नैना आज भी उस छत पर अपने राघव का इंतजार कर रही थी, जहां कभी उसकी शादी के सपने सजे थे। लाल जोड़े में बैठी वह दुल्हन मौत के बाद भी उसी रात में कैद थी। नए किरायेदार विवेक के आते ही उसे उसमें राघव दिखाई देने लगा। फिर शुरू हुआ एक ऐसा डरावना सिलसिला, जिसमें प्यार, अधूरी शादी, धोखा और बदले की आग एक-दूसरे से जुड़ गए। यह है लाल जोड़े में इंतजार और मौत की खौफनाक कहानी।
Hindi Rama | डरवानी कहानी
लाल जोड़े में इंतजार और मौत.. कहानी की शुरुआत
विवेक एक अच्छे स्वभाव का पच्चीस साल का लड़का था। नौकरी के कारण उसे नए शहर में आना पड़ा था। शहर उसके लिए बिल्कुल नया था और यहां किसी को वह ठीक से जानता भी नहीं था। इसलिए वह ऐसा कमरा ढूंढ रहा था जिसका किराया उसकी आमदनी के हिसाब से हो।
कई दिनों की तलाश के बाद उसे शहर के पुराने हिस्से में एक दो मंजिला मकान दिखाई दिया। मकान बहुत पुराना था, लेकिन बाहर से देखने पर रहने लायक लगता था। उस मकान के आसपास एक अजीब सी खामोशी रहती थी।
मकान के नीचे रहने वाली बुजुर्ग महिला का नाम सरला देवी था। उन्होंने विवेक को ऊपर का कमरा दिखाया। कमरा बड़ा था, खिड़की से खुला आसमान दिखाई देता था और सबसे अच्छी बात यह थी कि किराया आसपास के कमरों से काफी कम था।
विवेक ने बिना ज्यादा सोचे कमरा लेने की बात कर दी। सरला देवी ने कुछ देर उसे देखा। फिर उन्होंने चाबी उसकी हथेली पर रख दी। लेकिन चाबी छोड़ते समय उनका हाथ अचानक रुक गया।
उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “एक बात मेरी मानना। रात में छत पर मत जाना।”
विवेक मुस्कुराया। उसने पूछा, “क्यों? छत पर क्या है?”
सरला देवी ने सीढ़ियों की तरफ देखा। कुछ पल तक उनके चेहरे पर डर दिखाई देता रहा। फिर उन्होंने कहा, “वहां एक दुल्हन रहती है।”
विवेक हंस पड़ा। उसे लगा कि बुजुर्ग महिला उसे डराकर सावधान कर रही हैं। उसने बात को मजाक में लिया और अपना सामान कमरे में रख दिया। उसे क्या पता था कि उसी रात उसे उस दुल्हन के बारे में ऐसा सच पता चलेगा, जिसे सुनकर उसका पूरा शरीर कांप उठेगा।
पहली रात सुनाई दी पायल
पहली रात विवेक ने खाना खाया और करीब ग्यारह बजे सो गया। दिनभर की थकान के कारण उसे जल्दी नींद आ गई। लेकिन रात करीब दो बजे अचानक उसकी आंख खुल गई। कमरे में अंधेरा था और खिड़की से आती चांदनी फर्श पर एक पतली सफेद लकीर बना रही थी।
विवेक कुछ समझ पाता, उससे पहले उसे ऊपर से आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
उसने ध्यान से सुना। कोई छत पर धीरे-धीरे चल रहा था। पायल की आवाज कभी एक तरफ जाती और फिर दूसरी तरफ लौट आती। ऐसा लग रहा था जैसे कोई महिला छत पर किसी का इंतजार करते हुए लगातार टहल रही हो।
विवेक ने खुद को समझाया कि शायद ऊपर कोई बिल्ली या कोई चीज हवा में हिल रही होगी। लेकिन कुछ ही क्षण बाद पायल की आवाज उसके कमरे के ठीक ऊपर आकर रुक गई।
कमरे में अचानक बहुत ठंड हो गई।
फिर किसी महिला के बहुत धीमे रोने की आवाज आई। वह रोना इतना धीमा था कि विवेक को लगा जैसे कोई उसके कान के पास बैठकर रो रहा है।
रोने की आवाज बिल्कुल उसके ऊपर थी।
विवेक बिस्तर पर सीधा बैठ गया। तभी छत से झुमके के टकराने जैसी आवाज आई। फिर पायल दोबारा बजने लगी। इस बार आवाज सीढ़ियों की तरफ बढ़ रही थी।
सीढ़ियों से कदमों की आहट नीचे आने लगी। एक कदम… फिर दूसरा… फिर तीसरा…
विवेक की नजर दरवाजे पर टिक गई। कदमों की आवाज उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई। दरवाजे के नीचे से हल्की लाल रोशनी जैसी परछाई दिखाई दी।
कुछ सेकंड तक कोई हलचल नहीं हुई। फिर दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
