क्या एक दुल्हन मौत के बाद भी अपने प्यार का इंतजार कर सकती है? एक पुराने मकान की छत पर लाल जोड़े में भटकती नैना की कहानी प्यार, अधूरी शादी और एक छिपे हुए सच से जुड़ी है। जब विवेक उस मकान में रहने आता है, तो उसके सामने ऐसा रहस्य खुलता है, जो उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देता है।
लाल जोड़े में इंतजार और मौत: कहानी की शुरुआत
विवेक पच्चीस साल का एक सीधा-सादा लड़का था। नौकरी मिलने के बाद उसे दूसरे शहर में आना पड़ा था। शहर उसके लिए नया था और यहां उसका कोई जानने वाला भी नहीं था। वह ऐसा कमरा ढूंढ रहा था, जिसका किराया उसकी आमदनी के हिसाब से हो।
कई दिनों की तलाश के बाद उसे शहर के पुराने हिस्से में एक दो मंजिला मकान दिखाई दिया। मकान पुराना था, लेकिन बाहर से रहने लायक लगता था। आसपास के घरों की तुलना में वहां कुछ ज्यादा ही शांति थी। सड़क पर भी बहुत कम लोग आते-जाते थे।
मकान के निचले हिस्से में सरला देवी नाम की एक बुजुर्ग महिला रहती थीं। उन्होंने विवेक को ऊपर का कमरा दिखाया। कमरा बड़ा था, खिड़की से खुला आसमान दिखाई देता था और उसका किराया भी आसपास के कमरों से कम था।
विवेक को कमरा पसंद आ गया। उसने किराया तय कर लिया और अपना सामान रखने लगा। सरला देवी ने उसे चाबी दी, लेकिन तभी कुछ सोचकर रुक गईं।
उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “एक बात मेरी मानना। रात में छत पर मत जाना।”
विवेक ने हैरानी से पूछा, “क्यों? छत पर क्या है?”
सरला देवी ने सीढ़ियों की तरफ देखा। उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
“वहां एक दुल्हन रहती है,” उन्होंने कहा।
विवेक हल्का-सा हंस दिया। उसे लगा कि बुजुर्ग महिला उसे डराकर सावधान कर रही हैं। उसने उनकी बात को मजाक समझा और अपने कमरे में चला गया। उसे क्या पता था कि उस रात उसका सामना सचमुच एक ऐसी दुल्हन से होने वाला है, जिसके बारे में सोचकर ही किसी के भी होश उड़ सकते थे।
पहली रात सुनाई दी पायल
पहली रात विवेक ने खाना खाया और करीब ग्यारह बजे सो गया। दिनभर की थकान के कारण उसे जल्दी नींद आ गई। लेकिन रात के करीब दो बजे अचानक उसकी आंख खुल गई।
कमरे में अंधेरा था। खिड़की से आती चांदनी फर्श पर पड़ रही थी। तभी उसे ऊपर से एक अजीब आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
विवेक ने ध्यान से सुना। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई छत पर धीरे-धीरे चल रहा हो। पायल की आवाज कभी एक तरफ जाती और फिर दूसरी तरफ लौट आती। ऐसा लगता था, मानो कोई महिला किसी का इंतजार करते हुए इधर-उधर टहल रही हो।
विवेक ने खुद को समझाया कि शायद कोई बिल्ली छत पर घूम रही होगी। लेकिन कुछ ही देर बाद पायल की आवाज उसके कमरे के ठीक ऊपर आकर रुक गई।
कमरे में अचानक ठंड बढ़ने लगी।
फिर किसी महिला के रोने की आवाज सुनाई दी। आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें इतना दर्द था कि विवेक का दिल घबराने लगा। उसे लगा जैसे कोई उसके बिल्कुल पास बैठकर रो रहा हो।
वह बिस्तर पर उठकर बैठ गया। तभी ऊपर से किसी चीज के टकराने की आवाज आई और पायल फिर बजने लगी। इस बार आवाज सीढ़ियों की तरफ बढ़ रही थी।
धीरे-धीरे कदमों की आहट नीचे आने लगी।
एक कदम… फिर दूसरा… फिर तीसरा।
विवेक की नजर दरवाजे पर टिक गई। कदमों की आवाज उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई। दरवाजे के नीचे से लाल रोशनी जैसी हल्की चमक दिखाई देने लगी।
कुछ पल तक शांति रही। फिर दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
विवेक डर के कारण दरवाजा खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। वह चुपचाप बिस्तर पर बैठा रहा। थोड़ी देर बाद फिर पायल की आवाज सुनाई दी। आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई और आखिर में छत पर जाकर बंद हो गई।
उस रात विवेक को काफी देर तक नींद नहीं आई। उसके मन में बार-बार सरला देवी की बात घूम रही थी। अब उसे समझ आने लगा था कि उन्होंने उसे छत पर जाने से क्यों मना किया था।
लाल जोड़े में खड़ी दुल्हन
अगली सुबह विवेक ने सरला देवी से रात की घटना के बारे में पूछा।
“कल रात मेरे कमरे के बाहर कोई आया था। मैंने पायल की आवाज भी सुनी थी। आखिर इस मकान में हो क्या रहा है?” उसने पूछा।
सरला देवी ने गंभीर होकर कहा, “मैंने तुम्हें पहले ही छत पर जाने से मना किया था।”
विवेक ने जवाब दिया, “लेकिन मैं तो अपने कमरे में था। वह कौन थी?”
