शापित चिट्ठी का खौफ़ एक ऐसी रहस्यमयी कहानी है, जिसमें एक पुराना लिफाफा लोगों की जिंदगी को ऐसे अंधेरे में धकेल देता है, जहाँ से लौटना आसान नहीं। बिहार के चंद्रपुर गाँव में रहने वाले रमेश कुमार ने कभी भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं किया था। मगर काजल की सुनाई कहानी और उस मनहूस चिट्ठी ने उसकी दुनिया बदल दी। जब उसका दोस्त सुभाष उसे बचाने की कोशिश करता है, तो उसे भी एक ऐसा फैसला लेना पड़ता है, जिसकी कीमत किसी की पूरी जिंदगी हो सकती है।
शापित चिट्ठी का खौफ़: एक कहानी, जो सुनने वाले को कर लेती है कैद
रमेश कुमार बिहार के छोटे से गाँव चंद्रपुर में रहता था। वह साधारण जिंदगी जीता था और भूत-प्रेत की बातों पर हँस देता था। उसका मानना था कि डर इंसान के मन में पैदा होता है, किसी परछाईं या आत्मा में नहीं।
उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। बचपन का दोस्त सुभाष ही उसके लिए परिवार जैसा था। सुभाष मुंबई में नौकरी करता था और कभी-कभी गाँव आता था। दोनों के बीच ऐसी दोस्ती थी, जिसमें बिना कहे भी एक-दूसरे का दर्द समझ लिया जाता था।
रमेश की जिंदगी शांत थी, लेकिन गाँव के बाहर पुराने बरगद के पास उसकी मुलाकात एक लड़की से हुई। उसका नाम काजल था। वह पिछले कुछ दिनों से गाँव के आसपास दिखाई दे रही थी। उसके चेहरे पर थकान और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।
एक शाम काजल ने रमेश को रास्ते में रोक लिया।
“रमेश, क्या तुम मेरी एक बात सुनोगे?”
रमेश ने मुस्कराकर कहा, “हाँ, बोलो। तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?”
काजल ने पहले आसपास देखा, फिर धीमी आवाज में बोली, “अगर मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊँ, तो क्या तुम उसे अंत तक सुनोगे?”
“कहानी ही तो है। इसमें डरने वाली कौन-सी बात है?”
काजल के चेहरे पर उदासी फैल गई। “हर कहानी सिर्फ कहानी नहीं होती। कुछ कहानियाँ सुनने वाले को अपने भीतर कैद कर लेती हैं।”
रमेश हँस पड़ा। उसे लगा कि लड़की किसी अंधविश्वास में फँसी हुई है।
“अच्छा, सुनाओ। देखते हैं तुम्हारी कहानी में ऐसा क्या है।”
काजल ने कुछ पल उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में ऐसा डर था, जिसे देखकर रमेश की हँसी धीरे-धीरे गायब हो गई।
“याद रखना,” उसने कहा, “मैंने तुम्हें रोकने की कोशिश की थी।”
इसके बाद काजल ने नाहर सिंह और साधना की कहानी सुनानी शुरू की। वह कहानी चंद्रपुर से बहुत दूर बसे एक गाँव की थी, जहाँ नाहर सिंह की लिखी चिट्ठी का डर आज भी लोगों को सताता था।
रमेश ध्यान से सुनने लगा। उसे अभी भी विश्वास नहीं था कि उस कहानी का उससे कोई संबंध हो सकता है।
लेकिन काजल की आवाज में कुछ ऐसा था, जिसने उसे बीच में उठकर जाने नहीं दिया।
वह नहीं जानता था कि कहानी सुनने का उसका फैसला उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा पछतावा बनने वाला है।
नाहर सिंह का जुनून और साधना का डर

काजल ने बताया कि कई साल पहले एक गाँव में नाहर सिंह नाम का लंबा-चौड़ा आदमी रहता था। उसका रंग गहरा साँवला था और स्वभाव कठोर था। वह साधना नाम की युवती के पीछे पड़ा रहता था, जबकि साधना उससे दूर रहना चाहती थी।
नाहर सिंह अक्सर साधना का रास्ता रोकता और उसे परेशान करता था। कभी वह खेतों के पास दिखाई देता, तो कभी जंगल में लकड़ियाँ बीनते समय उसके सामने आ जाता। साधना कई बार उसे साफ मना कर चुकी थी, लेकिन वह उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
साधना के पिता रामप्रसाद, माँ कमला देवी और भाई वीरेंद्र थे। एक दिन जंगल के सुनसान रास्ते पर नाहर सिंह ने साधना के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। साधना किसी तरह खुद को छुड़ाकर घर भागी और उसने परिवार को पूरी बात बता दी।
रामप्रसाद और वीरेंद्र गुस्से में गाँव के कुछ लोगों को साथ लेकर नाहर सिंह के घर पहुँचे। वहाँ कहासुनी हुई और गुस्से में लोगों ने नाहर सिंह को बुरी तरह पीट दिया। उसके सिर पर गंभीर चोट लगी और वह जमीन पर गिरकर बेहोश हो गया।
लोग उसे वहीं छोड़कर चले गए। किसी ने यह जाँचने की कोशिश नहीं की कि वह जीवित था या मर चुका था। सबको लगा कि वह बेहोश है और कुछ समय बाद होश में आ जाएगा। मगर उस रात उसके घर में जो हुआ, उसका सच किसी को पता नहीं चला।
रात गहराने के बाद नाहर सिंह ने आँखें खोलीं। उसके सिर से खून बह रहा था। घर में कोई नहीं था और चारों तरफ अजीब खामोशी फैली हुई थी। उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है। उसने देखने की कोशिश की, लेकिन वहाँ सिर्फ अँधेरा था।
उसने काँपते हाथों से कागज और कलम उठाई। फिर साधना के नाम एक चिट्ठी लिखने लगा। उसके शब्दों में पछतावा नहीं था। उनमें गुस्सा, जुनून और ऐसा अँधेरा था, जो किसी इंसान के मन में नहीं होना चाहिए।
नाहर सिंह की आखिरी चिट्ठी
साधना…
अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि नाहर सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहा। लेकिन मेरा मरना और मेरा खत्म होना एक बात नहीं है।
तुमने मुझे ठुकराया। तुम मुझसे दूर भागीं। तुमने गाँववालों से मुझे पिटवाया और मेरे खून से मेरे ही घर की मिट्टी लाल करवा दी। तुम सबने सोचा होगा कि नाहर सिंह मर गया। लेकिन तुम गलत हो, साधना। मैं अभी भी यहीं हूँ।
मुझे नहीं मालूम कि उस रात मेरी साँसें थम गई थीं या मैं सिर्फ बेहोश पड़ा था। जब मैंने आँखें खोलीं, तो चारों तरफ अँधेरा था। मेरे सिर से खून बह रहा था और घर में कोई नहीं था। तभी मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई दी। तुम वहाँ नहीं थीं, फिर भी कोई मेरे कानों में तुम्हारा नाम फुसफुसा रहा था। उसी पल मैंने फैसला कर लिया कि अब तुम्हारी हर रात मेरी होगी।
जब तुम रात में कमरे का दरवाजा बंद करके सोने जाओगी, तो तुम्हें लगेगा कि कोई बाहर खड़ा है। तुम दरवाजा खोलोगी, मगर वहाँ कोई नहीं मिलेगा। वापस पलंग पर लेटोगी, तो नीचे से किसी के साँस लेने की आवाज आएगी।
