12 ज्योतिर्लिंग की कहानी । भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग की प्राचीन कहानियां

12 ज्योतिर्लिंग की कहानी । भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग की प्राचीन कहानियां

12 ज्योतिर्लिंग भगवान शिव से जुड़ी भारत की पुरानी धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद इन पवित्र स्थानों से कई रोचक कहानियाँ जुड़ी हैं। कहीं चंद्रदेव की तपस्या है, कहीं भगवान शिव ने अपने भक्तों की रक्षा की और कहीं उनकी भक्ति ने लोगों को धैर्य रखना सिखाया। इस लेख में 12 ज्योतिर्लिंगों के नाम, उनके स्थान और उनसे जुड़ी प्रचलित कथाएँ आसान भाषा में पढ़िए।

Hindi Rama | पौराणिक कहानी

12 ज्योतिर्लिंग के नाम और स्थान

1. सोमनाथ — गुजरात

2. मल्लिकार्जुन — आंध्र प्रदेश

3. महाकालेश्वर — मध्य प्रदेश

4. ओंकारेश्वर — मध्य प्रदेश

5. केदारनाथ — उत्तराखंड

6. भीमाशंकर — महाराष्ट्र

7. काशी विश्वनाथ — उत्तर प्रदेश

8. त्र्यंबकेश्वर — महाराष्ट्र

9. वैद्यनाथ — झारखंड

10. नागेश्वर — गुजरात

11. रामेश्वरम — तमिलनाडु

12. घृष्णेश्वर — महाराष्ट्र

1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी — गुजरात

गुजरात के प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। इससे जुड़ी प्रसिद्ध कथा चंद्रदेव और दक्ष प्रजापति के श्राप की है।

बहुत पुराने समय में दक्ष प्रजापति की 27 बेटियाँ थीं। इन सभी का विवाह चंद्रदेव से हुआ था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन 27 बेटियों को 27 नक्षत्रों से भी जोड़ा जाता है।

चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में रोहिणी को सबसे अधिक पसंद करते थे। वह अपना ज्यादातर समय उन्हीं के साथ बिताते थे। बाकी पत्नियों को यह बात अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि चंद्रदेव उनके साथ बराबर का व्यवहार नहीं करते।

आखिरकार वे सभी अपने पिता दक्ष प्रजापति के पास पहुँचीं और उन्हें अपनी परेशानी बताई। दक्ष ने चंद्रदेव को समझाया कि उन्हें सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। लेकिन चंद्रदेव ने अपनी आदत नहीं बदली।

इस बात से नाराज होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि उनका तेज कम होने लगेगा। श्राप का असर हुआ और चंद्रदेव का प्रकाश धीरे-धीरे घटने लगा। इससे वह बहुत परेशान हो गए।

चंद्रदेव ने देवताओं से मदद माँगी। देवताओं ने उन्हें भगवान शिव की पूजा करने की सलाह दी। उनकी बात मानकर चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र पहुँचे और वहाँ शिवजी की तपस्या करने लगे।

चंद्रदेव लंबे समय तक भगवान शिव का ध्यान करते रहे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी उनके सामने प्रकट हुए। चंद्रदेव ने उनसे श्राप से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना की।

भगवान शिव ने बताया कि दक्ष का श्राप पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन उसका असर कुछ हद तक कम हो सकता है। धार्मिक कथा में चंद्रमा के घटने और फिर बढ़ने को इसी घटना से जोड़ा जाता है।

चंद्रदेव ने भगवान शिव से यह भी प्रार्थना की कि वे प्रभास क्षेत्र में हमेशा रहें, ताकि दूसरे भक्त भी वहाँ आकर उनकी पूजा कर सकें। शिवजी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए।

चंद्रमा को सोम भी कहा जाता है। इसी वजह से भगवान शिव के इस रूप का नाम सोमनाथ पड़ा। यह कथा आज भी चंद्रदेव की तपस्या और भगवान शिव की कृपा के लिए श्रद्धा से सुनाई जाती है।

2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी — श्रीशैलम

आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा है। इसकी प्रसिद्ध कथा उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेशजी के बारे में है।