सरला देवी कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने कहा, “अगर रात में वह तुम्हें दिखाई दे, तो उसके पीछे मत जाना। वह तुम्हें किसी और की तरह समझ सकती है।”
विवेक के मन में कई सवाल उठे, लेकिन सरला देवी ने कुछ और नहीं बताया।
उस रात विवेक ने दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लिया। आधी रात के बाद उसकी आंख खुली तो कमरे में फिर वही ठंड महसूस हुई। इस बार पायल की आवाज नहीं आ रही थी। कमरे में मेहंदी जैसी हल्की खुशबू फैल रही थी।
विवेक ने धीरे से आंखें खोलीं। कमरे के एक कोने में लाल कपड़े का हिस्सा दिखाई दे रहा था। वह कपड़ा धीरे-धीरे हिल रहा था।
विवेक घबराकर बिस्तर पर बैठ गया। लाल कपड़ा धीरे-धीरे ऊपर उठा। उसके नीचे पायल पहने दो पैर दिखाई दिए। फिर लाल जोड़ा नजर आया। दुल्हन के चेहरे पर घूंघट पड़ा था।
वह ठीक विवेक के सामने खड़ी थी।
विवेक की आवाज गले में ही अटक गई। दुल्हन ने धीरे से अपना चेहरा उठाया। घूंघट के पीछे उसकी आंखें दिखाई दीं। उनमें गुस्से से ज्यादा उदासी थी, जैसे वह किसी ऐसे इंसान को खोज रही हो, जिसका इंतजार करते-करते उसकी पूरी जिंदगी बीत गई हो।
उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम आ गए…”
विवेक कांपते हुए बोला, “आप कौन हैं?”
दुल्हन उसके करीब आई और बोली, “मुझे पहचान नहीं रहे?”
विवेक पीछे हटने लगा। तभी दुल्हन ने उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसकी उंगलियां बर्फ जैसी ठंडी थीं।
“तुम राघव हो,” उसने कहा।
विवेक ने घबराकर सिर हिलाया। “नहीं! मैं राघव नहीं हूं। मेरा नाम विवेक है।”
लेकिन दुल्हन उसकी बात मानने को तैयार नहीं थी। उसकी आंखों में आंसू भर आए और उसने विवेक का हाथ कसकर पकड़ लिया।
नैना ने विवेक में राघव को देखा
उस दुल्हन का नाम नैना था। वह विवेक को अपना प्रेमी राघव समझ चुकी थी। उसकी यादें उसी रात में अटकी हुई थीं, जब वह लाल जोड़ा पहनकर अपने होने वाले पति का इंतजार कर रही थी।
नैना ने विवेक का हाथ पकड़कर कहा, “तुम मुझे छोड़कर चले गए थे। मैं तुम्हारा इंतजार करती रही। देखो, मैं आज भी इसी जोड़े में हूं।”
विवेक ने डरते हुए कहा, “मैं राघव नहीं हूं। मेरा नाम विवेक है। आप मुझे छोड़ दीजिए।”
नैना की आंखों से आंसू बहते रहे। उसने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो। तुम राघव हो। तुम वापस आ गए हो।”
विवेक ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन नैना की हालत बिगड़ने लगी। अचानक कमरे में रखी चीजें हिलने लगीं। खिड़की अपने आप बंद हो गई और दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।
नैना ने विवेक की तरफ देखा।
“इस बार मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।”
अचानक विवेक के पैर जमीन से ऊपर उठ गए। उसका शरीर हवा में लटकने लगा। उसने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसकी पकड़ से निकल नहीं पाया। वह डर के मारे मदद के लिए चिल्लाने लगा।
उसी समय नीचे से सरला देवी की आवाज सुनाई दी। वह दौड़कर ऊपर आईं। कमरे का दरवाजा खोलते ही सामने का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए।
विवेक हवा में लटक रहा था और उसके सामने लाल जोड़े वाली नैना खड़ी थी। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे और आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
सरला देवी ने हाथ जोड़कर कहा, “नैना, इसे छोड़ दो। यह राघव नहीं है। इसका नाम विवेक है।”
नैना ने उनकी तरफ देखा। उसकी आवाज में दर्द था।
“राघव ने मुझे क्यों छोड़ा? मैंने उसका क्या बिगाड़ा था?”
