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छत पर रखी खौफनाक चाय | आधी रात को कौन पी जाता था हितेश की चाय? | Chhat Par Rakhi Khaufnak Chai

छत पर रखी खौफनाक चाय | आधी रात को कौन पी जाता था हितेश की चाय? | Chhat Par Rakhi Khaufnak Chai

क्या हो अगर हर रात छत पर रखी चाय कोई ऐसा पी रहा हो, जिसे घर में रहने वाला कोई इंसान देख ही न सके? छत पर रखी खौफनाक चाय की यह कहानी एक पुराने घर, रहस्यमय पीपल के पेड़ और दो अधूरी आत्माओं का ऐसा डरावना राज खोलती है, जिसे जानने के बाद रात में छत की ओर देखना आसान नहीं रहेगा।

छत पर रखी खौफनाक चाय का रहस्य Chhat Par Rakhi Khaufnak Chai

गांव के किनारे कभी एक छोटा-सा घर हुआ करता था। घर के आसपास पहले ज्यादा मकान नहीं थे। चारों तरफ खेत, झाड़ियां और दूर तक फैला सुनसान रास्ता दिखाई देता था। दिन में वह जगह सामान्य लगती थी, लेकिन रात होते ही वहां का माहौल बदल जाता था।

उस घर के ठीक बगल में एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ था। उसकी मोटी जड़ें जमीन से निकलकर घर की दीवारों तक पहुंच चुकी थीं। कुछ जड़ें तो दीवारों के अंदर तक घुस गई थीं। गांव के बुजुर्ग उस पेड़ को देखकर रास्ता बदल लेते थे।

लोग कहते थे कि उस पीपल के नीचे कई सालों से एक तांत्रिक साधना करता था। वह आदमी उम्र में बहुत बूढ़ा था और उसके बारे में गांव में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं। कोई उसे साधु कहता था, तो कोई उससे डरकर उसका नाम तक लेने से बचता था।

उस समय उस घर में अभिषेक और माया रहते थे। दोनों ने अपनी मर्जी से शादी की थी। अभिषेक के माता-पिता नहीं थे, इसलिए शादी के बाद माया ही उसका सबसे बड़ा सहारा बन गई थी। दोनों की जिंदगी साधारण थी, लेकिन उनके बीच बहुत गहरा प्यार था।

उनकी शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनके कोई बच्चा नहीं था। माया इस बात को लेकर कभी-कभी उदास हो जाती थी। अभिषेक उसे समझाता कि दोनों साथ हैं, यही सबसे बड़ी बात है। लेकिन धीरे-धीरे यह चिंता उसके मन में भी घर करने लगी थी।

माया और अभिषेक की छत वाली चाय

अभिषेक और माया की एक छोटी-सी आदत थी। हर शाम दोनों घर की छत पर बैठकर चाय पीते थे। छत से गांव की कुछ रोशनियां दिखाई देती थीं और पीपल के पेड़ की शाखाएं उनके बिल्कुल पास तक झुक आती थीं।

माया चाय बनाती और अभिषेक दो कप लेकर छत पर चला जाता। दोनों देर तक बातें करते। कभी पुराने दिनों को याद करते और कभी आने वाले समय के सपने देखते। उस छत पर बिताया समय उनके लिए पूरे दिन का सबसे अच्छा हिस्सा था।

लेकिन एक रात माया ने देखा कि पीपल की एक शाखा हवा के बिना ही हिल रही थी। उसने अभिषेक से कहा कि पेड़ की तरफ कुछ अजीब लग रहा है। अभिषेक ने हंसकर कहा कि शायद हवा चल रही होगी। माया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में डर बैठ गया।

उसी रात दोनों ने छत पर चाय खत्म की और नीचे चले गए। उन्हें क्या पता था कि कुछ ही समय बाद उसी छत पर रखी चाय उनके घर के सबसे भयानक रहस्य का हिस्सा बनने वाली है।