भगवान शिव और माता पार्वती के दो पुत्र थे—कार्तिकेय और गणेश। एक दिन दोनों के विवाह की बात चली। तब यह तय करने की बात हुई कि पहले किसका विवाह होना चाहिए।

इसके लिए एक शर्त रखी गई कि जो पुत्र पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर सबसे पहले वापस आएगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा। यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन पर बैठकर दुनिया का चक्कर लगाने निकल पड़े।

गणेशजी ने इस बात पर विचार किया। उन्होंने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा की और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही पूरा संसार हैं। इसलिए उनकी परिक्रमा करना दुनिया की परिक्रमा करने के बराबर है।

गणेशजी की बात सुनकर शिवजी और माता पार्वती खुश हुए। उन्होंने उनकी बात स्वीकार की और उनका विवाह पहले कर दिया।

जब कार्तिकेय वापस लौटे और उन्हें यह बात पता चली, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्हें लगा कि उनके साथ ठीक नहीं हुआ। नाराज होकर वह अपने माता-पिता से दूर क्रौंच पर्वत की ओर चले गए।

माता पार्वती अपने पुत्र को दुखी देखकर परेशान थीं। भगवान शिव भी कार्तिकेय से बहुत प्रेम करते थे। दोनों उन्हें मनाने और उनके पास जाने की कोशिश करते रहे।

प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती समय-समय पर उस स्थान पर जाते थे जहाँ कार्तिकेय रहते थे। इसी परंपरा से श्रीशैलम का संबंध शिवजी, माता पार्वती और कार्तिकेय के प्रेम से जोड़ा जाता है।

इस स्थान पर भगवान शिव के रूप को मल्लिकार्जुन कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, मल्लिका नाम माता पार्वती और अर्जुन नाम भगवान शिव से जुड़ा है। इस तरह यह नाम दोनों के मेल को दिखाता है।

श्रीशैलम में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की भी पूजा की जाती है। मल्लिकार्जुन की कथा में परिवार के प्रेम और अपने प्रियजनों के लिए चिंता का भाव दिखाई देता है।

3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी — उज्जैन

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के प्रसिद्ध रूपों में से एक है। महाकाल नाम उनके उस रूप से जुड़ा है, जिसे समय से भी परे माना जाता है।

प्रचलित कथा के अनुसार, पुराने समय में उज्जैन में एक ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था। उसका परिवार भगवान शिव का भक्त था और रोज उनकी पूजा करता था।

उसी समय दूषण नाम का एक ताकतवर राक्षस वहाँ आ पहुँचा। वह लोगों को डराता था और चाहता था कि वे भगवान शिव की पूजा करना छोड़ दें। उसने शिव भक्तों को पूजा करने से रोकने की कोशिश की।

लेकिन ब्राह्मण परिवार ने अपना विश्वास नहीं छोड़ा। दूषण की धमकियों के बावजूद वे भगवान शिव की पूजा करते रहे। इससे राक्षस और ज्यादा गुस्सा हो गया।

एक दिन दूषण भक्तों को नुकसान पहुँचाने के लिए आगे बढ़ा। संकट में फँसे लोगों ने भगवान शिव को पुकारा। उनकी पुकार सुनकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए।

शिवजी ने अपने शक्तिशाली रूप से दूषण का सामना किया और उसके अत्याचारों का अंत कर दिया। इससे उज्जैन के लोगों को राहत मिली और भक्त फिर से बिना डर के पूजा करने लगे।

भक्तों ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उज्जैन में ही रहें। शिवजी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और महाकाल के रूप में वहाँ विराजमान हो गए।

इसी मान्यता के कारण यह स्थान महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ भगवान शिव की महाकाल के रूप में पूजा की जाती है।

महाकालेश्वर की कथा में भगवान शिव को अपने भक्तों की रक्षा करने वाले देवता के रूप में याद किया जाता है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि डर और संकट के समय भी भक्तों ने अपनी पूजा नहीं छोड़ी।