सरला देवी की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “तुम्हारा राघव तुम्हें छोड़कर नहीं गया था। वह मर चुका था। तुम्हें कभी सच बताया ही नहीं गया।”
यह सुनते ही नैना के चेहरे का रंग बदल गया। कुछ पल तक वह बिल्कुल शांत खड़ी रही। फिर उसके हाथ की पकड़ ढीली हो गई और विवेक जमीन पर गिर पड़ा।
वह हांफते हुए अपनी सांसें संभालने लगा। नैना धीरे-धीरे पीछे हट गई। उसकी आंखों में ऐसा दर्द था, जैसे कोई पुराना घाव फिर से खुल गया हो।
विवेक ने नैना की पूरी कहानी सुनी
उस घटना के बाद विवेक कई दिनों तक बीमार रहा। उसे तेज बुखार था और रात में आंखें बंद करते ही लाल जोड़े वाली दुल्हन का चेहरा याद आने लगता था। सरला देवी उसकी देखभाल करती रहीं। धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी।
एक रात विवेक ने सरला देवी से पूछा, “नैना को राघव की मौत के बारे में पता क्यों नहीं था? उसके साथ ऐसा क्या हुआ था?”
सरला देवी ने कुछ देर चुप रहने के बाद बताया, “नैना और राघव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों शादी करना चाहते थे। लेकिन उनकी शादी होने से पहले ही राघव की मौत हो गई। नैना को यही बताया गया कि राघव उसे छोड़कर कहीं चला गया है।”
विवेक ध्यान से उनकी बात सुनता रहा।
सरला देवी ने आगे कहा, “नैना इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाई। वह हर दिन राघव के लौटने की उम्मीद करती रही। फिर एक दिन उसकी भी मौत हो गई। लेकिन शायद उसका मन उस इंतजार से बाहर नहीं निकल पाया। तभी से उसकी आत्मा इस मकान की छत पर भटक रही है।”
विवेक को नैना के लिए दुख होने लगा। अब वह उसे केवल डरावनी आत्मा नहीं समझता था। वह एक ऐसी लड़की थी, जिसके सपने पूरे होने से पहले ही सब कुछ खत्म हो गया था।
उस रात विवेक हिम्मत करके छत पर गया। नैना कुछ दूरी पर खड़ी थी। इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।
उसने विवेक से पूछा, “क्या तुम मेरे राघव के बारे में पता करोगे? मुझे बस इतना जानना है कि वह मुझे छोड़कर क्यों नहीं आया।”
विवेक ने सिर हिलाया।
“मैं पता लगाऊंगा कि तुम्हारे और राघव के साथ क्या हुआ था। अगर किसी ने तुम्हें धोखा दिया है, तो सच सामने लाने की कोशिश करूंगा।”
नैना ने उसकी तरफ देखा। पहली बार उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“मुझे सच बता देना,” उसने कहा।
विवेक ने उसे भरोसा दिलाया और अगले ही दिन राघव के बारे में जानकारी जुटाने निकल पड़ा।
राघव की मौत का असली सच
विवेक ने आसपास के पुराने लोगों से राघव के बारे में पूछना शुरू किया। कई लोगों ने उससे बात करने से मना कर दिया। कुछ लोग राघव का नाम सुनते ही चुप हो जाते थे। ऐसा लगता था, जैसे इस घटना के बारे में सभी कुछ जानते थे, लेकिन कोई मुंह खोलना नहीं चाहता था।
काफी कोशिश के बाद एक बूढ़े दुकानदार ने उसे बताया कि राघव की मौत वाली रात उसे महेश नाम के एक आदमी के साथ देखा गया था।
दुकानदार के अनुसार, राघव और महेश के बीच जमीन और पुराने पैसों को लेकर विवाद चल रहा था। उस रात दोनों मकान से कुछ दूर एक सुनसान रास्ते पर मिले थे।
बातचीत के दौरान दोनों के बीच बहस बढ़ गई। गुस्से में महेश ने राघव को जोर से धक्का दे दिया। राघव पीछे गिरा और उसके सिर में गंभीर चोट लग गई।
महेश ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन तब तक राघव की मौत हो चुकी थी। महेश घबरा गया। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे। डर के कारण उसने किसी को सच नहीं बताया और पूरी घटना छिपा दी।
लोगों के सामने उसने यही बात रहने दी कि राघव की मौत एक हादसे में हुई थी। धीरे-धीरे समय बीत गया और राघव की मौत का सच दबकर रह गया।
विवेक ने महेश को ढूंढ निकाला। जब उसने राघव का नाम लिया, तो महेश का चेहरा उतर गया। उसने पहले बात टालने की कोशिश की, लेकिन विवेक के सवालों के सामने वह ज्यादा देर तक चुप नहीं रह सका।
