अमावस्या की चुड़ैल और तेरह रहस्यमयी हत्यारों की कहानी भैरवपुर गाँव के उस भयानक रहस्य से जुड़ी है, जिसे वर्षों से छिपाया गया।
हर अमावस्या की रात जंगल के पुराने सूखे कुएँ से डरावनी आवाजें सुनाई देती हैं, और गाँव में अजीब घटनाएँ होने लगती हैं।
कभी सुनसान खेतों में किसी औरत की परछाई दिखाई देती, तो कभी बंद दरवाजे पर तीन रहस्यमयी दस्तकें सुनाई देती थीं।
रघु और मोहन अनजाने में उसी मनहूस रात जंगल के रास्ते गाँव लौटते हैं और ऐसी भयानक घटना देखते हैं, जिसे भूलना मुश्किल है।
इसके बाद गाँव का चौकीदार भोला भी एक डरावनी घटना का शिकार होता है, जिसके हाथ में एक रहस्यमयी संदेश मिलता है।
धीरे-धीरे बीस साल पुराना कामिनी का रहस्य सामने आने लगता है, लेकिन असली डर तब शुरू होता है, जब तेरह नाम सामने आते हैं।
उन नामों में एक नाम रघु का भी होता है, और फिर अमावस्या की रात पहले से कहीं ज्यादा डरावनी बन जाती है।
भैरवपुर की वह मनहूस रात Horror Story In Hindi

भैरवपुर चारों तरफ फैले खेतों और घने जंगलों से घिरा हुआ एक शांत गाँव था, लेकिन रात होते ही उसका वातावरण पूरी तरह बदल जाता था।
दिन में गाँव की पगडंडियों पर बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं, मगर सूर्य ढलने के बाद लोग जल्दी अपने घरों में बंद हो जाते थे।
गाँव के आखिरी छोर से आगे बढ़ते ही घना जंगल शुरू होता था, जहाँ रात में जाने की हिम्मत किसी बड़े से बड़े इंसान में नहीं थी।
उस जंगल के भीतर बहुत पुराने पेड़ों के बीच एक सूखा कुआँ था, जिसके आसपास हमेशा अजीब सन्नाटा पसरा रहता था।
कहते थे कि लगभग बीस साल पहले उसी कुएँ के पास एक गरीब औरत अचानक गायब हुई थी, जिसका फिर कभी पता नहीं चला।
उस घटना के बाद से हर अमावस्या की रात गाँव में अजीब घटनाएँ होने लगीं और लोगों के घरों में डर फैल जाता था।
कभी खेतों के बीच किसी औरत के चलने की आवाज सुनाई देती, जबकि वहाँ आसपास कोई इंसान दिखाई नहीं देता था।
कभी किसी बंद घर की खिड़की पर लंबे काले बाल दिखाई देते और सुबह होते ही वे निशान रहस्यमय ढंग से गायब हो जाते थे।
कभी आधी रात को सुनसान गलियों में किसी औरत की धीमी हँसी सुनाई देती, जिसे सुनकर घरों के दरवाजे तुरंत बंद हो जाते थे।
लेकिन भैरवपुर के लोगों के लिए सबसे डरावनी चीज एक ही थी, जिसकी आवाज सुनते ही हर घर में सन्नाटा छा जाता था।
ठक… ठक… ठक…
दरवाजे पर तीन दस्तक सुनाई देतीं और उसके बाद बाहर से किसी परिचित इंसान की आवाज आने लगती थी।
गाँव में सभी जानते थे कि अमावस्या की रात तीन दस्तक सुनाई दें, तो दरवाजा खोलना मौत को अपने घर बुलाने जैसा था।
शहर से लौटते रघु और मोहन

उस रात भी अमावस्या थी और आसमान में चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था, जिससे जंगल का अंधेरा और भी गहरा लग रहा था।
रात के करीब ग्यारह बज चुके थे और रघु अपने दोस्त मोहन के साथ शहर के अस्पताल से वापस लौट रहा था।
अस्पताल में रघु के एक रिश्तेदार का इलाज चल रहा था, इसलिए दोनों को गाँव लौटने में काफी देर हो गई थी।
