क्या होगा अगर किसी गांव के लोग अचानक पुतलों की तरह व्यवहार करने लगें? क्या होगा अगर रात के अंधेरे में नदी किनारे कोई खूबसूरत औरत आपका नाम लेकर पुकारे और उसकी आवाज सुनते ही आपके कदम अपने आप उसकी तरफ बढ़ने लगें?
क्या होगा अगर उस औरत का संबंध गांव के उस पुराने मंदिर से हो, जहां कई साल पहले एक गरीब युवक को सिर्फ उसकी जाति के कारण मौत के घाट उतार दिया गया था?
आज की यह कहानी उसी डरावने रहस्य की है, जहां पुराना श्राप, अधूरा दर्द, अन्याय और बदले की आग मिलकर पूरे गांव को डर के साए में ले आती है।
चंद्रपुर नाम का एक छोटा सा गांव चारों तरफ से जंगल और नदी से घिरा हुआ था। दिन में यह गांव बहुत शांत दिखाई देता था, लेकिन रात होते ही यहां का माहौल पूरी तरह बदल जाता था।
सूरज ढलते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। बच्चे बाहर नहीं निकलते थे और बड़े लोग भी कोशिश करते थे कि अंधेरा होने के बाद घर से बाहर न जाना पड़े।
गांव के बाहर एक बहुत पुराना मंदिर था। उसके पीछे घना जंगल और जंगल के आगे एक नदी बहती थी। इसी नदी के किनारे एक टूटी हुई झोपड़ी भी थी, जहां रात के समय कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था।
गांव में धीरे-धीरे एक डरावनी बात फैलने लगी थी। लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि रात के समय नदी के पास एक बहुत सुंदर औरत दिखाई देती है।
लेकिन जो भी उसकी आवाज सुनकर उसके पास जाता, वह अगले दिन पहले जैसा नहीं रहता था। कुछ लोग घर लौटकर चुप हो जाते और कुछ ऐसे व्यवहार करते, जैसे उन्हें अपने आसपास की दुनिया दिखाई ही नहीं देती।
लोग उसे एक नाम से जानते थे—करुणी। तो पढ़िए यह भयानक कहानी पुतलों का गांव।
चंद्रपुर गाँव में लौट आया कई साल पुराना डर
चंद्रपुर गाँव का रहने वाला सूरज शहर में पत्रकार था। वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने गांव आया था। भगवान शिव में उसकी गहरी आस्था थी और उसकी कलाई पर त्रिशूल का छोटा सा निशान बना हुआ था।
गांव में कदम रखते ही सूरज को कुछ अलग महसूस हुआ। रास्ते पहले जैसे थे, घर पहले जैसे थे, लेकिन लोगों के चेहरों पर एक ऐसा डर था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।
शाम होते ही उसने देखा कि कई घरों के दरवाजे बंद हो गए। कुछ महिलाएं बच्चों को अंदर बुलाकर खिड़कियां भी बंद करने लगीं।
तभी उसकी मुलाकात सांवली से हुई। सांवली को देखते ही सूरज समझ गया कि उसके चेहरे पर भी चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
सांवली ने धीरे से कहा, “तुम बहुत देर से आए हो। गांव में पिछले कुछ महीनों से बहुत अजीब घटनाएं हो रही हैं।”
सूरज ने पूछा, “कैसी घटनाएं?”
सांवली ने नदी की तरफ देखते हुए कहा, “कुछ आदमी रात में घर से निकल जाते हैं। सुबह वापस आते हैं तो उन्हें कुछ याद नहीं रहता।”
सूरज ने हैरानी से पूछा, “ऐसा कैसे हो सकता है?”
सांवली ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “लोग कहते हैं कि करुणी वापस आ गई है।”
सूरज कुछ पल तक चुप रहा। उसे पहली बार इस नाम के बारे में सुनने को मिला था।
उसने पूछा, “करुणी कौन थी?”