आखिरकार महेश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
वह रोते हुए बोला, “मैं उसे मारना नहीं चाहता था। उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आ गया था। मैंने उसे धक्का दिया और वह गिर पड़ा। जब मैंने देखा कि उसकी सांसें नहीं चल रही थीं, तो मैं डर गया। मुझे सच बता देना चाहिए था, लेकिन मैंने अपनी गलती छिपा ली।”
विवेक ने गंभीर आवाज में कहा, “तुम्हारी चुप्पी की वजह से नैना पूरी जिंदगी यही समझती रही कि राघव उसे छोड़कर चला गया था। उसे सच जानने का हक था।”
महेश ने सिर झुका लिया। उसके पास अपनी गलती का कोई जवाब नहीं था।
विवेक को लगा कि अब नैना को सच बताने का समय आ गया है। लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि नैना को भी सब कुछ पता चल चुका था।
नैना का क्रोध
जब नैना को पता चला कि राघव उसे छोड़कर नहीं गया था, तो वह देर तक छत पर बैठकर रोती रही। उसके हाथों की पुरानी मेहंदी फिर से गहरी दिखाई देने लगी। वह बार-बार राघव का नाम ले रही थी।
उसने आसमान की तरफ देखकर कहा, “मेरा राघव झूठा नहीं था। वह मुझे छोड़कर नहीं गया था। किसी ने मुझसे मेरा प्यार छीन लिया।”
कुछ देर बाद उसकी आंखों में आंसुओं की जगह गुस्सा दिखाई देने लगा। छत पर तेज हवा चलने लगी और दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें नीचे गिर गईं।
नैना के मन में महेश के लिए गुस्सा था। उसी की वजह से राघव की मौत हुई थी और वह इतने सालों तक अपने प्यार को बेवफा समझती रही थी।
वह विवेक के पास आई और बोली, “मुझे महेश से मिलना है। उसे यहां ले आओ। मैं उसकी आंखों में देखकर उससे पूछना चाहती हूं कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया।”
विवेक को डर था कि नैना गुस्से में कुछ गलत न कर बैठे। फिर भी उसने सोचा कि महेश को अपने किए का सामना करना चाहिए। वह महेश के पास गया और उसे पुराने मकान में चलने के लिए कहा।
महेश पहले तो तैयार नहीं हुआ, लेकिन आखिरकार वह विवेक के साथ चल पड़ा। उसे अंदाजा नहीं था कि उस रात उसका सामना अपने अतीत से होने वाला है।
वह रात जब महेश छत पर फंस गया
रात काफी शांत थी। आसमान में बादल छाए हुए थे और चांद बार-बार बादलों के पीछे छिप रहा था। विवेक और महेश पुराने मकान के अंदर पहुंचे। सरला देवी अपने कमरे में थीं।
महेश बेचैन होकर बोला, “मुझे यहां क्यों लाए हो? तुम मुझसे जो पूछना चाहते थे, मैं बता चुका हूं।”
विवेक ने कहा, “तुम्हें उस सच का सामना करना होगा, जिससे तुम इतने सालों तक भागते रहे।”
तभी ऊपर से पायल की आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
महेश का चेहरा पीला पड़ गया। उसने सीढ़ियों की तरफ देखा। ऊपर लाल जोड़े का एक हिस्सा दिखाई दे रहा था।
“यह कौन है?” उसने घबराकर पूछा।
विवेक ने कोई जवाब नहीं दिया।
अचानक नीचे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। महेश ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। घबराकर वह सीढ़ियों की तरफ भागा। उसे लगा कि ऊपर से निकलने का कोई रास्ता मिल जाएगा।
लेकिन जैसे ही वह छत पर पहुंचा, दरवाजा उसके पीछे जोर से बंद हो गया।
सामने नैना खड़ी थी। उसका लाल जोड़ा हवा में हिल रहा था और लंबे बाल उसके चेहरे के चारों ओर फैले हुए थे।
महेश पीछे हटने लगा। उसके मुंह से कांपती आवाज में निकला, “नैना…”
नैना ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
“तुमने मेरे राघव के साथ ऐसा क्यों किया?” उसने पूछा।
महेश ने हाथ जोड़ दिए। “मुझसे गलती हो गई। मैं गुस्से में था। मेरा इरादा उसे मारने का नहीं था।”
नैना की आवाज तेज हो गई।
“तुम्हारी एक गलती ने मेरी पूरी जिंदगी छीन ली। मैं हर दिन उसका इंतजार करती रही। मुझे लगता था कि राघव मुझे छोड़कर चला गया। तुमने कभी सच बताने की हिम्मत क्यों नहीं की?”