जब दोनों बस अड्डे पर पहुँचे, तब तक गाँव जाने वाली आखिरी बस निकल चुकी थी और पूरा अड्डा लगभग खाली था।
मोहन ने परेशान होकर घड़ी देखी और धीमी आवाज में कहा, “अब क्या करेंगे, सुबह तक यहीं रुकना पड़ेगा, क्योंकि दूसरी बस नहीं आएगी।”
रघु ने कुछ देर आसपास देखा, फिर जंगल की तरफ जाने वाले पुराने रास्ते की ओर इशारा करके कहा, “पैदल चलते हैं, दो घंटे में गाँव पहुँच जाएँगे।”
मोहन ने जंगल की तरफ देखा और डरते हुए कहा, “लेकिन आज अमावस्या है, उस रास्ते से जाना ठीक नहीं होगा।”
रघु हल्का सा हँसा और बोला, “भूत-चुड़ैल कुछ नहीं होती, बेकार डर मत और चुपचाप मेरे साथ चल।”
मोहन को रघु की बात बिल्कुल पसंद नहीं आई, लेकिन रात में सुनसान बस अड्डे पर रुकना भी उसे सुरक्षित नहीं लगा।
आखिर दोनों ने अपने बैग उठाए और मोबाइल की रोशनी के सहारे जंगल की तरफ जाने वाले सुनसान रास्ते पर चल पड़े।
कुछ दूर तक दोनों सामान्य बातें करते रहे, मगर जंगल के भीतर बढ़ते ही आसपास की आवाजें धीरे-धीरे पूरी तरह शांत होने लगीं।
पेड़ों के बीच से आती हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई और बिना हवा के भी कई सूखी शाखाएँ अपने आप हिलने लगीं।
मोहन ने घबराकर पीछे देखा, लेकिन अंधेरे में सिर्फ पेड़ों की काली परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं और कोई इंसान वहाँ मौजूद नहीं था।
तभी अचानक जंगल के भीतर से किसी औरत की भयानक चीख सुनाई दी, जिससे दोनों के कदम उसी क्षण रुक गए।
“आऽऽऽऽऽह!”
मोहन ने तुरंत रघु का हाथ पकड़ लिया और काँपती आवाज में कहा, “तूने भी सुना ना, यह आवाज किसी इंसान जैसी बिल्कुल नहीं थी।”
रघु ने गंभीर होकर सिर हिलाया और कहा, “हाँ, आवाज जंगल के अंदर से आई है, चलकर देखते हैं आखिर कौन मदद माँग रहा है।”
मोहन ने घबराकर पीछे हटते हुए कहा, “पागल मत बन, रात में जंगल के बीच किसी अजनबी औरत की आवाज के पीछे जाना खतरनाक है।”
लेकिन रघु ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और बोला, “अगर कोई सचमुच मुसीबत में है, तो उसे अकेला छोड़ना भी ठीक नहीं होगा, मेरे साथ चल।”
दोनों धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ने लगे, जहाँ से आवाज आई थी और कुछ देर बाद उन्हें पुराना सूखा कुआँ दिखाई दिया।
सूखे कुएँ से आती आवाज

जैसे ही दोनों कुएँ के पास पहुँचे, नीचे से एक महिला की धीमी आवाज सुनाई दी और मोहन का चेहरा डर से पीला पड़ गया।
आवाज आई, “मुझे बाहर निकालो, मैं कुएँ में गिर गई हूँ और बहुत देर से मदद के लिए आवाज लगा रही हूँ।”
रघु ने तुरंत कुएँ के अंदर मोबाइल की रोशनी डाली, लेकिन नीचे सिर्फ गहरा अंधेरा दिखाई दिया और कोई इंसान नहीं दिखा।
उसे एक पल के लिए नीचे सफेद कपड़े जैसा कुछ दिखाई दिया, इसलिए उसने रोशनी उसी दिशा में दोबारा घुमाई।
लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था और कुएँ की गहराई में सिर्फ काली खामोशी दिखाई दे रही थी, जैसे कोई नीचे छिपा हो।