सांवली ने जवाब देने के बजाय कहा, “यह बात प्रकाश दादा और चेतनी दादी ही बता सकते हैं। उन्हें गांव के पुराने समय की हर बात पता है।”
बरगद के पेड़ के नीचे छिपा पुराना रहस्य
गांव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी मोटी जड़ों के नीचे रोज प्रकाश दादा और चेतनी दादी बैठे रहते थे।
जब सूरज और सांवली वहां पहुंचे तो दोनों बुजुर्ग कुछ देर तक उन्हें देखते रहे। प्रकाश दादा के चेहरे पर चिंता थी और चेतनी दादी बार-बार गांव की गलियों की तरफ देख रही थीं।
प्रकाश दादा ने कहा, “तू शहर से आया है, इसलिए शायद इन बातों पर भरोसा न करे। लेकिन जो कुछ गांव में हो रहा है, वह आज का नहीं है।”
सूरज ने पूछा, “तो फिर किसका है?”
चेतनी दादी ने धीरे से कहा, “एक ऐसी लड़की का, जिसे गांव ने पहले दुख दिया और फिर भुला दिया।”
सूरज ने पूछा, “करुणी?”
दोनों बुजुर्ग कुछ पल के लिए चुप हो गए।
प्रकाश दादा ने कहा, “हां। करुणी कभी चुड़ैल नहीं थी। वह इसी गांव की एक बहुत सुंदर और सीधी लड़की थी।”
चेतनी दादी ने आगे कहा, “उसकी शादी गोविंद नाम के एक गरीब कुम्हार से हुई थी। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे।”
सूरज ने पूछा, “फिर ऐसा क्या हुआ कि करुणी चुड़ैल बन गई?”
चेतनी दादी की आवाज कांपने लगी।
“उसका जवाब उस पुराने मंदिर में छिपा है।”
शादी के बाद मंदिर गया था गोविंद
कई साल पहले चंद्रपुर में गोविंद नाम का एक गरीब कुम्हार रहता था। वह दिन-रात मिट्टी के घड़े, दीये और बर्तन बनाकर अपना घर चलाता था।
गोविंद गरीब जरूर था, लेकिन उसका दिल बहुत साफ था। वह भगवान शिव का भक्त था और हर मुश्किल समय में भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता था।
उसकी शादी करुणी से हो चुकी थी। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे और शादी के बाद उनकी जिंदगी में खुशियों का नया समय शुरू हुआ था।
शादी की रात बीत चुकी थी। सुबह होते ही गोविंद ने करुणी से कहा, “मैं मंदिर जाकर भगवान शिव का आशीर्वाद लेकर आता हूं। हमारी नई जिंदगी भगवान की कृपा से अच्छी तरह शुरू हो, यही मेरी इच्छा है।”
करुणी ने मुस्कुराकर कहा, “जल्दी वापस आना। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी।”
गोविंद ने कहा, “बस पूजा करके आता हूं।”
उस समय करुणी अपने पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना कर रही थी। उसे क्या पता था कि कुछ ही देर बाद उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
मंदिर की सीढ़ियों पर शुरू हुआ भयानक अन्याय
गोविंद सुबह मंदिर पहुंचा। उसने हाथ में पूजा का सामान लिया हुआ था और उसके चेहरे पर नई जिंदगी की खुशी थी।
वह मंदिर की सीढ़ियां चढ़ ही रहा था कि बाहर बैठे कुछ गांव वालों ने उसका रास्ता रोक लिया।
एक आदमी ने कठोर आवाज में पूछा, “कहां जा रहा है?”
गोविंद ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवान के दर्शन करने आया हूं। मेरी शादी हो गई है। आज सुबह भगवान का आशीर्वाद लेने आया हूं।”
एक आदमी हंसकर बोला, “तू मंदिर के अंदर जाएगा?”
गोविंद ने हैरानी से पूछा, “क्यों नहीं जाऊंगा?”
उस आदमी ने कहा, “यह मंदिर सबके लिए नहीं है। अपनी जाति भूल गया क्या?”
गोविंद कुछ पल तक उसे देखता रहा। फिर उसने शांत आवाज में कहा, “भगवान के घर में जाने से पहले क्या इंसान को अपनी जाति बतानी पड़ती है?”