विवेक ने दरवाजा नहीं खोला। कुछ देर बाद पायल की आवाज फिर सुनाई दी और वह धीरे-धीरे ऊपर चली गई।
लाल जोड़े में खड़ी दुल्हन
अगली सुबह विवेक ने सरला देवी से रात की घटना के बारे में पूछा। सरला देवी ने उसकी बात सुनकर सिर्फ इतना कहा, “मैंने तुम्हें छत पर जाने से मना किया था।”
विवेक ने कहा, “लेकिन वहां कोई है। मैंने पायल की आवाज सुनी है।”
सरला देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह कुछ देर तक चुप रहीं और फिर बोलीं, “अगर रात में वह दिखाई दे तो उसके पीछे मत जाना।” वह तुम्हें किसी और की तरह समझ सकती है।”
यह बात विवेक के मन में अटक गई। आखिर वह दुल्हन उसे किसकी तरह समझ सकती थी?
उस रात विवेक ने दरवाजा बंद रखा। लेकिन आधी रात के बाद कमरे में फिर वही ठंड फैल गई। इस बार पायल की आवाज नहीं आई। इसके बजाय कमरे में हल्की मेहंदी की खुशबू भर गई।
विवेक ने धीरे से आंखें खोलीं। कमरे के कोने में लाल कपड़े का एक हिस्सा दिखाई दे रहा था। वह धीरे-धीरे हिल रहा था।
विवेक उठकर पीछे हट गया। लाल कपड़ा धीरे-धीरे ऊपर उठा। उसके नीचे दो पायल पहने पैर दिखाई दिए। फिर लाल जोड़ा दिखाई दिया। घूंघट चेहरे पर था।
दुल्हन बिल्कुल उसके सामने खड़ी थी।
विवेक की आवाज नहीं निकली। दुल्हन ने धीरे से अपना चेहरा उठाया। घूंघट के पीछे से उसकी आंखें दिखाई दीं। उन आंखों में डर नहीं था। उनमें सिर्फ इंतजार था। बहुत पुराना इंतजार।
उसने धीरे से कहा, “तुम आ गए…”
विवेक कांप गया। उसने कहा, “आप कौन हैं?”
दुल्हन उसके करीब आई और बोली, “मुझे पहचान नहीं रहे?”
विवेक पीछे हटता गया। तभी दुल्हन ने उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसकी उंगलियां बर्फ जैसी ठंडी थीं।
“तुम राघव हो…” उसने कहा।
विवेक ने जोर से सिर हिलाया। “नहीं! मैं राघव नहीं हूं।”
लेकिन नैना जैसे सुन ही नहीं रही थी। उसकी आंखों में अचानक आंसू आ गए।
नैना ने विवेक में राघव को देखा
दुल्हन का नाम नैना था। वह विवेक को राघव समझ चुकी थी। उसकी आत्मा उस रात में अटक गई थी जब वह लाल जोड़ा पहनकर अपने होने वाले पति का इंतजार कर रही थी।
उसने विवेक का हाथ पकड़ लिया। उसकी आवाज में दर्द था। “तुम मुझे छोड़कर चले गए थे। मैं तुम्हारा इंतजार करती रही। देखो… मैं आज भी उसी जोड़े में हूं।”
विवेक डर गया। उसने कहा, “मैं राघव नहीं हूं। मेरा नाम विवेक है।”
नैना की आंखों से आंसू बहते रहे। “तुम झूठ बोल रहे हो। तुम राघव हो। तुम वापस आए हो।”
विवेक ने समझाने की कोशिश की, लेकिन नैना की हालत बिगड़ती जा रही थी। अचानक कमरे की सारी चीजें हवा में उठने लगीं। खिड़की अपने आप बंद हो गई। दरवाजा जोर से हिलने लगा।
नैना ने विवेक की तरफ देखा और कहा, “इस बार मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।”
अचानक विवेक के पैर जमीन से ऊपर उठ गए। उसका शरीर हवा में लटक गया। वह हाथ-पैर मारने लगा। उसकी सांस रुकने लगी। नैना रोते हुए उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
विवेक हवा में लटक रहा था।
उसी समय नीचे से सरला देवी की आवाज आई। उन्होंने दौड़कर ऊपर आने की कोशिश की। जैसे ही उन्होंने कमरे का दरवाजा खोला, सामने का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
विवेक हवा में था और उसके सामने लाल जोड़े वाली नैना खड़ी थी। उसके खुले बाल हवा में उड़ रहे थे और आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
सरला देवी ने हाथ जोड़ दिए। “नैना, इसे छोड़ दो। यह राघव नहीं है। यह विवेक है।”
नैना ने उनकी तरफ देखा। उसकी आवाज अचानक बहुत भारी हो गई। “राघव ने मुझे क्यों छोड़ा?”