मोहन पीछे हटते हुए बोला, “रघु, वहाँ कोई नहीं है, फिर नीचे से आवाज कौन निकाल रहा है, मुझे यहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”
तभी कुएँ के अंदर से फिर वही आवाज सुनाई दी और इस बार उसके शब्द पहले से कहीं ज्यादा साफ थे।
“तुम्हें मैं दिखाई नहीं दे रही, क्योंकि अंधेरे में मेरी मौजूदगी तुम्हारी आँखों से कहीं ज्यादा पास है।”
दोनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई और रघु की मोबाइल पकड़े उँगलियाँ अचानक काँपने लगीं।
फिर वही आवाज अचानक बदल गई और उसमें ऐसी भारीपन आ गया, जैसे बोलने वाला इंसान नहीं बल्कि कोई अदृश्य शक्ति हो।
आवाज आई, “क्योंकि मैं कुएँ में नहीं हूँ, मैं तो इस वक्त तुम्हारे बिल्कुल पीछे खड़ी हूँ।”
रघु और मोहन ने एक साथ पीछे देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था और जंगल पहले से ज्यादा डरावना लग रहा था।
अचानक पीछे से किसी औरत के हँसने की आवाज आई और दोनों ने घबराकर अपनी टॉर्च चारों तरफ घुमानी शुरू कर दी।
पेड़ के नीचे जमीन पर उन्हें किसी औरत के पैरों के निशान दिखाई दिए, लेकिन उन निशानों ने दोनों को और डरा दिया।
वे निशान जंगल से उनकी तरफ नहीं आ रहे थे, बल्कि उनकी तरफ से जंगल की ओर जा रहे थे, जैसे कोई उनके पीछे चल रहा हो।
मोहन चीखकर बोला, “भाग रघु, अभी यहाँ से निकलना होगा, वरना सुबह होने से पहले हम दोनों भी गायब हो जाएँगे।”
दोनों गाँव की तरफ पूरी ताकत से दौड़ पड़े, लेकिन कुछ देर बाद उन्हें महसूस हुआ कि रास्ता बार-बार बदलता जा रहा था।
आखिर अचानक दोनों फिर उसी सूखे कुएँ के सामने खड़े थे और उन्हें समझ नहीं आया कि वे वापस यहाँ कैसे पहुँच गए।
रघु के हाथ से मोबाइल गिर गया और उसी क्षण कुएँ के भीतर से धीमी आवाज दोबारा सुनाई दी।
आवाज आई, “रास्ता भूल गए, रघु, या फिर मैं तुम्हें जाने ही नहीं देना चाहती।”
इसके तुरंत बाद कुएँ के अंदर से आवाज आई, “ठक… ठक… ठक…” और दोनों के चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा।
अब रघु और मोहन हनुमान चालीसा बोलते हुए बिना पीछे मुड़े बहुत तेजी से गाँव की तरफ भागे।
गाँव का चौकीदार भोला

उसी समय गाँव की सीमा पर भोला रात की ड्यूटी कर रहा था और हाथ में पुरानी लालटेन लेकर खेतों के आसपास घूम रहा था।
भोला पिछले बीस वर्षों से गाँव का चौकीदार था और अमावस्या की रात होने वाली रहस्यमय घटनाओं से अच्छी तरह परिचित था।
उसने कई बार गाँव वालों को समझाया था कि ऐसी रात में जंगल की तरफ जाना अपनी जान खतरे में डालने जैसा था।
अचानक उसे खेतों की तरफ से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी और उसने तुरंत लालटेन ऊपर उठा दी।
छप… छप… छप…
लालटेन की पीली रोशनी में खेत के बीच एक औरत खड़ी दिखाई दी, जिसके लंबे बाल पूरे चेहरे को ढके हुए थे।
भोला ने सावधानी से पूछा, “कौन है, इतनी रात को खेत के बीच अकेली क्यों खड़ी हो, यहाँ से गाँव की तरफ चली जाओ।”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया और बिना चेहरा उठाए धीरे-धीरे खेत के भीतर आगे बढ़ने लगी।