दूसरा आदमी गुस्से में बोला, “बहुत बोलने लगा है। यह मंदिर हमारे बाप-दादाओं का है। यहां कौन आएगा और कौन नहीं, यह हम तय करेंगे।”
गोविंद ने कहा, “मंदिर किसी इंसान का नहीं होता। भगवान का होता है।”
भीड़ में खड़े एक आदमी ने ताना मारा, “गरीब होकर बराबरी की बात करता है।”
गोविंद ने अपनी आंखों में आंसू रोकते हुए कहा, “गरीब हूं, लेकिन इंसान हूं। तुमसे ऊंचा नहीं हूं और तुमसे नीचा भी नहीं हूं।”
एक आदमी ने गुस्से में कहा, “अपनी औकात में रह। ऊंची जाति के मंदिर में घुसने की कोशिश मत कर।”
गोविंद ने मंदिर की तरफ देखते हुए कहा, “अगर भगवान के सामने भी कोई ऊंचा और कोई नीचा है, तो फिर भगवान किसके हैं?”
यह बात सुनते ही वहां खड़े लोगों का गुस्सा और बढ़ गया।
एक आदमी ने गोविंद को जोर से धक्का दिया। वह मंदिर की सीढ़ियों पर गिर पड़ा। उसके हाथ में पकड़ा पूजा का सामान नीचे गिर गया।
गोविंद ने हाथ जोड़कर कहा, “मुझे मत मारो। मैं लड़ने नहीं आया हूं। मेरी अभी-अभी शादी हुई है। मैं बस भगवान का आशीर्वाद लेने आया हूं।”
लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
एक आदमी चिल्लाया, “आज इसे अंदर जाने दिया तो कल हर कोई मंदिर में घुस आएगा।”
दूसरे ने कहा, “इसे यहां से निकालो।”
गोविंद ने आखिरी बार मंदिर की तरफ देखा और कहा, “मैंने किसी का हक नहीं छीना। मैं सिर्फ भगवान के सामने सिर झुकाने आया था।”
फिर भी भीड़ ने उसे मारना शुरू कर दिया। गोविंद जमीन पर गिर पड़ा। उसने बचने की कोशिश की, लेकिन वह अकेला था और सामने कई लोग थे।
उसकी आवाज धीरे-धीरे कमजोर होती गई।
उसने कांपते हुए कहा, “भगवान… अगर मेरे लिए आपके दरवाजे बंद हैं… तो आप इस अन्याय को जरूर देखना।”
उसी पल मंदिर के अंदर की घंटी अपने आप बज उठी।
टन…
टन…
टन…
सभी लोग अचानक रुक गए। किसी ने मंदिर के अंदर नहीं देखा था, लेकिन घंटी लगातार बज रही थी।
गोविंद की आंखें धीरे-धीरे बंद हो गईं। उसकी सांसें थम चुकी थीं।
सुहागन करुणी के सामने उजड़ गया उसका संसार
जब गोविंद के मरने की खबर करुणी तक पहुंची तो वह दौड़ती हुई मंदिर पहुंची। उसके हाथों की मेहंदी अभी फीकी भी नहीं हुई थी।
वह अपने पति को खोजते हुए मंदिर की सीढ़ियों तक पहुंची। वहां गोविंद को देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
करुणी उसके पास बैठ गई और रोते हुए बोली, “गोविंद… उठो। तुम तो भगवान का आशीर्वाद लेने गए थे। तुमने कहा था कि अभी वापस आओगे।”
लेकिन गोविंद अब इस दुनिया में नहीं था।
करुणी ने गांव वालों की तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे और चेहरे पर ऐसा दर्द था, जिसे देखकर कुछ लोग भी नजरें झुकाने लगे।
उसने पूछा, “इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”
कोई जवाब नहीं आया।
करुणी ने फिर कहा, “क्या गरीब होना अपराध है? क्या कुम्हार होना अपराध है? क्या भगवान के सामने खड़ा होना अपराध है?”
एक आदमी ने गुस्से में कहा, “बहुत सवाल मत कर। घर चली जा।”
करुणी ने कांपते हुए कहा, “आज तुमने मेरे पति को मारा है। जिस आदमी के साथ मैंने अभी अपनी नई जिंदगी शुरू की थी, उसे तुमने मुझसे छीन लिया।”
फिर उसने मंदिर की तरफ देखा और कहा, “मैंने अपने पति को भगवान का आशीर्वाद लेने भेजा था। मुझे क्या पता था कि वह वापस ही नहीं आएगा?”
करुणी मंदिर के अंदर जाकर भगवान के सामने बैठना चाहती थी। उसने हाथ जोड़कर कहा, “मैं सिर्फ यह पूछना चाहती हूं कि मेरे गोविंद का अपराध क्या था?”