4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी — मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के बीच मांधाता क्षेत्र में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा विंध्य पर्वत की तपस्या के बारे में है।

कहा जाता है कि एक समय विंध्य पर्वत को अपनी ऊँचाई और ताकत पर घमंड होने लगा। वह चाहता था कि दुनिया में उसकी शक्ति सबसे अधिक मानी जाए।

इसी दौरान देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। विंध्य से बातचीत करते हुए उनकी बातों ने पर्वत के मन में और अधिक शक्तिशाली बनने की इच्छा जगा दी।

इसके बाद विंध्य ने भगवान शिव को प्रसन्न करने का फैसला किया। उसने एक जगह मिट्टी से शिवलिंग बनाया और उसकी पूजा शुरू कर दी। वह लंबे समय तक शिवजी का ध्यान करता रहा।

विंध्य की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट हुए। उन्होंने विंध्य से वरदान माँगने को कहा। विंध्य ने ऐसी शक्ति माँगी जिससे वह और अधिक ताकतवर बन सके।

भगवान शिव ने उसे वरदान दिया। इसके बाद वहाँ मौजूद देवताओं और ऋषियों ने भी शिवजी से प्रार्थना की कि वे इस पवित्र स्थान पर हमेशा रहें। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इस धार्मिक परंपरा में भगवान शिव के इस रूप को ओंकारेश्वर से जोड़ा जाता है। ओंकार नाम पवित्र ध्वनि ॐ से जुड़ा हुआ माना जाता है।

ओंकारेश्वर क्षेत्र से राजा मांधाता की तपस्या की कथा भी जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राजा मांधाता ने यहाँ भगवान शिव की पूजा की थी। इसी वजह से इस क्षेत्र को मांधाता नाम से भी जाना जाता है।

इस तरह ओंकारेश्वर की परंपरा में विंध्य पर्वत की तपस्या और राजा मांधाता की भक्ति, दोनों का महत्व है। नर्मदा नदी के बीच स्थित यह स्थान आज भी शिव भक्ति के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है।

5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी — उत्तराखंड

उत्तराखंड के हिमालय में ऊँची पहाड़ियों के बीच स्थित केदारनाथ भगवान शिव के प्रमुख तीर्थों में से एक है। इसकी प्रसिद्ध कथा महाभारत के पांडवों से जुड़ी है।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडव युद्ध तो जीत गए थे, लेकिन इतने लोगों की मृत्यु देखकर उनके मन में दुख और पछतावा था। वे भगवान शिव से मिलकर अपने किए का प्रायश्चित करना चाहते थे।

पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी खोज में निकले। लेकिन कथा के अनुसार, शिवजी उनसे तुरंत मिलना नहीं चाहते थे। उन्होंने अपना रूप बदल लिया और बैल का रूप धारण कर लिया।

पांडवों ने एक बैल को देखा। भीम को शक हुआ कि यह कोई साधारण बैल नहीं है। उन्होंने उसे पहचानने और रोकने की कोशिश की।

तभी बैल धरती में समाने लगा। भीम ने उसे पकड़ना चाहा, लेकिन बैल का अधिकतर शरीर धरती के भीतर चला गया। पांडव समझ गए कि यह भगवान शिव ही हैं, जो उनसे छिपने के लिए बैल बने थे।

पांडवों ने भगवान शिव की पूजा की और उनसे अपने किए की माफी माँगी। उन्होंने युद्ध में हुई तबाही के लिए अपना दुख भी प्रकट किया।

भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। इस कथा में बैल के शरीर के अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग स्थानों पर प्रकट होने की बात भी कही जाती है। केदारनाथ में बैल के पिछले हिस्से की पूजा की परंपरा इसी कथा से जुड़ी है।

केदारनाथ से नर और नारायण ऋषियों की तपस्या की कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और उनसे इस स्थान पर रहने की प्रार्थना की।

इन्हीं धार्मिक परंपराओं के कारण केदारनाथ को तपस्या, प्रायश्चित और भगवान शिव की कृपा से जुड़ा पवित्र स्थान माना जाता है।