सरला देवी रोने लगीं। “तुम्हारा राघव तुम्हें छोड़कर नहीं गया था। वह मर चुका था। तुम्हें सच नहीं बताया गया था।”
नैना कुछ पल बिल्कुल स्थिर रही। फिर उसकी पकड़ ढीली हो गई। विवेक जोर से जमीन पर गिर पड़ा और सांस लेने लगा।
नैना धीरे-धीरे पीछे हट गई। उसके चेहरे पर ऐसा दर्द था जैसे बीस साल पुराना घाव फिर खुल गया हो।
विवेक ने नैना की पूरी कहानी सुनी
विवेक कई दिनों तक बीमार रहा। उसे तेज बुखार था और रात में नींद आते ही उसे लाल जोड़ा, पायल और नैना की रोती हुई आंखें दिखाई देती थीं। सरला देवी उसकी देखभाल करती रहीं। धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी।
एक रात विवेक ने सरला देवी से पूछा, “नैना को राघव की मौत के बारे में पता क्यों नहीं था?”
सरला देवी ने कहा, “उस समय बहुत कुछ छिपाया गया था। नैना सदमे में मर गई। उसकी आत्मा को लगा कि राघव उसे छोड़कर चला गया। तभी से वह इसी इंतजार में अटकी है।”
विवेक के मन में नैना के लिए डर कम और दुख ज्यादा होने लगा। वह समझ चुका था कि नैना सिर्फ डरावनी आत्मा नहीं थी। वह एक ऐसी दुल्हन थी जिसकी शादी पूरी होने से पहले ही उसकी दुनिया खत्म हो गई थी।
उस रात विवेक छत पर गया। नैना दूर खड़ी थी। इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था। उसने धीरे से कहा, “क्या तुम मेरे राघव के बारे में पता करोगे?”
विवेक ने सिर हिलाया। “हां। मैं पता लगाऊंगा कि तुम्हारे साथ और राघव के साथ क्या हुआ था।”
नैना ने पहली बार उसकी तरफ देखकर हल्की मुस्कान दी। “बस सच मुझे बता देना।”
राघव की मौत का असली सच
विवेक ने पुराने लोगों से पूछताछ शुरू की। कई लोगों ने उससे बात करने से मना कर दिया। आखिर एक बूढ़े दुकानदार ने उसे बताया कि राघव की मौत वाली रात उसे महेश के साथ देखा गया था।
महेश का राघव से पहले विवाद हुआ था। दोनों के बीच जमीन और पुराने पैसों को लेकर झगड़ा था। उस रात दोनों मकान से कुछ दूर एक सुनसान रास्ते पर मिले थे। बहस बढ़ी और महेश ने गुस्से में राघव को जोर से धक्का दे दिया।
राघव पीछे गिरा। उसके सिर में गंभीर चोट लगी। महेश ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन तब तक उसकी सांसें रुक चुकी थीं। डर के कारण महेश ने किसी को सच नहीं बताया। उसने घटना को छिपा दिया और सबको हादसा मानने दिया।
विवेक ने महेश को ढूंढ निकाला। जब उसने राघव का नाम लिया तो महेश का चेहरा सफेद पड़ गया। बहुत देर तक चुप रहने के बाद उसने आखिरकार सब कुछ स्वीकार कर लिया।