तुम डरते हुए नीचे झाँकोगी। वहाँ अँधेरा होगा। मगर उसी अँधेरे में तुम्हें दो खुली आँखें दिखाई देंगी। वे आँखें मेरी होंगी।
तुम चीखकर माँ के पास भागोगी। कमला देवी तुम्हें लेकर कमरे में लौटेंगी, तो पलंग के नीचे कुछ नहीं होगा। वे कहेंगी कि यह तुम्हारा वहम है। मगर मैं तुम्हारे पीछे खड़ा होकर हँस रहा होऊँगा।
एक दिन तुम आईने के सामने बाल सँवारोगी। तुम्हें अपने पीछे एक लंबा-चौड़ा आदमी दिखाई देगा। उसका चेहरा अँधेरे में डूबा होगा और सिर पर सूखे खून के निशान होंगे। तुम पीछे मुड़ोगी, तो वहाँ कोई नहीं होगा। दोबारा आईने में देखोगी, तो मैं तुम्हारे और करीब खड़ा होऊँगा। तुम्हारी गर्दन पर ठंडी साँस महसूस होगी।
तुम आँखें बंद करोगी। जब खोलोगी, तो मेरा चेहरा तुम्हारे चेहरे के ठीक पीछे होगा। फिर तुम्हें आवाज सुनाई देगी—“साधना… तुमने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”
तुम्हारे घर की दीवारें भी तुम्हें बचा नहीं पाएँगी। कभी सीढ़ियों के पीछे मेरी परछाईं होगी, कभी आँगन में मेरे पैरों की आवाज सुनाई देगी। तुम्हारे पिता रामप्रसाद दरवाजा खोलेंगे, मगर बाहर कोई नहीं होगा। तुम्हारा भाई वीरेंद्र लालटेन लेकर पूरा घर देखेगा, फिर भी उसे कुछ नहीं मिलेगा।
रात के ठीक बारह बजे, जब सब सो जाएँगे, मैं तुम्हारे कमरे के बाहर खड़ा होकर पुकारूँगा—“साधना… दरवाजा खोलो। मैं आ गया हूँ।”
तुम चादर के भीतर छिप जाओगी। माँ तुम्हें सीने से लगा लेंगी, मगर दस्तक बंद नहीं होगी। पहले धीरे-धीरे, फिर जोर-जोर से। आखिर दरवाजे के दूसरी तरफ से तुम्हारी ही आवाज आएगी—“माँ, दरवाजा खोलो… मैं बाहर खड़ी हूँ।” जबकि तुम माँ के पास बिस्तर पर बैठी काँप रही होगी।
तब तुम्हें समझ आएगा कि मैं सिर्फ तुम्हारे सपनों में नहीं हूँ। मैं तुम्हारे डर में हूँ, तुम्हारी परछाईं में हूँ और तुम्हारी हर साँस के पास हूँ।
तुम हर आईना ढक दोगी। पलंग के नीचे देखना छोड़ दोगी और रात में अकेले कमरे में जाना बंद कर दोगी। मगर डर से भागकर कहाँ जाओगी? जंगल में भी मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा। घर में तुम्हारी दीवारों के पीछे खड़ा रहूँगा। परिवार के पास भी तुम्हें लगेगा कि कोई पीछे खड़ा है।
जब तुम अँधेरे में मेरा नाम पुकारोगी, तब मैं तुम्हारे सामने आऊँगा। मेरी उँगलियाँ तुम्हारे कंधे पर महसूस होंगी। तुम भागना चाहोगी, मगर तुम्हारे कदम जम जाएँगे। मैं तुम्हारे कान के पास झुककर कहूँगा—“अब बहुत भाग लीं, साधना। अब तुम्हारी बारी है।”
इस चिट्ठी को पढ़कर तुमने मेरे शब्दों को अपने भीतर जगह दे दी है। अगर तुम्हें लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो चिट्ठी बंद कर दो। मगर बंद करने से पहले पीछे देख लेना। हो सकता है, जब तुम आखिरी पंक्ति पढ़ रही हो, तब मैं तुम्हारे ठीक पीछे खड़ा हूँ।
अगर आईने में तुम्हारा चेहरा दिखाई न दे, तो आवाज मत लगाना। अगर पलंग के नीचे से कोई तुम्हारा पैर पकड़ ले, तो नीचे मत झुकना। अगर तुम्हारी माँ तुम्हें पुकारे, जबकि वह तुम्हारे सामने बैठी हो, तो जवाब मत देना।
जब सब शांत हो जाए, तब पलंग के नीचे से तीन बार दस्तक आएगी। तीसरी दस्तक पर तुम्हें अपने कान के पास मेरी आवाज सुनाई देगी—“मैं आ गया हूँ।” तुम चीखना चाहोगी, मगर आवाज नहीं निकलेगी। तुम्हारी आँखें खुली होंगी, मगर शरीर हिल नहीं पाएगा। कोई तुम्हारे चेहरे के पास झुककर तुम्हारी साँसें गिनेगा।
मुझे खुद नहीं मालूम कि मैं कौन हूँ। शायद मर चुका हूँ, शायद अब भी इसी घर में पड़ा हूँ। मगर तुम्हें ढूँढ़ने का रास्ता मुझे याद है। जहाँ भी जाओगी, तुम्हारे पीछे एक परछाईं चलेगी। जिस रात तुम्हें अपनी और मेरी परछाईं एक साथ दिखाई दे, समझ लेना कि मैं बहुत करीब हूँ।
तुम मुझसे दूर भाग सकती हो, साधना, लेकिन इस चिट्ठी में लिखे शब्दों से नहीं। अब तुम जानती हो कि मैं तुम्हें ढूँढ़ सकता हूँ। और जब तक कोई मेरी पूरी कहानी किसी दूसरे को नहीं सुनाता, यह अँधेरा किसी एक के साथ नहीं रुकेगा।
याद रखना—यह चिट्ठी सिर्फ कागज नहीं है। यह एक दरवाजा है। जो इसकी कहानी पूरी सुन लेगा, उसके लिए भी वह दरवाजा खुल सकता है।
अब पीछे देखो, साधना।
मैं तुम्हारे बहुत करीब हूँ।
— नाहर सिंह
काजल ने रमेश की ओर देखा। “साधना के साथ आगे क्या हुआ, यह कोई ठीक से नहीं जानता। चिट्ठी पढ़ने के बाद वह हर रात किसी के पीछे खड़े होने की बात कहती थी। वह आईनों को ढक देती, पलंग के नीचे देखने से डरती और रात में अपने परिवार के पास सोती थी।”
एक रात साधना अचानक घर से गायब हो गई। रामप्रसाद, कमला देवी और वीरेंद्र ने उसे पूरे गाँव और जंगल में खोजा, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। कुछ लोगों ने कहा कि वह जंगल की ओर गई थी। कुछ का मानना था कि वह किसी दूसरे गाँव चली गई। मगर किसी को सच्चाई नहीं मालूम थी।
“उस चिट्ठी का सबसे भयानक नियम यही है,” काजल ने कहा। “जो व्यक्ति अपनी इच्छा से पूरी कहानी सुनता है, उसके पीछे वह साया आ जाता है। उसके बाद वह कभी सचमुच अकेला नहीं रहता।”
काजल ने रमेश को चिट्ठी क्यों दी?

कहानी पूरी करने के बाद काजल ने अपने कपड़ों के भीतर से एक पुराना लिफाफा निकाला। उसका कागज पीला पड़ चुका था और किनारों पर काले धब्बे थे। बीच में वही झुकी हुई काली आकृति बनी थी, जिसका जिक्र उसने नाहर सिंह की चिट्ठी की कहानी में किया था।
काजल ने लिफाफा रमेश की ओर बढ़ा दिया।
“इसे अपने पास रखना। इसे फेंकना मत और फाड़ने की कोशिश भी मत करना।”
रमेश ने लिफाफा लेते हुए पूछा, “तुम मुझे यह क्यों दे रही हो? तुम्हारे पास है, तो तुम ही रखो।”
काजल ने जवाब नहीं दिया। उसकी आँखों के नीचे के घेरे पहले से ज्यादा गहरे दिखाई दे रहे थे।
“अगर तुम्हें कभी लगे कि कोई तुम्हारा पीछा कर रहा है, तो पीछे मुड़कर देखने से पहले अच्छी तरह सोच लेना।”
रमेश ने लिफाफा पलटकर देखा। उसे कागज पर कुछ लिखावट दिखाई दी, लेकिन अक्षर इतने अजीब थे कि वह उन्हें समझ नहीं पाया।
“इसमें लिखा क्या है?”
