मजबूर माता – पिता और अनाथ आश्रम । Motivational Story In Hindi । Moral Story In Hindi ।

मजबूर माता - पिता और अनाथ आश्रम । Motivational Story In Hindi । Moral Story In Hindi । by Hindirama.com

मजबूर माता – पिता और अनाथ आश्रम । Motivational Story In Hindi । Moral Story In Hindi ।

शहर के बाहरी इलाके मे बना एक पुराना सा घर जिस घर मे रहते थे रामदीन और उनकी पत्नी शारदा देवी दोनों ने पूरा जीवन मेहनत ,त्याग और संघर्ष में बिता दिया था  । उन्होंने अपने इकलौते बेटे को पढ़ाया लिखाया , बड़ा आदमी बनाया । अपनी सारी खुशियां उस माता पिता ने अपने इकलौते बेटे रमेश पर पूरी तरह न्योछावर कर दिया था ।

अब कुछ महीनों बाद रमेश की शादी हुयी । सुनीता उनके घर की बहूँ बनकर आयी । वह भी बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी थीं । अब घर में बहूँ आ गई थीं, तो कुछ महीने सही से गुजर गए । सब ठीक ठाक ही चल रहा था । लेकिन धीरे – धीरे घर मे कलह बढ़ने लगा ।

सुनीता बार – बार यह कहने लगी कि यह बूढ़े लोग हर बातमे टोकते हैं । इनकी दवाइयों और देखभाल में कितना पैसा बर्बाद होता हैं । क्या हमें अपनी जिंदगी नहीं जीनी ? इनके ही आगे पीछे नाचते रहेंगे । ऐसी बातें रोज घर में रोज सुनाई देने लगी ।

मजबूर मे रामदीन और शारदा अपनी बहूँ सुनीता को कुछ भी नहीं बोलते थें । वे सोचते थें — कि बच्चें हैं , समझ जाएंगे । और वैसे भी वह दोनों घर मे क्लेश बिल्कुल नही चाहते थे । वह सोचते थें कि सुनीता समय आने पर सुधर जाएगी ।

पर एक दिन वही हुआ — जिसकी उन्होंने कल्पना भी नही की थीं ।

आश्रम की दहलीज

एक सुबह रमेश कार लेकरआया , और अपने माता पिता को कहा — कि माँ  – पिताजी आज आपको कहीं लेकर जाऊँगा आप तैयार हो जाओ । वहाँ आपकी अच्छी देखभाल होगी । शारदा देवी ने नं आँखों से पूछा — कि बेटा हमें कहाँ लेकर जा रहे हो । रमेश नें आंखे चुराते हुए कहा , बस आप चलो , मैं बता दूँगा ।

रमेश नें अपने माता – पिता को कार में बैठाया और कार को एक अनाथ आश्रम के आगे रोक दिया । अब शारदा देवी का कलेजा काँप उठा और उसके पति रामदीन की आँखों में आँसू आ गये । वे दोनों बोले कि बेटा ऐसा तुम क्यों कर रहें हों ।

रमेश ने कहा कि माँ पिताजी आप यहीं रहो हम आपको हर महीने कुछ खर्चा भिजवा देंगे । तभी बहूँ नें जल्दी – जल्दी उनका सारा समान उतारा और कहा —आप दोनों अब यही रहिए , आपका हमने सारा इंतजाम करवा दिया हैं । बस इतना कहकर उनके बेटे बहूँ वहाँ उन्हे छोड़कर चले गए । रामदीन और शारदा कुछ देर वहीं खड़े रहें । जैसे शरीर वहीं था और आत्मा कहीं खो गई हों । इतनी ही देर में अनाथ आश्रम के अंदर से कोई आया और उन्हे आश्रम के अंदर आने को कहा । मजबूर रामदीन और शारदा आश्रम मे चले गए ।

12 साल का पोता

रमेश का एक बेटा था — जो अब  12 साल का हो चुका था । जिसका नाम था सूरज । सूरज अपने दादा दादी से बहुत प्यार करता था । लेकिन सूरज को बताया गया था कि , उसके दादा दादी कहीं बाहर तीर्थ यात्रा पर गए हैं । लेकिन बच्चे की आंखे झूठ को जल्दी ही पहचान लेती हैं ।

