कैसे हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया ? – Hanuman Swallow Sun
1. बाल हनुमान की असीम शक्ति
⇒ बचपन में हनुमान जी एक साधारण बालक की तरह नही थी, बल्कि उनके भीतर अपार शक्ति और अद्भुत ऊर्जा भरी हुई थी। उनका जन्म ही एक दिव्य उद्देश्य के लिए हुआ था । लेकिन उस समय उन्हे अपनी शक्तियों का कोई ज्ञान नही था।
⇒ जो हर चीज को जानने और पाने की इच्छा रखते थे। उनकी माता अंजना उन्हे बहुत प्रेम करती थी और हमेशा उनकी देखभाल में लगी रहती थी, लेकिन संभालना आसान नही था । वे कभी पेड़ों पर चढ़ जाते, कअभी जानवरों के पीछे दौड़ते और कभी आकाश की ओर देखकर उड़ने की कोशिश करते ।
⇒ उनकी हर हरकत में एक अलग ही ऊर्जा और आत्मविश्वास झलकता था। हनुमान जी को बचपन से ही उड़ने की शक्ति प्राप्त थी, जो उन्हे अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग बनाती थी। वे बिना किसी डर के ऊँचे – ऊँचे आसमान में चले जाते और बादलों के बीच खेलते रहते।
⇒ यह देखकर देवता भी हैरान हो जाते थे कि इतना छोटा बालक इतनी बड़ी शक्ति कैसे संभाल रहा है । एक दिन सुबह – सुबह जब आकाश में लाल – लाल सूरज उग रहा था, तब हनुमान जी की नजर उस चमकते हुए सूर्य पर पड़ी।
⇒ उनकी बालसुलभ बुद्धि ने उसे कोई साधारण चीज नही, बल्कि एक स्वादिष्ट फल समझ लिया। उन्हे लगा की जैसे आकाश में कोई लाल, चमकदार और रस से भरा हुआ फल लटका हुआ है। हनुमान जी के मन मे उस फल को पाने की तीव्र बढ़ गया ……
⇒ उनकी जिज्ञासा और उत्साह इतना बढ़ गया कि वे बिना कुछ सोचे समझे उसे पाने के लिए तैयार हो गए, उन्हे न तो दूरी का अंदाजा था और न ही यह पता था कि वह वासत्व में क्या है ? उनके लिए वह बस एक आकर्षक चीज थी , जिसे उन्हे हर हाल में पाना था।
⇒ उस क्षण ,अपनी अद्भुत शक्ति के बल पर हनुमान जी ने एक लंब छलांग लगाई और सीधे आकाश की ओर उड गए, उनकी गति इतनी तेज थी कि देखते ही देखते वे धरती से बहुत दूर निकल गए । यह दृश्य देखकर सभी लोग और देवता चौक गए, क्योंकि अब एक मासूम बालक अनजाने में पूरे ब्रह्मांड के सबसे महत्वपूर्ण तत्व की ओर बढ़ रहा था।
2. सूर्य को फल समझने की गलती
⇒ जब हनुमान जी आकष में तेजी से उड़ रहे थे उनकी नजर सिर्फ लाल गोले पर टिकी थी , वह उसे किसी साधारण वस्तु की तरह नही , बल्कि एक बेहद आकर्षक और स्वादिष्ट फल जैसा दिखायी दे रहा था, उनकी मासूम बुद्धि में यह बात बिल्कुल भी नही आई कि वह सूर्य है, जो पूरी सृष्टि को प्रकाश और ऊर्जा देता है।
⇒ उनके मन में बस एक विचार था- उस फल को किसी भी तरह पाना । जैसे – जसे हनुमान जी सूर्य के करीब पहुंचते गए, उनकी चमक और गर्मी बढ़ती गई । लेकिन इसका उन पर कोई असर नही पड़ा । उनकी दिव्य शक्ति उन्हे हर प्रकाश की बाधा से बचा रही थी।
⇒ आम जीव – जंतु या मनुष्य उस तेज को सहन नही कर सकते थे, लेकिन बाल हनुमान निडर होकर उसी दिशा में आगे बढ़ते रहे। उनके लिए यह सब एक खेल जैसा था। उस समय आकाश में एक और घटना घट रही थी —–
⇒ राहू भी सूर्य को ग्रहण करने के लिए आगे बढ़ रहा था। लेकिन जैसे ही उसने हनुमान जी को देखा , वह डर गया। उसे लगा कि कोई और उससे पहले ही सूर्य को निगलने जा रहा है। यह देखकर राहू तुरंत वहाँ से भागा और जाकर इन्द्र देव से शिकायत करने लगा कि कोई अजीब बालक सूर्य को निगलने की कोशिश कर रहा है।