भोला कुछ समझ नहीं पाया और उसके पीछे चल पड़ा, लेकिन कुछ कदम बाद वह औरत अचानक उसकी आँखों के सामने गायब हो गई।
भोला घबराकर बोला, “अरे, अभी तो यहीं थी, आखिर इतनी जल्दी कहाँ चली गई, क्या मेरी आँखों ने धोखा देखा।”
तभी उसके बिल्कुल पीछे से आवाज आई, “भोला…” और चौकीदार का शरीर डर के मारे एकदम जम गया।
भोला पलटकर देखने लगा, लेकिन उसके पीछे कोई दिखाई नहीं दिया और खेत में सिर्फ घना अंधेरा फैला था।
फिर वही आवाज आई, “भोला, इधर देख, मैं यहीं हूँ, बस तुम्हें मुझे पहचानने की जरूरत है।”
आवाज खेत के बीच से आई और भोला ने डरते हुए लालटेन उठाकर धीरे-धीरे उसी दिशा में कदम बढ़ाए।
अचानक उसका पैर किसी चीज में फँस गया और वह जोर से जमीन पर गिर पड़ा, जबकि लालटेन दूर जाकर बुझने लगी।
अंधेरे में भोला को अपने पैरों के चारों तरफ कुछ लिपटा हुआ महसूस हुआ और वह समझ गया कि वह लंबे बाल थे।
भोला चीखकर बोला, “बचाओ, कोई मुझे बचाओ, मेरे पैरों में यह क्या लिपट गया है, मुझे यहाँ से निकालो।”
तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा, “आज अमावस्या है, भोला, और आज तुम्हारी बारी है।”
इसके बाद पूरे खेत में एक भयानक चीख गूँजी और भोला बेहोश होकर वहीं मिट्टी पर गिर पड़ा।
सुबह गाँव वालों ने उसे खेत के किनारे बेहोश पाया और उसके शरीर पर कई गहरे खरोंच के निशान दिखाई दिए।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके हाथ में मिट्टी से लिखा हुआ था, “13 बाकी हैं।”
गाँव में पहली तीन दस्तकें

उधर रघु और मोहन किसी तरह डरते हुए गाँव पहुँच गए, लेकिन दोनों ने रात में हुई घटना किसी को बताने की हिम्मत नहीं की।
उन्हें लगा कि शायद सुबह होने के बाद सब सामान्य हो जाएगा और जंगल की वह डरावनी घटना केवल उनका भ्रम साबित होगी।
लेकिन आधी रात के बाद गाँव के एक घर में अचानक तीन दस्तकें गूँजीं और पूरा घर डर से शांत हो गया।
ठक… ठक… ठक…
उस घर में कल्लू अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ सो रहा था, तभी उसे दरवाजे पर किसी के खड़े होने का एहसास हुआ।
कल्लू ने घबराकर पूछा, “कौन है, इतनी रात को दरवाजा क्यों खटखटा रहे हो, बाहर जो भी है सुबह होने तक इंतजार करे।”
बाहर से उसकी माँ की आवाज आई, “बेटा, दरवाजा खोल, मैं बाहर खड़ी हूँ और बहुत देर से तुम्हें आवाज दे रही हूँ।”
कल्लू की आँखें डर से फैल गईं, क्योंकि उसकी माँ की मौत पाँच साल पहले ही हो चुकी थी।
कल्लू की पत्नी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “दरवाजा मत खोलना, यह तुम्हारी माँ की आवाज नहीं है, बाहर जरूर कुछ और है।”
फिर बाहर से आवाज आई, “बेटा, मैं बाहर हूँ, दरवाजा खोल दे, मुझे बहुत ठंड लग रही है।”
कल्लू ने डरते हुए कुंडी की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन तभी दरवाजे के नीचे से काले लंबे बाल अंदर आने लगे।
कल्लू तुरंत पीछे हट गया और उसकी पत्नी ने बच्चे को अपनी बाँहों में कसकर पकड़ लिया।