6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कहानी — महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के सह्याद्रि क्षेत्र में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की प्रसिद्ध कथा भीम नाम के राक्षस और भगवान शिव से जुड़ी है। इस कथा में एक भक्त राजा की शिव भक्ति का भी वर्णन मिलता है।

प्रचलित कथा के अनुसार, भीम एक ताकतवर राक्षस था। उसकी माता का नाम कर्कटी बताया जाता है और उसके पिता के रूप में कुंभकर्ण का नाम आता है। जब भीम को अपने परिवार और जन्म से जुड़ी बातें पता चलीं, तो उसके मन में गुस्सा भर गया।

भीम ने बहुत अधिक ताकत पाने का फैसला किया। इसके लिए उसने भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे ताकतवर होने का वरदान दिया।

वरदान मिलने के बाद भीम का घमंड बढ़ गया। वह लोगों को परेशान करने लगा और कई राजाओं को अपने अधीन कर लिया। उसकी ताकत से लोग डरने लगे।

इसी कथा में राजा सुदक्षिण का जिक्र आता है। भीम ने राजा को बंदी बना लिया, लेकिन राजा ने कठिन हालात में भी भगवान शिव की पूजा करना नहीं छोड़ा।

राजा सुदक्षिण बंदी रहते हुए भी शिवजी का ध्यान करते रहे। भीम को यह बात पसंद नहीं आई। उसने राजा को पूजा करने से रोकने की कोशिश की, लेकिन राजा अपने विश्वास पर टिके रहे।

राजा और दूसरे भक्तों की पुकार सुनकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए। भीम ने उनसे युद्ध किया। दोनों के बीच भयंकर लड़ाई हुई, लेकिन राक्षस भगवान शिव के सामने टिक नहीं पाया।

भगवान शिव ने भीम का अंत कर दिया और भक्तों को उसके डर से मुक्ति दिलाई। इसके बाद वहाँ मौजूद लोगों ने शिवजी से उसी स्थान पर रहने की प्रार्थना की।

भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और भीमाशंकर के रूप में वहाँ विराजमान हो गए। इसी मान्यता से इस स्थान का संबंध 12 ज्योतिर्लिंगों में माना जाता है।

भीमाशंकर की कथा में राजा सुदक्षिण की भक्ति और भीम के घमंड के बीच अंतर दिखाई देता है। यह कथा भगवान शिव की पूजा और भक्तों की रक्षा से जुड़ी हुई है।

7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी — वाराणसी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। काशी को बहुत पुराने समय से शिवजी की प्रिय नगरी माना जाता है। यहाँ की धार्मिक परंपराएँ भगवान शिव के अनंत रूप और उनके इस नगरी में निवास से जुड़ी हैं।

भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग रूप से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच यह सवाल उठा कि दोनों में सबसे बड़ा कौन है। दोनों अपने-अपने महत्व को सबसे अधिक मानते थे।

तभी भगवान शिव एक विशाल प्रकाश के खंभे के रूप में प्रकट हुए। उस प्रकाश का न तो ऊपर का अंत दिखाई देता था और न ही नीचे का।

भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने उस प्रकाश के शुरू और अंत को खोजने की कोशिश की। लेकिन वे उसकी सीमा का पता नहीं लगा सके। इस कथा के जरिए भगवान शिव के अनंत और असीम रूप को समझाया जाता है।

काशी के बारे में धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव ने इस नगरी को अपना विशेष निवास बनाया। इसी वजह से यहाँ उन्हें विश्वनाथ कहा जाता है। विश्वनाथ का अर्थ है पूरे संसार के स्वामी।

काशी से जुड़ी मान्यताओं में भगवान शिव को अपने भक्तों पर कृपा करने वाला माना जाता है। यहाँ मृत्यु और मुक्ति से जुड़ी भी कई पुरानी धार्मिक मान्यताएँ हैं। इसी कारण काशी को केवल एक शहर नहीं, बल्कि भगवान शिव की पवित्र नगरी के रूप में देखा जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग रूप की पूजा होती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं।

काशी विश्वनाथ की कथा का मुख्य भाव भगवान शिव के अनंत रूप और काशी में उनके निवास की मान्यता से जुड़ा है।

