क्या आपने कभी सोचा है कि छत पर रखे चाय के दो कप सुबह खाली कैसे हो जाते हैं, जबकि रात में वहाँ कोई दिखाई नहीं देता? एक पुराने मकान, सुनसान पीपल के पेड़ और दो बिछड़ी आत्माओं का यह रहस्य एक ऐसे डरावने सच से जुड़ा है, जिसका अंत आज भी किसी को नहीं पता।
Chhat Par Rakhi Khaufnak Chai: छत पर रखी खौफनाक चाय
गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना मकान था। उसकी दीवारों में दरारें थीं और लकड़ी के दरवाजे हवा चलने पर चरमराने लगते थे। मकान के पीछे एक विशाल पीपल का पेड़ खड़ा था। दिन में भी उसके नीचे अजीब खामोशी रहती थी, लेकिन सूरज ढलते ही वहाँ का माहौल बदल जाता था। रात में उसकी शाखाएँ बिना हवा के हिलतीं और कभी-कभी पेड़ के नीचे से किसी के चलने की आवाज आती।
गाँव के बुजुर्ग बताते थे कि कई साल पहले उस पेड़ के नीचे एक तांत्रिक साधना करता था। वह आधी रात को आग जलाता, मंत्र पढ़ता और पेड़ के तने पर अजीब निशान बनाता था। लोगों ने कई बार उसे अँधेरे में किसी से बातें करते देखा था, लेकिन उसके पास जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
कुछ साल पहले उसी मकान में अभिषेक और उसकी पत्नी माया रहते थे। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। उनकी सबसे प्यारी आदत थी कि हर शाम छत पर बैठकर चाय पीते और दिनभर की बातें करते। माया चाय बनाती और अभिषेक दो कप लेकर छत पर चला जाता। पीपल के पेड़ की तरफ देखते हुए वे अपने भविष्य के सपने बुनते थे।
लेकिन शादी के कई साल बाद भी उनके घर में कोई बच्चा नहीं हुआ था। माया दुखी रहती, मगर अभिषेक उसे समझाता कि दोनों का साथ ही सबसे बड़ी खुशी है। फिर भी जब गाँव में कोई बच्चों की बात करता, तो अभिषेक भीतर से टूटने लगता। धीरे-धीरे यही दुख उसके मन पर हावी होने लगा।
एक शाम छत पर चाय पीते हुए अभिषेक ने कहा, “माया, कभी-कभी लगता है कि हमारी जिंदगी अधूरी रह जाएगी। हमारे बाद इस घर में कौन रहेगा?”
माया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “ऐसा मत सोचो। हम दोनों साथ हैं। जो होगा, मिलकर देखेंगे।”
अभिषेक ने मुस्कराने की कोशिश की। तभी पीपल की शाखाएँ बिना हवा के हिलने लगीं। सूखे पत्ते छत पर गिरने लगे। दोनों ने पेड़ की ओर देखा, लेकिन कुछ ही पल में सब शांत हो गया। उन्हें नहीं पता था कि पेड़ के नीचे खड़ा एक तांत्रिक कई दिनों से उन पर नजर रख रहा था।
तांत्रिक का जाल
तांत्रिक को अभिषेक की कमजोरी का पता चल चुका था। वह उसकी संतान पाने की इच्छा का फायदा उठाना चाहता था। एक दिन बाजार से लौटते समय उसने अभिषेक को रास्ते में रोक लिया।
“तुम्हारे चेहरे पर दुख दिखाई देता है,” तांत्रिक ने कहा। “मैं चाहूँ तो तुम्हारी परेशानी दूर कर सकता हूँ।”
अभिषेक ने पूछा, “तुम मेरे बारे में क्या जानते हो?”