बाहर से आवाज आई, “दरवाजा खोल, मुझे अंदर आने दे, इतनी ठंडी रात में मुझे बाहर खड़ा मत रख।”
अचानक दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा और घर की दीवारें भी उसके साथ काँपने लगीं।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
कल्लू और उसका परिवार पूरी रात डर के कारण एक-दूसरे से चिपककर बैठे रहे, लेकिन दरवाजा नहीं टूटा।
सुबह जब उन्होंने दरवाजा खोला, तो बाहर कोई नहीं था और आँगन में रात के कोई सामान्य निशान भी नहीं थे।
सिर्फ दरवाजे पर तीन गहरे खरोंच के निशान थे और मिट्टी पर लिखा था, “अगली अमावस्या तक…”
जमुना दादी का सच

सुबह रघु, मोहन और गौरी गाँव की सबसे बुजुर्ग महिला जमुना दादी के घर पहुँचे, क्योंकि उन्हें पुराने रहस्य की जानकारी थी।
जमुना दादी ने तीनों के चेहरे देखे और बिना कुछ पूछे समझ गईं कि पिछली रात गाँव में फिर कुछ भयानक हुआ था।
रघु ने जंगल, कुएँ, आवाज और पैरों के निशानों की पूरी घटना दादी को बता दी, जिसके बाद उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
जमुना दादी ने धीमी आवाज में कहा, “वह वापस आ गई है, इतने वर्षों बाद फिर वही अमावस्या हमारे सामने खड़ी है।”
रघु ने बेचैनी से पूछा, “कौन वापस आ गई है, दादी, आखिर आप किसकी बात कर रही हैं, मुझे सबकुछ साफ-साफ बताइए।”
जमुना दादी ने दरवाजे की तरफ देखा और बोलीं, “कामिनी, वही लड़की जिसकी मौत को गाँव वालों ने बीस साल पहले हादसा बताया था।”
कामिनी कभी इसी गाँव में रहने वाली गरीब लड़की थी और उसका कुछ प्रभावशाली लोगों के साथ गंभीर विवाद हो गया था।
एक अमावस्या की रात कामिनी जंगल के पास बने उसी सूखे कुएँ के पास गई थी, लेकिन उसके बाद कभी वापस नहीं लौटी।
गाँव वालों ने उसकी मौत को हादसा बताकर बात खत्म कर दी, मगर जमुना दादी जानती थीं कि असली कहानी कुछ और थी।
जमुना दादी ने काँपती आवाज में कहा, “कामिनी को मारा गया था, और उसकी मौत के पीछे गाँव का एक बड़ा रहस्य छिपा है।”
रघु ने तुरंत पूछा, “किसने मारा था उसे, दादी, अगर आपको सच पता है तो आज हमें सबकुछ बता दीजिए।”
जमुना दादी कुछ पल चुप रहीं, फिर दरवाजे की तरफ देखते हुए फुसफुसाईं, “उसका नाम लेना भी खतरा है, अभी नहीं।”
चुड़ैल का हमला

उसी रात गाँव के तीन अलग-अलग घरों में एक साथ तीन दस्तकें हुईं और लोगों के बीच डर फिर से फैल गया।
ठक… ठक… ठक…
एक घर में गौरी के पिता घायल हुए, दूसरे घर में कल्लू पर हमला हुआ और तीसरे घर में भोला चीखते हुए जाग गया।
भोला घबराकर बोला, “वह मेरे कमरे में थी, मैंने उसे अपने सामने खड़ा देखा था, फिर अचानक वह दीवार के अंदर गायब हो गई।”
लोग दौड़कर उसके घर पहुँचे और उसकी छाती पर बनी तीन गहरी खरोंचें देखकर सभी डर गए।
जमुना दादी ने तुरंत नीम की पत्तियाँ, काली तुलसी और पुराने मंदिर की राख से एक लेप तैयार किया।
उन्होंने घाव पर लेप लगाते हुए कहा, “यह सिर्फ उसके असर को कुछ समय रोक सकता है, लेकिन इससे वह हमेशा के लिए खत्म नहीं होगी।”
