134 लोग और 9 साल का नर्क – Mystery In Hindi । Real Story In Hindi ।

134 लोग और 9 साल का नर्क - Mystery In Hindi । Real Story In Hindi । By Hindi Rama

134 लोग और 9 साल का नर्क – Mystery In Hindi ।

27 दिसंबर 1948 की रात दुनिया का सबसे बड़ा यात्री विमान डगलस डीc3 मियामी से फ्लोरिडा के लिये उड़ान भर रहा था। विमान मे 125 यात्री और नौ क्रू सदस्य कुल 134 लोग सवार थे । उत्तरी अटलांटिक  महासागर के ऊपर लगभग 8300 फीट की ऊंचाई पर विमान शांति से अपनी 180 मील प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा था ।

रात के 8:13 हुए थे। कॉकपिट मे कैप्टन रॉबर्ट मिलर और उनके को पायलट सब कुछ सामान्य  देख रहें थे। लेकिन अचानक सैन जॉन एयर ट्रैफिक कंट्रोल यानि एटीसी के साथ  उनका संपर्क कमजोर पड़ने लगा।

कैप्टन मिलर ने रिपोर्ट किया, कि उन्हे एक मामूली तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। यह उनकी आखिरी आवाज थी । इसके ठीक 10 सेकेंड के अंदर विमान एटीसी के रडार से हमेशा के लिए गायब हो गया। विमान की आखिरी लोकेशन बरमूडा ट्रायंगल के ठीक बीच मे थी। उस रात जो हुआ वह किसी तकनीकी खराबी से कही ज्यादा भयानक था।

वियमन दुनिया की सबसे रहस्यमयी जगह बरमूडा ट्रायं गल के  एक ऐसे बवंडर मे फस गया था ,  जिसके बारे मे ना कभी किसी ने सुना  होगा ना देखा होगा। पलक झपकते ही विमान के अंदर चीख पुकार मच गई । कैप्टन मिलर ने अपनी पूरी ताकत से प्लेन को संभालने  की कोशिश की लेकिन टकटक बहुत देर हो चुकी थी।

तूफान ने अपनी चपेट मे पूरे विमान को ले लिया था। और उसे किसी खिलौने की तरह घुमा रहा था। प्लेन के सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण , कंपास , रेडार सब कुछ बंद हो  चुका था। विमान अब किसी इंसान के नियंत्रण मे नही था। वह सिर्फ तूफान की रफ्तार मे अंधाधुन उड़े जा रहा था।

लगभग आधा घंटा उस भयंकर बवंडर मे जूझने के बाद जब विमान तूफान से बाहर निकला, तो चारों तरफ सिर्फ अंतहीन समंदर था। प्लेन के इंजन अभी भी काम नही कर रहे थे , और वह धीरे – धीरे नीचे की ओर गिर रहा था। तभी को पायलट की नजर के सामने एक द्वीप पर पड़ी।

वह एक अनजान अनछुआ द्वीप था । सबको पता था कि उनकी मौत बस कुछ ही दूरी पर है। विमान उस मौजूद विशाल काय पुराने पेड से जा टकराया । पेड़ की सैकड़ों मोटी डालियों ने विमान को किसी जाल की तरह अपने अंदर  फंसा लिया और यही वो चमत्कार था जिसने 134 लोगों की जान तो बचा ली, विमान के पेड़  मे  फंस जाने से यात्रियों की जान तो बच गई , लेकिन यह एक दर्दनाक शुरुआत थी।

विमान के अंदर से रोने और कराने की आवाज  आ  रही थी । कैप्टन रॉबर्ट मिलर जिनका सिर एक पैनल से टकरा गया था, होश मे आते ही हरकत मे  आ  गए। उन्होंने तुरंत लोगों को शांत करवाया । विमान मे सवार एक रिटायर्ड आर्मी डॉक्टर एवलिन रीड ने बिना समय गवाये घायलों की देखभाल शुरू कर दी।

