन रही थी।
उसने घबराकर सलीम चाचा से पूछा, “अब्बू जान… क्या सचमुच ज़र्राख जिन्न रात को निकलता है?”
सलीम चाचा कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने गहरी साँस ली और बोले,
“बेटी… कुछ बातें जितनी कम जानो, उतना अच्छा है। मगर आज से याद रखना… सूरज ढलने के बाद अगर कोई अनजान आदमी तुम्हें मुस्कुराकर बुलाए, तो कभी उसके साथ मत जाना…”
सलीम चाचा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि… घर के बाहर किसी ने बहुत धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
ठक… ठक… ठक…
सलीम चाचा और नूर एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
आधी रात को दरवाजे पर कौन
“रात अभी शुरू ही हुई थी… घर के बाहर किसी ने बहुत धीरे से दरवाज़ा खटखटाया। ठक… ठक… ठक…”
नूर डरकर सलीम चाचा के पीछे छिप गई। हिना भी घबराकर अपनी बड़ी बहन का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई।
सलीम चाचा ने हिम्मत करके पूछा, “कौन है?”
बाहर से आवाज़ आई, “चाचा जान… मैं करीम हूँ। दरवाज़ा खोलिए।”
सलीम चाचा ने धीरे से दरवाज़ा खोला। सामने पड़ोसी करीम खड़े थे। उनके चेहरे पर घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
उन्होंने जल्दी से कहा, “चाचा जान, आज रात जंगल की तरफ़ कोई मत जाना। अभी थोड़ी देर पहले अजीब सी आवाज़ें सुनाई दी थीं।”
सलीम चाचा ने सिर हिलाया।
“अल्लाह सबकी हिफ़ाज़त करे। तुम भी जल्दी अपने घर जाओ।”
करीम चले गए। मगर उनके जाने के बाद भी घर के अंदर अजीब सी ख़ामोशी छाई रही।
समीर की जंगल जाने की मजबूरी

उधर समीर अपने आँगन में बैठा लकड़ियों का हिसाब देख रहा था।
तभी बाज़ार का एक आदमी उसके पास आया।
वह बोला, “समीर, सुबह-सुबह मेहमान आने वाले हैं। मुझे ज़्यादा लकड़ियाँ चाहिए। अगर आज रात ही ले आओगे, तो अच्छा दाम दूँगा।”
समीर कुछ देर सोचता रहा।
सायरा की बात उसे याद थी।
फातिमा की नसीहत भी याद थी।
लेकिन पैसों की ज़रूरत भी थी।
उसने अपने गधे की रस्सी पकड़ी और धीरे-धीरे जंगल की ओर चल पड़ा।
रात गहरी होती जा रही थी।
आसमान पर बादल छा गए थे। जंगल में अजीब सा सन्नाटा था। सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
समीर जल्दी-जल्दी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करने लगा।
अचानक उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।
वह पलटा। मगर वहाँ कोई नहीं था। उसने फिर लकड़ियाँ उठानी शुरू कीं।
तभी पीछे से एक धीमी आवाज़ आई।
“इतनी रात को जंगल में क्या कर रहे हो…?”
समीर ने चौंककर पीछे देखा। एक लंबा आदमी पेड़ के पास खड़ा था। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
कपड़े बिल्कुल साधारण थे।
समीर बोला, “लकड़ियाँ लेने आया हूँ। तुम कौन हो?” वह आदमी धीरे से हँसा।
“मैं भी यहीं रहता हूँ। जंगल मेरा घर है।”
समीर को उसकी बात अजीब लगी।
उसने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?” आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर उसकी नज़र समीर के गले में पड़े ताबीज़ पर टिक गई।
अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
वह एक कदम आगे बढ़ना चाहता था… मगर जैसे किसी ने उसे रोक लिया हो। उसने फिर कोशिश की।
लेकिन इस बार भी वह समीर के पास नहीं आ सका।
उसकी आँखों में गुस्सा और बेचैनी साफ़ दिखाई देने लगी।
समीर को कुछ समझ नहीं आया।
वह बोला, “क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?” आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह बस ताबीज़ को घूरता रहा। अगले ही पल उसका शरीर धीरे-धीरे पहले से ज़्यादा लंबा दिखाई देने लगा।
उसके कंधे चौड़े होते गए।
समीर की साँसें तेज़ हो गईं।
उसके हाथ काँपने लगे।
आदमी ने एक अजीब सी आवाज़ निकाली। फिर बिजली की रफ़्तार से जंगल के गहरे अँधेरे में गायब हो गया।
समीर के पूरे शरीर से पसीना बहने लगा।
उसने बिना देर किए जितनी लकड़ियाँ उठ सकती थीं, गधे पर रखीं और पूरी ताक़त से नूराबाद गाँव की ओर दौड़ पड़ा।
समीर ने खाई फातिमा की कसम

समीर सीधे फातिमा के घर पहुँचा।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
सायरा उसे देखकर घबरा गई।
“समीर! क्या हुआ? तुम्हारा चेहरा इतना सफ़ेद क्यों पड़ गया?” समीर कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया।
फातिमा ने उसे बैठाया। उसे पानी पिलाया। कुछ देर बाद समीर ने जंगल की पूरी बात बता दी।
फातिमा का चेहरा एकदम गंभीर हो गया।
उन्होंने कोई सवाल नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ इतना पूछा,
“बेटा… क्या वह बार-बार तुम्हारे गले के ताबीज़ को देख रहा था?”
