बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल । 28 साल बाद खुला एक भयानक राज

बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल । 28 साल बाद खुला एक भयानक राज

बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल महाराष्ट्र के एक सुनसान गांव में खड़ा पुराना स्कूल अट्ठाईस साल से बंद था, फिर भी हर आधी रात वहां बच्चों की हंसी गूंजती थी।

कहते थे, 1998 की आग में मारे गए बारह बच्चे आज भी अपनी कक्षा में बैठे अटेंडेंस का इंतजार करते हैं।

एक रात YouTuber अर्णव देशमुख कैमरा लेकर उस स्कूल में पहुंचा, लेकिन उसे वहां बच्चों की आत्माओं से कहीं ज्यादा डरावना राज मिला।

वह राज एक पुराने रजिस्टर, बंद दरवाजे और ऐसी अटेंडेंस से जुड़ा था, जो कभी पूरी नहीं हुई थी।

और उस रात के बाद स्कूल में बच्चों की संख्या बारह नहीं रही, क्योंकि एक नई सीट अचानक दिखाई देने लगी।

Hindi Rama | डरावनी कहानी

बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल का भयानक राज

गांव के बाहर सुनसान मैदान में बना वह स्कूल दूर से किसी छोड़ी हुई हवेली जैसा दिखाई देता था।

उसकी पीली पड़ चुकी दीवारों पर काले निशान थे और छत की कई पुरानी टाइलें टूट चुकी थीं।

स्कूल के सामने एक बहुत बड़ा पेड़ था, जिसकी सूखी शाखाएं रात में खिड़कियों तक पहुंचती थीं।

दिन में भी गांव के बच्चे उस पेड़ के पास जाने से बचते और शाम होते ही रास्ता खाली हो जाता था।

लोग कहते थे, आधी रात के बाद उस पेड़ के नीचे बच्चों की परछाइयां खड़ी दिखाई देती थीं।

कभी कोई परछाईं धीरे-धीरे स्कूल की तरफ जाती और कभी बिना पैर हिलाए वहीं खड़ी रहती थी।

स्कूल की टूटी खिड़कियों के भीतर कभी-कभी हल्की रोशनी दिखाई देती, जबकि वहां बिजली वर्षों पहले काट दी गई थी।

सबसे अजीब बात यह थी कि हर रात बारह बजे स्कूल की पुरानी घंटी जरूर बजती थी।

घंटी के बाद बच्चों की सामूहिक हंसी सुनाई देती और फिर अचानक किसी शिक्षक को पुकारने की आवाज आती थी।

आधी रात के बाद स्कूल में बच्चों की हंसी शुरू होती, लेकिन उसे सुनने वाला कभी अकेला नहीं रहता था।

गांव के बुजुर्ग जानते थे कि इन आवाजों के पीछे 1998 की भयानक घटना छिपी हुई थी।

1998 की आग और बंद दरवाजा

साल 1998 में उसी स्कूल की एक कक्षा में बारह बच्चे शाम तक पढ़ाई कर रहे थे।

बच्चे लगातार शोर कर रहे थे, इसलिए स्कूल के एक कर्मचारी ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला किया।

उसने बच्चों को कक्षा के अंदर बैठाया और बाहर से दरवाजा बंद करके कुछ देर के लिए चला गया।

बच्चों ने पहले दरवाजा खटखटाया, फिर जोर से पुकारा, लेकिन बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

उसी समय पुरानी बिजली की वायरिंग में चिंगारी निकली और दीवार के पास रखे सामान में आग लग गई।

सूखे पर्दों और लकड़ी की बेंचों ने आग को तेजी से फैलाया और कुछ ही क्षणों में कमरा धुएं से भर गया।

बच्चों को समझ आ गया कि बाहर निकलना जरूरी है, इसलिए सभी दरवाजे पर टूट पड़े।

अंदर से लगातार धड़ाम-धड़ाम की आवाजें आती रहीं, लेकिन मजबूत कुंडी बाहर से बंद थी।

धुआं बढ़ता गया और बच्चों की चीखें धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगीं, जबकि आग पूरे कमरे में फैल चुकी थी।

बारह बच्चों ने आखिरी बार दरवाजा पीटा, लेकिन वही बंद दरवाजा उनकी सबसे भयानक कैद बन चुका था।