तांत्रिक मुस्कराया। “मैं तुम्हारे मन की बात जानता हूँ। तुम्हारे घर में एक कमी है। अगर तुम मेरी बात मानो, तो तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है।”
अभिषेक को उसकी बातें अजीब लगीं, लेकिन तांत्रिक ने उसे उम्मीद दिलाई कि कुछ विशेष अनुष्ठान करने से उसकी इच्छा पूरी हो सकती है। उसने शर्त रखी कि अभिषेक किसी को इस बारे में नहीं बताएगा। अपनी परेशानी से थका अभिषेक उसकी बातों में आने लगा।
इसके बाद वह चुपचाप तांत्रिक से मिलने जाने लगा। कुछ ही दिनों में उसका व्यवहार बदल गया। वह माया से कम बातें करता और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होने लगा। माया पूछती कि आखिर क्या हुआ है, लेकिन वह हर बार कोई बहाना बना देता।
एक रात माया की आँख खुली तो अभिषेक बिस्तर पर नहीं था। कमरे का दरवाजा खुला था और गलियारे में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। तभी सीढ़ियों की ओर से किसी आदमी की फुसफुसाहट सुनाई दी।
“अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है।”
माया को हुआ शक
माया डरते हुए बाहर आई, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। तभी पीछे से अभिषेक की आवाज आई, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
माया ने पूछा, “मैंने किसी की आवाज सुनी थी। तुम कहाँ गए थे?”
अभिषेक ने कठोर स्वर में कहा, “तुम हर बात पर सवाल क्यों करती हो? अपने कमरे में जाओ।”
माया हैरान रह गई। अभिषेक ने पहले कभी उससे इस तरह बात नहीं की थी। उस रात उसे नींद नहीं आई। खिड़की से पीपल का पेड़ दिखाई दे रहा था। उसकी एक शाखा पर सफेद कपड़े जैसी कोई चीज लटक रही थी। माया ने दोबारा देखा तो वह गायब हो चुकी थी।
अगली शाम माया चाय लेकर छत पर पहुँची। अभिषेक वहाँ बैठा पेड़ को घूर रहा था। उसने चाय का कप उसके सामने रखा, लेकिन अभिषेक ने उसे छुआ तक नहीं। तभी सीढ़ियों की तरफ से किसी के कदमों की आवाज आने लगी। कदम छत के दरवाजे तक पहुँचे और अचानक रुक गए।
माया ने पूछा, “कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया। दरवाजे के नीचे से एक काली परछाईं सरकती हुई दिखाई दी। माया पीछे हट गई। तभी पीपल के पेड़ की तरफ से तांत्रिक की आवाज आई, “समय आ गया है।”
अभिषेक उठकर सीढ़ियों की ओर चल दिया। माया ने उसका हाथ पकड़कर पूछा, “कहाँ जा रहे हो? यह कौन है?”
पीपल के नीचे अनुष्ठान
अभिषेक ने झटके से हाथ छुड़ा लिया और नीचे उतर गया। माया भी उसके पीछे गई। आँगन में पहुँचते ही उसे असामान्य ठंड महसूस हुई। मुख्य दरवाजा खुला था और बाहर दो परछाइयाँ पीपल के पेड़ की तरफ जा रही थीं। उनमें से एक अभिषेक की थी।
माया दौड़कर पेड़ के पास पहुँची। वहाँ तांत्रिक जमीन पर अजीब निशान बना रहा था। चारों ओर छोटे दीपक जल रहे थे और अभिषेक उसके सामने बिना हिले खड़ा था। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें पहचान नहीं थी।
“अभिषेक, मेरी तरफ देखो!” माया चीखी।
एक पल के लिए अभिषेक की आँखों में दर्द उभरा, जैसे वह तांत्रिक के प्रभाव से निकलने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन तांत्रिक ने कुछ मंत्र बुदबुदाए और अभिषेक फिर शांत हो गया।
माया ने तांत्रिक से कहा, “तुमने इसके साथ क्या किया है? इसे छोड़ दो!”