कुल 10 लोग गंभीर रूप से घायल थे। किसी हाथ टूटा था, तो किसी का पैर और किसी के सिर पर गहरी चोट आई थी । बाकी सभी लोग सदमे मे थे। लेकिन  सुरक्षित थे। जब सब धीरे – धीरे विमान से उतरे , तो उन्होंने महसूस किया कि वे कहाँ आ फंसे हैं।

यह एक ऐसा द्वीप था, जो नक्शे पर मौजूद नही था । चारों तरफ घना जंगल , अजीबोगरीब पेड़ पौधे और एक अनजानी खामोशी थी। सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती थी पानी। हर कोई प्यासा था। लेकिन पूरे द्वीप पर दूर- दूर तक किसी नदी, झरने या साफ पानी के स्त्रोत का कोई निशान नही था। उनकी एकमात्र उम्मीद अब सिर्फ बारिश का पानी थी।

कैप्टन मिलर ने अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए लोगों को समूहों मे बाँटा। एक समूह को विमान के खाने – पीने के मलबे से समान , दवाईयां  और काम की चीजे निकालने का काम सौंपा गया। दूसरा समूह कैप्टन के साथ मिलकर रात गुजारने के लिए एक अस्थायी आश्रय बनाने मे जुट गया।

उन्होंने विमान की टूटी हुई सीटों, धातु की चादरों और बड़े – बड़े पत्तों का इस्तेमाल करके एक काम चलाऊ छत तैयार की , जो उन्हे रात की ठंड और संभावित बारिश से बचा सके। उस पहली रात जब सब लोग एक दूसरे से सट  कर बैठे थे,  तो उनके दिलों मे एक ही सवाल था । क्या कोई उन्हे ढूँढने आएगा ?

क्या कभी वह  लोग एक अनजान जगह से निकल पाएंगे? दूसरे दिन की सुबह एक नई चुनौती लेकर आई । भोजन की कमी और आगे जलाने की तकनीकी ।  विमान से जो थोड़ा – बहुत खाना मिला था। वह ज्यादा दिन नही चलने वाला था।

उन्हे द्वीप पर ही भोजन खोजना था , लेकिन कौन सा फल जहरीला है, और कौन स फल खाने के  लायक है ? यह जानने का कोई तरीका नही था , इसी कोशिश मे एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने एक अनजान फल कहा लिया , और कुछ ही घंटे मे उसकी वही  तड़प – तड़प कर मौत हो गई।

यह द्वीप पर पहली मौत थी जिसने सबको अंदर  से हिला  कर रख दिया। इस घटना के बाद लोगों के मन मे डर और सीमित भोजन को लेकर पहला संघर्ष शुरू होता। लेकिन कैप्टन मिलर और डॉक्टर ऐडवीन ने स्थिति को संभाला। उसेे  शाम एक किशोर लड़के ने जिसे विज्ञान मे रुचि थी।

अपने चश्मे का उपयोग करके सूरज की  किरणों को सुखी पत्तियों पर केंद्रित किया । घंटों की मेहनत के बाद पत्तियों मे धुएं की एक पतली लकीर उठी , और फिर एक छोटी सी लौजल उठी । वह आग के रूप मे दिखी ।

यह उनके सब लोगों के लिए जीत से कम नही थी। आग ना केवल खाना बनाने के लिए जरूरी थी बल्कि, यह रात मे जंगली जानवरों को भी दूर रख सकती है । इसी बीच विमान के एक इंजीनियर आथर्र वैस ने टूटे हुए रेडियो को ठीक करने  की  कोशिश की ।

कड़ी मसकक्त के बाद वह कमजोर सिग्नल भेजने मे कामयाब रहा । उसने अपनी आखिरी लोकेशन और मदद का संदेश भेजा। लेकिन बहुत इंतजार के बाद भी  सामने से कोई जवाब नही आया । रेडियो की बैटरी खत्म हो चुकी थी । और संपर्क एक मात्र जरिया भी टूट चुका था।