सुबह जब लोग पहुंचे, तब कक्षा की दीवारें काली थीं और अंदर सबकुछ राख में बदल चुका था।

हादसे के बाद स्कूल क्यों नहीं सोया

हादसे के बाद स्कूल को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया और गांव वालों ने उस रास्ते से दूरी बना ली।

सरकारी रिकॉर्ड में आग का कारण खराब बिजली की वायरिंग बताया गया, लेकिन गांव में दूसरी कहानी चलती रही।

लोग कहते थे कि बच्चों की आत्माएं इसलिए भटक रही थीं, क्योंकि उनकी आखिरी पुकार कभी पूरी नहीं हुई।

हादसे के कुछ दिनों बाद रात में स्कूल के अंदर से पहली बार घंटी सुनाई दी थी।

उसके बाद किसी ने बच्चों को प्रार्थना करते सुना और फिर अचानक बारह बच्चों की हंसी सुनाई दी।

गांव के बुजुर्ग विठ्ठल काका कहते थे कि स्कूल की सबसे डरावनी चीज आग नहीं थी।

उनके मुताबिक असली डर उस बंद दरवाजे में था, जिसे बच्चों ने आखिरी सांस तक खोलने की कोशिश की थी।

कई बार उन्होंने रात में स्कूल के अंदर से बेंच घिसटने और छोटे कदमों की आवाज सुनी थी।

जब भी कोई आवाज स्कूल के पास जाती, अचानक हंसी बंद हो जाती और पूरी जगह शांत हो जाती थी।

विठ्ठल काका कहते थे, स्कूल बंद जरूर हुआ था, मगर उसके अंदर बच्चों की आखिरी रात कभी खत्म नहीं हुई।

गांव वालों ने तब से एक नियम बना लिया कि आधी रात के बाद स्कूल की आवाजों का जवाब नहीं देंगे।

सावित्री ताई ने दी आखिरी चेतावनी

गांव की बुजुर्ग महिला सावित्री ताई भी उस स्कूल की कई डरावनी घटनाएं अपनी आंखों से देख चुकी थीं।

एक रात उन्होंने स्कूल की खिड़की में बारह बच्चों को बैठे देखा था, जबकि स्कूल कई सालों से बंद था।

बच्चे बिल्कुल शांत थे और सभी एक ही दिशा में देखकर जैसे किसी का इंतजार कर रहे थे।

सावित्री ताई ने आंखें बंद कीं और दोबारा देखा तो खिड़की पूरी तरह खाली थी।

जब उन्होंने उस रात यह बात गांव वालों को बताई, तो किसी ने भी उन्हें दोबारा स्कूल जाने नहीं दिया।

इसी गांव में एक रात YouTuber अर्णव देशमुख पहुंचा, जिसे पुराने स्कूल की कहानी बहुत रोमांचक लगी।

उसने फैसला किया कि वह आधी रात में स्कूल के अंदर जाकर पूरी घटना कैमरे में रिकॉर्ड करेगा।

विठ्ठल काका ने उसे समझाया कि रात में वहां जाना बिल्कुल सुरक्षित नहीं है, लेकिन अर्णव नहीं माना।

सावित्री ताई ने भी कहा कि अगर अंदर कोई बच्चा उसे सर कहकर बुलाए, तो जवाब नहीं देना।

सावित्री ताई बोलीं, “अगर वे तुम्हें सर कहें, तो समझना अब स्कूल तुम्हें अपना चुका है।”

अर्णव ने उनकी चेतावनी रिकॉर्ड की, कैमरा उठाया और रात पौने बारह बजे अकेला स्कूल की तरफ निकल गया।

11:45 पर जंग लगा गेट अपने आप खुला

रात के 11 बजकर 45 मिनट पर अर्णव स्कूल के पुराने जंग लगे गेट के सामने पहुंचा।

गेट पर मोटी जंजीर लटक रही थी और हवा चलने पर वह धीरे-धीरे लोहे से टकरा रही थी।

अर्णव ने कैमरा ऑन किया और अपने दर्शकों को स्कूल की हालत दिखाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