कुछ ही दिनों बाद जब सूरज की जल्दी स्कूल से छुट्टी हुयी । तब  ही उसने बहुत जिद की , कि मुझे दादा दादी जी से मिलना हैं । सूरज इतनी जिद करता हैं कि , रमेश को उसे वृद्ध आश्रम लेकर जाना ही पड़ा ।

जैसे ही सूरज नें गेट पर अनाथ आश्रम लिखा देखा — तो उसकि आंखे फटी की फटी रह गई ।

मासूम पोता सूरज और दादा दादी

सूरज दौड़कर दादा दादी से लिपट गया । और बोला — दादी ! आप यहाँ क्यों हो ? दादा जी यह जगह तो अनाथों कए लिए हैं न ? शारदा देवी तो कुछ ना बोल सकी । फिर रामदीन कांपती आवाज में बोलता हैं — कि बेटा सूरज ! जब इंसान अपने ही घर में अनाथ हो जाए , तो उसे यहाँ आना पड़ता हैं ।

यह सुनकर सूरज चुप हो गया । अब उसकी आँखों में आँसू थें । उसने अपने माता – पिता की ओर देखा , फिर दादा – दादी की ओर देखा । इतनी सी उम्र में उसे यह सब देखना पड़ रहा था । अब सूरज को अपने माता – पिता पर बहुत क्रोध आ रहा था ।

माता – पिता को 12 साल के बेटे नें दिखया आईना

कुछ देर बाद सूरज नें अपने पिता से पूछा — कि पापा जब दादा – दादी बूढ़े हो गए तो ,आपने इन्हे अनाथ आश्रम छोड़ दिया । रमेश झुँझलाया , और बोला — बेटा तुम यह सब नहीं समझोगे ” तब सूरज नें बड़ी ही शांति से कहा — नहीं पापा में समझता हूँ ।


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फिर उसने दादा दादी का हाथ पकड़कर कहा — कि दादा दादी जी आप चिंता मत करो । ” जब पापा और ममी बूढ़ी हो जाएगी तो , तो मैं इन्हे भी यहीं अनाथ आश्रम में छोड़ूँ दूँगा । यह सुनते ही रमेश और सुनीता सन्न रह गए ।

अब सूरज आगे बोला — क्योंकि माँ पापा आपने मुझे यही सीखा दिया हैं कि बूढ़े माँ – बाप बोझ होते हैं । तो आज आप इनके बेटे हैं तो कल मैं आपका बेटा हूँ ।

टूट गया रमेश और सुनीता का अहंकार

12 साल के सूरज बेटे कए शब्द किसी हथौड़े की तरह रमेश के दिल पर पड़े । उसे अपने बचपन कए दिन याद आ गए । जब पिता रामदीन उसे साइकिल दिलाने के लिए अपनी मनपसंद घड़ी को भी बेच दी थीं । और उसकी माँ शारदा खुद भूखी रहकर भी उसे खाना खिलाती थीं ।

यह सब सोचकर अब रमेश की भी आँखों में आँसू बहने लगे । और उसकि पत्नी सुनीता का सिर भी शर्म से झुक गया । 

अब रमेश अपने बूढ़े माता – पिता के पैरों में गिरकर रोने लगा । और बोला ! माँ – पिताजी मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई । मुझे माफ़ कर दीजिए । 

सबकी खुशी खुशी घर वापसी 

उसी दिन रामदीन और शारदा देवी वापस अपने घर लौट आए । घर में फिर से रौनक लौट आयी । सुनीता अब हर रोज सुबह अपने सास ससुर के पैर छूती थी ।  रमेश पिता की दवा और उनके स्वास्थ्य का खुद ध्यान रखता था । 

और सूरज जिसने अपने माता – पिता को इतनी सी उम्र में सही रास्ता दिखाया , वह घर का सबसे समझदार सदस्य बन गया । जिसने अपने दादा – दादी को एक नई जिंदगी दी । उस दिन सूरज घर में सबका प्यारा बन गया । 

कहानी से सिख 

हम जो भी आज अपने माता – पिता के साथ कर रहें हैं , कल वो ही हमारे बच्चे भी हमारे साथ जरूर करेंगे । यही कर्मा हैं । जो सबका हिसाब लेता हैं । आप यह कभी मत भूलिए आज जो बूढ़े हैं वे कभी हमारे लिए पूरी दुनियाँ थें । 

माता – पिता बोझ नहीं , वह तो जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं ।  

Author: Hindi Rama

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