लेकिन उसे भी मंदिर में जाने से रोक दिया गया।
करुणी चीखकर बोली, “जिस भगवान के सामने मेरा गोविंद मर गया, मैं उन्हीं से पूछना चाहती हूं कि उसका अपराध क्या था!”
लेकिन भीड़ ने उसकी बात नहीं सुनी। उसे धक्का दिया गया और वह मंदिर की सीढ़ियों पर गिर पड़ी।
करुणी ने मंदिर की तरफ देखा। उसके चेहरे पर आंसू थे, लेकिन आंखों में अब भयानक गुस्सा उतर चुका था।
उसने कहा, “तुमने आज मेरे पति को मारा है। लेकिन याद रखना, तुमने सिर्फ एक आदमी को नहीं मारा। तुमने मेरे पूरे जीवन को उजाड़ दिया है।”
मरने से पहले करुणी ने दिया भयानक श्राप
उस दिन करुणी का सुहाग उजड़ चुका था। जिस घर में कुछ घंटे पहले शादी की खुशियां थीं, वहां अब मातम था।
लेकिन करुणी के अंदर का दर्द धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा।
कहते हैं कि आखिरी समय में उसने मंदिर की तरफ देखा और कांपती आवाज में कहा, “तुमने मेरे गोविंद को इंसान नहीं समझा। अब मैं तुम्हारे घरों के पुरुषों को भी इंसान नहीं रहने दूंगी।”
उसकी आवाज अचानक बदल गई। मंदिर की दीवारें कांपने लगीं और बंद घंटी अपने आप हिलने लगी।
करुणी ने कहा, “एक दिन इस गांव में इंसान नहीं, पुतले चलेंगे।”
फिर उसने कहा, “उनके शरीर तुम्हारे बीच होंगे, लेकिन उनका मन मेरे पास रहेगा।”
“तुमने मेरा घर उजाड़ा है। अब मैं तुम्हारे घरों में डर और अंधेरा भर दूंगी।”
उसकी आखिरी आवाज पूरे मंदिर में गूंजती रही।
उसके बाद मंदिर पर ताला लगा दिया गया। गांव वालों ने उस घटना को धीरे-धीरे भुलाने की कोशिश की।
लेकिन करुणी का श्राप खत्म नहीं हुआ था। वह केवल सही समय का इंतजार कर रहा था।
पुतलों का गांव बनने लगी चंद्रपुर की पहचान
कई साल बाद एक रात गांव का एक आदमी नदी के किनारे से गुजर रहा था। अचानक उसे पायल की आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
उसने पीछे मुड़कर देखा तो थोड़ी दूर एक औरत सफेद कपड़ों में खड़ी थी। उसके लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे और उसका चेहरा चांदनी में बहुत सुंदर दिखाई दे रहा था।
औरत ने मुस्कुराकर कहा, “तुम मुझे पहचानते नहीं?”
आदमी ने पूछा, “तुम कौन हो?”
औरत ने कहा, “जिसे तुम्हारे गांव ने भुला दिया।”
आदमी को अचानक अपने शरीर में अजीब कमजोरी महसूस हुई। फिर भी वह उसकी तरफ बढ़ता चला गया।
वह औरत उसे जंगल के अंदर बनी पुरानी झोपड़ी तक ले गई। झोपड़ी के अंदर मिट्टी के दर्जनों छोटे पुतले रखे थे।
कुछ पुतलों के चेहरे गांव के लोगों जैसे थे।
उस आदमी ने डरकर पूछा, “ये सब क्या हैं?”