समीर ने हैरानी से कहा, “जी… अम्मी जान। वह मेरे पास आना चाहता था, मगर जैसे कोई चीज़ उसे रोक रही थी।”
फातिमा ने गहरी साँस ली। उन्होंने समीर के दोनों कंधों पर हाथ रखा।
फिर बोलीं, “मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि सूरज ढलने के बाद जंगल मत जाना। बेटा, आज के बाद मेरी कसम… कभी रात में जंगल नहीं जाओगे।”
समीर की आँखें भर आईं। उसने सिर झुकाकर कहा,
“मैं कसम खाता हूँ, अम्मी जान। आज के बाद रात में कभी जंगल नहीं जाऊँगा।”
फातिमा ने उसे अपने गले से लगा लिया।
सायरा चुपचाप यह सब देख रही थी। उसकी आँखों में भी आँसू आ चुके थे।
उसी समय फातिमा की नज़र समीर के ताबीज़ पर पड़ी।
उन्होंने आसमान की ओर देखा। उनके होंठ काँप रहे थे।
समीर के पूछने पर भी फातिमा क्यों चुप रही
उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा— “या अल्लाह… क्या वह फिर लौट आया…?”
फातिमा की धीमी आवाज़ सुनकर समीर और सायरा दोनों उनकी ओर देखने लगे। कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।
समीर ने धीरे से पूछा, “अम्मी जान, आप किसकी बात कर रही हैं? जंगल में आखिर कौन रहता है?”
फातिमा ने गहरी साँस ली। उनकी आँखों में पुराने दिनों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
वह बोलीं, “बच्चों, जंगल के उस शैतान की बात बहुत खतरनाक और बहुत पुरानी है। वह दर्द मैं आज तक नहीं भूल सकी।”
उन्होंने कुछ पल चुप रहकर फिर कहा, “लेकिन आज मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकती। सही समय आने पर सब सच बता दूँगी।”
सायरा और समीर ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों समझ गए कि फातिमा कोई बहुत बड़ा राज़ अपने दिल में छिपाए बैठी हैं।
रात काफ़ी हो चुकी थी।
फातिमा बोलीं, “समीर बेटा, आज तुम अपने घर नहीं जाओगे। आज की रात यहीं हमारे घर ठहरो।”
समीर ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
सायरा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसे यह बात सुनकर बहुत खुशी हुई।
वह जल्दी से रसोई में चली गई। फातिमा भी उसके साथ खाना बनाने लगीं।
कुछ ही देर में गरम रोटियाँ और सब्ज़ी तैयार हो गई। सायरा ने अपने हाथों से समीर की थाली में रोटियाँ रखीं।
समीर मुस्कराकर बोला, “इतना स्वादिष्ट खाना तो मुझे कहीं नहीं मिलता।” सायरा हल्का सा मुस्कुरा दी।
फातिमा दोनों को देखकर दुआ करने लगीं।
तीनों ने साथ बैठकर खाना खाया। खाना खाते हुए उन्होंने गाँव की छोटी-छोटी बातें कीं।
कुछ देर बाद सब अपने-अपने बिस्तर पर सो गए।
फ़ातिमा की दया और सलीम चाचा का दुख
सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद फातिमा ने सायरा को आवाज़ दी।
उन्होंने चार गरम रोटियाँ और मिर्च-टमाटर की चटनी एक साफ़ कपड़े में बाँध दी।
सायरा सब समझ गई। उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।
फातिमा ने हमेशा उससे कहा था, “बेटी, जब तक हमारे घर में रोटी बनेगी, उससे पहले नूर के घर खाना ज़रूर पहुँचेगा।”
कई दिन पहले फातिमा ने अपने देवर सलीम चाचा को कहते सुना था,
“या अल्लाह… मैं अपने बच्चों का पेट कैसे भरूँ?”