8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी — महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में नासिक के पास स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा गौतम ऋषि, उनकी पत्नी अहिल्या और भगवान शिव से जुड़ी है। इस कहानी का संबंध गोदावरी नदी की धार्मिक परंपरा से भी है।

बहुत पुराने समय में गौतम ऋषि अपनी पत्नी अहिल्या के साथ इस क्षेत्र में रहते थे। वे भगवान शिव की पूजा करते और अपना समय तपस्या में बिताते थे।

एक समय उस क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा। लंबे समय तक बारिश नहीं हुई, जिससे लोगों और पशु-पक्षियों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा।

गौतम ऋषि ने वरुण देव की पूजा की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वरुण देव ने उनके आश्रम में पानी की व्यवस्था कर दी। इससे गौतम ऋषि खेती कर सके और जरूरतमंद लोगों की मदद भी करने लगे।

उनके आश्रम में आने वाले लोगों को भोजन और पानी मिलता था। लेकिन समय के साथ कुछ दूसरे ऋषियों के मन में गौतम ऋषि के लिए जलन पैदा हो गई। उन्होंने उन्हें बदनाम करने की योजना बनाई।

प्रचलित कथा के अनुसार, गणेशजी ने एक कमजोर गाय का रूप लिया और गौतम ऋषि के खेत में पहुँच गए। गौतम ऋषि ने गाय को खेत से हटाने के लिए घास की एक हल्की डंडी से उसे छुआ। इसके बाद गाय जमीन पर गिर गई।

गौतम ऋषि को लगा कि उनसे बहुत बड़ा पाप हो गया है। वह इस घटना से दुखी हो गए और उन्होंने अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए भगवान शिव की तपस्या शुरू कर दी।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने गौतम ऋषि से कहा कि उन्होंने जानबूझकर कोई गलत काम नहीं किया था। गौतम ऋषि ने शिवजी से प्रार्थना की कि गंगा इस क्षेत्र में आएँ, ताकि वह पवित्र जल में स्नान कर सकें।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव की कृपा से गंगा की धारा इस क्षेत्र से जुड़ी। इसे गोदावरी या गौतमी नदी की परंपरा से जोड़ा जाता है।

गौतम ऋषि ने भगवान शिव से वहाँ हमेशा रहने की प्रार्थना भी की। शिवजी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और त्र्यंबकेश्वर के रूप में वहाँ विराजमान हो गए। इसी कारण त्र्यंबकेश्वर को गोदावरी नदी की उत्पत्ति से जुड़ा पवित्र तीर्थ भी माना जाता है।

9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी — देवघर

झारखंड के देवघर में स्थित बाबा वैद्यनाथ एक प्रसिद्ध शिव तीर्थ हैं। एक प्रमुख धार्मिक परंपरा में इन्हें वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इनसे जुड़ी प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण की तपस्या के बारे में है।

रावण भगवान शिव का बड़ा भक्त था। वह चाहता था कि शिवजी उसके साथ लंका चलें और वहीं रहने लगें। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उसने कठिन तपस्या शुरू कर दी।

कथा के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बहुत कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे दर्शन दिए। रावण ने उनसे लंका चलने की प्रार्थना की।

भगवान शिव ने रावण को अपना शिवलिंग रूप दिया और एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि वह रास्ते में शिवलिंग को जमीन पर न रखे। यदि शिवलिंग जमीन पर रख दिया गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा।

रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा। लेकिन रास्ते में उसे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा कि उसे शिवलिंग कुछ समय के लिए दूसरे व्यक्ति को सौंपना पड़ा।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वह व्यक्ति अधिक देर तक शिवलिंग को अपने हाथों में नहीं रख सका और उसे जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस आया, तो उसने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह उसे वहाँ से हिला नहीं पाया।

रावण समझ गया कि शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित हो चुका है। इसके बाद वहाँ भगवान शिव की पूजा होने लगी।