औरत ने धीरे से कहा, “ये अभी पुतले नहीं हैं।”
अगली सुबह वह आदमी घर वापस आ गया। शरीर उसका था, लेकिन उसकी आंखों में अजीब खालीपन था।
उस दिन से वह रात में चुपचाप उठकर जंगल की तरफ जाने लगा। उसे खुद भी नहीं पता होता था कि उसके कदम उसे कहां ले जा रहे हैं।
कुछ दिनों बाद उसके घर की दीवार पर अपने आप एक काला निशान दिखाई दिया। फिर उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा।
वह बिना कारण अपने परिवार वालों से झगड़ता और घंटों एक ही जगह बैठकर खाली दीवार को देखता रहता।
लोगों ने फुसफुसाकर कहना शुरू कर दिया कि वह करुणी का जिंदा पुतला बन चुका है।
करुणी का बदला अब घर-घर पहुंचने लगा
इसके बाद चंद्रपुर में एक के बाद एक अजीब घटनाएं होने लगीं। रात में कई घरों के दरवाजे अपने आप खुल जाते और सुबह दरवाजे पर मिट्टी के छोटे पुतले मिलते।
कुछ पुतलों के चेहरे गांव के उन लोगों जैसे होते थे, जो अभी जिंदा थे।
एक रात एक आदमी अचानक उठा और बिना कुछ बोले घर से बाहर चला गया। उसकी पत्नी ने रोकने की कोशिश की, लेकिन वह ऐसे चल रहा था, जैसे किसी अदृश्य शक्ति के आदेश पर जा रहा हो।
सुबह वह नदी के पास मिला। उसकी मुट्ठी में मिट्टी का एक पुतला था और उसकी आंखें खुली हुई थीं।
उसने सिर्फ इतना कहा, “वह मुझे फिर बुलाएगी।”
कुछ दिनों बाद उसकी हालत बहुत खराब हो गई और वह मर गया। उसके कमरे में उसकी मौत से पहले एक ही चीज मिली—करुणी के चेहरे वाला मिट्टी का पुतला।
अब गांव के लोग रात में किसी की आवाज सुनते ही दरवाजा बंद कर लेते थे।
लेकिन करुणी का बदला केवल बाहर नहीं था। वह लोगों के घरों के अंदर पहुंच चुका था।
कई घरों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगे। पति अपनी पत्नी पर शक करने लगे और परिवार के सदस्य एक-दूसरे से दूर होने लगे।
करुणी चाहती थी कि जिस गांव ने कभी एक परिवार को उजाड़ा था, अब उसी गांव का हर घर अंदर से टूट जाए।
सूरज को मिला मिट्टी के पुतलों का भयानक राज
सूरज ने इन घटनाओं को केवल डर की कहानी मानने से इनकार कर दिया। उसने तय किया कि वह खुद नदी के किनारे जाकर सच्चाई पता करेगा।
एक रात वह चुपचाप जंगल की तरफ निकल पड़ा। उसके हाथ में कैमरा था और कलाई पर बना त्रिशूल का निशान चांदनी में साफ दिखाई दे रहा था।
जंगल के अंदर पहुंचते ही उसे पेड़ों से कुछ लटका हुआ दिखाई दिया। उसने कैमरे की रोशनी ऊपर की तो उसकी सांस रुक गई।
पेड़ों पर दर्जनों मिट्टी के पुतले लटके हुए थे।
कुछ पुतलों के चेहरे बूढ़े लोगों जैसे थे। कुछ जवानों जैसे थे और एक पुतले का चेहरा बिल्कुल सांवली जैसा दिखाई दे रहा था।
सूरज ने उस पुतले को नीचे उतारने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से आवाज आई, “उसे मत छूना।”
सूरज तुरंत पलटा। वहां कोई नहीं था।
फिर वही आवाज आई, “तुम भी उसे बचा नहीं पाओगे।”
सूरज ने जोर से पूछा, “कौन हो तुम?”
अचानक जंगल में धीमी हंसी गूंजी। पेड़ों के बीच सफेद कपड़ों में एक औरत दिखाई दी।
उसका चेहरा बहुत सुंदर था, लेकिन उसकी आंखें बिल्कुल काली थीं। उसके लंबे बाल जमीन को छू रहे थे।
वह धीरे-धीरे सूरज की तरफ बढ़ी।
सूरज ने कहा, “करुणी!”
वह मुस्कुराई और बोली, “आखिर किसी ने मेरा नाम तो लिया।”
करुणी ने सूरज को बताया अपने बदले का सच
सूरज ने हिम्मत करके पूछा, “तुम इन लोगों को पुतला क्यों बना रही हो?”
करुणी ने कहा, “जिस गांव ने इंसानों को जाति के नाम पर बांटा था, मैं उसी गांव को अब उसकी गलती का एहसास करा रही हूं।”
सूरज ने कहा, “तुम्हारे साथ बहुत गलत हुआ था। लेकिन जिन लोगों ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा, उन्हें क्यों सजा दे रही हो?”