महेश के पास कोई जवाब नहीं था। वह छत से बाहर जाने का रास्ता खोजने लगा। लेकिन वह जिस तरफ जाता, उसे सामने लाल जोड़े में नैना दिखाई देती।
“मुझे जाने दो!” वह चिल्लाया।
नैना ने दुख से कहा, “मैंने भी राघव को जाने नहीं दिया था। मैं उसका इंतजार करती रही, लेकिन वह कभी नहीं आया। अब तुम भी मेरे सवालों का जवाब दिए बिना नहीं जा सकते।”
तभी महेश के पीछे एक धुंधली परछाई दिखाई दी। वह धीरे-धीरे साफ होने लगी। उसके चेहरे को देखते ही महेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह राघव था।
महेश चीखकर पीछे हट गया। उसका संतुलन बिगड़ा और वह जमीन पर गिर पड़ा। विवेक सीढ़ियों के पास खड़ा यह सब देख रहा था। डर के कारण उसकी आवाज नहीं निकल रही थी।
नैना ने महेश की तरफ देखा और कहा, “मैंने इतने साल सिर्फ इंतजार में बिताए हैं। अब मैं अपने राघव से मिलना चाहती हूं।”
अचानक छत पर तेज हवा चलने लगी। महेश उठकर भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसका शरीर जैसे वहीं रुक गया। उसे चारों तरफ से पायल की आवाज सुनाई देने लगी।
वह मदद के लिए चिल्लाया। फिर एक तेज झोंका आया और वह जमीन पर गिर पड़ा। कुछ ही पल में सब शांत हो गया।
पायल की आवाज बंद हो चुकी थी। नैना भी अब महेश की तरफ नहीं देख रही थी। उसकी नजर छत के दूसरे छोर पर टिकी थी, जहां कोई धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा था।
राघव आखिरकार वापस आया
महेश के गिरने के बाद नैना के चेहरे से गुस्सा गायब होने लगा। वह धीरे-धीरे उस परछाई की तरफ बढ़ी, जो छत के दूसरे छोर पर खड़ी थी।
विवेक ने भी उधर देखा। धुंधली परछाई अब एक आदमी का रूप ले चुकी थी। उसके चेहरे पर अपनापन था और उसकी आंखें नैना को देखकर ठहर गई थीं।
नैना के होंठ कांपने लगे।
“राघव…”
वह आदमी धीरे-धीरे उसके पास आया। दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे। इतने सालों का इंतजार जैसे उन कुछ पलों में सिमट गया था।
राघव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा, “मैंने बहुत इंतजार किया। हर रात यही सोचती रही कि तुम लौट आओगे। मुझे लगता था कि तुम मुझे भूल गए।”
राघव ने धीमी आवाज में कहा, “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गया था, नैना। अब तुम्हें अकेले इंतजार नहीं करना पड़ेगा।”
नैना उसके करीब आ गई। उसके चेहरे पर अब वह डर और गुस्सा नहीं था, जो विवेक ने पहली बार देखा था। उसकी जगह सुकून था।
विवेक की आंखों में भी आंसू आ गए। अब उसे समझ आ गया था कि जिस आत्मा से वह इतना डरता था, वह असल में अपने प्यार के लौटने की उम्मीद में भटक रही थी।
नैना ने आखिरी बार विवेक की तरफ देखा।
“तुमने मुझे सच बता दिया। अब मेरा इंतजार खत्म हो गया।”
विवेक ने सिर झुकाकर कहा, “तुम दोनों को अब शांति मिले।”
नैना ने हल्की मुस्कान के साथ राघव का हाथ थाम लिया। दोनों की परछाइयां धीरे-धीरे धुंधली होने लगीं। फिर छत पर ठंडी हवा का एक झोंका आया और देखते ही देखते दोनों गायब हो गए।