तांत्रिक की पहली नजर

एक दिन अभिषेक गांव से लौट रहा था। रास्ते में वही बूढ़ा तांत्रिक पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। अभिषेक उसके पास से निकलने लगा, तभी तांत्रिक ने उसे आवाज दी।

उसने कहा, “बेटा, रुक जाओ। मन में क्या लेकर जा रहे हो?” अभिषेक अचानक रुक गया। तांत्रिक उसकी तरफ देख रहा था। फिर उसने बिना अभिषेक के कुछ बताए ही कह दिया कि उसके मन में संतान को लेकर चिंता है।

अभिषेक यह सुनकर हैरान रह गया। उसे लगा कि शायद सच में उस बूढ़े आदमी को कोई विशेष ज्ञान है। तांत्रिक ने उसे भरोसा दिलाया कि वह ऐसी साधना जानता है जिससे उसकी इच्छा पूरी हो सकती है।

अभिषेक ने शुरुआत में मना किया, लेकिन तांत्रिक की बातों ने उसके मन में उम्मीद जगा दी। कुछ दिनों बाद वह उसे अपने घर बुलाने लगा। अभिषेक को यह नहीं पता था कि उसके सामने बैठा आदमी उसकी परेशानी का इलाज नहीं, बल्कि उसके घर के लिए एक भयानक जाल तैयार कर रहा था।

जिस घर में पूजा के नाम पर अंधेरा उतरा

तांत्रिक ने अभिषेक को कई तरह की साधनाओं के बारे में बताया। उसने कहा कि इसके लिए घर में कुछ विशेष पूजा करनी होगी। अभिषेक उसकी बातों पर विश्वास करने लगा। माया को भी उसने समझाया कि इससे उनके जीवन की परेशानी खत्म हो सकती है।

धीरे-धीरे तांत्रिक का घर में आना बढ़ गया। वह रात में भी आने लगा। वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर अजीब मंत्र पढ़ता और फिर घर के अंदर चला जाता। माया को उसके आने से हमेशा बेचैनी होती थी।

असल में तांत्रिक की नजर माया पर थी। वह उसकी मासूमियत और सुंदरता से प्रभावित हो चुका था। वह उसे अपने वश में करना चाहता था। लेकिन माया अभिषेक से बहुत प्यार करती थी और उसके लिए किसी दूसरे आदमी के बारे में सोचना भी असंभव था।

तांत्रिक ने पहले अभिषेक को अपने प्रभाव में लेना शुरू किया। धीरे-धीरे अभिषेक का व्यवहार बदलने लगा। वह घंटों चुप बैठा रहता। कई बार उसे ऐसी बातें याद नहीं रहतीं जो कुछ समय पहले ही हुई होती थीं।

माया ने कई बार उससे पूछा कि क्या बात है, लेकिन अभिषेक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाता। उसे खुद समझ नहीं आता था कि उसके साथ क्या हो रहा है। रात में वह अचानक उठकर पीपल के पेड़ की तरफ देखने लगता था।

अभिषेक के घर में बदलती रातें

एक रात माया की आंख खुली तो उसने देखा कि अभिषेक कमरे में नहीं था। वह घबराकर उठी और उसे ढूंढते हुए छत पर पहुंची। अभिषेक वहां पीपल के पेड़ की तरफ पीठ करके खड़ा था।

माया ने उसका कंधा पकड़ा तो वह अचानक पलटा। उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन चेहरे पर अजीब खालीपन था। उसने धीमी आवाज में कहा कि उसे नीचे जाना है। माया ने पूछा क्यों, लेकिन अभिषेक बिना जवाब दिए सीढ़ियों से उतर गया।

अगले दिन माया ने उससे पूछा तो अभिषेक को रात की कोई बात याद नहीं थी। यही बात माया को सबसे ज्यादा डराने लगी। उसने तांत्रिक से घर आने के लिए मना किया, लेकिन अभिषेक अचानक उस पर नाराज हो गया।