वैद्यनाथ नाम को भगवान शिव के वैद्य यानी इलाज करने वाले रूप से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से यह स्थान बाबा वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के स्थान को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएँ मिलती हैं। देवघर को इस ज्योतिर्लिंग का स्थान मानने की परंपरा बहुत प्रसिद्ध है।

10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी — गुजरात

गुजरात में द्वारका के पास स्थित नागेश्वर एक प्रसिद्ध शिव तीर्थ है। एक प्रमुख धार्मिक परंपरा में इसे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसकी कथा दारुक नाम के राक्षस और शिव भक्त सुप्रिय से जुड़ी है।

कहानी के अनुसार, दारुक नाम का राक्षस लोगों को परेशान करता था। वह कई लोगों को पकड़कर बंदी बना लेता था और उन्हें अपनी मर्जी से रहने पर मजबूर करता था।

एक दिन सुप्रिय नाम का शिव भक्त भी उसके हाथ लग गया। उसे दूसरे लोगों के साथ बंदी बना लिया गया। वहाँ मौजूद लोग डरे हुए थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे इस संकट से कैसे निकलें।

सुप्रिय ने उन्हें हिम्मत दी और भगवान शिव का नाम लेने को कहा। उसने सभी बंदियों से शिवजी की पूजा करने और उनसे रक्षा की प्रार्थना करने के लिए कहा।

बंदी लोगों ने सुप्रिय की बात मानी। वे सब मिलकर भगवान शिव को पुकारने लगे। जब दारुक को यह पता चला, तो वह गुस्से से भर गया और उसने उनकी पूजा रोकने की कोशिश की।

लेकिन सुप्रिय और दूसरे भक्तों ने भगवान शिव का नाम लेना नहीं छोड़ा। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए और अपने भक्तों को राक्षस के डर से बचाया।

इसके बाद बंदी बनाए गए लोगों को राहत मिली। सुप्रिय और दूसरे भक्तों ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उस स्थान पर हमेशा रहें, ताकि वहाँ आने वाले दूसरे भक्त भी उनकी पूजा कर सकें।

भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और नागेश्वर के रूप में वहाँ विराजमान हुए। इसी कथा से इस स्थान को भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थान को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताएँ मिलती हैं। द्वारका के पास स्थित नागेश्वर मंदिर इस नाम से प्रसिद्ध तीर्थों में से एक है।

11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कहानी — तमिलनाडु

तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कथा रामायण की धार्मिक परंपरा से जुड़ी है। यह स्थान भगवान राम और भगवान शिव की भक्ति के संबंध के लिए जाना जाता है।

कथा के अनुसार, भगवान राम माता सीता को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जा रहे थे। लंका पहुँचने के लिए उन्हें समुद्र पार करना था। समुद्र के किनारे पहुँचकर उन्होंने भगवान शिव की पूजा करने का फैसला किया।

भगवान राम चाहते थे कि लंका जाने से पहले उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद मिले। रामायण से जुड़ी एक प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार, उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया और उसकी पूजा की। उन्होंने धर्म की जीत और अपने काम में सफलता के लिए प्रार्थना की।

एक प्रसिद्ध लोककथा में बताया जाता है कि हनुमानजी शिवलिंग लाने गए थे। उनके लौटने में देर हुई, तो माता सीता ने रेत से शिवलिंग बनाया। भगवान राम ने उसी शिवलिंग की पूजा की।

बाद में भगवान राम ने भगवान शिव से आशीर्वाद माँगा और लंका की ओर आगे बढ़े। इस धार्मिक परंपरा में भगवान शिव को राम की भक्ति से प्रसन्न होकर उस स्थान पर रहने वाला माना जाता है।

रामेश्वरम नाम को भगवान राम और ईश्वर यानी भगवान शिव के संबंध से जोड़ा जाता है। इस कथा की खास बात यह है कि भगवान राम स्वयं भगवान शिव की पूजा करते हैं।

रामेश्वरम आज भी भारत के प्रमुख शिव तीर्थों में गिना जाता है। यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं।