रघु ने परेशान होकर पूछा, “उसे खत्म कैसे करेंगे, दादी, अगर वह गाँव में लौटती रही तो लोगों की जान खतरे में पड़ती रहेगी।”
जमुना दादी ने रघु की तरफ देखा और धीमे स्वर में बोलीं, “उसे खत्म करना आसान नहीं है, क्योंकि उसके पीछे बहुत पुराना दर्द है।”
रघु ने फिर पूछा, “क्यों, ऐसा क्या हुआ था, जिसकी वजह से वह आज तक लोगों को डराने वापस आती है।”
जमुना दादी ने गहरी साँस लेकर कहा, “क्योंकि कामिनी अकेली नहीं है, उसके साथ उन आत्माओं का दर्द भी है जो उस रात मरी थीं।”
उन्होंने आगे बताया, “उस सूखे कुएँ के अंदर सिर्फ कामिनी की आत्मा नहीं है, वहाँ कई लोगों की चीखें भी कैद हैं।”
कमरे में बैठे सभी लोग चुप हो गए और किसी के पास दादी की बात का जवाब देने के लिए कोई शब्द नहीं था।
आखिरी अमावस्या

रघु, मोहन और गौरी ने फैसला किया कि अब इस रहस्य को हमेशा के लिए खत्म करने का प्रयास करना जरूरी था।
उन्हें श्यामलाल से पता चला कि पुराने मंदिर में कामिनी से जुड़ी कुछ पुरानी चीजें अब भी सुरक्षित रखी हुई थीं।
तीनों रात में पुराने मंदिर पहुँचे और अंदर कदम रखते ही उन्हें ऐसा लगा, जैसे मंदिर की दीवारें उनकी मौजूदगी महसूस कर रही हों।
मंदिर के भीतर धूल जमी थी, पुराने दीये टूटे पड़े थे और हवा में मिट्टी तथा नमी की अजीब गंध फैली हुई थी।
काफी खोजबीन के बाद उन्हें एक पुरानी तस्वीर मिली, जिसमें कामिनी शांत चेहरे के साथ खड़ी दिखाई दे रही थी।
रघु ने तस्वीर पलटी तो पीछे एक नाम लिखा दिखाई दिया, “रुद्र सिंह”, और यह नाम देखकर गौरी भी चौंक गई।
तभी मंदिर के पीछे से आवाज आई, “तुम लोगों को यह तस्वीर नहीं मिलनी चाहिए थी, अब तुमने बहुत पुराना सच देख लिया है।”
तीनों तेजी से पलटे और वहाँ ठाकुर रुद्र सिंह खड़ा था, जिसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
रुद्र सिंह वर्षों तक गाँव वालों से कामिनी की सच्चाई छिपाता रहा था और वही उस रात का आखिरी जीवित गवाह था।
लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और कह पाता, मंदिर के मुख्य दरवाजे पर अचानक तीन दस्तकें गूँज उठीं।
ठक… ठक… ठक…
रुद्र सिंह का चेहरा डर से सफेद पड़ गया और उसके मुँह से अचानक निकला, “नहीं, यह दोबारा नहीं हो सकता।”
मंदिर का दरवाजा अपने आप खुल गया और उसके बाहर अंधेरे में एक औरत की आकृति दिखाई दी।
वह कामिनी थी, उसके लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे और उसकी आँखों में वर्षों पुराना दर्द दिखाई दे रहा था।
कामिनी ने धीरे-धीरे चेहरा ऊपर उठाया और बोली, “बीस साल से मैं इसी रात का इंतजार कर रही थी, रुद्र सिंह।”
रुद्र पीछे हटते हुए बोला, “मैंने कुछ नहीं किया, कामिनी, तुम गलत आदमी के पास आई हो, मुझे छोड़ दो।”
कामिनी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “तुमने मुझे कुएँ में धक्का दिया था, और आज मैं तुम्हें वह रात याद दिलाने आई हूँ।”
रुद्र काँपते हुए बोला, “मैंने नहीं किया, मैंने तुम्हें नहीं मारा, तुम झूठ बोल रही हो।”
कामिनी अचानक भयानक आवाज में चीखी, “झूठ!”