माया ने पहली बार महसूस किया कि उसका पति उसके सामने होकर भी जैसे उससे दूर जा रहा है। वह उसे बचाना चाहती थी, लेकिन उसे पता नहीं था कि उसके खिलाफ लड़ाई किसी इंसान से नहीं थी।

तांत्रिक का असली इरादा

कुछ दिनों बाद तांत्रिक ने माया को बताया कि अंतिम साधना के लिए उसे अकेले कुछ विशेष विधि करनी होगी। माया ने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि वह अपने पति के बिना किसी साधना में शामिल नहीं होगी।

तांत्रिक ने अभिषेक की तरफ देखा और कुछ मंत्र पढ़े। इसके बाद अभिषेक जैसे अपनी इच्छा खो बैठा। वह तांत्रिक की हर बात मानने लगा। माया समझ चुकी थी कि कुछ बहुत गलत हो चुका है।

तांत्रिक ने माया को अपने साथ बांधने की कोशिश की। वह उसे विश्वास दिलाने लगा कि अभिषेक अब पहले जैसा नहीं रहा और उसकी रक्षा केवल वही कर सकता है। माया रोती रही और अभिषेक को आवाज देती रही।

लेकिन अभिषेक पर तांत्रिक का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि वह माया की बात सुनकर भी उसकी मदद नहीं कर पा रहा था। माया के सामने उसका अपना पति था, लेकिन उसकी आंखों में जैसे किसी और का आदेश दिखाई देता था।

दरवाजे पर गांव वालों की दस्तक

उसी रात गांव के कुछ लोगों को उस घर से अजीब आवाजें सुनाई दीं। एक आदमी ने दूसरे से कहा कि कई रातों से उस घर के आसपास कुछ ठीक नहीं लग रहा है। आखिर कुछ लोग हिम्मत करके घर की तरफ चल पड़े।

जब वे घर के पास पहुंचे तो अंदर से माया के रोने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। कोई जवाब नहीं आया। फिर जोर से आवाज लगाई गई, लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था।

अंदर तांत्रिक ने अभिषेक को पूरी तरह अपने प्रभाव में ले लिया था। माया उसके सामने खड़ी रो रही थी। उसने अभिषेक को बचाने की कोशिश की, लेकिन तभी तांत्रिक ने ऐसा वार किया कि अभिषेक जमीन पर गिर पड़ा।

माया चीख पड़ी। उसने अभिषेक को अपनी बाहों में उठाया। उसकी आवाज टूट गई थी। वह बार-बार कह रही थी कि अभिषेक आंखें खोलो, लेकिन अभिषेक की सांसें थम चुकी थीं।

बाहर खड़े गांव वालों ने दरवाजा तोड़ दिया। उन्हें देखते ही तांत्रिक पीछे हटने लगा। लोगों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह अंधेरे का फायदा उठाकर वहां से भाग निकला।

माया की आखिरी चीख

माया अभिषेक के शरीर के पास बैठी रो रही थी। उसके लिए दुनिया जैसे उसी पल खत्म हो गई थी। जिस आदमी के साथ उसने अपनी पूरी जिंदगी बिताने का सपना देखा था, वह उसके सामने निर्जीव पड़ा था।

गांव वालों ने माया को वहां से हटाने की कोशिश की, लेकिन उसने अभिषेक का हाथ नहीं छोड़ा। तभी उसकी नजर पीपल के पेड़ की तरफ गई। पेड़ की जड़ें अचानक हल्की-हल्की हिलने लगीं।

माया ने अभिषेक को देखा और उसके बाद उसकी आंखें बंद हो गईं। वह भी वहीं गिर पड़ी। गांव वालों ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

उस रात एक ही घर में दो जिंदगियां खत्म हो गईं। लेकिन उस घर का डर वहीं खत्म नहीं हुआ। असली भय तो उसके बाद शुरू हुआ था।