उस दिन उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। उसी दिन उन्होंने फैसला किया था कि नूर और हिना कभी भूखे नहीं सोएँगे।
आज भी वही नियम चल रहा था।
सायरा खाना लेकर चल पड़ी।
समीर भी उसके साथ हो लिया।
दोनों सलीम चाचा के घर पहुँचे।
रोटी से बड़ा रिश्ता
घर के अंदर सलीम चाचा इबादत कर रहे थे।
वह रोते हुए दुआ माँग रहे थे।
“या अल्लाह… मेरी मदद कर। मैं अपने बच्चों की परवरिश कैसे करूँ?”
यह सुनकर समीर और सायरा की आँखें नम हो गईं।
सायरा ने जल्दी से अपने आँसू पोंछे।
फिर मुस्कराकर बोली, “अरे नूर… हिना… जल्दी बाहर आओ। देखो, मैं गरम-गरम खाना लेकर आई हूँ।”
नूर और हिना दौड़ते हुए बाहर आ गईं।
सलीम चाचा भी इबादत पूरी करके बाहर आ गए।
उन्होंने खाने की गठरी देखी तो उनकी आँखें भर आईं।
समीर उनके पास बैठ गया।
वह बोला, “चाचा जान, आपका अपना बेटा नहीं है तो क्या हुआ? आज से मुझे अपना बेटा समझिए।”
“मैं ज़्यादा नहीं कमाता, लेकिन जितना होगा, उसमें आपका भी हिस्सा रहेगा।”
सलीम चाचा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।
वह बोले, “नहीं बेटा… तुम कब तक हमारी मदद करोगे?”
इतने में सायरा मुस्कराकर बोली, “पहले सब लोग खाना खाइए। बाकी बातें बाद में भी हो जाएँगी।”
सब लोग साथ बैठकर खाना खाने लगे।
खाना खाते-खाते सलीम चाचा धीरे से बोले,
“बेटी सायरा, शाम के बाद जंगल मत जाना। कल भी किसी ने कहा था कि वहाँ किसी शैतान जैसी आवाज़ सुनाई दी थी।”
यह सुनते ही सायरा ने एक पल के लिए समीर की ओर देखा।
समीर चुपचाप बैठा रहा।
फिर सायरा बोली, “चाचा जान… कल रात समीर का भी जंगल में एक अजीब आदमी से सामना हुआ था। वह उसके गले के ताबीज़ को देखकर बेचैन हो गया और अचानक अँधेरे में गायब हो गया।”
यह सुनते ही सलीम चाचा के हाथ से रोटी का टुकड़ा नीचे गिर पड़ा।
उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
उन्होंने काँपती आवाज़ में सिर्फ़ एक शब्द कहा—
“…ज़र्राख!”
सलीम चाचा के मुँह से यह नाम निकलते ही घर के अंदर सन्नाटा छा गया। उनकी आँखों में साफ़ डर दिखाई दे रहा था।
नूर घबराकर अपने अब्बा के पास आकर खड़ी हो गई। उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “अब्बा जान… यह ज़र्राख कौन है?”