“तुम्हें खुद पता चल जाएगा।”
इतना कहकर काजल वहाँ से चली गई। रमेश ने उसे रोकने की कोशिश की, मगर वह तेज कदमों से बरगद के पीछे वाले रास्ते पर निकल गई।
उस रात रमेश ने लिफाफा अपनी मेज की दराज में रख दिया। उसे लगा कि काजल किसी मानसिक परेशानी से गुजर रही होगी। कहानी सुनाकर उसने अपना डर हल्का किया होगा।
रमेश सोने चला गया।
आधी रात के करीब उसकी नींद खुली। कमरे में किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी। वह कुछ देर चुपचाप लेटा रहा। आवाज कभी तेज होती, कभी धीमी।
उसने खिड़की की तरफ देखा। खिड़की बंद थी।
फिर उसे महसूस हुआ कि बिस्तर के दूसरे किनारे पर कोई बैठ गया है। गद्दा धीरे-धीरे नीचे दब रहा था।
रमेश झटके से उठा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन गद्दे पर किसी के बैठने का निशान बना हुआ था।
उसने तुरंत बत्ती जलाई। कमरा खाली था। फिर भी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“तुमने मुझे बुलाया था।”
रमेश ने पूरे कमरे में देखा। कोई दिखाई नहीं दिया। उसने दराज खोलकर चिट्ठी निकाली और उसे ध्यान से देखने लगा।
कागज पर कुछ शब्द उभर आए थे। इस बार वह उन्हें पढ़ सकता था। मगर जैसे ही उसने उन्हें जोर से बोलने की कोशिश की, उसका गला जकड़ गया।
उसने दोबारा कोशिश की। आवाज बाहर ही नहीं निकली।
तभी चिट्ठी पर बनी काली आकृति उसे पहले से कुछ बड़ी दिखाई दी।
रमेश ने लिफाफा वापस दराज में रखा और सारी रात बत्ती जलाकर बैठा रहा। सुबह होते ही उसने खुद को समझाया कि यह नींद की कमी और डर का असर था।
लेकिन बाथरूम के आईने में उसने अपना चेहरा देखा, तो उसका प्रतिबिंब कुछ पल तक हिलना बंद कर गया।
रमेश पीछे हट गया।
प्रतिबिंब वहीं खड़ा रहा।
फिर उसके पीछे एक काला चेहरा उभरा।
रमेश पलटा। पीछे कोई नहीं था।
जब उसने दोबारा आईने में देखा, तो वह चेहरा उसके बिल्कुल पास था।
हर रात बढ़ता डर और पलंग के नीचे की आवाज

अगले कुछ दिनों तक रमेश ने किसी से इस घटना का जिक्र नहीं किया। उसे डर था कि लोग उसका मजाक उड़ाएँगे। वह खुद भी यही मानना चाहता था कि रात में जो कुछ हुआ, वह केवल थकान के कारण था।
लेकिन हर रात कुछ नया होने लगा।
कभी उसे छत पर किसी के चलने की आवाज आती। कभी आँगन में कोई धीरे-धीरे उसके कमरे की ओर आता हुआ सुनाई देता। जब वह दरवाजा खोलता, तो बाहर कोई नहीं मिलता।
एक रात पानी पीने के लिए कमरे से बाहर निकला, तो सीढ़ियों पर कोई बैठा दिखाई दिया। उस आकृति ने सिर घुटनों के बीच छिपा रखा था। उसके लंबे हाथ सीढ़ियों पर फैले हुए थे।
रमेश ने काँपती आवाज में पूछा, “कौन है वहाँ?”
आकृति शांत बैठी रही।
रमेश ने एक कदम आगे बढ़ाया। तभी उस आकृति का सिर धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गया।
चेहरा रमेश जैसा था।
लेकिन आँखों की जगह दो काले गड्ढे थे।
रमेश चीखकर अपने कमरे में भागा और दरवाजा बंद कर लिया। कुछ ही क्षण बाद दरवाजे के दूसरी ओर नाखून रगड़ने की आवाज आने लगी।
“रमेश, दरवाजा खोलो।”
वह आवाज भी रमेश की ही थी।
“मुझे अंदर आने दो। मैं बाहर बहुत देर से बैठा हूँ।”
रमेश ने दोनों कान बंद कर लिए। आवाज बंद नहीं हुई। फिर दरवाजे के नीचे से काली उँगलियाँ अंदर आने लगीं। वे फर्श पर रेंगती हुई बिस्तर तक पहुँचीं और अचानक गायब हो गईं।
सुबह दरवाजे के नीचे पाँच लंबे काले निशान थे। रमेश ने उन्हें कपड़े से मिटाया, मगर वे और गहरे होते गए।
अब उसे शाम होने से पहले ही डर लगने लगता था। जिस आदमी ने कभी अँधेरे का मजाक उड़ाया था, वही सूरज ढलते ही दरवाजे और खिड़कियाँ बंद करने लगा।
एक रात उसने हिम्मत करके बत्ती बंद की और सोने की कोशिश की। आधी रात के बाद पलंग के नीचे से खुरचने की आवाज आने लगी।
खर्र… खर्र… खर्र…
रमेश ने चादर सिर तक खींच ली। कुछ देर आवाज बंद रही। फिर पलंग के नीचे से किसी ने उसका नाम पुकारा।
“रमेश… नीचे आओ।”
उसने मोबाइल की रोशनी पलंग के नीचे डाली। वहाँ दो पैर दिखाई दिए। उनके पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे और वे रमेश के सिर की ओर थे।
वह बिस्तर से कूदकर बाहर भागा। सुबह होने पर पलंग हटवाया, लेकिन नीचे कुछ नहीं मिला। धूल में केवल एक वाक्य लिखा था—
“आज रात फिर मिलेंगे।”
रमेश ने चिट्ठी फेंकने का सोचा, मगर काजल की चेतावनी याद आते ही उसका हाथ रुक गया। वह उसे पढ़ने की कोशिश करता, तो गला बंद हो जाता। किसी और को दिखाता, तो उसे सिर्फ काली आकृति नजर आती।
रमेश को अब समझ आने लगा था कि वह किसी सामान्य डर में नहीं फँसा था। वह चिट्ठी उसके घर में रखी जरूर थी, लेकिन ऐसा लगता था जैसे उसका असली मालिक कोई और हो।
और वह मालिक हर रात उसके करीब आता जा रहा था।
सुभाष गाँव लौटा और शांति देवी ने खोला रहस्य

करीब एक साल तक रमेश इस डर के साथ जीता रहा। उसकी नींद गायब हो गई थी। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरा हमेशा थका हुआ रहता था। दिन में भी वह अचानक पीछे मुड़कर देखने लगता, जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा हो।
आखिर एक रात उसने सुभाष को फोन किया। उसकी आवाज सुनकर सुभाष घबरा गया। अगले ही दिन वह मुंबई से चंद्रपुर पहुँच गया।
रमेश को देखकर सुभाष कुछ पल तक बोल नहीं पाया। उसका दोस्त पहले जैसा नहीं रहा था। उसकी आँखों में डर बैठ गया था और चेहरे पर कई रातों की थकान साफ दिखाई दे रही थी।
“रमेश, तुम्हारे साथ क्या हुआ? तुमने अपनी हालत ऐसी कैसे बना ली?”