पीपल के पेड़ में कैद दो आत्माएं

कहा जाता है कि तांत्रिक ने अभिषेक पर ऐसी तांत्रिक बंधन की साधना की थी, जिसका असर उसकी मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं हुआ। अभिषेक की आत्मा उसी पीपल के पेड़ से बंध गई। माया की आत्मा भी उसी जगह अटक गई।

लेकिन माया अपने पति के पास नहीं जा सकती थी। वह उसे दूर से देख सकती थी, उससे बात करने की कोशिश कर सकती थी, लेकिन उनके बीच एक अदृश्य बंधन था। माया जितना अभिषेक की ओर बढ़ती, उतना ही कोई अदृश्य शक्ति उसे पीछे खींच लेती।

रात के समय कभी-कभी उस घर की छत पर दो परछाइयां दिखाई देती थीं। एक अभिषेक की और दूसरी माया की। दोनों एक-दूसरे को देखते थे, लेकिन उनके बीच कुछ ऐसा था जिसे वे पार नहीं कर सकते थे।

सबसे अजीब बात यह थी कि कभी-कभी छत पर चाय का एक कप रखा दिखाई देता था। सुबह वह खाली मिलता। गांव वालों ने इसे संयोग माना, लेकिन उस घर के पुराने लोगों को पता था कि वहां चाय पीने की एक अधूरी आदत आज भी जिंदा थी।

सालों बाद घर में आया हितेश

कई साल बीत गए। गांव धीरे-धीरे बदल गया। जहां पहले खेत और खाली जमीन थी, वहां नए मकान बन गए। पुराना घर भी बिक गया। आखिरकार हितेश अपनी मां सुधा के साथ उस घर में रहने आ गया।

हितेश को पुराने घर के इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसकी मां सुधा ने भी उससे केवल इतना कहा था कि घर बहुत पुराना है और उसे कुछ समय बाद ठीक करवाना पड़ेगा।

घर के आसपास अब कई मकान बन चुके थे, लेकिन पीपल का वह पेड़ आज भी वहीं खड़ा था। उसकी जड़ें अब पहले से ज्यादा फैल चुकी थीं। कुछ जड़ें घर की दीवारों के अंदर तक दिखाई देती थीं।

पहली रात हितेश ने उस पेड़ को देखा तो उसे अजीब बेचैनी हुई। उसे लगा जैसे कोई पेड़ के पीछे खड़ा होकर उसे देख रहा है। उसने दोबारा देखा तो वहां कोई नहीं था।

हर रात छत पर लौटती चाय

कुछ दिनों बाद हितेश की एक आदत बन गई। वह रात को खाना खाने के बाद चाय बनाता और कभी-कभी छत पर चला जाता। उसे खुली हवा में बैठकर चाय पीना अच्छा लगता था।

एक रात उसकी मां ने उसे नीचे बुलाया। हितेश ने कहा कि वह थोड़ी देर बाद आएगा। उसने चाय का कप छत पर रख दिया और कुछ देर बाद नीचे चला आया। उसे लगा था कि चाय वहीं पड़ी रहेगी।

सुबह जब वह छत पर गया तो कप खाली था। हितेश ने सोचा कि शायद उसने रात में ही चाय पी ली होगी और उसे याद नहीं रहा। उसने इस बात को ज्यादा महत्व नहीं दिया।

लेकिन अगली रात भी वही हुआ। उसने चाय बनाई, कप छत पर रखा और नीचे चला गया। सुबह कप खाली था। इस बार हितेश को यकीन हो गया कि बात सामान्य नहीं है।

तीसरी रात उसने चाय छत पर रखी और सीढ़ियों के पीछे छिपकर देखने लगा। कुछ मिनट तक कुछ नहीं हुआ। फिर पीपल की शाखाएं बिना हवा के हिलने लगीं।