⇒ इधर हनुमान जी बिना रुके सूर्य के और भी करीब पहुँच चुके थे । अब वह क्षण आ गया था जब उन्होंने अपने छोटे – से मुख को खोलकर उस फल को पकड़ने की कोशिश की । उनकी यह हरकत पूरी सृष्टि के लिए एक बड़े संकट का संकेत बन चुकी थी, क्योंकि अगर सूर्य ही गायब हो जाता , तो पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा जाता।
⇒ लेकिन हनुमान जी को सब बातों को कोई अंदाजा नही था । वे तो अपनी बालसुलभ जिज्ञासा और उत्साह में पूरी तरह खोए हुए थे । उनके लिए वह सिर्फ एक खेल था, लेकिन देवताओ के लिए यह चिंता का विषय बन गया था , अब सभी देवता मिलकर सोचने लगे कि इस बालक को कैसे रोका जाए, क्योंकि उसकी शक्ति असाधारण थी और उसे रोकना आसान नही था।
3. देवताओ में मचा हड़कंप
⇒ जैसे ही बाल हनुमान सूर्य के बेहद करीब पहुँचने लगे, देवलोक मे हलचल मच गई। देवताओ ने देखा कि एक छोटा बालक इतनी तेज गति से सूर्य की ओर बढ़ रहा है। और उसे निगलने की कोशिश कर रहा है । यह दृश्य इतना अप्रत्याशित था कि सभी देवता चिंतित हो उठे ।
उन्हे समझ नही आ रहा था कि यह बालक कौन है ? और इतनी अपार शक्ति उसके भीतर कैसे है। सूर्य देव स्वयं भी इस स्थिति को देखकर आश्चर्यचकीत थे । उन्होंने महसूस किया कि यह कोई साधारण बालक नही है , बल्कि उसमे ओई द्वय शक्ति है।
लेकिन फिर भी , यदि सूर्य को कुछ हो जाता, तो पूरी सृष्टि अंधकार में होती । इस डर से सूर्य देव ने अन्य देवताओ को संकेत दिया कि तुरंत कुछ करना पड़ेगा । उसी समय राहू, जो पहले ही डर कर भाग चुका था , इन्द्र देव के पास पहुँचा और पूरी घटना बताई।
उसने कहा कि कोई अज्ञात बालक सूर्य को निगलने जा रहा है और यदि ऐसा हो गया, तो उसका ग्रहण करने का अधिकार भी समाप्त हो जाएगा । राहू की बात सुनकर इन्द्र देव भी चिंतित हो गए और तुरंत इस समस्या का समाधान ढूँढने लगे।
देवलोक में अब एक आपात स्थिति बन चुकी थी । सभी देवता एकत्र होकर विचार करने लगे कि इस बालक को कैसे रोका जाए । किसी को यह समझ नही आ रहा था कि इतनी छोटी उम्र में इतनी विशाल शक्ति कैसे संभव है। कुछ देवता उसे समझाने के पक्ष में थे, तो कुछ तुरंत उसे रोकने के लिए बल प्रयोग करने की बात कर रहे थे।
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जैसे – जैसे समय बीत रहा था , हनुमान जी सूर्य के और भी करीब पहुंचते जा रहे थे। अब देरी करने का मतलब पूरी सृष्टि को खतरे में डालना था। आखिरकर नद्रदेव ने निर्णय लिया कि चाहे जो भी हो जाए उस बालक को तुरंत ही रोकना होगा ।
यही वह क्षण था जब देवलोक में घबराहट अपने चरम पर पहुँच गई और एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू हो गई।
4. इन्द्र का वज्र और हनुमान जी घायल
जब देवलोक मे यह तय हो गया कि अब देर करना विनाश को बुलावा देना होगा , तब इन्द्र देव ने स्वयं इस स्थिति को संभालने का निश्चय किया। उन्होंने देखा कि बाल हनुमान सूर्य के अत्यंत करीब पहुँच चुके हैं और यदि उन्हे तुरंत नही रोका गया, तो पूरी सृष्टि अंधकार में डूब सकती है।
यह सोचकर इन्द्र देव ने अपने सबसे शक्तिशाली अस्त्र , वज्र को उठाया और सही समय का इंतजार करने लगा। इधर बाल हनुमान अपनी ही दुनिया में मगन थे । उन्हे न तो किसी खतरे का अंदाजा था और न ही इस बात कि देवता उन्हे रोकना की योजना बना रहे हैं।
वे तो बस उस लाल चमकते हुए फल को पाने की खुशी में और तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे । उनकी मासूमियत और उत्साह ही इस घटना को और भी भावुक बना रहा था। जैसे ही हनुमान जी ने सूर्य को पकड़ने के लिए अपना मुख खोला, उसी क्षण इन्द्र देव ने वज्र का प्रहार कर दिया।