सलीम चाचा कुछ पल तक चुप रहे।
उन्होंने नूर के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, यह बात बहुत पुरानी है। अभी तुम छोटी हो। सही समय आने पर सब बता दूँगा।”
उन्होंने गहरी साँस ली।
“बस इतना समझ लो कि उस शैतान का नाम सुनकर आज भी इस नूराबाद गाँव के पुराने लोगों की रूह काँप उठती है।”
इतना कहकर उन्होंने वहीं बात रोक दी।
सायरा समझ गई कि सलीम चाचा अभी कुछ और नहीं बताना चाहते।
वह मुस्कराकर बोली, “चाचा जान, अब मैं चलती हूँ। घर का खाना भी बनाना है और बाज़ार के लिए भी लोग सुबह ही कह गए थे कि आज जल्दी खाना चाहिए।”
समीर भी उठ खड़ा हुआ।
“चाचा जान, मैं भी चलता हूँ। मुझे लकड़ियाँ लेकर बाज़ार जाना है। रात को जल्दी लौट आया था, इसलिए कम लकड़ियाँ ला पाया।”
सायरा को अचानक कुछ याद आया।
उसने अपनी ओढ़नी के कोने से कुछ सिक्के निकाले।
“अरे समीर, अम्मी जान ने मुझे लकड़ियों के पैसे दिए थे। मैं तुम्हें देना ही भूल गई थी।”
समीर मुस्कराया।
उसने रात वाली सूखी लकड़ियाँ सायरा को दे दीं।
बाद में जंगल से थोड़ी और लकड़ियाँ लाकर उसने उनमें से एक छोटा गट्ठर नूर के घर भी रख दिया।
सलीम चाचा ने उसे दुआएँ दीं।
शबनम का रहस्य

घर लौटते ही फातिमा और सायरा बाज़ार के लिए खाना बनाने में लग गईं।
रोटियाँ सिकने लगीं। सब्ज़ी की खुशबू पूरे आँगन में फैल गई।
दोपहर बीतते ही लोग एक-एक करके खाना लेने आने लगे।
शाम के करीब चार बजे एक बुज़ुर्ग आदमी धीरे-धीरे उनके घर पहुँचा।
आज उसके चेहरे पर पहले जैसी मुस्कान नहीं थी।
फातिमा ने चिंता से पूछा, “क्या बात है भाईजान? आज आप बहुत उदास लग रहे हैं।”
बुज़ुर्ग की आँखें भर आईं।
वह धीमी आवाज़ में बोला, “बहन… मेरी बेटी शबनम को गायब हुए पूरे बीस दिन हो गए।”
सायरा के हाथ रुक गए।
बुज़ुर्ग आगे बोला, “वह अपनी एक सहेली के साथ जंगल की नदी से पानी भरने गई थी।”
“सांझ होने लगी थी। मेरी बेटी घड़ा भर रही थी। उसकी सहेली ने बस एक पल के लिए पीछे देखा…”
वह बोलते-बोलते रो पड़ा। “जब उसने दोबारा सामने देखा… शबनम वहाँ थी ही नहीं।” “हमने पूरा जंगल छान मारा।
नदी के किनारे भी खोजा। लेकिन आज तक उसका कोई पता नहीं चला।”
यह सुनते ही फातिमा और सायरा की रूह काँप उठी।
दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं। फातिमा ने चुपचाप खाने का डिब्बा उस बुज़ुर्ग के हाथ में रख दिया।
बुज़ुर्ग ने दुआ दी और आँसू पोंछते हुए वहाँ से चला गया।
नूराबाद गाँव की चिंता
रात धीरे-धीरे उतर आई।
दिनभर की भागदौड़ के बाद फातिमा और सायरा घर के बाहर चारपाई पर बैठी थीं।
आसमान में चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था।
चारों ओर अजीब सा सन्नाटा फैला हुआ था।
फातिमा की आँखों के सामने बार-बार शबनम के पिता का उदास चेहरा घूम रहा था।
सायरा ने धीरे से पूछा, “अम्मी जान… क्या हुआ? आप इतनी उदास क्यों हैं?”
फातिमा ने गहरी साँस ली।
उन्होंने दूर अँधेरे में डूबे नूराबाद गाँव की ओर देखा।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोलीं, “कुछ नहीं बेटी… बस यही सोच रही हूँ कि पता नहीं इस नूराबाद गाँव का क्या होगा… और यहाँ रहने वाले लोगों का क्या होगा।
आखिर कब सब कुछ पहले जैसा होगा…”
सायरा ने अपनी अम्मी जान का हाथ पकड़ लिया। वह धीरे से बोली, “अम्मी जान… क्या इस सबके पीछे वही जंगल वाला शैतान है?”