करुणी की आंखों में अचानक लाल चमक दिखाई दी।
उसने कहा, “जब मेरा गोविंद मारा जा रहा था, तब कितने लोग उसके सामने खड़े हुए थे? कितनों ने कहा था कि उसे मत मारो?”
सूरज चुप रहा।
करुणी ने कहा, “सब देखते रहे। कोई नहीं बोला।”
फिर उसने धीमी आवाज में कहा, “अब मैं भी देखती हूं कि जब तुम्हारे घर उजड़ेंगे तो कौन किसे बचाता है।”
सूरज ने कहा, “बदला तुम्हारा दर्द खत्म नहीं करेगा।”
करुणी हंसने लगी। उसकी हंसी सुनकर जंगल में बैठे पक्षी अचानक उड़ गए।
“दर्द?” उसने कहा, “मेरा दर्द अब मेरा नहीं रहा। वह इस गांव का डर बन चुका है।”
इतना कहकर वह धुएं में बदल गई।
सूरज ने नीचे देखा। वहां एक छोटा मिट्टी का पुतला पड़ा था।
उस पुतले के चेहरे पर सूरज का चेहरा बना हुआ था।
सांवली पर मंडराने लगा करुणी का साया
सूरज पुतला लेकर गांव वापस आया। लेकिन उसी रात सांवली ने अपने घर की खिड़की के बाहर किसी को खड़ा देखा।
वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गई। बाहर वही सफेद कपड़ों वाली करुणी खड़ी थी।
करुणी ने कहा, “तुम सूरज से प्यार करती हो?”
सांवली पीछे हट गई।
उसने कांपते हुए पूछा, “तुम सूरज से क्या चाहती हो?”
करुणी ने कहा, “जिसे तुम प्यार करती हो, उसे भी किसी अपने को खोने का दर्द महसूस होगा।”
सांवली ने कहा, “तुम्हारे साथ जो हुआ, वह गलत था। लेकिन सूरज ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा।”
करुणी कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “शायद तुम सही कह रही हो। लेकिन मेरे अंदर का अंधेरा अब मेरी बात नहीं सुनता।”
इतना कहकर खिड़की पर जोर से हाथ पड़ा। सांवली डरकर पीछे गिर गई।
जब उसने दोबारा बाहर देखा तो वहां कोई नहीं था। लेकिन खिड़की के नीचे मिट्टी का एक छोटा पुतला पड़ा था।
उस पुतले के चेहरे पर सांवली की शक्ल बनी हुई थी।
पुराने मंदिर का दरवाजा अपने आप खुल गया
प्रकाश दादा ने सूरज को बताया कि करुणी के श्राप को खत्म करने का रास्ता उसी मंदिर से होकर जाता है, जहां से यह सब शुरू हुआ था।
उस रात सूरज, सांवली, प्रकाश दादा और चेतनी दादी पुराने मंदिर के पास पहुंचे। मंदिर का दरवाजा वर्षों से बंद था।
सूरज ने जैसे ही दरवाजे को छुआ, पुराना ताला अपने आप टूटकर जमीन पर गिर गया।
मंदिर के अंदर घना अंधेरा था। हवा बिल्कुल बंद थी, फिर भी अंदर लटकी घंटी धीरे-धीरे हिल रही थी।
चेतनी दादी ने कांपते हुए कहा, “यह जगह अभी भी उसे याद करती है।”
अचानक मंदिर के अंदर किसी के रोने की आवाज आई।
सांवली ने सूरज का हाथ पकड़ लिया।
सूरज ने आवाज की तरफ देखा। वहां एक छोटा दीपक जल रहा था। उसके पास मिट्टी का एक पुतला रखा था।
पुतले का चेहरा गोविंद जैसा था।
तभी पीछे से करुणी की आवाज आई, “इतने साल बाद तुम लोग मेरे मंदिर में आए हो?”
सभी ने पीछे देखा। करुणी मंदिर के दरवाजे पर खड़ी थी। उसके बाल बिना हवा के उड़ रहे थे और उसकी आंखों में गहरा अंधेरा था।
करुणी का आखिरी और सबसे भयानक बदला
करुणी ने कहा, “आज इस गांव का आखिरी आदमी भी मेरा पुतला बनेगा।”
सूरज उसके सामने खड़ा हो गया। उसने कहा, “नहीं। आज तुम्हारा बदला खत्म होगा।”
करुणी जोर से हंसी। उसकी हंसी से मंदिर की दीवारें कांपने लगीं।
उसने कहा, “तुम मुझे रोक सकते हो?”