⇒  दिन बीतते गए। जब 10 दिन बाद भी बचाव का कोई संदेश नही मिला तो चार लड़के और एक लड़की का सब्र जवाब दे गया । एक रात जब सब सो रहे थे तो वो लोग , चुपके से विमान के मलबे  से बनी एक छोटी सी नाव लेकर समुद्र मे उतर गए ।

⇒  वे कभी फिर वापस लौट कर नही आए , उनका क्या हुआ , और वे लोग कहाँ गए इसका कोई पता नही चला बस एक रहस्य बनकर रह गया। उन पाँच लोगों के जाने के बाद , बचे हुए लोगों को एहसास हो गया कि उन्हे लंबे समय तक यही रहना पड़ेगा।

⇒  कैप्टन मिलर ने सबको इकट्ठा किया, और एक अस्थायी व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा । काम का बंटवारा किया गया। एक टीम रोजाना भोजन और फल  इकट्ठा करने के लिए जंगल मे जाती , । दूसरी टीम आश्रय को और मजबूत बनाने और उसकी मरम्मत करने का काम करती थी।

⇒  डॉक्टर ऐल्विन और कुछ अन्य लोगों ने घायलों और बीमारों की देखभाल का जिम्मा संभाला। दूसरी ओर अमेरिका ने विमान को ढूँढने के लिए इतिहास का सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। अटलांटिक महासागर के चप्पे – चप्पे को छान मारा गया।

⇒  लेकिन विमान का एक टुकड़ा भी नही मिला, एक सप्ताह के लगातार खोज के बाद भी जब कोई सुराग नही मिला , तो अभियान धीमा पड़ गया। इसी बीच द्वीप पर बचे हुए लोग जीने के लिए कला सिखनी शुरू कर दिए।

उन्होंने द्वीप के पत्थरों और विमान की धातु को घिस- घिसकर चाकू और  भाले जैसे औजार बनाए, सबसे बड़ी चुनौती जंगल के खतरनाक जानवर जिनमे से एक सुआ थे जो , झुंड मे रहते थे। और रात मे उनके  शिवर पर हमला कर देते थे।

विमान मे एक शिकार ट्रेनर भी था, जिसने लोगों को भाला चलाना सिखाया । कई दिनों के योजना और अभ्यास के बाद उन्होंने अपने पहले जंगली सूअर का शिकार किया। यह एक भयानक और भावनात्मक क्षण था। शिकार के दौरान दो लोग घायल भी हो गए।

लेकिन जब वे लोग शिकार को लेकर शिवर मे लौटे तो, यह सिर्फ भोजन नही था, यह उनकी एकता और दृढ़ संकल्प की जीत थी। उन्होंने द्वीप के किनारे टूटे हुए नारियल के तनों से रेत पर बड़े – बड़े अक्षरों मे हेल्प लिखा ।

⇒  वे लोग एक उम्मीद मे थे कि शायद कोई गुजरता हुआ जहाज या  विमान इसे देखे तो हमारी मदद कर दे। उस दर्दनाक सफर पर 6 महीने बीत चुके थे। बाहरी दुनिया के लिए NC 16002 विमान और उसमे सवार 134 लोग एक अनसुलझी पहेली बनकर रह गए थे।

45 मिलियन खर्च करने के बाद अमेरिका सरकार ने आधिकारिक तौर पर सर्च ऑपरेशन बंद कर दिया । और  सभी को लापता घोषित कर दिया कि सब उनके प्रियजनों के लौटने की कोई उम्मीद नही है ।

लेकिन यहाँ इस अनजान द्वीप पर नया समुदाय जन्म ले रहा था । जो लोग गंभीर रूप से घायल थे , वे डॉक्टर ऐल्विन की देख भाल मे धीरे – धीरे ठीक हो रहे थे, और छोटे – मोटे कामों मे हाथ बटाने  लगे थे। लेकिन इस दौरान बीमारी और निराशा के कारण कुछ और लोगों की मौत हो गई। बचने का कोइ रास्ता नही देखते हुए कई लोग मानसिक रूप से टूट चुके थे।