महेश रोते हुए बोला, “मैं उसे मारना नहीं चाहता था। मैं गुस्से में था। मैंने सिर्फ धक्का दिया था। लेकिन उसकी मौत मेरे सामने हुई और मैं डर गया। मैंने सच छिपा दिया।”
विवेक ने उससे कहा कि अब सच छिपाने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन उससे पहले ही एक अजीब बात हो चुकी थी।
उसी रात नैना को सब पता चल गया था।
नैना का क्रोध
नैना को जैसे ही पता चला कि राघव उसे छोड़कर नहीं गया था, उसकी आत्मा बुरी तरह कांप उठी। वह घंटों तक छत पर बैठकर रोती रही। उसके हाथों की पुरानी मेहंदी फिर से गहरी दिखाई देने लगी।
उसने आसमान की तरफ देखकर कहा, “मेरा राघव झूठा नहीं था… वह मुझे छोड़कर नहीं गया था।”
फिर उसकी आंखों में आंसुओं की जगह गुस्सा उतर आया। उसके आसपास की हवा तेजी से घूमने लगी। छत की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें अपने आप गिरने लगीं।
नैना अब सिर्फ रो नहीं रही थी।
वह महेश का इंतजार कर रही थी।
नैना ने विवेक से कहा, “मुझे उससे मिलना है। बस एक बार उसे यहां ले आओ।”
विवेक को नहीं पता था कि नैना के मन में क्या चल रहा है। उसे लगा कि शायद वह महेश से सच सुनना चाहती है। इसलिए वह महेश को अपने साथ उस मकान तक ले आया।
वह रात जब महेश छत पर फंस गया
रात बहुत शांत थी। आसमान में बादल थे और चांद बार-बार बादलों के पीछे छिप रहा था। विवेक और महेश मकान के अंदर पहुंचे। सरला देवी नीचे कमरे में थीं।
महेश बेचैन था। उसने पूछा, “मुझे यहां क्यों लाए हो?”
विवेक ने कहा, “तुम्हें सच का सामना करना होगा।”
तभी ऊपर से पायल की आवाज आई।
छन… छन… छन…
महेश का चेहरा पीला पड़ गया। उसने सीढ़ियों की तरफ देखा। लाल जोड़े का एक सिरा ऊपर दिखाई दिया।
महेश पीछे हट गया। “यह… यह कौन है?”
विवेक ने कोई जवाब नहीं दिया।
अचानक नीचे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। महेश ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी नहीं हिली। वह घबराकर सीढ़ियों की तरफ भागा।
जैसे ही वह ऊपर पहुंचा, छत का दरवाजा जोर से बंद हो गया। सामने नैना खड़ी थी। उसका लाल जोड़ा हवा में उड़ रहा था और उसके बाल चेहरे के चारों तरफ फैल गए थे।
महेश पीछे हटता गया। “नैना…” उसके मुंह से सिर्फ इतना निकला।
नैना ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उसने पूछा, “तुमने मेरे राघव को क्यों मारा?”
महेश कांपने लगा। उसने हाथ जोड़ दिए। “मुझसे गलती हो गई।”
नैना एक कदम आगे बढ़ी। महेश पीछे भागा। उसने छत का दूसरा रास्ता खोजा, लेकिन हर तरफ वही लाल जोड़ा दिखाई देता। एक पल वह सीढ़ियों की तरफ भागता, दूसरे पल नैना उसके सामने खड़ी मिलती।
महेश चीखने लगा। “मुझे जाने दो!”