सूरज ने कहा, “तुम्हारे साथ अन्याय हुआ था। लेकिन अब तुम वही कर रही हो जो तुम्हारे साथ हुआ था।”
करुणी अचानक शांत हो गई।
सूरज ने कहा, “तुम चाहती थीं कि लोग समझें कि इंसान की कीमत उसकी जाति से नहीं होती। लेकिन अब तुम निर्दोष लोगों को सिर्फ इसलिए सजा दे रही हो क्योंकि वे इसी गांव में पैदा हुए हैं।”
प्रकाश दादा आगे आए। उनकी आंखों में आंसू थे।
उन्होंने कहा, “करुणी, उस समय हममें से कई लोग डरकर चुप रहे थे। हमारी चुप्पी भी अपराध थी।”
चेतनी दादी ने हाथ जोड़कर कहा, “गोविंद के साथ जो हुआ, वह गलत था। तुम्हारे साथ जो हुआ, वह भी गलत था। लेकिन अब किसी और के घर को उजाड़ना भी गलत है।”
करुणी ने धीरे से पूछा, “क्या तुम्हें सच में याद था कि मेरे साथ क्या हुआ था?”
प्रकाश दादा ने कहा, “हमने भुला दिया था। लेकिन तुम्हारा दर्द कभी खत्म नहीं हुआ।”
करुणी की आंखों से आंसू गिरने लगे। लेकिन उसी पल मंदिर की दीवारों से काला धुआं निकलने लगा।
मिट्टी के पुतले अपने आप हिलने लगे। कुछ पुतलों ने अपना सिर घुमा लिया।
सांवली डरकर पीछे हट गई।
करुणी ने अचानक अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया और चीखकर बोली, “मैंने अपने दर्द को बदला बना दिया!”
उसकी चीख इतनी तेज थी कि मंदिर की खिड़कियां कांप उठीं।
मंदिर में खुला सबसे बड़ा रहस्य
अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी। दीपक की लौ बहुत तेज हो गई और उसके सामने रखा गोविंद का पुतला चमकने लगा।
तभी मंदिर के अंदर से एक धीमी आवाज आई।
“करुणी…”
करुणी अचानक जम गई।
उसने कांपते हुए पूछा, “गोविंद?”
आवाज फिर आई, “तुमने मुझे खोया था… लेकिन अपना दिल मत खोना।”
करुणी जमीन पर बैठ गई। उसकी आंखों से आंसू लगातार बहने लगे।
उसने कहा, “मैं बहुत थक गई हूं, गोविंद।”
आवाज आई, “तुम्हारा दर्द सच था। लेकिन नफरत को अपनी जिंदगी मत बना दो।”
करुणी ने अपने सामने पड़े पुतले को देखा। कुछ पल बाद उसने उसे दोनों हाथों से उठा लिया।
उसने कहा, “मैंने तुम्हें वापस पाने के लिए पूरे गांव को खोना शुरू कर दिया।”
दीपक की लौ अचानक बहुत ऊंची हुई। मंदिर के अंदर मौजूद सभी मिट्टी के पुतले एक-एक करके टूटने लगे।
जिन लोगों पर करुणी का असर था, उनके शरीर से काला धुआं निकलने लगा और वे धीरे-धीरे सामान्य होने लगे।
करुणी का चेहरा बदलने लगा। उसकी डरावनी आंखों में फिर वही पुरानी करुणा दिखाई देने लगी, जो कभी एक साधारण लड़की की आंखों में हुआ करती थी।
क्या करुणी का श्राप हमेशा के लिए खत्म हो गया?