रमेश ने उसे गले लगा लिया। “भाई, मैं ठीक नहीं हूँ। कोई हर रात मेरे पास आता है। मैं सो नहीं पाता। वह कहता है कि मैं उससे कभी छुटकारा नहीं पा सकता।”
सुभाष ने उसे भरोसा दिया कि वह उसे अकेला छोड़कर नहीं जाएगा।
रमेश ने काजल और चिट्ठी के बारे में सब कुछ बताया। फिर दराज से पुराना लिफाफा निकालकर सुभाष को दे दिया।
सुभाष ने चिट्ठी को रोशनी के सामने किया। उसे कोई लिखावट दिखाई नहीं दी। केवल एक काली आकृति थी, जिसका सिर अस्वाभाविक रूप से झुका हुआ था।
“इसमें लिखा क्या है?” सुभाष ने पूछा।
“मैं पढ़ सकता हूँ, लेकिन तुम्हें नहीं दिखेगा। जब जोर से पढ़ने की कोशिश करता हूँ, तो मेरा गला बंद हो जाता है।”
सुभाष ने उसी दिन गाँव की बुजुर्ग शांति देवी से मिलने का फैसला किया। गाँव में कहा जाता था कि उन्हें पुरानी घटनाओं और उन रहस्यों की जानकारी है, जिनका जिक्र लोग खुलेआम नहीं करते।
शांति देवी ने चिट्ठी देखते ही अपना चेहरा ढक लिया।
“यह तुम्हें कहाँ मिली?”
सुभाष ने बताया कि काजल ने रमेश को दी थी।
“तो वह लड़की अब भी लोगों को ढूँढ़ रही है,” शांति देवी बुदबुदाईं।
सुभाष चौंक गया। “आप काजल को जानती हैं?”
शांति देवी ने दरवाजा बंद किया और धीमी आवाज में बताया कि काजल भी कभी इसी तरह डर में जीती थी। वह रात में चीखकर उठती और कहती कि कोई उसके पलंग के नीचे बैठा है। उसकी आँखों के नीचे भी गहरे काले घेरे थे।
एक दिन काजल गायब हो गई। उसके बाद गाँव में किसी ने उसे नहीं देखा।
“क्या रमेश कभी ठीक हो सकता है?” सुभाष ने पूछा।
शांति देवी कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “एक रास्ता है। लेकिन वह आसान नहीं है। इस चिट्ठी का बंधन एक व्यक्ति से दूसरे तक जा सकता है।”
“कैसे?”
“जिस व्यक्ति पर इसका असर हो चुका है, उसे चिट्ठी में लिखी पूरी कहानी किसी दूसरे इंसान को पढ़कर सुनानी होगी। दूसरा व्यक्ति अपनी इच्छा से कहानी सुनने के लिए तैयार होना चाहिए। कहानी पूरी होते ही साया नए श्रोता से जुड़ सकता है।”
सुभाष ने गुस्से से कहा, “काजल ने रमेश को यह बात क्यों नहीं बताई?”
शांति देवी ने दुखी स्वर में जवाब दिया, “डर में फँसा इंसान कभी-कभी अपनी आजादी के लिए किसी दूसरे को उसी अँधेरे में धकेल देता है। यह सही नहीं, लेकिन ऐसा हो सकता है।”
सुभाष ने रमेश की तरफ देखा। अब वह समझ चुका था कि उसके दोस्त के सामने क्या रास्ते बचे थे।
रमेश का फैसला और दोस्ती की सबसे कठिन परीक्षा

उस रात सुभाष और रमेश घर के कमरे में बैठे थे। बाहर हवा चल रही थी। खिड़की के काँच पर कभी-कभी ऐसी आवाज आती, जैसे कोई नाखून से उसे खुरच रहा हो।
सुभाष ने चिट्ठी मेज पर रखी।
“रमेश, तुम मुझे पूरी कहानी पढ़कर सुना दो। शायद तुम्हें इस मुसीबत से छुटकारा मिल जाए।”
रमेश ने तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं, सुभाष। मैं तुम्हें अपनी जगह नहीं डाल सकता। तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो। बचपन से हमने एक-दूसरे का साथ दिया है। मैं तुम्हें इस डर में नहीं धकेल सकता।”
सुभाष की आवाज भर्रा गई। “और मैं तुम्हें इस हालत में छोड़कर कैसे चला जाऊँ? तुम लगभग एक साल से ठीक से सोए नहीं हो। तुम्हारी हालत हर दिन खराब हो रही है। मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, रमेश। तुम्हें अकेला छोड़ दूँ, तो दोस्ती का मतलब ही क्या रह जाएगा?”
रमेश ने उसकी तरफ देखा। “लेकिन अगर वह साया तुम्हारे पीछे आ गया तो?”
“तो मैं उसका सामना करूँगा। मैं तुम्हें इस हालत में मरते हुए नहीं देख सकता।”
कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर रमेश ने बताया कि कभी-कभी उसे लगता था कि काजल भी किसी से मदद माँगना चाहती थी। शायद वह खुद इस डर से टूट चुकी थी और किसी तरह उससे छुटकारा चाहती थी।
सुभाष ने कहा, “हो सकता है काजल भी मजबूर रही हो। लेकिन हम वही गलती किसी अनजान इंसान के साथ नहीं करेंगे। पहले हमें तुम्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए।”
रमेश ने काँपते हाथों से चिट्ठी उठाई। उसके मन में डर था कि वह अपने सबसे करीबी दोस्त को मुसीबत में डाल देगा। मगर उसे यह भी मालूम था कि अब वह इस हालत में ज्यादा दिन नहीं जी पाएगा।
उस रात रमेश ने चिट्ठी में लिखी पूरी कहानी सुभाष को सुनाई।
कमरे की बत्ती जल रही थी। दरवाजा बंद था और खिड़की पर कुंडी लगी थी। फिर भी कहानी के आखिरी शब्दों के साथ हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।
चिट्ठी पर बनी काली आकृति फैलने लगी। उसकी उँगलियाँ कागज के किनारों से बाहर निकलती दिखाई दीं। सुभाष ने घबराकर लिफाफा छोड़ दिया।
अगले ही पल सब कुछ शांत हो गया।
रमेश ने चारों तरफ देखा। कई महीनों बाद उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी महसूस नहीं हुई। उसने लंबी साँस ली और बिस्तर पर लेट गया।
“सुभाष… अब वह दिखाई नहीं दे रहा। शायद मैं आज रात सो पाऊँगा।”
सुभाष ने मुस्कराने की कोशिश की। “तुम आराम करो। मैं यहीं हूँ।”
रमेश की आँख लग गई। पहली बार उसका चेहरा शांत था।
लेकिन सुभाष की नजर चिट्ठी पर टिक गई। उस पर लिखे शब्द गायब हो चुके थे। केवल काली आकृति बची थी। उसके नीचे दो नए निशान उभर रहे थे, जैसे किसी ने कागज पर नन्हे पैरों से चलना शुरू कर दिया हो।
सुभाष ने चिट्ठी दराज में रख दी।
उसे लगा कि सबसे कठिन हिस्सा खत्म हो चुका है।
वह नहीं जानता था कि अगली सुबह उसके लिए कैसी होने वाली थी।
अब वह खतरनाक साया सुभाष के साथ था

अगली सुबह रमेश कई महीनों बाद चैन से सो रहा था। सुभाष ने उसे जगाना ठीक नहीं समझा। वह चुपचाप कमरे से बाहर निकला और आँगन में बैठ गया।
कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है। उसने पलटकर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
वह वापस कमरे में आने लगा, तभी दरवाजे के पास लगे छोटे आईने में अपनी परछाईं दिखाई दी। उसके पीछे एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।
सुभाष तुरंत पलटा। कमरा खाली था।
उसने दोबारा आईने में देखा। आकृति उसके कंधे के ऊपर झुकी हुई थी। उसका चेहरा सुभाष के कान के बिल्कुल पास था।
“तुमने मेरी कहानी सुनी है।”
सुभाष पीछे हट गया। आईने में उसकी परछाईं वहीं खड़ी रही। इस बार परछाईं ने उसके साथ पीछे कदम नहीं लिया। वह स्थिर रही और धीरे-धीरे मुस्कराने लगी।
सुभाष ने आईने पर कपड़ा डाल दिया। वह खुद को समझाता रहा कि यह थकान और डर का असर है। मगर रात को सोने गया, तो पलंग के नीचे से किसी के साँस लेने की आवाज आने लगी।
उसने नीचे झाँकने की हिम्मत नहीं की।
आवाज धीरे-धीरे उसके सिर के पास आने लगी। फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“रमेश को बचाकर तुमने अच्छा किया।”
सुभाष का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।
“अब तुम्हारी बारी है।”
उसने तुरंत बत्ती जलाई। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन चिट्ठी उसके तकिए के पास रखी थी, जबकि उसने उसे दराज में बंद किया था।
चिट्ठी पर बनी आकृति अब पहले से कहीं बड़ी थी। उसका सिर उठा हुआ था और चेहरे पर दो सफेद आँखें दिखाई दे रही थीं। नीचे कुछ शब्द उभर रहे थे, लेकिन सुभाष उन्हें पढ़ नहीं पा रहा था।
रमेश की नींद खुल गई। वह दरवाजे पर खड़ा था। उसने सुभाष को चिट्ठी के सामने बैठे देखा, मगर उसकी नजर अचानक सुभाष के पीछे जाकर रुक गई।
रमेश का चेहरा पीला पड़ गया।
“सुभाष… तुम्हारे पीछे कौन खड़ा है?”