मंदिर की सारी खिड़कियाँ एक साथ टूट गईं और अंदर रखे कई पुराने दीये उसी क्षण बुझ गए।
चारों तरफ घना अंधेरा छा गया और सूखे कुएँ की दिशा से सैकड़ों डरावनी आवाजें सुनाई देने लगीं।
आवाजें एक साथ चीख रही थीं, “हमें बाहर निकालो, हमें इस अंधेरे से बाहर निकालो, हम यहाँ वर्षों से कैद हैं।”
सबसे बड़ा रहस्य

रघु ने अंधेरे में मंदिर के नीचे पड़ा एक पुराना पत्थर देखा और उसे हटाते ही नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
तीनों सावधानी से उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे और कुछ देर बाद एक पुराने कमरे में पहुँच गए।
वह कमरा सूखे कुएँ के ठीक नीचे बना था और उसकी दीवारों पर नमी तथा पुराने खून जैसे काले निशान दिखाई दे रहे थे।
एक दीवार पर तेरह नाम लिखे हुए थे और रघु ने काँपते हाथों से उन नामों को पढ़ना शुरू किया।
वे सभी उन लोगों के नाम थे, जो बीस साल पहले कामिनी की मौत का असली सच जानते थे।
रघु की नजर आखिरी नाम पर जाकर रुक गई और वहाँ साफ लिखा था, “रुद्र सिंह।”
लेकिन उसके ठीक नीचे एक और नाम लिखा था और उसे देखते ही रघु के चेहरे का रंग उड़ गया।
वह नाम था, “रघु।”
रघु काँपते हुए बोला, “मेरा नाम यहाँ कैसे लिखा है, मैं तो उस समय इस गाँव की बातों से भी अनजान था।”
तभी पीछे से जमुना दादी की आवाज आई, “क्योंकि तुम कामिनी के बेटे हो, रघु, यही वह सच है जिसे सबसे ज्यादा छिपाया गया।”
रघु स्तब्ध होकर दादी को देखने लगा और उसके मन में बीते वर्षों की कई अनजानी बातें अचानक जुड़ने लगीं।
उसी पल कामिनी उसके सामने आ गई और इस बार उसका चेहरा डरावना नहीं बल्कि बेहद दुखी दिखाई दे रहा था।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और वह कुछ पल तक बिना बोले अपने बेटे को देखती रही।
कामिनी ने रघु की तरफ देखकर कहा, “मैं तुम्हें मारने नहीं आई थी, बेटा, मैं तुम्हें केवल सच बताने आई थी।”
रघु की आँखों में आँसू भर आए और उसने अपनी माँ को देखते हुए दर्द से भरी लंबी साँस ली।
लेकिन तभी पीछे से रुद्र सिंह ने हमला कर दिया और कामिनी ने तुरंत उसे पकड़ लिया।
उसी क्षण जमीन जोर-जोर से काँपने लगी और सूखे कुएँ की पुरानी दीवारों से पत्थर नीचे गिरने लगे।
मोहन और गौरी ने रघु को पकड़कर बाहर खींचना शुरू किया, क्योंकि पूरा कमरा किसी भी समय ढह सकता था।
कामिनी वहीं खड़ी रही और उसने आखिरी बार रघु की तरफ देखा, जैसे वर्षों बाद उसे अपने बेटे से विदा लेनी हो।
कामिनी ने धीमी आवाज में कहा, “आज मेरा बदला पूरा हुआ, अब शायद मुझे इस अंधेरे से मुक्ति मिल सकती है।”
अचानक उसके पीछे तेरह परछाइयाँ दिखाई दीं और वे सभी धीरे-धीरे सूखे कुएँ की तरफ बढ़ने लगीं।
कामिनी भी उन तेरह परछाइयों के साथ अंधेरे में गायब हो गई और उसके बाद चारों तरफ अचानक गहरी शांति छा गई।
क्या सच में खत्म हो गई थी चुड़ैल?