हितेश की नजर कप पर टिक गई। कप के पास अचानक किसी के बैठने जैसी हल्की आवाज आई। लेकिन वहां कोई दिखाई नहीं दे रहा था। फिर कप धीरे-धीरे अपनी जगह से खिसकने लगा।

हितेश का शरीर डर से जम गया। उसने साफ देखा कि कप किसी अदृश्य हाथ की तरह उठ रहा था। उसी समय उसके कान के पास किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई।

“यह चाय उसके लिए है।”

माया ने पहली बार हितेश से बात की

हितेश डरकर नीचे भाग आया। उसने मां सुधा को पूरी बात बताई। सुधा ने पहले उसे समझाया कि शायद डर के कारण उसे भ्रम हुआ होगा। लेकिन जब अगली सुबह चाय का कप फिर खाली मिला, तो सुधा भी चुप हो गई।

उस रात हितेश ने छत पर जाने की हिम्मत नहीं की। लेकिन आधी रात के बाद ऊपर से कप रखे जाने की आवाज आई। फिर किसी पुरुष की धीमी आवाज सुनाई दी। हितेश ने दरवाजे के पास खड़े होकर ध्यान से सुना।

आवाज कह रही थी कि माया अभी भी बंधी हुई है। हितेश को समझ नहीं आया कि वह किसकी बात कर रहा है। तभी दूसरी आवाज आई। वह औरत की थी।

वह आवाज कह रही थी कि जिसने यह सब किया था, वह अभी खत्म नहीं हुआ है। हितेश के रोंगटे खड़े हो गए। उसे पहली बार समझ आया कि घर में जो कुछ हो रहा है, वह केवल किसी आत्मा की मौजूदगी नहीं है।

माया की आत्मा ने हितेश से मदद मांगी। उसने बताया कि उसका नाम माया है और उसके पति का नाम अभिषेक था। उसने यह भी बताया कि उनकी मौत के पीछे वही तांत्रिक था जिसने उन्हें अपने बंधन में जकड़ दिया था।

पुराने घर का छिपा हुआ कमरा

हितेश ने अगले दिन घर की पुरानी दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया। पीपल की जड़ें जिस हिस्से में सबसे ज्यादा घुसी थीं, वहां दीवार कुछ अलग दिखाई दे रही थी। उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई खाली जगह हो।

उसने सुधा को बिना बताए दीवार के उस हिस्से को साफ किया। थोड़ी देर बाद उसे ईंटों के पीछे एक छोटा-सा बंद स्थान मिला। वहां पुराने कपड़े, राख और कुछ सूखे हुए पत्ते पड़े थे।

एक कोने में लोहे का छोटा डिब्बा रखा था। हितेश ने उसे खोला तो अंदर पुराने कागज और एक धुंधली तस्वीर मिली। तस्वीर में अभिषेक और माया छत पर बैठे हुए थे। उनके सामने दो कप चाय रखे थे।

तस्वीर के पीछे कुछ शब्द लिखे थे। उनमें तांत्रिक का नाम नहीं था, लेकिन एक जगह पीपल के पेड़ और बंधन की साधना का संकेत था। हितेश समझ गया कि माया सच कह रही थी।

तांत्रिक की तलाश

हितेश ने गांव के बुजुर्गों से पुराने घर के बारे में पूछना शुरू किया। शुरुआत में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं था। आखिर एक बूढ़े आदमी ने उसे बताया कि कई साल पहले वहां एक तांत्रिक आता था और अभिषेक-माया की मौत के बाद वह अचानक गायब हो गया था।

हितेश ने पूछा कि वह तांत्रिक अब कहां है। बूढ़े आदमी ने कहा कि किसी को पता नहीं। लेकिन उसने एक ऐसी जगह का नाम लिया जहां कभी तांत्रिक साधना किया करता था।

उस जगह तक पहुंचना आसान नहीं था। वह गांव से दूर जंगल की तरफ थी। हितेश अकेला वहां जाने से डर रहा था, लेकिन माया की आवाज उसे बार-बार वही रास्ता दिखा रही थी।