सुभाष धीरे-धीरे पलटा। वहाँ कोई नहीं था।
रमेश काँपती आवाज में बोला, “वह तुम्हारे ठीक पीछे खड़ा है। उसकी गर्दन तुम्हारे कंधे पर झुकी हुई है।”
सुभाष को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन उसके कंधे पर बर्फ जैसा ठंडा हाथ महसूस हुआ। वह समझ गया कि शांति देवी की बात सच थी।
रमेश ने उसे बचाने के लिए कहानी सुनाई थी। मगर अब सुभाष भी उसी बंधन में आ चुका था।
कुछ दिनों तक वह चंद्रपुर में रुका। रात होते ही उसे आईने में काला साया दिखने लगता। कभी पलंग के नीचे से आवाज आती, तो कभी सीढ़ियों पर किसी के बैठने का एहसास होता। दिन निकलने के बाद भी डर उसका पीछा नहीं छोड़ता था।
आखिर उसने मुंबई लौटने का फैसला किया। उसे उम्मीद थी कि शायद शहर की भीड़ में वह अपना डर भूल सकेगा।
उसे यह भी नहीं मालूम था कि ट्रेन की उस यात्रा में उसकी मुलाकात एक ऐसे आदमी से होने वाली है, जिसकी जिंदगी में इंसानी खून की कमी नहीं थी, लेकिन जो पहली बार किसी ऐसी कैद में फँसने वाला था, जहाँ से भागना उसके बस में नहीं होगा।
मुंबई जाने वाली ट्रेन में एक खतरनाक मेहमान

रात काफी हो चुकी थी। सुभाष मुंबई जाने वाली ट्रेन के फर्स्ट एसी डिब्बे में बैठा था। उसने अपना सामान सीट के पास रखा और खिड़की से बाहर देखने लगा। वह थका हुआ था, मगर आँखें बंद करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी। कुछ यात्री चढ़े और उतर गए। थोड़ी देर बाद ट्रेन फिर चल पड़ी।
तभी डिब्बे का दरवाजा अचानक खुला।
एक बूढ़ा आदमी हाँफता हुआ अंदर घुसा। उसकी उम्र लगभग साठ साल थी। कपड़े अस्त-व्यस्त थे और चेहरे पर पसीना था। उसने पीछे मुड़कर देखा, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो।
उसके हाथ में पिस्तौल थी।
वह सीधे सुभाष के पास आया और बंदूक उसकी ओर तान दी।
“खबरदार! अगर आवाज निकाली, तो यहीं मार दूँगा। किसी को बताया, तो तुम्हारी जिंदगी खत्म!”
सुभाष का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह समझ गया कि यह कोई साधारण यात्री नहीं था।
बूढ़ा सीट पर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। कुछ देर बाद उसने सुभाष को घूरते हुए कहा, “मैं जेल से भागकर आया हूँ। पुलिस मुझे ढूँढ़ रही है। अगर किसी को बताया, तो तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ूँगा।”
सुभाष ने धीरे से हाथ उठाए।
“ठीक है, मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगा। आप चिंता मत करिए। शांति से बैठ जाइए।”
बूढ़े ने पिस्तौल नीचे नहीं की। वह कुछ देर तक सुभाष को देखता रहा, फिर अपनी कहानी सुनाने लगा।
“तुमने शायद मेरा नाम नहीं सुना होगा। लेकिन मैंने ऐसी-ऐसी हत्याएँ की हैं कि लोग मेरा नाम सुनकर काँपते थे। मैं किसी को माफ नहीं करता। जो मेरे खिलाफ खड़ा होता है, उसे हमेशा के लिए मिटा देता हूँ।”
उसकी आवाज में घमंड था। वह अपने अपराधों को ऐसे बता रहा था, जैसे किसी बहादुरी की कहानी सुना रहा हो।
“मैंने कई लोगों की जान ली है। मेरे लिए किसी की जिंदगी की कोई कीमत नहीं। जेल में मुझे बंद करके उन्होंने सोचा कि अब मैं कुछ नहीं कर सकता। लेकिन मैं वहाँ से भी निकल आया।”
सुभाष उसकी बातें सुनता रहा। बाहर रात का अँधेरा दौड़ता हुआ पीछे छूट रहा था।
अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया।
यह आदमी बेहद खतरनाक है। अगर मैं इसे कहानी सुना दूँ, तो शायद चिट्ठी का साया इसी के साथ चला जाए।
उसने बूढ़े की ओर देखा। उसे अपने विचार पर शर्म भी आई, मगर उसके मन में एक सवाल था—क्या वह खुद को बचाने के लिए किसी ऐसे आदमी को चुन सकता है, जिसने दूसरों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं की?
बूढ़े ने पिस्तौल उसकी ओर उठाई। “क्या सोच रहे हो?”