वह वज्र सीधे हनुमान जी के सीधे जबड़े में जाकर लगा । प्रहार इतना शक्तिशाली था कि बाल हनुमान तुरंत बेहोश होकर आकाश से नीचे गिरने लगे । यह दृश्य देखकर पूरे ब्रह्मांड में सन्नाटा छा गया । हनुमान जी का यह गिरना केवल एक बालक का गिरना नही था,,,,,,,,,,
बल्कि एक दिव्य शक्ति का अचानक शांत हो जाना था। उनके घायल होने से प्रकृति भी जैसे दुखी हो उठी । यह देखकर देवता भी कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए, क्योंकि उन्होंने एक मासूम बालक को इतना कठोर सजा दिया , जो सिर्फ अपनी बालसुलभ जिज्ञासा में ऐसा कर रहा था।
हनुमान जी धरती पर गिरकर अचेत हो गए और उनके शरीर से जीवन की हल्की – सी आभा ही शेष रह गई थी । यह घटना आगे चलकर एक बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाली थी, क्योंकि अब पवन देव का क्रोध जागने वाला था । यही वह पल था, जब एक साधारण सी लगने वाली घटना ने पूरे ब्रह्मांड को हिला देने वाली दिशा ले ली,।
5. पवन देव का क्रोध और देवताओ का वरदान (कहानी का अंत )
जब बाल हनुमान घायल होकर धरती पर गिरे और अचेत हो गए, तब यह खबर होकर उनके पिता पवन देव तक पहुंची । अपने प्रिय पुत्र की यह अवस्था देखकर पवन देव का हृदय क्रोध और दुख से भर उठा । वे तुरंत वहाँ पहुंचे और हनुमान जी को अपनी गोद में उठा लिया।
उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन भीतर एक प्रचंड तूफान उठ चुका था । अपने पुत्र के साथ हुए स अन्याय को देखकर पवन देव ने एक भयानक निर्णय लिया। उन्होंने पूरे संसार से पनि वायु शक्ति को वापस खींच लिया । धीरे – धीरे धरती पर हवा रुकने लगी, प्राणियों का सांस लेना कठिन हो गया,,,,,,
पेड़- पौधे मुरझाने लगे और चारों ओर हाहाकार मच गया। यह दृश्य इतना भयावह था कि देवता भी घबरा उठे। जब सभी देवताओ ने देखा कि पवन के बिना जीवन असंभव हो गया है, तब वे तुरंत ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे समाधान की प्रार्थना करने लगे।
ब्रह्मा जी ने स्थिति की गंभीरता को समझा और सभी देवताओ को साथ लेकर पवन देव के पास पहुंचे , ताकि उन्हे शांत किया जा सके और संसार को इस संकट से बचाया जा सके। ब्रह्मा जी ने पवन देव को समझाया और हनुमान जी के शरीर को स्पर्श किया।
उनके दिव्य स्पर्श से हनुमान जी धीरे – धीरे होश में आने लगे । जैसे ही हनुमान जी ने आंखे खोली, पवन देव का क्रोध कुछ शांत हुआ, लेकिन देवताओ को यह एहसास हो चुका था कि उन्होंने एक महान और दिव्य बालक के साथ कठोर व्यवहार किया है।
तबसभ देवताओ ने मिलकर हनुमान जी को अनेक अद्भुत वरदान दिया । इन्द्र देव ने उन्हे वज्र से कभी आहत न होने का आशीर्वाद दिया, अग्नि देव ने उन्हे अग्नि से अजेय बना दिया और यमराज ने उन्हे दीर्घायु और मृत्यु का वरदान दिया ।
इस सभी वरदानों के बाद पवन देव का क्रोध पूरी तरह शांत हो गया और उन्होंने फिर से संसार में वायु का प्रवाह शूरू किया । धीरे – धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा, प्राणियों को जीवन मिला और सृष्टि ने राहत की सांस ली।
इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया, कि हनुमान जी कोई साधारण बालक नही , बल्कि एक महान दिव्य शक्ति के अवतार है। इस प्रकार बाल हनुमान की यह अद्भुत लीला समाप्त होती है , जो हमे यह सिखाती है कि शक्ति के साथ ज्ञान और संयम भी आश्यक है।
उनकी यह बालकाव्य उनके महान कार्यों की शुरुआत बनी। हनुमान जी ने हमेशा धर्म , भक्ति और सेवा का मार्ग अपनाया और पूरे संसार के लिए प्रेरणा बनी।