एक रात माया ने उसे बताया कि तांत्रिक की साधना का आखिरी निशान अब भी वहीं मौजूद है। अगर वह निशान नष्ट हो जाए तो अभिषेक और माया उस बंधन से मुक्त हो सकते हैं।

जंगल में मिला तांत्रिक का निशान

हितेश उस जगह पहुंचा तो चारों तरफ घना अंधेरा था। पेड़ों के बीच से हवा गुजर रही थी, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा हो। उसने कई बार पीछे मुड़कर देखा, मगर हर बार रास्ता खाली था।

जंगल के बीच उसे पत्थरों से घिरा एक पुराना स्थान मिला। वहां जमीन पर वही निशान बने थे जो उसे अपने घर के छिपे हुए कमरे में मिले थे। अचानक उसके पीछे किसी ने भारी आवाज में कहा कि उसे वहां नहीं आना चाहिए था।

हितेश पलटा तो सामने वही बूढ़ा तांत्रिक खड़ा था। उम्र बहुत बढ़ चुकी थी, लेकिन उसकी आंखों में वही कठोरता थी। उसने कहा कि माया अब भी उसकी पहुंच से बाहर नहीं है और अभिषेक की आत्मा भी उसी के बंधन में है।

हितेश ने उससे पूछा कि उसने अभिषेक और माया के साथ ऐसा क्यों किया। तांत्रिक ने कोई पछतावा नहीं दिखाया। उसने कहा कि उसने माया को पाने के लिए वह सब किया था और अभिषेक उसके रास्ते में था।

उसी पल जंगल में तेज हवा चली। पेड़ों की शाखाएं जोर-जोर से हिलने लगीं। हितेश ने देखा कि उसके पीछे माया की परछाई दिखाई दे रही थी। उसके ठीक दूसरी तरफ अभिषेक खड़ा था।

अभिषेक और माया की आखिरी लड़ाई

तांत्रिक ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। जमीन पर बने निशान जैसे चमकने लगे। हितेश पीछे हट गया। तभी माया की आवाज गूंजी कि वह अब अपने पति को दोबारा खोने नहीं देगी।

अभिषेक की आत्मा भी तांत्रिक के सामने खड़ी हो गई। पहली बार उसके चेहरे पर वही शांति थी जो कभी माया के साथ छत पर चाय पीते समय होती थी। उसने माया की तरफ देखा और कहा कि अब वह उसे अकेला नहीं छोड़ेगा।

तांत्रिक ने बंधन को मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन इस बार माया और अभिषेक दोनों उसके सामने थे। हितेश ने उस पुराने निशान को नष्ट करने का प्रयास किया।

जैसे ही वह निशान टूटने लगा, तांत्रिक चीख उठा। उसके चारों तरफ की हवा अचानक भारी हो गई। पेड़ की जड़ें जमीन के अंदर से हिलने लगीं और उसकी ओर बढ़ती दिखाई दीं।

“अब कोई बंधन नहीं रहेगा।”

निशान पूरी तरह टूट गया। तांत्रिक जमीन पर गिर पड़ा। उसकी शक्ति जैसे उसी पल खत्म हो गई। हितेश ने देखा कि माया और अभिषेक की परछाइयां धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रही थीं।

छत पर आखिरी बार रखी गई चाय

उस रात हितेश वापस घर आया। उसकी मां सुधा दरवाजे पर उसका इंतजार कर रही थी। हितेश ने उसे पूरी बात बताई। दोनों देर तक चुप बैठे रहे।

सुबह होने से पहले हितेश ने दो कप चाय बनाई। वह उन्हें लेकर छत पर गया और दोनों कप पीपल के पेड़ के पास रख दिए। कुछ देर तक वहां बिल्कुल शांति रही।