सुभाष ने खुद को संभालते हुए कहा, “मैं पुलिस को फोन नहीं करूँगा और न ही आपको परेशान करूँगा। लेकिन बदले में आपको मेरी एक छोटी-सी कहानी सुननी होगी।”
बूढ़ा कुछ पल उसे देखता रहा, फिर हँस पड़ा।
“कहानी? जेल में बहुत दिन हो गए। न कुछ पढ़ने को मिला, न किसी की ढंग की बात सुनी। चलो, आज तुम्हारी कहानी भी सुन लेते हैं। मगर याद रखना, मुझे बोर किया तो अच्छा नहीं होगा।”
सुभाष ने धीरे से सिर हिलाया।
उसे पता था कि अब उसके पास पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था।
सुभाष ने शुरू की वह कहानी, जिससे कोई लौटकर नहीं आया

सुभाष ने बूढ़े कैदी को चंद्रपुर गाँव के रमेश कुमार के बारे में बताया। उसने बताया कि रमेश भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करता था और किस तरह एक दिन उसकी मुलाकात काजल से हुई थी।
बूढ़ा शुरू में हँसता रहा। उसे लगा कि सुभाष उसे डराने के लिए कोई बनाई हुई कहानी सुना रहा है।
“आगे बोलो,” उसने पिस्तौल अपनी गोद में रखते हुए कहा। “देखता हूँ, तुम्हारी कहानी में कितना दम है।”
सुभाष ने नाहर सिंह और साधना की कहानी सुनाई। उसने बताया कि कैसे नाहर सिंह साधना को परेशान करता था, कैसे गाँववालों ने उसे पीटा और कैसे उसने अँधेरे में साधना के नाम चिट्ठी लिखी थी।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ी, बूढ़े की हँसी बंद होने लगी।
सुभाष ने बताया कि चिट्ठी पढ़ने के बाद साधना को हर जगह अपना पीछा करता हुआ साया दिखाई देने लगा था। वह आईनों को ढक देती थी, पलंग के नीचे देखने से डरती थी और आखिरकार एक रात अचानक गायब हो गई।
बूढ़ा बेचैनी से सीट पर हिलने लगा।
“ये सब बकवास है। ऐसी चीजें कहीं नहीं होतीं,” उसने कहा।
सुभाष ने जवाब नहीं दिया। उसने कहानी जारी रखी और बताया कि काजल ने रमेश को वही चिट्ठी क्यों दी थी। उसने यह भी बताया कि चिट्ठी को फाड़ने या फेंकने की कोशिश करने पर डर खत्म नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है।
बूढ़े ने अपनी आँखें मलीं।
“तुम्हें यह कहानी किसने बताई?”
“मैंने खुद यह सब देखा है,” सुभाष ने कहा। “मेरा दोस्त रमेश इसी डर में एक साल तक जीता रहा।”
बूढ़े ने अचानक सिर उठाया। “तुम कहना क्या चाहते हो? कि कोई साया तुम्हारा पीछा करता है?”
सुभाष ने उसकी तरफ देखा। “मैं कहना चाहता हूँ कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें ताकत से नहीं हराया जा सकता।”
बूढ़ा गुस्से से हँसा। “मैंने लोगों को मरते देखा है। मैं खुद कई लोगों की मौत का कारण बना हूँ। मुझे कोई साया नहीं डरा सकता।”
सुभाष ने कहानी का वह हिस्सा सुनाना शुरू किया, जिसमें रमेश रात के समय अपने कमरे में अकेला था। उसने पलंग के नीचे से आने वाली आवाज, सीढ़ियों पर बैठे अपने ही चेहरे जैसी आकृति और आईने में दिखाई देने वाले काले प्रतिबिंब का वर्णन किया।
बूढ़े की उँगलियाँ पिस्तौल पर कस गईं।
तभी उसे लगा कि उसके पीछे की सीट पर कोई बैठा है।
उसने झटके से पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
“तुमने कुछ सुना?” उसने सुभाष से पूछा।
“क्या?”
“कुछ नहीं,” बूढ़ा बड़बड़ाया। “कहानी सुनाओ।”
सुभाष जानता था कि अब वह कहानी के बीच में रुक नहीं सकता। उसने रमेश की हालत, शांति देवी की चेतावनी और चिट्ठी के असली नियम के बारे में बताया।
बूढ़े की आँखों में अब घमंड की जगह बेचैनी उतरने लगी थी।
सुभाष ने पहली बार महसूस किया कि उसकी योजना काम कर रही थी।
लेकिन उसके मन में यह सवाल अब भी था कि क्या वह सचमुच आजाद होने वाला है, या केवल किसी और को अपने अँधेरे में धकेल रहा है।
बूढ़े कैदी की आँखें काली होने लगीं

ट्रेन अँधेरे मैदानों और छोटे स्टेशनों को पीछे छोड़ती हुई आगे बढ़ रही थी। फर्स्ट एसी डिब्बे में दोनों के अलावा कोई यात्री दिखाई नहीं दे रहा था। बाहर खंभों की रोशनी कुछ पल के लिए खिड़की पर चमकती और फिर गायब हो जाती।
सुभाष ने कहानी जारी रखी। उसने बताया कि कैसे रमेश ने आखिरकार अपने दोस्त को पूरी कहानी सुनाई और कैसे चिट्ठी पर बनी आकृति बदलने लगी थी।
बूढ़ा अब चुप था।
उसके माथे पर पसीने की बूँदें जमा हो गई थीं। उसने अपनी आँखें रगड़ीं, फिर खिड़की के काँच में खुद को देखने लगा।
उसे अपना चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
काँच में उसके पीछे कोई लंबा-सा आकार खड़ा था।
वह तुरंत पलटा।
कुछ नहीं था।
“तुम्हारे डिब्बे में कोई और भी है क्या?” उसने सुभाष से पूछा।
सुभाष ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं। यहाँ हम दोनों ही हैं।”
बूढ़े ने फिर खिड़की की तरफ देखा। इस बार उसका प्रतिबिंब उसे घूर रहा था। उसकी आँखों के आसपास काला रंग फैलने लगा था।
उसने घबराकर अपनी आँखें बंद कर लीं और दोनों हथेलियों से चेहरा ढक लिया।
“बस करो! अब यह सब बंद करो!”
सुभाष ने कहानी पढ़ना नहीं रोका।
बूढ़े ने पिस्तौल उठाई, मगर उसका हाथ काँप रहा था। उसने सुभाष को धमकाने की कोशिश की, लेकिन आवाज गले में अटक गई।
“मैंने कहा… बंद करो!”
सुभाष ने शांत स्वर में कहा, “आपने खुद कहा था कि कहानी सुनना चाहते हैं। मैं बस उसे पूरा कर रहा हूँ।”
बूढ़ा उसे घूरता रहा। अब उसकी आँखों का सफेद हिस्सा धीरे-धीरे गायब हो रहा था। काला रंग पुतलियों से फैलकर पूरी आँख में उतर रहा था।
उसने अपनी आँखों को रगड़ा, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।
“मेरी आँखों को क्या हो रहा है?” वह बुरी तरह घबराकर बोला।
सुभाष के हाथ ठंडे पड़ गए। वह जानता था कि चिट्ठी का असर शुरू हो चुका है।
बूढ़े ने सीट से उठने की कोशिश की, लेकिन उसे लगा कि उसके पैर जमीन से चिपक गए हैं। उसके पीछे किसी के खड़े होने का एहसास इतना तेज था कि वह गर्दन घुमाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
तभी उसके कान के पास एक आवाज आई।
“तुम किसी को माफ नहीं करते थे, है न?”