तांत्रिक उसकी ओर मुड़ा। “तुम्हें बीच में नहीं आना चाहिए था।”
माया अभिषेक की तरफ बढ़ी। तभी तांत्रिक ने अभिषेक को जोर से धक्का दे दिया। वह पीछे गिरा और उसके सिर पर गंभीर चोट लगी। माया चीखती हुई उसके पास पहुँची। उसने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन उसकी साँसें थम चुकी थीं।
“अभिषेक, आँखें खोलो! तुमने कहा था कि हमेशा मेरे साथ रहोगे। मुझे अकेला मत छोड़ो!” माया रोती रही।
तांत्रिक ने उसे भी नहीं छोड़ा। माया ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वह अचानक कमजोर पड़ गई और जमीन पर गिर पड़ी। उस रात माया की भी मौत हो गई।
अगली सुबह गाँव वालों को दोनों की मौत का पता चला। किसी को समझ नहीं आया कि उनके साथ क्या हुआ था। तांत्रिक ने सबूत मिटा दिए और कुछ समय बाद गाँव छोड़कर जंगल में चला गया। लेकिन जाने से पहले उसने पीपल के पेड़ के नीचे एक और अनुष्ठान किया। उसने अभिषेक और माया की आत्माओं को उसी पेड़ से बाँध दिया। अब दोनों एक-दूसरे को देख सकते थे, लेकिन पास नहीं जा सकते थे। जब भी माया अभिषेक की तरफ बढ़ती, कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक देती।
उसी रात से छत पर चाय के दो कप दिखाई देने लगे। सुबह वे खाली मिलते, जबकि किसी ने उन्हें छुआ नहीं होता था। मकान में रहने से लोग डरने लगे। रात में कभी कप रखे जाने की आवाज आती, तो कभी किसी औरत के रोने की। धीरे-धीरे मकान सुनसान हो गया।
खाली कपों का रहस्य
कई साल बाद हितेश अपनी माँ सुधा के साथ उसी मकान में रहने आया। उन्हें कम किराए पर घर चाहिए था। मकान पुराना था, लेकिन बड़ा था। मकान मालिक ने बस इतना बताया कि घर लंबे समय से खाली पड़ा है। उसने पीपल के पेड़ या वहाँ हुई मौतों के बारे में कुछ नहीं बताया।
पहले दिन सुधा ने घर साफ किया। शाम को हितेश ने दो कप चाय बनाई और माँ के साथ छत पर बैठकर पी। दोनों कप रसोई में रखकर सोने चले गए। रात में हितेश को ऊपर से कप रखे जाने की आवाज सुनाई दी, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।
सुबह सुधा ने देखा कि दोनों कप छत की सीढ़ियों के पास रखे हैं। वे खाली थे। उसने हितेश से पूछा, लेकिन उसने कहा कि वह कप रसोई में रखकर सोया था। दोनों ने इसे अनदेखा कर दिया।
अगली सुबह भी वही हुआ। इस बार एक कप के किनारे पर गीले निशान थे, जैसे किसी ने अभी-अभी चाय पी हो। हितेश ने कप उठाया। वह बर्फ की तरह ठंडा था, लेकिन उसमें से इलायची की खुशबू आ रही थी। छत का दरवाजा बंद था और धूल में किसी के पैरों के निशान भी नहीं थे।
उस शाम हितेश ने दोनों कप रसोई में रखे और छत का दरवाजा बंद कर दिया। आधी रात को उसकी नींद एक आवाज से खुली।
टिन… टिन… टिन…
ऐसा लग रहा था, जैसे कोई चम्मच से कप के किनारे पर चोट कर रहा हो। हितेश मोबाइल की रोशनी लेकर सीढ़ियाँ चढ़ा। छत का दरवाजा खोलते ही ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया। दोनों कप बीच छत पर रखे थे। उनके पास लंबे बालों वाली एक औरत बैठी थी। वह उँगली से कप को धीरे-धीरे घुमा रही थी।