और उन्होंने दम तोड़ दिया । अब द्वीप पर केवल 114 लोग बचे थे। उन्होंने अपने मृतकों को सम्मान के साथ दफनाना शुरू कर दिया। और एक दूसरे का मानसिक सहारा बने। रात मे जब सब लोग आग के चारों ओर इकट्ठा होते तो वेअपने पुराने जीवन की कहानियाँ सुनाते , गाने गाते।

लगभग डेढ़ साल बाद किसी बच्चे की किलकारी गूंजी । एक युवा जोड़े के यहाँ एक स्वस्थ्य बेटे का  जन्म हुआ । उस बच्चे का जन्म द्वीप पर मौजूद हर इंसान के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया । 2 साल बीत गए । एक दौरान उन्होंने द्वीप पर जीना सीखा ।

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उन्होंने छोटी  – मोटी खेती भी शुरू कर डी थी, और मछली पकड़ने के नए नए तरीके इजाद कर लिए थे । लेकिन सभ्य दुनिया मे लौटने की इच्छा अभी भी उनके दिलों मे चल रही थी। इंजीनियर आर्थर वेंस के नेतृत्व मे सभी ने मिलकर एक बड़ी नाव बनाने का फैसला किया। यह उनका सबसे बड़ा और सबसे महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट था।

महीनों की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने विमान के टुकड़ों , लकड़ी और बेलो का उपयोग करके एक बड़ी मजबूत नाव तैयार की। जिस दिन उन्होंने नाव को समुद्र मे उतारा वो किसी त्यौहार से  कम नही था। 25 सबसे मजबूत और अनुभवी लोगों को उस नाव पर सवार किया गया।

इस वादे के साथ कि मदद लेकर लौटेंगे । नाव द्वीप  से कुछ मील तक तो ठीक चली लेकिन फिर मौसम ने अपना असली रूप दिखाया । अचानक आसमान मे काले बादल घेर लिया । ऊँची – ऊँची लहरों ने नाव को पलट कर रख दिया । उनमे से कुछ लोग तैर कर द्वीप के किनारे वापस पहुँच गए।

लेकिन उस हादसे मे 16 और जाने चली गई । कुल मिला कर 31 लोगो की मौत हो चुकी थी। और पाँच पहले ही भाग गए थे। अब द्वीप पर केवल 98 लोग बचे थे । इस घटना ने उनके बचने के विश्वास को चकनाचूर कर दिया था।

कई लोगों ने  मान लिया था कि , यह द्वीप ही उनकी कब्र बनेगा। और यहाँ से निकलने की कोशिश करना मतलब मौत को दावत  देने के बराबर है । 5 साल गुजर चुके थे, जो बच्चे द्वीप पर पैदा हुए थे , उनके लिए यही उनकी दुनिया बनगई थी।

उन्होंने कभी कार , बिजली या शहर नही देखे थे। बड़े लोग उन्हे अपने पुराने  जीवन की कहानियाँ सुनाते  थे जो उन बच्चों के लिए किसी परी की कहानी से कम नहीं थी। लेकिन समय के साथ समाज मे दरारे पड़ने लगी। द्वीप के प्रकृतिक संसाधन जैसे कि एक खास किस्म के फलदार पेड़ और छोटे जानवर कम होने लगे थे।

भोजन के कमी के कारण लोगों के बीच तनाव का कारण बन गया । अब वे लोग दो गुटों मे बंट गए थे, एक गुट  जिसका नेतृत्व कैप्टन मिलर कर रहे थे तो दूसरे गुट का नेतृत्व एक हताश व्यक्ति कर रहा था। उन लोगों का मानना था कि यही उनकी नियति है और उन्हे बाहरी दुनीया को भूलकर इसी द्वीप पर बस जाना चाहिए ।