बूढ़े की साँस रुक गई।
वह आवाज किसी दूसरे इंसान की नहीं थी। वह उसके अपने स्वर जैसी थी, मगर उसमें ऐसी ठंडक थी कि उसके पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
उसने चीखने की कोशिश की। गले से सिर्फ टूटी हुई साँस निकली।
सुभाष ने कहानी की आखिरी पंक्तियों की ओर बढ़ते हुए कहा, “अब आपको समझ आ रहा होगा कि कुछ कैदें जेल की सलाखों से नहीं बनतीं।”
बूढ़े की आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं।
उसने सुभाष की ओर देखा, लेकिन अब उसकी नजर में इंसानी गुस्सा नहीं था। उसमें केवल डर था।
अब वह कैदी असली में कैद होने वाला था

सुभाष ने चिट्ठी अपनी जेब से निकाली। वह उसे रमेश के घर से अपने साथ ले आया था। उसे लगा था कि अगर कहानी पूरी करने के बाद चिट्ठी नए श्रोता को दे दी जाए, तो बंधन आगे बढ़ जाएगा।
उसने लिफाफा खोला और उसमें लिखी आखिरी पंक्तियाँ पढ़नी शुरू कीं।
बूढ़ा सीट से चिपका बैठा था। उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं और चेहरा ऐसा लग रहा था, जैसे उसका सारा खून सूख गया हो। वह बार-बार पीछे देखना चाहता था, मगर उसकी गर्दन हिल नहीं रही थी।
सुभाष ने आखिरी शब्द पढ़ दिया।
डिब्बे में अचानक सन्नाटा छा गया।
ट्रेन की आवाज तक जैसे दूर चली गई। कुछ पल के लिए ऐसा लगा कि डिब्बा किसी ऐसी जगह रुक गया है, जहाँ न हवा है, न समय।
बूढ़े ने मुँह खोला, लेकिन आवाज नहीं निकली। उसकी पीठ के पीछे से एक लंबा काला साया उभरने लगा। वह सीट के ऊपर झुकता हुआ उसके कंधों तक आ गया।
बूढ़े ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उठने की कोशिश की। उसकी उँगलियाँ सीट को पकड़कर रह गईं। फिर उसे लगा कि किसी ने उसकी गर्दन के पीछे बर्फ का टुकड़ा रख दिया है।
वह काँप उठा।
सुभाष ने चिट्ठी उसकी ओर बढ़ा दी।
“लो, अब यह तुम्हारी है।”
बूढ़े ने उसे लेने से इनकार करना चाहा, मगर उसकी उँगलियाँ अपने आप आगे बढ़ गईं। जैसे ही उसने लिफाफा पकड़ा, कागज पर बनी काली आकृति फैल गई।
उसके चेहरे पर अब कोई घमंड नहीं बचा था।
सुभाष ने धीमी आवाज में कहा, “अब तुम मेरी जगह हो।”
अब वह कैदी असली में कैद होने वाला था।
और वह भी साये की कैद में, उस चिट्ठी की कैद में।
बूढ़ा चीख उठा। उसके पीछे खड़ा साया धीरे-धीरे उसके शरीर में समाने लगा। उसके कंधे झटके से हिले और हाथ से पिस्तौल छूटकर फर्श पर गिर गई।
कुछ ही पलों में वह स्थिर बैठा था। उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं और उसकी उँगलियाँ चिट्ठी को कसकर पकड़े हुए थीं।
सुभाष ने कई दिनों बाद राहत की साँस ली।
उसे अब अपने पीछे किसी की मौजूदगी महसूस नहीं हो रही थी। उसने कमरे में चारों तरफ देखा। आईने में उसका प्रतिबिंब सामान्य था। खिड़की के काँच में कोई काली आकृति नहीं दिखाई दे रही थी।
फिर भी वह बूढ़े से नजर नहीं हटा पा रहा था।
वह आदमी, जिसने अपनी जिंदगी में कई लोगों की जान लेने का घमंड किया था, अब एक कागज को गोद में रखे बैठा था। वह न बोल रहा था, न हिल रहा था। उसकी आँखों में ऐसा डर था, जिसे कोई बंदूक या धमकी दूर नहीं कर सकती थी।
सुभाष ने मन ही मन सोचा कि शायद अब वह आजाद है।
लेकिन उसके मन में एक सवाल भी उठा।
क्या किसी इंसान के पाप उसे इस साये की कैद में भेजने का कारण बन सकते हैं? या चिट्ठी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके सामने कौन बैठा है?
बूढ़े ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसके काले होंठ हिले।
“यह मेरे साथ क्या कर दिया?”
सुभाष ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह अपना सामान समेटने लगा। उसे अगला स्टेशन आने का इंतजार था।
सुभाष ने अपनी टिकट कैदी को दे दी

कुछ देर बाद ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर धीमी हुई। प्लेटफॉर्म पर पीली रोशनी थी और कुछ लोग चाय की दुकानों के पास बैठे थे। सुभाष ने खिड़की से बाहर देखा।
उसे मुंबई तक जाना था, लेकिन अब वह इस ट्रेन में एक पल भी और नहीं रहना चाहता था। उसे लग रहा था कि वह जितनी जल्दी इस डिब्बे से बाहर निकलेगा, उतना ही अच्छा होगा।
उसने अपना सामान उठाया और दरवाजे की ओर बढ़ा। फिर उसे बूढ़े कैदी की याद आई।
वह वापस सीट के पास आया। बूढ़ा अब भी चिट्ठी को घूर रहा था। उसकी आँखों की कालिमा कम नहीं हुई थी। उसके पीछे कभी-कभी एक धुँधला आकार दिखाई देता, जो अगले ही पल गायब हो जाता।
सुभाष ने अपनी टिकट निकाली और बूढ़े के सामने रख दी।
“ये मेरी टिकट है। तुम इसे रख लो। मुंबई पहुँच जाना।”
बूढ़े ने धीरे से उसकी तरफ देखा। “तुम मुझे यहाँ छोड़कर जा रहे हो?”
सुभाष कुछ पल चुप रहा। वह उस आदमी से डरता था, लेकिन अब उसके लिए मन में दया भी पैदा हो रही थी।
“मैंने तुम्हें कहानी सुना दी है। अब मुझे यहाँ से जाना होगा। टिकट तुम्हारे पास रहेगी। आगे क्या करना है, यह तुम्हें तय करना होगा।”
बूढ़े ने टिकट की ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“तुमने मुझे किस चीज में फँसा दिया?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
सुभाष ने नजरें झुका लीं। उसके पास कोई ऐसा जवाब नहीं था, जो उस आदमी के डर को कम कर सके।
“मैं भी इससे बचना चाहता था,” उसने कहा। “मुझे लगा था कि अब यह मुझे छोड़ देगा।”
बूढ़ा कड़वाहट से हँसने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसकी हँसी रोने जैसी आवाज में बदल गई।
“मैं जेल से भागा था। सोचा था, अब कोई मुझे पकड़ नहीं पाएगा। लेकिन यह…” उसने चिट्ठी की ओर देखा, “यह तो मेरे साथ ही आ गया।”
सुभाष ने कोई जवाब नहीं दिया।
ट्रेन रुक चुकी थी। उसने अपना सामान उठाया और प्लेटफॉर्म पर उतर गया। कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा। डिब्बे की खिड़की से बूढ़ा दिखाई दे रहा था।
वह चिट्ठी को दोनों हाथों से पकड़े बैठा था।
उसके पीछे काला साया झुका हुआ था।
सुभाष को लगा कि बूढ़े ने भी उसे देख लिया है। उसकी काली आँखें खिड़की के काँच से सीधे सुभाष की ओर देख रही थीं।
ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी।
सुभाष प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा, जब तक आखिरी डिब्बा उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गया।
उसने गहरी साँस ली। उसे लगा कि उसके कंधों से कोई भारी बोझ उतर गया है। मगर उसी क्षण उसके भीतर एक विचार उठा, जिसने उसे चैन से खड़ा नहीं रहने दिया।
क्या मैंने सचमुच खुद को बचा लिया?
या मैंने अपना डर किसी दूसरे इंसान के हवाले कर दिया?