नैना ने कहा, “मैंने भी राघव को जाने नहीं दिया था। मैं उसका इंतजार करती रही। लेकिन तुमने उसे मुझसे छीन लिया।”
अचानक महेश के पीछे राघव की परछाई दिखाई दी। महेश ने उसे देखा और उसके मुंह से चीख निकल गई। वह जमीन पर गिर पड़ा।
नैना उसके सामने खड़ी थी। उसके चेहरे पर आंसू थे, लेकिन आवाज में वर्षों का दर्द और क्रोध था।
“अब मेरा इंतजार खत्म होगा।”
महेश ने आखिरी बार भागने की कोशिश की। वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ा, लेकिन अचानक हवा में उठ गया। उसके हाथ-पैर छटपटाने लगे। विवेक नीचे से यह सब देखकर डर से जम गया।
कुछ ही क्षणों बाद महेश जमीन पर गिर पड़ा। उसके बाद पूरी छत पर खामोशी छा गई। पायल की आवाज भी बंद हो गई।
राघव आखिरकार वापस आया
महेश के गिरते ही नैना बिल्कुल शांत हो गई। उसके चेहरे से क्रोध गायब हो गया। वह अचानक पीछे देखने लगी, जैसे किसी की आहट सुन रही हो।
विवेक ने देखा कि छत के दूसरे छोर पर एक आदमी की धुंधली परछाई खड़ी थी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर वही अपनापन था जिसका नैना वर्षों से इंतजार कर रही थी।
नैना के होंठ कांपने लगे। “राघव…”
राघव उसके सामने आकर रुक गया। दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे। फिर राघव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
नैना रोते हुए बोली, “मैंने बहुत इंतजार किया।”
राघव ने धीमी आवाज में कहा, “अब और नहीं।”
विवेक की आंखों में भी आंसू आ गए। उसे पहली बार लगा कि जिस आत्मा से वह डरता था, उसके पीछे कितना गहरा दर्द छिपा था।
नैना ने आखिरी बार विवेक की तरफ देखा। उसने कहा, “तुमने मेरा इंतजार खत्म कर दिया। अब मैं तुम्हें कभी नहीं डराऊंगी।”
विवेक ने सिर झुका लिया। “तुम दोनों अब साथ रहो।”
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नैना मुस्कुराई। राघव ने उसका हाथ थामा। दोनों की परछाइयां धीरे-धीरे एक-दूसरे में मिल गईं। फिर एक ठंडी हवा चली और लाल जोड़े की दुल्हन उस हवा के साथ धुंधली होने लगी।
कुछ ही क्षणों में छत खाली थी।
लाल जोड़े का आखिरी इंतजार
उस रात के बाद मकान में कभी पायल की आवाज नहीं आई। छत पर कोई लाल परछाई दिखाई नहीं दी। आईने में भी विवेक को अब सिर्फ अपना चेहरा दिखाई देता था।
सरला देवी ने विवेक से कहा, “शायद नैना और राघव को आखिरकार शांति मिल गई।”
विवेक कुछ देर तक छत की तरफ देखता रहा। उसके मन में नैना की आखिरी मुस्कान घूम रही थी। वह सोच रहा था कि एक लड़की ने अपनी पूरी जिंदगी जिस आदमी के साथ बिताने का सपना देखा था, उसी के इंतजार में उसकी जिंदगी खत्म हो गई और उसकी आत्मा भी वर्षों तक उसी इंतजार में भटकती रही।
अगली सुबह विवेक ने वह मकान छोड़ने का फैसला किया। सामान बांधते समय उसे अपने कमरे के कोने में कुछ दिखाई दिया। वह वही पुरानी पायल थी जो नैना की थी।
विवेक ने उसे हाथ में उठाया। पायल बिल्कुल ठंडी थी। उसने उसे सरला देवी को देना चाहा, लेकिन सरला देवी ने उसे लेने से इनकार कर दिया।
उन्होंने कहा, “इसे यहीं रहने दो। अब शायद यह उसकी आखिरी निशानी है।”
विवेक ने पायल वापस रख दी और मकान से बाहर निकल गया। कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर आखिरी बार छत की तरफ देखा।
छत खाली थी।
लेकिन जैसे ही वह आगे बढ़ा, पीछे से बहुत धीमी आवाज आई।
छन… छन…
विवेक रुक गया। उसने पीछे देखा। कोई नहीं था।
फिर हवा के साथ किसी महिला की बहुत धीमी आवाज आई, “राघव…”
विवेक की आंखें भर आईं। वह समझ गया कि वह आवाज डराने के लिए नहीं थी। वह उस प्यार की आखिरी आवाज थी जो बीस साल तक मौत से भी लंबा इंतजार करता रहा था।
आज भी उस पुराने मकान के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि कभी-कभी शाम ढलने के बाद उसकी छत पर लाल जोड़े की हल्की परछाई दिखाई देती है। कहते हैं, अगर कोई ध्यान से सुने तो पायल की आवाज भी सुनाई देती है।
लेकिन अब उस छत पर दुल्हन अकेली नहीं होती। उसके पास एक पुरुष की परछाई भी दिखाई देती है।
शायद नैना का इंतजार खत्म हो चुका है। शायद राघव उसे लेने वापस आ चुका है।
कुछ प्रेम कहानियां मौत के बाद पूरी होती हैं।
और कुछ इंतजार ऐसे होते हैं, जिनकी आखिरी रात भी हमेशा याद रहती है। नैना के लिए वह रात लाल जोड़े में इंतजार और मौत की रात थी, लेकिन उसी रात उसके वर्षों पुराने दर्द का अंत भी हुआ।
लेखक: Ajay Nagar