फिर हवा चली। पीपल की पत्तियां धीरे-धीरे हिलने लगीं। हितेश ने देखा कि एक कप के पास माया की हल्की परछाई दिखाई दी और दूसरे कप के पास अभिषेक की।

दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे के सामने बैठे रहे। जैसे बरसों बाद उन्हें वही छत, वही चाय और वही साथ वापस मिल गया हो। हितेश ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

जब उसने आंखें खोलीं तो दोनों परछाइयां गायब थीं। दोनों कप भी खाली थे। लेकिन इस बार डर नहीं था। उसे लगा कि शायद माया और अभिषेक आखिरकार उस बंधन से मुक्त हो चुके हैं।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई

कुछ दिन तक घर में सब सामान्य रहा। पीपल का पेड़ शांत था। रात में कोई आवाज नहीं आती थी। हितेश ने भी छत पर जाना शुरू कर दिया था। उसे लगा कि पुराना डर अब खत्म हो चुका है।

लेकिन एक रात वह सोने जा रहा था, तभी उसे ऊपर से कप रखने की आवाज सुनाई दी। उसने सोचा कि शायद सुधा छत पर गई होगी। लेकिन उसकी मां नीचे कमरे में सो रही थी।

हितेश धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़कर छत पर पहुंचा। वहां पीपल का पेड़ बिल्कुल शांत था। बीच में एक कप रखा था। कप से भाप उठ रही थी।

हितेश ने कप को छुआ। चाय अभी गर्म थी। लेकिन इस बार वहां दो कप नहीं थे। केवल एक कप था। उसके पास जमीन पर किसी ने उंगली से एक नाम लिखा था।

“तांत्रिक अभी मरा नहीं।”

हितेश कुछ समझ पाता, उससे पहले पीपल के पेड़ की सबसे मोटी जड़ के अंदर से हल्की दस्तक सुनाई दी। एक बार। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार।

हितेश पीछे हट गया। जड़ के भीतर से किसी बूढ़े आदमी की धीमी हंसी सुनाई दी। उसी क्षण छत पर रखा कप अपने आप टूट गया और चाय जमीन पर फैल गई।

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हितेश की नजर पीपल की जड़ पर टिक गई। वहां एक नई दरार बन चुकी थी। उस दरार के अंदर से अंधेरा दिखाई दे रहा था।

और तभी उसे माया की आवाज सुनाई दी। इस बार उसकी आवाज पहले जैसी शांत नहीं थी। वह डरकर केवल इतना कह रही थी कि हितेश तुरंत छत से नीचे चला जाए।

“वह वापस आ गया है।”

हितेश ने नीचे भागने के लिए कदम बढ़ाया, लेकिन उसके पीछे पीपल के पेड़ की जड़ें फिर से हिलने लगीं। घर के अंदर से अचानक चाय उबलने की आवाज आने लगी।

उस रात के बाद किसी ने भी उस घर की छत पर अकेले जाने की हिम्मत नहीं की। गांव में आज भी कहा जाता है कि अगर आधी रात के बाद उस पुराने पीपल के पेड़ के पास से गुजरते समय चाय की खुशबू आए, तो वहां रुकना नहीं चाहिए।

क्योंकि कभी-कभी छत पर रखी खौफनाक चाय किसी इंसान के लिए नहीं होती। वह उन लोगों के लिए होती है जो सालों पहले चले गए, लेकिन जिनकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई।

Hindi Rama पर प्रकाशित यह डरावनी कहानी पूरी तरह मौलिक रूप से लिखी गई है और इसका उद्देश्य पाठकों को एक काल्पनिक डरावनी कहानी का अनुभव देना है।

अगर आपको ऐसी रहस्यमय और डरावनी कहानियां पसंद हैं, तो Hindi Rama पर ऐसी ही दूसरी कहानियां भी पढ़ सकते हैं। लेकिन रात में अकेले छत पर जाने से पहले इस कहानी को जरूर याद रखिएगा।

लेखक: अजय नागर

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