वह स्टेशन के बाहर की ओर चल पड़ा। रात की हवा ठंडी थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे और प्लेटफॉर्म पर लाउडस्पीकर से किसी दूसरी ट्रेन के आने की घोषणा हो रही थी।
सुभाष ने खुद को समझाया कि अब सब खत्म हो चुका है।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि चिट्ठी का खौफ़ इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं था।
शापित चिट्ठी का खौफ़ अभी खत्म नहीं हुआ था

सुभाष स्टेशन के बाहर निकल आया। उसके पास सामान था, लेकिन मन खाली-सा लग रहा था। वह कई दिनों बाद बिना किसी के पीछे खड़े होने का एहसास किए चल रहा था।
उसने एक दुकान के शीशे में अपना चेहरा देखा। इस बार उसका प्रतिबिंब उसके साथ हिला। कोई काला साया दिखाई नहीं दिया।
उसने राहत की साँस ली।
“शायद सचमुच मैं आजाद हो गया,” उसने खुद से कहा।
फिर उसे रमेश का चेहरा याद आया। वह दोस्त, जिसने एक साल तक डर में जीने के बाद आखिरकार उसे कहानी सुनाई थी। सुभाष ने रमेश को बचाने का वादा किया था, लेकिन अंत में उसने खुद को बचाने के लिए एक दूसरे इंसान को चुना था।
वह आदमी भले ही खूंखार हत्यारा था, मगर अब जिस डर में वह फँसा था, उससे निकलने का कोई रास्ता उसके पास नहीं था।
सुभाष आगे बढ़ता रहा। तभी स्टेशन के एक बड़े शीशे में उसे अपने पीछे काजल खड़ी दिखाई दी।
वह ठिठक गया।
काजल का चेहरा शांत था। उसकी आँखों के नीचे अब काले घेरे नहीं थे। उसने सुभाष की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान दी।
सुभाष ने पलटकर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
वह शीशे की ओर वापस मुड़ा। काजल गायब हो चुकी थी। अब केवल उसका अपना प्रतिबिंब था।
उसने तेजी से कदम बढ़ाए। तभी उसके फोन पर एक अनजान नंबर से संदेश आया।
उसमें सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“अब तुम मेरी जगह हो।”
सुभाष के हाथ से फोन लगभग छूट गया। उसने तुरंत पीछे देखा। प्लेटफॉर्म पर लोग आ-जा रहे थे। कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था।
उसने फोन बंद कर दिया।
उसे लगा कि अब उसे सीधे घर जाकर आराम करना चाहिए। शायद डर के कारण उसका दिमाग उसे ऐसी चीजें दिखा रहा था।
लेकिन घर पहुँचने के बाद भी उसे चैन नहीं मिला।
उस रात वह बिस्तर पर लेटा, तो उसे पलंग के नीचे से किसी के धीरे-धीरे साँस लेने की आवाज सुनाई दी। उसने करवट बदली और चादर सिर तक खींच ली।
आवाज बंद हो गई।
कुछ देर बाद वही आवाज उसके सिर के पास सुनाई दी।
“तुमने मुझे किसी और के हवाले कर दिया।”
सुभाष ने बत्ती जलाई। कमरे में कोई नहीं था।
उसने मेज पर रखा पानी पिया और खुद को शांत करने की कोशिश की। तभी उसकी नजर सामने लगे आईने पर पड़ी।
आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था, लेकिन उसके पीछे एक काली आकृति खड़ी थी।
सुभाष पलटा।
कमरा खाली था।
वह वापस आईने की ओर देखने लगा। इस बार आकृति उसके और करीब आ गई थी। उसका सिर सुभाष के कंधे पर झुका हुआ था।
सुभाष की आँखों में आँसू आ गए।
“मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
आईने के भीतर से जवाब आया—
“तुमने मेरी कहानी सुनी है। अब तुम्हें मेरी कहानी आगे सुनानी है।”
सुभाष पीछे हट गया। उसके पैर लड़खड़ाने लगे। अब उसे समझ आ गया था कि ट्रेन में बूढ़े कैदी को कहानी सुनाने के बाद भी चिट्ठी का बंधन पूरी तरह नहीं टूटा था।
उसने केवल अपनी जगह किसी दूसरे को दे दी थी।
और यह सिलसिला शायद आगे भी चलने वाला था।
अँधेरे जंगल में रमेश ने अपने दोस्त को देखा

उधर चंद्रपुर में रमेश कई महीनों बाद पहली बार चैन से सो रहा था। उसे लग रहा था कि सुभाष की मदद से उसका डर खत्म हो गया है।
लेकिन आधी रात को उसकी आँख अचानक खुल गई। कमरे में अजीब-सी ठंड थी। सामने लगे आईने पर किसी ने अंदर से उँगली फेरकर एक वाक्य लिखा था।
“कहानी खत्म नहीं हुई है।”
रमेश बिस्तर से उठा और आईने के पास गया। उसने कपड़े से लिखावट मिटाने की कोशिश की, लेकिन अक्षर शीशे के भीतर से उभरते हुए लग रहे थे।
फिर आईने में उसका अपना चेहरा गायब हो गया।
उसकी जगह सुभाष दिखाई दिया।
सुभाष किसी घने जंगल में अकेला खड़ा था। चारों तरफ ऊँचे पेड़ थे और जमीन पर धुंध फैली हुई थी। उसके पीछे वही काली आकृति खड़ी थी, जो रमेश को रातों में सताया करती थी।
रमेश ने घबराकर आईने पर हाथ रखा।
“सुभाष!”
आईने के भीतर सुभाष ने सिर उठाया। ऐसा लगा जैसे उसने रमेश की आवाज सुन ली हो।
“रमेश… मुझे बचा लो।”
रमेश पीछे हट गया। उसने आँखें बंद कर लीं और जोर से चिल्लाया। जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, तो आईने में उसका अपना चेहरा था।
कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
बत्ती बुझ गई।
पलंग के नीचे से किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज आने लगी।
रमेश समझ गया कि साया पूरी तरह गया नहीं था। उसने केवल अपना ठिकाना बदला था।
उसे यह भी समझ आने लगा कि कहानी सुनाने से किसी को राहत मिल सकती है, मगर उस राहत की कीमत कोई दूसरा इंसान चुकाता है।
दूर मुंबई में सुभाष भी उसी डर के साथ जी रहा था। उसे कभी आईने में साया दिखता, कभी अपने पीछे किसी के बैठने का एहसास होता। अब वह जानता था कि चिट्ठी का बंधन केवल एक व्यक्ति से दूसरे तक जाता है, लेकिन कोई नहीं जानता कि यह सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा।
और ट्रेन में बैठा बूढ़ा कैदी भी अब उस साये की कैद में था। उसकी पिस्तौल उसके पास थी, लेकिन उससे कोई फायदा नहीं था। वह जिस भी दिशा में देखता, उसे अपने पीछे वही आकृति दिखाई देती।
वह जेल से भागा था ताकि कोई उसे पकड़ न सके।
लेकिन अब वह ऐसी कैद में था, जिसकी कोई दीवार नहीं थी और जिसका दरवाजा कहीं दिखाई नहीं देता था।
उसने चिट्ठी को फाड़ने की कोशिश की। कागज खिंचा, मगर फटा नहीं। उसने उसे खिड़की से बाहर फेंकना चाहा, लेकिन उसकी उँगलियाँ खुलीं ही नहीं।
तभी उसके कान में एक आवाज गूँजी—
“तुम किसी को माफ नहीं करते थे। अब खुद को माफ करके दिखाओ।”
बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर पहली बार अपने किए हुए अपराधों का डर दिखाई दिया।
ट्रेन अँधेरी रात को चीरती हुई आगे बढ़ती रही।
और शापित चिट्ठी पर बनी काली आकृति के नीचे एक नया नाम धीरे-धीरे उभरने लगा।
किसी ऐसे इंसान का नाम, जिसे अभी तक पता भी नहीं था कि उसकी जिंदगी बदलने वाली है।
शापित चिट्ठी का खौफ़ खत्म नहीं हुआ था।
कहानी अभी बाकी थी।
और अगला श्रोता कहीं न कहीं उसका इंतजार कर रहा था।