क्योंकि बाहर निकलने की हर कोशिश सिर्फ मौत लेकर आई थी ।  इसी बीच भोजन के तलाश मे एक खोजी दल द्वीप के अंदरूनी हिस्से मे गया  जहाँ उन्हे कुछ ऐसा मिला , जिसने उनके रोंगटे खड़े कर दिए। उन्हे किसी प्राचीन टूटी – फूटी सभ्यता के खंडर मिले और उन्हे खँड़रों के पास  गुफ़ा के अंदर उन्हे एक इंसान का कंकाल मिला।

कंकाल के पास धातु का एक छोटा स जंग लगा टुकड़ा था जो किसी पुराने विमान का हिस्सा लग रहा था । यह इस बात का सुबूत था कि वे इस द्वीप पर फँसने वाले पहले लोग नही थे। बरमूडा ट्रायंगल का रहस्य और भी गहरा हो गया था।

क्या इस द्वीप का कोई श्राप था ? क्या यहाँ आने वाला हर कोई यही मर जाता है ? इस सवालों ने उन्हे और भी डरा दिया । 7 साल बीते थे। इन दो सालों मे तनाव ,भोजन की कमी और बीमारियों के कारण 16 लोगों की और मौत हो गई।

⇒  अब उनकी संख्या घट कर सिर्फ 82 ही रह गई। लोगों ने जीने की उम्मीद लगभग छोड़ ही  दी थी । वेबस दिन काट रहे थे ऐसा लग रहा था, कि कोई चीज इससे ज्यादा बुरी नही हो सकती लेकिन वे लोग गलत थे ।

आंतहवे साल की एक दोपहर द्वीप पर एक भयानक चक्रवात आया । तेज हवाओ और मूसलाधार बरिशों ने उनके लंबे समय के बनाए गए बसीरों और छोटी – मोटी फसलों को तहस – नहस कर दिया।  उन्होंने जो कुछ भी बनाया था सब कुछ बिखर गया। उनके जीने का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था।

वे खुले आसमान के नीचे भीगते हुए काँपते हुए बैठे थे । और सोच रहे थे कि शायद अब अंत आ  गया  है । चक्रवात के कुछ हफ्ते बाद जब वह अभी उभरने की कोशिश हो कर रहे थे । द्वीप एक जोरदार भूकंप से कांप उठा।

जमीन ऐसे हिल रही थी जैसे फट जाएगा । पहाड़ टूट कर गिरने लगे और पेड़ जड़ से उखड़ गए। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए इधर – उधर भाग रहे थे। यह भूकंप विनाशकारी था। लेकिन अनजाने मे यह भूकंप उनके उद्धार का कारण बनने वाला था।

भूकंप के कारण विमान का जो मलबा सालों से एक ही जगह बड़ा था, वह अपनी जगह से खिसक गया और उसके नीचे दबे कुछ तार  और उपकरण बाहर आ गए । किसी को नही पता था कि यह छोटी सि घटना , उनकी 9 साल की पीड़ा का अंत लिखने वाली है।

भूकंप के कुछ दिन बाद जब सब कुछ शांत हुआ तो इंजीनियर आर्थर वेंस यूँ ही टूटे हुए मलबे का निरीक्षण कर रहा था । तभी उसकी नजर विमान के उस रेडियो पर पड़ी , जो अब एक अलग कोण पर था ,। उसी समय वैज्ञानिकों के अनुसार एक तीव्र सौर तूफान जिसे सोलर फ्लेयर कहते हैं।

वो उठा जिसने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित किया। यह एक दुर्लभ खगोलीय घटना थी। शायद इसी घटना के कारण या भूकंप से हीले तारों के जुड़ जाने से एक चमत्कार हुआ। ऑर्थर वेंस ने ज़्ब्यून ही रेडियो का एक स्विच दबाया, तो उसमे से एक हल्की  सी खरखराहट की आवाज आई।

उसके दिल की धड़कन बद्ध गई उसने कापते हाथों से बैटरी के बचे कुछ तारों को जोड़ा और 9 मे पहली बार रेडियो के हरी बत्ती जल उठी । उसने तुरंत माइक उठाया और एक कनपटी हुई आवाज से कहा, मेडे – मेडे – मेडे यह फ्लाइट एनसी 16002 है।