कुछ ही पलों में छत खाली थी।
विवेक काफी देर तक वहीं खड़ा रहा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस मकान में वह हर रात डरकर सोता था, वहां अब इतनी शांति थी।
लाल जोड़े का आखिरी इंतजार
उस रात के बाद मकान में फिर कभी पहले जैसी पायल की आवाज नहीं सुनाई दी। छत पर लाल जोड़े वाली कोई परछाई भी दिखाई नहीं दी। विवेक को पहली बार लगा कि शायद नैना और राघव को आखिरकार शांति मिल गई है।
सरला देवी ने उससे कहा, “शायद अब दोनों का इंतजार खत्म हो गया। भगवान करे, उनकी आत्माओं को शांति मिले।”
विवेक कुछ देर तक छत की तरफ देखता रहा। उसे नैना की आखिरी मुस्कान याद आ रही थी। वह लड़की जिसने कभी अपने प्यार के साथ जीवन बिताने के सपने देखे थे, उसी के इंतजार में अपनी पूरी जिंदगी खो बैठी थी।
अगली सुबह विवेक ने वह मकान छोड़ने का फैसला किया। सामान बांधते समय उसे कमरे के एक कोने में कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। वह नैना की पुरानी पायल थी।
उसने पायल उठाकर सरला देवी को दिखाया और पूछा, “क्या इसे अपने पास रख लूं?”
सरला देवी ने सिर हिलाकर मना कर दिया।
“इसे यहीं रहने दो। यह उसकी आखिरी निशानी है। शायद अब इसे भी यहीं रहना चाहिए।”
विवेक ने पायल को उसी जगह रख दिया और अपना सामान लेकर मकान से बाहर निकल गया। कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर छत की तरफ देखा।
छत खाली थी। वहां कोई नहीं था।
वह आगे बढ़ने ही वाला था कि पीछे से बहुत धीमी आवाज सुनाई दी।
छन… छन…
विवेक के कदम रुक गए। उसने पलटकर देखा, लेकिन छत पर कोई दिखाई नहीं दिया। तभी हवा के साथ एक महिला की धीमी आवाज सुनाई दी।
“राघव…”
विवेक कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसकी आंखें भर आईं। इस बार उस आवाज में डर नहीं था। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अपने प्रिय इंसान को पुकारते हुए उससे दूर जा रहा हो।
विवेक वहां से चला गया, लेकिन उस रात की याद उसके मन में हमेशा के लिए रह गई।
कई साल बीत गए। उस पुराने मकान के आसपास रहने वाले लोग कभी-कभी बताते थे कि शाम ढलने के बाद छत पर दो धुंधली परछाइयां दिखाई देती हैं। एक परछाई लाल जोड़े में होती है और दूसरी उसके साथ खड़ी रहती है।
कुछ लोग कहते थे कि उन्हें पायल की हल्की आवाज भी सुनाई देती है। हालांकि किसी ने कभी पास जाकर देखने की हिम्मत नहीं की।
शायद नैना का इंतजार सचमुच खत्म हो चुका था। शायद राघव उसे अपने साथ ले गया था। और शायद उस पुराने मकान की छत पर अब कोई अकेला नहीं था।
नैना और राघव की कहानी यही याद दिलाती है कि कभी-कभी एक छिपा हुआ सच किसी की पूरी जिंदगी बदल देता है। नैना ने वर्षों तक उस इंसान का इंतजार किया, जिसने उसे कभी छोड़ा ही नहीं था। जब सच सामने आया, तब जाकर उसके मन को सुकून मिला।
उस लाल जोड़े में छिपा इंतजार अब खत्म हो चुका था। लेकिन उस मकान की खामोशी आज भी लोगों को उस रात की याद दिलाती है, जब प्यार, दर्द और एक पुराने रहस्य का आखिरी पर्दा उठा था।