सुबह होते ही चंद्रपुर के लोगों ने देखा कि पुराने मंदिर का दरवाजा खुला हुआ है। वर्षों से बंद घंटी अपने आप शांत हो चुकी थी।
प्रकाश दादा ने पूरे गांव को मंदिर के सामने बुलाया और गोविंद तथा करुणी की पूरी कहानी सबको सुनाई।
उस दिन गांव के लोगों ने पहली बार खुलकर माना कि वर्षों पहले हुआ अन्याय बहुत बड़ा अपराध था।
मंदिर के बाहर एक पत्थर लगाया गया, जिस पर लिखा गया कि भगवान के सामने कोई ऊंचा या नीचा नहीं होता।
कई दिनों तक गांव में कोई अजीब घटना नहीं हुई। लोगों को लगा कि करुणी का श्राप हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।
लेकिन एक रात सूरज नदी के किनारे उसी पुराने रास्ते से गुजर रहा था। अचानक उसे पायल की आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
सूरज वहीं रुक गया। उसने अंधेरे जंगल की तरफ देखा। वहां कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर पेड़ के पीछे सफेद कपड़ों की हल्की सी झलक दिखाई दी।
सूरज धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा। वहां जमीन पर मिट्टी का एक छोटा पुतला रखा था।
उस पुतले के चेहरे पर करुणी की मुस्कान बनी हुई थी।
सूरज ने उसे उठाया तो उसके पीछे मिट्टी में एक वाक्य लिखा था।
“बदला खत्म हुआ है… लेकिन कहानी नहीं।”
सूरज के हाथ से पुतला नीचे गिर गया। उसी पल जंगल के अंदर से एक धीमी हंसी सुनाई दी।
सूरज ने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था।
अगली सुबह वह पुतला भी गायब था।
आज भी सुनाई देती है पुतलों की आवाज
आज भी चंद्रपुर के बूढ़े लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात नदी के पास अगर किसी को पायल की आवाज सुनाई दे, तो पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।
क्योंकि हो सकता है वह आवाज करुणी की न हो।
हो सकता है जंगल में कोई ऐसी अंधेरी परछाई घूम रही हो, जो किसी नए इंसान को अपने पुतलों में शामिल करना चाहती हो।
कहते हैं कि कभी-कभी आधी रात को चंद्रपुर की सुनसान गलियों में कुछ आदमी बिल्कुल सीधे चलते हुए दिखाई देते हैं। उनकी आंखें खुली होती हैं, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं होता।
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वे बिना किसी से बात किए नदी की तरफ जाते हैं और कुछ देर बाद वापस लौट आते हैं।
गांव वाले उन्हें देखकर कहते हैं कि शायद पुराने श्राप की आखिरी परछाई अभी भी कहीं बाकी है।
इसीलिए चंद्रपुर को आज भी लोग पुतलों का गांव कहते हैं। यहां के लोगों का मानना है कि इंसान के अंदर का डर कभी-कभी किसी भी भूत से ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
पुतलों का गांव की डरावनी सीख
चंद्रपुर की कहानी केवल एक चुड़ैल के बदले की कहानी नहीं थी। यह उस अन्याय की कहानी थी, जिसमें इंसान ने दूसरे इंसान को छोटा समझकर उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था।
गोविंद के साथ जो हुआ, वह गलत था। करुणी के साथ जो हुआ, वह भी गलत था। लेकिन बाद में करुणी ने अपने दर्द को बदले की आग में बदल दिया और कई निर्दोष लोगों को भी डर और मौत के करीब पहुंचा दिया।
इसलिए पुतलों का गांव केवल डर की कहानी नहीं है। यह याद दिलाता है कि किसी इंसान को उसकी जाति, गरीबी या जन्म के कारण छोटा समझना कितना गलत है।
क्योंकि जब इंसान के दिल में नफरत जन्म लेती है, तो वह धीरे-धीरे उसके पूरे जीवन को अपने कब्जे में ले सकती है।
और अगर कभी किसी सुनसान रात में आपको नदी किनारे से किसी खूबसूरत औरत की आवाज सुनाई दे…
तो उसकी तरफ मत जाना।
उसका नाम मत पूछना।
और सबसे जरूरी बात…
पीछे मुड़कर मत देखना।
क्योंकि हो सकता है उस अंधेरे में करुणी आपका इंतजार न कर रही हो…
बल्कि कोई ऐसा पुतला आपका इंतजार कर रहा हो, जिसका चेहरा बिल्कुल आपके जैसा हो।
यह थी पुतलों का गांव की खौफनाक और रहस्यमयी कहानी। ऐसी ही डरावनी, रहस्यमयी और रोमांच से भरी हिंदी कहानियां पढ़ने के लिए हिंदी रामा से जुड़े रहें।
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