उसने बताया कि स्कूल अट्ठाईस साल से बंद है और आज रात वह अंदर की सच्चाई देखेगा।

अचानक जंजीर नीचे गिर गई, जबकि अर्णव ने उसे छुआ तक नहीं था।

गेट धीरे-धीरे खुला और उसके कब्जों से ऐसी आवाज निकली, जैसे कोई बहुत पुराना दरवाजा कराह रहा हो।

अर्णव कुछ पल वहीं खड़ा रहा, फिर उसने टॉर्च जलाई और अंदर कदम रख दिया।

बरामदे में धूल की मोटी परत थी, लेकिन उसके बीच छोटे पैरों के ताजा निशान दिखाई दे रहे थे।

वे निशान गेट से शुरू होकर सीधे उसी पुरानी कक्षा की तरफ जा रहे थे।

अचानक उसके पीछे गेट धड़ाम से बंद हुआ और अंधेरे में किसी बच्चे ने फुसफुसाकर कहा, “सर आ गए।”

अर्णव ने पीछे देखा, लेकिन वहां सिर्फ जंग लगा गेट था और उसके पार सुनसान गांव दिखाई दे रहा था।

अंधेरे बरामदे में कोई उसके पीछे चल रहा था

अर्णव ने कैमरा संभाला और धीरे-धीरे बरामदे के अंदर बढ़ने लगा, लेकिन पीछे किसी के कदम सुनाई दिए।

वह रुकता तो कदम रुक जाते और वह चलता तो वही कदम फिर उसके पीछे चलने लगते।

उसने कैमरा पीछे घुमाया, मगर स्क्रीन पर खाली बरामदा और अंधेरा ही दिखाई दिया।

अचानक एक पुरानी बेंच फर्श पर घिसटती हुई उसके सामने आ गई और अर्णव डरकर पीछे हट गया।

दीवार पर बच्चों के पुराने चित्र लगे थे और हर चित्र के नीचे 1998 की तारीख लिखी थी।

चित्रों में वही बारह बच्चे थे, जिनकी कहानी गांव वाले आज तक भूल नहीं पाए थे।

एक चित्र में बच्चे अपनी कक्षा के अंदर बैठे थे और दरवाजा बाहर से बंद दिखाई दे रहा था।

अर्णव ने उस चित्र को करीब से देखा तो उसे लगा कि एक बच्चा चित्र से बाहर देख रहा है।

उसने आंखें झपकाईं और तस्वीर फिर सामान्य हो गई, लेकिन तभी ऊपर से छोटे पैरों की दौड़ सुनाई दी।

सीढ़ियों पर कोई नहीं था, फिर भी आखिरी सीढ़ी पर एक जली हुई छोटी जूती ताजा दिखाई दे रही थी।

अर्णव ने जूती उठाई और उसी क्षण स्कूल की पुरानी घंटी एक बार अपने आप हिल गई।

ठीक बारह बजे घंटी ने स्कूल जगा दिया

रात के ठीक बारह बजे अचानक स्कूल की पुरानी घंटी जोरदार आवाज के साथ बज उठी।

टननन… टननन… टननन… आवाज इतनी तेज थी कि अर्णव ने डरकर अपने कान ढक लिए।

घंटी की आखिरी आवाज के बाद पुराने स्पीकर से खरखराहट और टूटे तारों जैसी आवाज आने लगी।

कुछ सेकंड बाद बच्चों की सामूहिक प्रार्थना सुनाई दी, जैसे किसी कक्षा में सुबह की प्रार्थना चल रही हो।

अर्णव ने कैमरा स्पीकर की तरफ किया, लेकिन वहां कोई बिजली का कनेक्शन तक मौजूद नहीं था।

प्रार्थना खत्म हुई तो अचानक पूरा स्कूल शांत हो गया और अर्णव ने राहत की सांस ली।

लेकिन अगले ही पल बंद कक्षा के अंदर से कुर्सी खिसकने की लंबी आवाज सुनाई दी।

फिर एक बच्चे ने हंसा, उसके बाद दूसरे ने और देखते ही देखते पूरी कक्षा हंसी से भर गई।

अर्णव दरवाजे के पास पहुंचा तो अंदर कई छोटे कदम एक साथ चलने लगे।

“ही… ही… ही…” के बाद बारह आवाजें एक साथ आईं, “सर आ गए… सर आ गए…”