फातिमा कुछ देर तक चुप बैठी रहीं।
फिर उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “हाँ बेटी… लोग उसे ज़र्राख कहते हैं। लेकिन वह कोई साधारण शैतान नहीं है। उसकी कहानी बहुत पुरानी और बहुत दर्द भरी है।”
सायरा ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी।
फातिमा फिर बोलीं, “कई साल पहले भी इस नूराबाद गाँव के लोग उसके नाम से काँपते थे। शाम ढलते ही कोई अपनी बेटी को घर से बाहर नहीं निकलने देता था।”
इतना सुनते ही सायरा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी आँखों में डर साफ़ दिखाई देने लगा।
फातिमा ने यह देखा तो तुरंत बात रोक दी। वह मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोलीं,
“बस बेटी… आज के लिए इतना ही। बाकी बातें फिर कभी बताऊँगी। अब चलो, सो जाते हैं। सुबह बहुत काम है।”
सायरा कुछ कहना चाहती थी। लेकिन फातिमा उठकर घर के अंदर चली गईं।
सायरा हैरानी से उन्हें देखती रह गई।
उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था। आख़िर अम्मी जान पूरी बात क्यों नहीं बतातीं? उस रात दोनों जल्दी सो गईं।
नदी किनारे अजीब एहसास

अगली सुबह सायरा, नूर और हिना पानी भरने नदी की ओर गईं।
तीनों ने अपने-अपने घड़े भर लिए। फिर एक बड़े पेड़ के नीचे रखे पत्थर पर बैठ गईं।
सायरा अपने साथ रोटियाँ लाई थी।
उसने कपड़ा खोला। उसमें रोटियाँ और कांदा-मिर्ची का अचार रखा था।
तीनों हँसते हुए खाना खाने लगीं। खाना खाते-खाते नूर अचानक चुप हो गई।
उसकी नज़र जंगल की ओर चली गई।
वह धीरे से बोली, “सायरा आपा… उधर देखो। मुझे लगता है कोई हमें छिपकर देख रहा है।”
सायरा ने तुरंत उस दिशा में देखा। घने पेड़ों के बीच सचमुच कोई खड़ा दिखाई दे रहा था।
चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।
बस ऐसा लग रहा था कि कोई बिना हिले उन्हें देख रहा है। उसी पल सायरा को शबनम के अब्बू की बात याद आ गई।
फिर उसे रात वाली फातिमा की बातें भी याद आने लगीं।
उसने बिना देर किए घड़ा उठाया।
“चलो… अभी चलते हैं।” नूर और हिना कुछ समझ नहीं पाईं। लेकिन दोनों सायरा के साथ चल पड़ीं।
तीनों की गायब हुई परछाइयाँ
तीनों तेज़ कदमों से नूराबाद गाँव की ओर लौट रही थीं। सायरा बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।
अचानक उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी। उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
उसे अपनी, नूर और हिना… तीनों में से किसी की भी परछाई दिखाई नहीं दे रही थी। सायरा की साँसें तेज़ हो गईं।
वह कुछ बोलना चाहती थी। लेकिन उसके होंठ जैसे बंद हो गए।
नूर और हिना बिना कुछ जाने आगे बढ़ती रहीं।
कुछ दूर चलने के बाद जैसे ही तीनों नूराबाद गाँव की सीमा के पास पहुँचीं…
अचानक उनकी परछाइयाँ फिर से ज़मीन पर दिखाई देने लगीं।
सायरा बुरी तरह घबरा गई। उसके हाथ से पानी का घड़ा छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
घड़ा टूट गया। नूर और हिना घबराकर उसकी ओर देखने लगीं। सायरा ने कुछ नहीं कहा।
वह दोनों को लेकर तेज़ी से गाँव के अंदर चली गई।
उसे पता नहीं था कि घने जंगल के पीछे खड़ा ज़र्राख जिन्न उन तीनों को देख रहा था।
लेकिन उसकी नज़र सिर्फ़… नूर पर थी।
ताबीज़ की ज़रूरत

सायरा ने पहले नूर और हिना को उनके घर छोड़ा।
फिर वह भागती हुई अपने घर पहुँची।
फातिमा ने उसे घबराया हुआ देखा तो तुरंत उसके पास आ गईं।
सायरा ने नदी किनारे हुई पूरी घटना बता दी।
उसने गायब परछाइयों की बात भी बताई।
यह सुनते ही फातिमा ने सायरा को अपने सीने से लगा लिया।
वह बोलीं, “बेटी… याद रखना। यह ताबीज़ कभी अपने गले से मत उतारना। चाहे कुछ भी हो जाए।”
सायरा ने सिर हिलाया। फातिमा कुछ देर सोचती रहीं।
फिर बोलीं, “मुझे नूर और हिना के लिए भी ताबीज़ बनवाने होंगे। दो दिन में तैयार हो जाएँगे। उसके बाद मैं खुद उनके गले में पहनाऊँगी।”
लेकिन किसे पता था… कि उन दो दिनों का इंतज़ार नूर की किस्मत में लिखा ही नहीं था।
उसी शाम सलीम चाचा किसी काम से बाज़ार चले गए।
हिना घर की सफ़ाई करने लगी। नूर ने रसोई में झाँककर देखा।
घर में जलाने के लिए एक भी लकड़ी नहीं बची थी।
वह धीरे से बोली, “अगर अब्बू जान लौट आए और लकड़ियाँ ही न हों, तो खाना कैसे बनेगा?”