सुबह गाँव वालों ने देखा कि पुराना सूखा कुआँ पूरी तरह मिट्टी से भर चुका था और उसके आसपास की जमीन बदल चुकी थी।
जिस जगह से वर्षों तक डरावनी आवाजें आती थीं, वहाँ अब सिर्फ मिट्टी, टूटे पत्थर और सूखी घास दिखाई दे रही थी।
कई वर्षों बाद भैरवपुर में अमावस्या की रात बिना किसी चीख, आवाज या दस्तक के शांत बीती।
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गाँव वालों को लगा कि कामिनी और उसके साथ जुड़ी सारी आत्माएँ आखिरकार मुक्त हो चुकी हैं और अब डर खत्म हो गया है।
रघु ने भी धीरे-धीरे सामान्य जिंदगी में लौटने की कोशिश शुरू कर दी, लेकिन उसके मन में माँ की आखिरी बात हमेशा बनी रही।
समय गुजरता गया और लोगों ने उस डरावनी घटना को धीरे-धीरे अपनी पुरानी यादों का हिस्सा मान लिया।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि भैरवपुर की कहानी वास्तव में खत्म नहीं हुई थी।
एक साल बाद फिर वही दस्तक

उस घटना के ठीक एक महीने बाद फिर अमावस्या की रात आई और भैरवपुर पर वही काला अंधेरा छा गया।
रात के ठीक बारह बजे रघु अपने घर में गहरी नींद में सो रहा था और बाहर पूरा गाँव बिल्कुल शांत था।
अचानक रघु की आँख खुल गई और उसे महसूस हुआ, जैसे किसी ने उसे नींद से अचानक जगाया हो।
वह कुछ क्षण तक बिस्तर पर बैठा रहा और कमरे के अंधेरे को ध्यान से देखने लगा।
घर में बिल्कुल सन्नाटा था और बाहर हवा भी नहीं चल रही थी, तभी अचानक एक जानी-पहचानी आवाज सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
रघु बिस्तर पर सीधा बैठ गया और उसकी साँसें तेज हो गईं, क्योंकि वह आवाज उसके लिए बिल्कुल अनजान नहीं थी।
उसने डरते हुए दरवाजे की तरफ देखा और उसके चेहरे पर एक साल पहले वाला डर फिर लौट आया।
फिर दरवाजे के बाहर से आवाज आई, “बेटा, दरवाजा खोलो, मैं बाहर खड़ी हूँ, तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी है।”
रघु की आँखों से आँसू निकल आए और उसके हाथ काँपने लगे, क्योंकि वह आवाज बिल्कुल अपनी माँ जैसी लग रही थी।
लेकिन कुछ ही पल बाद रघु को महसूस हुआ कि वह आवाज कामिनी की नहीं थी।
वह आवाज उसकी अपनी थी और यही बात उसके डर को पहले से कई गुना ज्यादा भयानक बना रही थी।
तभी दरवाजे के बाहर कोई धीरे-धीरे फुसफुसाया, “रघु, इस बार मैं अकेली नहीं आई हूँ, मेरे साथ बाकी लोग भी हैं।”
रघु ने डरकर पीछे हटते हुए दरवाजे को देखा और उसे लगा, जैसे दूसरी तरफ कई लोग खड़े होकर उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों।
फिर दरवाजे पर आखिरी बार आवाज हुई—
ठक… ठक… ठक…
और उसी क्षण पूरे भैरवपुर के हर घर के दरवाजे पर एक साथ तीन दस्तकें गूँज उठीं।
ठक… ठक… ठक…
पूरे गाँव में लोग नींद से जाग गए, लेकिन किसी ने भी अपने घर का दरवाजा खोलने की हिम्मत नहीं की।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी, क्योंकि भैरवपुर में अगली अमावस्या की रात अभी बाकी थी।
____कहानी समाप्त____