अर्णव का हाथ दरवाजे पर जम गया और उसे अचानक सावित्री ताई की चेतावनी याद आ गई।

बारह जले हुए बच्चे उसी बेंच पर बैठे थे

अर्णव ने डरते हुए दरवाजे को धक्का दिया और वह चरमराता हुआ धीरे-धीरे खुल गया।

टॉर्च की रोशनी पहले काली दीवार पर पड़ी, फिर पुराने ब्लैकबोर्ड से होती हुई बेंचों पर रुकी।

वहां बारह बच्चे बिल्कुल शांत बैठे थे और सभी की पीठ अर्णव की तरफ थी।

उनके पुराने स्कूल यूनिफॉर्म जले हुए थे और कपड़ों पर काले धब्बे साफ दिखाई दे रहे थे।

अर्णव ने एक कदम पीछे लिया और उसी क्षण सभी बच्चों ने एक साथ गर्दन घुमाई।

उनके चेहरे असामान्य रूप से काले थे और आंखों की जगह सिर्फ गहरी चमक दिखाई दे रही थी।

अर्णव की सांस तेज हो गई और कैमरा उसके हाथ से फिसलकर जमीन पर गिर गया।

एक बच्चे ने धीरे से अपनी उंगली बेंच पर रखी और तीन बार थपथपाया।

ठक… ठक… ठक… बाकी ग्यारह बच्चों ने भी उसी लय में बेंच पर हाथ मारना शुरू किया।

बारहों बच्चों ने एक साथ अपना सिर झुकाया और कमरे की सारी हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।

फिर सबसे आगे बैठे बच्चे ने अपना हाथ उठाया और अर्णव की तरफ देखकर धीरे से बोलना शुरू किया।

“सर, हमें भी बचाओ ना…”

बच्चे की आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन खाली कक्षा में वह आवाज कई बार गूंजकर लौट रही थी।

“सर, हमें भी बचाओ ना…” उसने कहा और बाकी ग्यारह बच्चों ने भी वही शब्द दोहराए।

अर्णव ने कांपते हुए कहा कि वह शिक्षक नहीं है और उसे बच्चों के बारे में कुछ मालूम नहीं।

बच्चे बिल्कुल शांत हो गए और कुछ सेकंड तक किसी ने कोई आवाज नहीं निकाली।

फिर एक बच्चे ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई और बंद दरवाजे की तरफ देखने लगा।

अर्णव ने भी दरवाजे की तरफ देखा तो वह बाहर से बंद था, बिल्कुल 1998 की तरह।

दीवारों पर अचानक आग की चमक दिखाई दी और कमरे में हल्का धुआं फैलने लगा।

बच्चों के पीछे जलती हुई कक्षा का दृश्य दिखाई देने लगा और अर्णव की आंखों के सामने पुरानी घटना जीवित हो गई।

उसे बच्चों की पुरानी चीखें सुनाई देने लगीं, जैसे वह उसी रात के अंदर खड़ा हो।

“दरवाजा खोलो सर…” बारह बच्चों की रोती आवाजें अर्णव के चारों तरफ घूमने लगीं।

अर्णव ने पूरी ताकत से दरवाजा पीटा और तभी मेज पर रखा पुराना रजिस्टर अपने आप खुल गया।

अटेंडेंस रजिस्टर में अर्णव का नाम

रजिस्टर के पन्ने हवा के बिना तेजी से पलटने लगे और आखिरी पन्ने पर जाकर रुक गए।

उस पन्ने पर 1998 में मारे गए बारह बच्चों के नाम लिखे हुए थे।

अर्णव ने टॉर्च आगे की तो बारहों नामों के नीचे अचानक काली स्याही फैलने लगी।

स्याही धीरे-धीरे अक्षरों में बदलने लगी और अर्णव देशमुख नाम साफ दिखाई देने लगा।

अर्णव की सांस रुक गई क्योंकि उसने अपना नाम वहां लिखते हुए किसी को नहीं देखा था।

उसके नाम के सामने अपने आप एक शब्द लिखा गया, “उपस्थित।”

अर्णव ने रजिस्टर बंद करने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ अचानक भारी हो गए।