हितेश ने मोबाइल की रोशनी उस पर डाली। उसी पल औरत गायब हो गई। दोनों कप खाली थे। उनमें से एक कप अपने-आप खिसकने लगा। हितेश ने उसे पकड़ लिया, तभी उसके कान के पास एक फुसफुसाहट सुनाई दी।
“उसे ढूँढ़ो… दीवार के अंदर…”
हितेश घबराकर नीचे भागा और सुधा को जगाया। उसने पूरी बात बताई, लेकिन सुधा ने सोचा कि नए घर के डर से उसे भ्रम हो रहा है। अगली सुबह हितेश ने सीढ़ियों के पास की दीवार ध्यान से देखी। वहाँ का पलस्तर बाकी दीवार से अलग था। उसने हाथ से थपथपाया तो अंदर से खोखली आवाज आई।
दीवार में छिपा रहस्य
पलस्तर हटाने पर पीछे एक छोटी जगह मिली। उसमें कपड़े में लिपटे पुराने कागज और एक धुँधली तस्वीर रखी थी। तस्वीर में अभिषेक और माया छत पर बैठे थे। उनके सामने चाय के दो कप थे। तस्वीर के पीछे काले रंग का अजीब निशान बना था।
कागजों में तांत्रिक के अनुष्ठान और पीपल के पेड़ के नीचे बने निशानों का उल्लेख था। उनमें लिखा था कि जमीन पर बना मुख्य निशान सुरक्षित रहने तक दोनों आत्माएँ पेड़ से बँधी रहेंगी। तांत्रिक की शक्ति उसी निशान से जुड़ी थी। उसे तोड़ने से बंधन कमजोर हो सकता था।
कागज पढ़ते समय हितेश को पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। उसने पलटकर देखा तो गलियारे में एक औरत खड़ी थी। उसका चेहरा पीला था और आँखों में गहरा दुख था।
“तुम माया हो?” हितेश ने पूछा।
औरत ने सिर हिलाया। “मुझे और अभिषेक को उस पेड़ से बाँध दिया गया था। तांत्रिक की शक्ति अब भी उसी निशान से जुड़ी है। उसे तोड़ दो, शायद हमें मुक्ति मिल जाए।”
हितेश ने पूछा, “तांत्रिक कहाँ है?”
माया ने जंगल की तरफ देखा। “वह वहाँ है। उसका शरीर दूर है, लेकिन उसकी शक्ति अब भी इस घर तक आती है।”
इतना कहकर वह गायब हो गई। उसी समय छत से कप गिरने की आवाज आई। हितेश दौड़कर ऊपर पहुँचा। दोनों कपों में काली चाय भरी थी। उनकी सतह पर बुलबुले उठ रहे थे, जबकि नीचे कोई आग नहीं थी।
हितेश ने गाँव के बुजुर्गों से तांत्रिक के बारे में पूछा। अभिषेक और माया की तस्वीर देखकर एक बूढ़े आदमी ने बताया कि दोनों की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी। उसके बाद तांत्रिक जंगल में चला गया था। उसने हितेश को चेतावनी दी कि उस आदमी के पास जाना खतरनाक है।
जंगल में तांत्रिक का सामना
लेकिन हितेश माया और अभिषेक को मुक्त करना चाहता था। उसने कागज, तस्वीर और टॉर्च अपने बैग में रखी और अगले दिन सूरज ढलने से पहले जंगल की ओर निकल पड़ा। अंदर जाते ही रास्ता सुनसान हो गया। सूखे पत्तों पर उसके कदमों की आवाज गूँज रही थी। कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है। वह रुकता तो आवाज भी रुक जाती।
उसने पीछे मुड़कर टॉर्च जलाई, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। तभी एक पेड़ के पीछे से हँसी सुनाई दी। सामने तांत्रिक खड़ा था। उसके बाल बिखरे थे और चेहरे पर वही डरावनी मुस्कान थी।
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था,” तांत्रिक बोला। “कुछ दरवाजे बंद ही रहने चाहिए।”
हितेश ने कहा, “तुमने अभिषेक और माया के साथ जो किया, वह गलत था। मैं उन्हें आजाद करने आया हूँ।”
तांत्रिक हँसा। “वे मेरी शक्ति का हिस्सा हैं। तुम कुछ पुराने कागज लेकर मेरा क्या बिगाड़ लोगे?”