क्या कोई  सुन रहा है ? हम जिंदा है हम 9 साल से एक द्वीप पर फंसे हैं, दूसरी तरफ मियामी के एयर ट्रैफिक कंट्रोल मे एक ऑपरेटर ने यह संदेश सुना तो उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । उसने सोचा कि यह कोई मजाक है।

लेकिन जब आर्थर ने विमान का रजिस्ट्रेशन नंबर , कैप्टन का नाम और उड़ान की तारीख बतायी तो पूरे , कंट्रोल रूम मे सन्नाटा छा गया। अमेरिका सरकार ने तुरंत रेसक्यू ऑपरेशन फिर से शुरू कर दिया ।

उस समय सेटे लाईट तकनीकी इतनी उन्नति नही थी, कि वेलोग लोकेशन को ट्रैक कर सके । उन्हे बस इतना पता कि विमान बरमूडा ट्रायंगल के आसपास कही है। उन्होंने उस पूरे इलाके के एक – एक द्वीप को फिर छानने का फैसला किया ।

दूसरी ओर द्वीप पे मौजूद लोगों मे आशा  की एक नई किरण ने जन्म लिया । वे दिन रात एक बड़ी आग जलाकर धूँआ करते रहते थे ताकि, बचाव दल उन्हे देख सके। 9 साल पूरे 9 साल बीत ही चुके थे । एक सुबह जब द्वीप के बचे – खुचे लोग सॉकर उठे तो उनमे से एक ने दूर क्षितिज पर एक छोटा सा धब्बा देखा।

वो धब्बा धीरे – धीरे बड़ा हो रहा था , वो एक जहाज था । वो एक अमेरिका नौसेना का ही  जहाज था , जो उनकी तलाश मे आया था। उस जहाज को देखते ही 9 साल का दबा हुआ दर्द, पीड़ा और इंतजार सब कुछ आँसुओ के सैलाब मे बह गया।

लोग खुशी से चीख रहे थे , वे रेत पर दौड़ रहे थे । रो रहे  थे , एक दूसरे को गले लगा रहे थे । वे रेत पर  दौड़ते हुए चिल्ला रहे थे। हम बच गए  । हम बच गए जब बचाओ दल द्वीप पर उतरा तो वे वहाँ का दृश्य देखकर सन्न रह गया ।

जिन्हे दुनिया 9 साल पहले मृत मान चुकी थी वे आज उनके सामने खड़े थे । थके हुए  कमजोर लेकिन जिंदा । उनकी वापसी की कहानी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख  दिया । यह मानव की सहनशक्ति  और जीने की इच्छा की एक अविश्वसनीय  कहानी है।

जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों की वापस लौटने की उम्मीद छोड़ दि थी, वे आज उनसे मिल रहे थे, वह पल सबलोग इतने भावुक थे कि उन्हे शब्दो मे बयां नही किया जा सकता । अमेरिका मे यह कहानी एक किंवदंती बन गई जो आज भी लोगों के दिलों मे बसी है।

ठीक एक साल बाद 1958 मे प्रसिद्ध लेखक जेम्स बाडविन ने इन बचे हुए लोगों के अनुभवों पर आधारित एक किताब लिखी जिसका नाम था लॉस्ट इन द इको द न ईयर सर्वाइवल ऑफ फ्लाईट एनसी 16002 । यह किताब अमेरिका की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों मे से एक है ।

यह सिर्फ एक कहानी नही थी यह उन 82 आत्माओ की दर्दनाक दास्तान थी जिन्होंने 9 साल तक मौत को मात दी और हमे सिखाया कि उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी सबसे घने अंधेरे को चीर सकती है ।

⇒  जीवन मे कितनी ही बड़ी परेशानी क्यू ना हो पर उन हर परेशानियों का सामना करना ही सबसे बड़ी जीत है ।

Author: Hindi Rama

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