उसने कुल्हाड़ी उठाई।
हिना से कहा, “मैं जल्दी से जंगल से लकड़ियाँ लेकर आती हूँ। अब्बू जान के आने से पहले वापस आ जाऊँगी।”
“इतना कहकर नूर अकेली जंगल की ओर चल पड़ी…”
नूर तेज़ कदमों से जंगल की ओर जा रही थी। रास्ते में गाँव के अब्दुल भाईजान मिल गए।
उन्होंने नूर को देखकर कहा, “अरे बेटी, इस समय जंगल जा रही हो? जल्दी वापस आ जाना। तुम्हें पता है ना, सांझ के बाद जंगल ठीक नहीं रहता।”
नूर भोलेपन से मुस्कराई।
“क्या पता है, अब्दुल भाईजान?” अब्दुल भाईजान कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले, “बस मेरी बात मानो और सूरज ढलने से पहले लौट आना।”
नूर ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। सोलह साल की नूर जितनी सुंदर थी, उतनी ही भोली भी थी।
नूर को मिला जंगल में ज़र्राख जिन्न

कुछ ही देर में उसने सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कर लीं।
लेकिन उसे बिल्कुल पता नहीं था… कि कोई दूर खड़ा उसे लगातार देख रहा था।
वह बस सूरज ढलने का इंतज़ार कर रहा था।
जैसे ही सूरज की आख़िरी किरण पेड़ों के पीछे छिपी…
नूर के कानों में एक आवाज़ गूँजी।
“क्या तुम नूर हो?” नूर चौंककर पीछे मुड़ी। उसके सामने एक बहुत सुंदर और सभ्य दिखने वाला मुसाफ़िर खड़ा था।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
वह बोला, “मैं तुम्हारे अब्बू जान, सलीम चाचा को जानता हूँ। वह बहुत नेक इंसान हैं।”
असल में… वह कोई मुसाफ़िर नहीं था।
वह ज़र्राख जिन्न था।
उसने एक सुंदर इंसान का रूप धारण कर लिया था।
अजीब बात यह थी कि… उसकी आवाज़ और उसका रूप केवल नूर को ही दिखाई और सुनाई दे रहा था।
अगर उस समय वहाँ कोई और होता… तो उसे वहाँ कोई दिखाई नहीं देता।
नूर ने पूछा, “आप कौन हैं?”
वह मुस्कराकर बोला, “मैं एक मुसाफ़िर हूँ। रास्ता भटक गया हूँ। सुबह से कुछ नहीं खाया।
अगर तुम मुझे अपने घर ले जाकर थोड़ा खाना खिला दो, तो मैं यह एहसान कभी नहीं भूलूँगा।”
नूर ने मासूमियत से कहा,
“हमारे घर में तो खुद बहुत कम खाना होता है। कभी सुबह खा लेते हैं तो रात नहीं खा पाते, और कभी रात को खा लेते हैं तो सुबह की फ़िक्र रहती है।”
यह सुनकर उस मुसाफ़िर की आँखें भर आईं।
कुछ पल के लिए उसके भीतर का पुराना इंसान जाग उठा।
जिन्न बनने से पहले वह भी ऐसा ही इंसान था, जो दूसरों की मदद करता था।
वह धीरे से बोला, “मैं बहुत अमीर आदमी हूँ। लेकिन रास्ता भटक गया हूँ। अगर आज खाना नहीं मिला, तो शायद भूख से यहीं गिर पड़ूँ।”
नूर को उस पर दया आ गई।
वह बोली, “मेरे अब्बू जान हमेशा कहते हैं कि भूखे इंसान को खाना ज़रूर खिलाना चाहिए, चाहे हमें खुद कम खाना मिले।”
यह सुनते ही उस मुसाफ़िर की आँखों से आँसू निकल आए।
वह कुछ पल तक नूर को देखता रहा।
फिर नूर बोली, “आइए… मेरे साथ घर चलिए।”
उसे क्या पता था… कि उसने अपने घर एक ऐसे मेहमान को बुला लिया है।
जिसका रहस्य पूरे नूराबाद गाँव को हिला सकता था।
नूर उस अदृश्य जिन्न को ले आई घर
नूर मुसाफ़िर को लेकर घर पहुँची।
सलीम चाचा भी बाज़ार से लौट चुके थे।
नूर खुश होकर बोली,
“अब्बू जान, देखिए! यह मुसाफ़िर जंगल में रास्ता भटक गए थे। मैंने इन्हें खाने के लिए घर बुला लिया है।”
सलीम चाचा ने हैरानी से इधर-उधर देखा। उन्हें वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया।
उन्होंने पूछा, “बेटी… कौन मुसाफ़िर?”