बारहों बच्चे अब रजिस्टर को देख रहे थे और उनकी गर्दन धीरे-धीरे एक साथ हिल रही थी।

एक आवाज ने कहा कि अटेंडेंस अभी पूरी नहीं हुई और बाकी नाम भी पुकारने होंगे।

अर्णव के नाम के नीचे अचानक लिखा गया, “उपस्थित… अगला नाम अभी बाकी है।”

अर्णव पीछे हट गया और तभी बंद कक्षा में बच्चों की हंसी पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई।

कमरे में फिर वही आग जलने लगी

पुरानी बिजली की तारें अचानक चमकने लगीं और दीवारों से धुआं तेजी से निकलने लगा।

अर्णव ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी बाहर से बंद थी और बिल्कुल नहीं हिल रही थी।

कमरे का तापमान तेजी से बढ़ा और उसकी सांस लेना मुश्किल होने लगा।

एक पुरानी बेंच में अचानक आग लगी और फिर उसके पास रखी दूसरी बेंच भी जल उठी।

अर्णव ने बच्चों की तरफ देखा, लेकिन वे सभी बिल्कुल शांत बैठे रहे, जैसे आग उन्हें छू ही नहीं रही थी।

उसने पूछा कि वे उससे क्या चाहते हैं, मगर बच्चों ने कोई जवाब नहीं दिया।

सबसे पीछे बैठे बच्चे ने केवल दरवाजे की तरफ उंगली उठाई और अर्णव समझ गया।

वह वही स्थिति थी जिसमें 1998 में वे बारह बच्चे फंस गए थे।

अर्णव ने पूरी ताकत से दरवाजा पीटा और उसकी चीख आग के शोर में दबती चली गई।

आग के बीच बारहों बच्चों ने एक साथ कहा, “सर, इस बार दरवाजा मत बंद करना।”

अर्णव ने दरवाजा खोलने की आखिरी कोशिश की, लेकिन अचानक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

अर्णव की आखिरी चीख और कैमरे की रिकॉर्डिंग

अंधेरे में अर्णव ने कैमरा उठाया और मदद के लिए पूरी ताकत से चीखना शुरू किया।

उसकी चीख के तुरंत बाद बच्चों की हंसी इतनी तेज हुई कि पूरा कमरा कांपता महसूस हुआ।

कैमरा उसके हाथ से गिरा और रिकॉर्डिंग में सिर्फ धुआं, परछाइयां और टूटती आवाजें दिखाई दीं।

कुछ सेकंड तक अर्णव लगातार दरवाजा पीटता रहा और फिर उसकी आवाज अचानक बंद हो गई।

रिकॉर्डिंग में इसके बाद केवल बच्चों की हंसी सुनाई दी, जो धीरे-धीरे और तेज होती गई।

फिर एक भारी आवाज आई और कैमरे की स्क्रीन पूरी तरह काली हो गई।

सुबह तक अर्णव गांव वापस नहीं लौटा और उसका मोबाइल भी लगातार बंद मिल रहा था।

विठ्ठल काका और सावित्री ताई ने पुलिस को सारी बात बताई और पाटील साहब स्कूल पहुंचे।

स्कूल के बरामदे में अर्णव का कैमरा पड़ा था और बंद कक्षा के अंदर से धीमी हंसी आ रही थी।

कक्षा खोलते ही पाटील साहब ने देखा, बारह बच्चों वाली बेंच पर तेरहवीं जगह में अर्णव बैठा था।

उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन चेहरे पर बच्चों जैसी अजीब मुस्कान थी और होंठ हल्के-हल्के हिल रहे थे।

तेरहवीं सीट पर अर्णव बैठा था

पाटील साहब ने अर्णव को आवाज दी, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और बिल्कुल स्थिर बैठा रहा।