उसने जमीन पर पैर पटका। तेज हवा चलने लगी और सूखे पत्ते हितेश के चारों ओर घूमने लगे। टॉर्च की रोशनी काँपने लगी। तांत्रिक उसकी तरफ बढ़ा और कागज नीचे रखने का आदेश दिया।
मुक्ति की आखिरी उम्मीद
तभी हितेश के पीछे दो धुँधली परछाइयाँ दिखाई दीं। वे माया और अभिषेक थे। अभिषेक की आँखों में पहचान लौट आई थी। माया ने जमीन की ओर इशारा किया। हितेश ने पत्ते हटाए तो उसे वही निशान दिखाई दिया, जो तस्वीर के पीछे बना था। उसके बीच एक काला पत्थर रखा था।
तांत्रिक चिल्लाया, “उसे हाथ मत लगाना!”
माया और अभिषेक उसके सामने आ खड़े हुए। तांत्रिक ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। जमीन पर बने निशान चमकने लगे और जंगल में कई लोगों के रोने जैसी आवाजें गूँज उठीं। हितेश को लगा कि कोई उसके पैरों को नीचे खींच रहा है। उसने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर हटा दिया। उसी पल निशान के बीच दरार पड़ गई।
तांत्रिक दर्द से चीख उठा। उसकी मुस्कान गायब हो गई और वह पीछे गिर पड़ा। माया ने अभिषेक की तरफ हाथ बढ़ाया। इस बार उनके बीच कोई अदृश्य दीवार नहीं थी। अभिषेक ने उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों की परछाइयाँ साफ होने लगीं।
लेकिन तभी तांत्रिक ने जमीन पर हाथ मारा। काला धुआँ चारों तरफ फैल गया। जब धुआँ छँटा, तांत्रिक गायब था। जंगल के भीतर से उसकी आवाज आई, “यह अंत नहीं है। तुमने सिर्फ एक बंधन तोड़ा है।”
हितेश ने माया से पूछा, “क्या तुम दोनों अब आजाद हो?”
अभिषेक ने कहा, “हमारा बंधन टूट गया है, लेकिन तांत्रिक की शक्ति पूरी तरह खत्म नहीं हुई। जब तक वह जीवित है, वह लौटने की कोशिश करेगा।”
माया ने चेतावनी दी, “अगर छत पर फिर चाय का कप दिखाई दे, तो समझना कि वह घर तक पहुँचने का रास्ता खोज रहा है। उस आवाज का पीछा मत करना।”
छत पर फिर रखी गई चाय
इतना कहकर दोनों की परछाइयाँ हवा में घुल गईं। हितेश काला पत्थर और कागज लेकर गाँव लौट आया।
घर पहुँचकर हितेश ने सुधा को सारी बात बताई। अगले दिन उसने छत साफ की और अभिषेक-माया की तस्वीर सुरक्षित रख दी। शाम को उसने दो कप चाय बनाकर छत पर रखे।
“यह चाय तुम्हारे लिए है,” उसने धीमे स्वर में कहा। “अगर तुम दोनों सच में आजाद हो गए हो, तो आज आखिरी बार साथ बैठकर इसे पी लेना।”
वह नीचे आकर सो गया, लेकिन रात भर उसे ऊपर से हल्की आवाजें सुनाई देती रहीं। कभी कप रखने की आवाज आती, तो कभी किसी के चलने की। सुबह छत पर पहुँचकर उसने देखा कि दोनों कप खाली थे। उनके पास अभिषेक और माया की धुँधली परछाइयाँ बैठी थीं। माया ने अभिषेक के कंधे पर सिर रखा हुआ था। कुछ पल बाद दोनों परछाइयाँ सुबह की रोशनी में गायब हो गईं।
हितेश की आँखें भर आईं। उसे लगा कि दोनों को मुक्ति मिल गई है। कई दिनों तक छत पर कोई अजीब आवाज नहीं आई। पीपल का पेड़ भी शांत रहा। हितेश और सुधा को भरोसा हो गया कि अब सब ठीक है।
तांत्रिक की वापसी
एक रात तेज हवा चलने लगी। आधी रात को हितेश की नींद चम्मच के कप से टकराने की आवाज से खुली।
टिन… टिन… टिन…
आवाज छत से आ रही थी। उसे माया की चेतावनी याद आई, लेकिन तभी किसी ने उसका नाम पुकारा।
“हितेश…”
यह माया की आवाज नहीं थी। वह किसी बूढ़े आदमी की भारी आवाज थी। फिर छत से आवाज आई, “दरवाजा खोलो… चाय ठंडी हो रही है।”
हितेश ने खिड़की से बाहर देखा। पीपल की निचली शाखा पर एक काली आकृति बैठी थी। बिजली चमकी तो उसका चेहरा दिखाई दिया। वह तांत्रिक था। उसकी आँखें सीधे हितेश की खिड़की पर टिकी थीं और होंठों पर वही डरावनी मुस्कान थी।
अचानक कमरे के दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई। दरवाजे के नीचे से काला धुआँ अंदर आने लगा। हितेश ने कुंडी खोलने की कोशिश की, लेकिन वह हिली तक नहीं। तभी माया की घबराई आवाज सुनाई दी, “दरवाजा मत खोलना! वह वापस आ गया है!”