12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी — महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में एलोरा के पास वेरुल क्षेत्र में स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रसिद्ध कथा घुश्मा नाम की शिव भक्त महिला से जुड़ी है। इस कथा में घुश्मा की भक्ति और कठिन समय में धैर्य बनाए रखने का वर्णन मिलता है।

प्रचलित कथा के अनुसार, सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहता था। दोनों भगवान शिव के भक्त थे, लेकिन उन्हें संतान का सुख नहीं मिला था। सुदेहा इस बात से बहुत दुखी रहती थी।

बाद में परिवार में घुश्मा नाम की एक स्त्री आई। घुश्मा भी भगवान शिव की बड़ी भक्त थीं। वह रोज मिट्टी के शिवलिंग बनातीं, उनकी पूजा करतीं और फिर उन्हें पानी में विसर्जित कर देती थीं।

घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र का आशीर्वाद दिया। पुत्र के जन्म से घर में खुशी छा गई। लेकिन समय के साथ सुदेहा के मन में जलन पैदा होने लगी। उसे लगने लगा कि अब परिवार में घुश्मा का महत्व उससे अधिक हो गया है।

कथा के अनुसार, सुदेहा की जलन इतनी बढ़ गई कि उसने घुश्मा के पुत्र को मारने का फैसला कर लिया। उसने ऐसा ही किया। इस घटना से परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा।

इतना बड़ा दुख सहने के बाद भी घुश्मा ने भगवान शिव की पूजा करना नहीं छोड़ा। अगली सुबह वह रोज की तरह शिवलिंग बनाकर पूजा करने लगीं। उनका विश्वास भगवान शिव पर बना रहा।

पूजा पूरी करने के बाद घुश्मा शिवलिंगों को विसर्जित करने उसी स्थान पर गईं जहाँ वह रोज जाती थीं। प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न हुए और उनके पुत्र को फिर से जीवित कर दिया।

इसके बाद भगवान शिव घुश्मा के सामने प्रकट हुए और उनसे वरदान माँगने को कहा। घुश्मा ने अपने लिए कुछ माँगने के बजाय उनसे प्रार्थना की कि वे उसी स्थान पर रहें और अपने भक्तों पर कृपा करें।

भगवान शिव ने घुश्मा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वहाँ घृष्णेश्वर के रूप में विराजमान हो गए। घुश्मा की भक्ति से जुड़ी यह कथा आज भी श्रद्धा से सुनाई जाती है।

12 ज्योतिर्लिंग की कहानियों का महत्व

12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी कथाएँ अलग-अलग हैं। सोमनाथ की कहानी चंद्रदेव की तपस्या से जुड़ी है, जबकि मल्लिकार्जुन की कथा में माता-पिता और पुत्र का प्रेम दिखाई देता है। महाकालेश्वर की कथा में भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और ओंकारेश्वर की परंपरा में तपस्या का महत्व बताया गया है।

केदारनाथ की कथा पांडवों के पछतावे और भगवान शिव के आशीर्वाद से जुड़ी है। भीमाशंकर में राजा सुदक्षिण की भक्ति का वर्णन मिलता है। काशी विश्वनाथ की मान्यता भगवान शिव के अनंत रूप और काशी में उनके निवास से जुड़ी है।

त्र्यंबकेश्वर की कथा गौतम ऋषि की तपस्या और गोदावरी नदी की परंपरा से जुड़ी है। वैद्यनाथ में रावण की तपस्या का वर्णन है, जबकि नागेश्वर की कथा बंदी भक्तों की पुकार के बारे में है। रामेश्वरम में भगवान राम की शिव पूजा और घृष्णेश्वर में घुश्मा की भक्ति का महत्व बताया गया है।

इन कथाओं में भगवान शिव के अलग-अलग रूप और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ देखने को मिलती हैं। हर ज्योतिर्लिंग का अपना महत्व है और हर स्थान से जुड़ी परंपरा भक्तों के लिए खास है।

12 ज्योतिर्लिंग केवल मंदिरों के नाम नहीं हैं। उनसे जुड़ी कथाएँ भारत की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में इन कहानियों के कुछ विवरण अलग मिल सकते हैं, लेकिन इन सभी में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा का विशेष स्थान है।

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