नूर मुस्कराकर बोली, “यही तो खड़े हैं।”
सलीम चाचा और हिना ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों को वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
नूर ने सोचा शायद दोनों मज़ाक कर रहे हैं।
वह रसोई में चली गई। उसने रोटियाँ बनानी शुरू कर दीं।
कुछ देर बाद उसने रसोई में नज़र डाली…
तो वह दंग रह गई। जहाँ थोड़ी देर पहले आटा, दाल और चावल लगभग ख़त्म थे…
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वहाँ अब सब कुछ भरा हुआ था।
नूर खुशी से दौड़ती हुई बाहर आई।
“अब्बू जान! देखिए… रसोई में आटा, दाल और चावल अपने आप भर गए!”
सलीम चाचा भागकर अंदर गए।
उन्होंने देखा… सचमुच सब कुछ भरा पड़ा था।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
ज़र्राख जिन्न ने नूर को दी सोने की मोहर

नूर बार-बार उस मुसाफ़िर की थाली में रोटियाँ रखती जा रही थी।
एक…
दो…
पाँच…
दस…
पंद्रह…
बीस…
लेकिन उसकी भूख खत्म ही नहीं हो रही थी।
नूर थककर हँसते हुए बोली,
“आप कितना खाते हैं?”
मुसाफ़िर मुस्कराया।
“मेरी भूख बहुत बड़ी है।”
तभी सलीम चाचा ने देखा… थाली में रखी रोटियाँ अपने-आप ऊपर उठतीं… और देखते ही देखते गायब हो जातीं।
उनके हाथ काँपने लगे।
उन्होंने नूर को एक तरफ बुलाया।
धीमी आवाज़ में बोले, “बेटी… जिससे तुम बात कर रही हो… हमें वह बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा।”
हिना भी डरते हुए बोली, “आपा… मुझे भी वहाँ कोई नहीं दिख रहा।”
यह सुनते ही नूर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
तभी मुसाफ़िर उठ खड़ा हुआ।
वह बोला, “अब मुझे नींद आ रही है। थोड़ा आराम कर लूँ?”
नूर ने चुपचाप सिर हिला दिया।
अंदर जाने से पहले उसने अपनी मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली में चमकती हुई एक सोने की मोहर थी।
उसने वह मोहर नूर के हाथ पर रख दी।
इस बार… वह मोहर सलीम चाचा को भी दिखाई दे रही थी।
हिना भी उसे साफ़ देख रही थी।
सलीम चाचा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उन्हें यक़ीन हो गया… यह कोई साधारण इंसान नहीं हो सकता।
मुसाफ़िर अंदर जाने लगा।
दरवाज़े पर रुककर उसने बिना पीछे देखे धीमी आवाज़ में कहा, “नूर… डरना मत। दुनिया मुझे चाहे जैसा समझे… लेकिन तुम्हें देखकर मुझे किसी की याद आ गई…”
इतना कहकर वह अंदर चला गया।
नूर के हाथ में अब भी सोने की मोहर थी। सलीम चाचा, हिना और नूर… तीनों की आँखों से नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
भाग 1 समाप्त
अब अगले भाग में क्या होगा? क्या कयामत आने वाली है? क्या नूर को ले जाएगा ज़र्राख जिन्न अपने साथ?