हितेश ने देखा कि कमरे के कोने में माया की परछाईं खड़ी थी। उसने पूछा, “लेकिन तुम तो आजाद हो गई थीं?”
माया ने पीपल के पेड़ की ओर देखा। “हमारा बंधन टूट गया था, लेकिन उसकी शक्ति की असली जड़ अब भी पेड़ के नीचे है। जंगल में तुमने सिर्फ एक हिस्सा तोड़ा था। वह फिर लौट आया है।”
इतना कहते ही माया की परछाईं गायब हो गई। उसी समय छत पर कप टूटने की आवाज आई। हितेश सीढ़ियों की तरफ बढ़ा तो उसे हर पायदान पर गीले पैरों के निशान दिखाई दिए। छत का दरवाजा अपने-आप खुल गया। अंदर पीली रोशनी थी और बीचोंबीच चाय का एक कप रखा था। उसमें से भाप उठ रही थी। कप के पास वही काला निशान बना था, जिसे उसने जंगल में तोड़ा था।
कप के पीछे तांत्रिक खड़ा था। उसने चाय की सतह पर उँगली घुमाते हुए कहा, “तुमने सोचा था कि मुझे रोक लोगे? तुमने मेरा बंधन कमजोर किया है, खत्म नहीं। अब इस घर का दरवाजा मेरे लिए खुल चुका है।”
हितेश नीचे भागा। उसी समय पीपल की जड़ के पास जमीन में दरार फैलने लगी और उसमें से काला धुआँ निकलने लगा। घर की दीवारें काँप उठीं। रसोई में रखी केतली बिना आग के उबल रही थी। उसकी भाप में तांत्रिक का चेहरा दिखाई दिया।
“अब हर रात दो कप नहीं होंगे, हितेश,” भाप से आती आवाज ने कहा। “अब एक कप तुम्हारे लिए भी रखा जाएगा।”
अचानक घर की सारी रोशनी बुझ गई। अँधेरे में किसी ने हितेश का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था। हितेश ने छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन पकड़ और मजबूत होती गई। तभी छत से माया की चीख सुनाई दी। उसके बाद घर में सन्नाटा छा गया।
उस तांत्रिक का आखिरी संदेश
अगली सुबह गाँव वालों ने मकान की छत पर चाय का एक कप देखा। उससे भाप उठ रही थी। पास की जमीन पर उँगली से लिखा था—“तांत्रिक अभी मरा नहीं है।”
उस दिन के बाद हितेश और सुधा को किसी ने गाँव में नहीं देखा। मकान फिर खाली हो गया। पीपल की जड़ के पास दरार और गहरी हो चुकी थी। रात में कभी-कभी वहाँ से चम्मच के कप से टकराने की आवाज आती। जो भी उस आवाज के पीछे छत तक जाता, उसे एक कप चाय रखा मिलता। उसके पास दो धुँधली परछाइयाँ बैठी होतीं और उनके पीछे तीसरी परछाईं खड़ी रहती।
वह परछाईं चाय नहीं पीती थी। वह बस इंतजार करती थी—किसी ऐसे इंसान का, जो उसके सामने रखा कप उठाने की गलती कर बैठे।