उसके पास वही पुराना रजिस्टर खुला पड़ा था, जिसमें बारह पुराने नाम दर्ज थे।

उन बारह नामों के नीचे अर्णव का नाम लिखा था और उसके सामने उपस्थित दर्ज था।

लेकिन अर्णव के नाम के नीचे एक और खाली लाइन दिखाई दे रही थी।

पाटील साहब ने रजिस्टर बंद किया, मगर कुछ ही सेकंड बाद वह अपने आप फिर खुल गया।

सावित्री ताई ने खाली लाइन देखी तो उनका चेहरा पीला पड़ गया और वह पीछे हट गईं।

विठ्ठल काका समझ गए कि अर्णव अब उस कक्षा की अटेंडेंस का हिस्सा बन चुका है।

पाटील साहब ने दो पुलिसकर्मियों को अर्णव को बाहर निकालने के लिए आगे भेजा।

जैसे ही उन्होंने अर्णव के कंधे को छुआ, कमरे में बच्चों की सामूहिक हंसी गूंज उठी।

बारह बच्चों की हंसी में अचानक अर्णव की आवाज मिल गई और तेरहवीं हंसी पैदा हो गई।

लेकिन रजिस्टर की खाली लाइन देखकर किसी को समझ नहीं आया कि अगली उपस्थिति किसकी होने वाली थी।

नई बेंच और चौदहवीं सीट का रहस्य

पाटील साहब कक्षा से बाहर निकलने ही वाले थे कि उनकी नजर पीछे रखी एक नई बेंच पर पड़ी।

वह बेंच वहां पहले नहीं थी और बाकी पुरानी बेंचों की तुलना में बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

उस पर धूल नहीं थी, लेकिन लकड़ी पर किसी छोटे बच्चे की उंगलियों के निशान मौजूद थे।

पाटील साहब ने टॉर्च ऊपर की तो बेंच पर धूल से लिखा एक वाक्य दिखाई दिया।

वह वाक्य था, “अटेंडेंस अभी पूरी नहीं हुई है।”

कमरे में मौजूद सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे और किसी को समझ नहीं आया कि यह किसने लिखा।

तभी अर्णव ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं और नई बेंच की तरफ देखने लगा।

उसका सिर धीरे-धीरे झुका और फिर उसके होंठों से बिल्कुल बच्चे जैसी आवाज निकली।

सावित्री ताई ने अपने कान ढक लिए, लेकिन वह आवाज कमरे में साफ सुनाई देती रही।

अर्णव बोला, “सर… मेरी सीट कहां है?” और नई बेंच से चौदहवीं हंसी सुनाई दी।

नई बेंच धीरे-धीरे पीछे खिसकी और उसके नीचे से एक पुरानी घंटी बाहर लुढ़क आई।

तेरहवीं आवाज के बाद चौदहवीं आवाज

पाटील साहब ने पुरानी घंटी उठाई और उसी क्षण स्कूल की सभी खिड़कियां एक साथ खुल गईं।

ठंडी हवा कक्षा में घुसी और बच्चों के जले हुए कपड़े एक साथ हिलने लगे।

अर्णव चुपचाप बैठा रहा, लेकिन उसकी उंगलियां मेज पर लगातार एक ही ताल बजा रही थीं।

ठक… ठक… ठक… आवाज धीरे-धीरे पूरे कमरे में फैलने लगी और फिर चौदहवीं आवाज जुड़ गई।

नई बेंच के पास से किसी बच्चे की धीमी सिसकी आई और कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

अर्णव ने अपनी गर्दन उसी दिशा में घुमाई, लेकिन वहां सिर्फ खाली बेंच दिखाई दे रही थी।

अगले ही पल उस बेंच पर एक छोटी परछाईं दिखाई दी और धीरे-धीरे बैठ गई।

विठ्ठल काका ने कांपते हुए कहा कि शायद अटेंडेंस अब किसी चौदहवें बच्चे का इंतजार कर रही है।

अर्णव अचानक अपनी जगह से उठा और बिल्कुल शिक्षक की तरह सामने खाली जगह को देखने लगा।

अर्णव ने कहा, “तेरहवीं सीट के बाद वाली सीट खाली है, अगला बच्चा बैठ जाए।”

नई बेंच पर बैठी परछाईं ने पहली बार स्पष्ट आवाज में जवाब दिया, “सर… मैं आ गया।”

अब स्कूल किसका इंतजार कर रहा था

उस रात के बाद गांव वालों ने स्कूल की तरफ जाने वाला रास्ता पूरी तरह छोड़ दिया।

हर रात बारह बजे घंटी बजती और उसके बाद बच्चों की प्रार्थना पहले से ज्यादा साफ सुनाई देती थी।

पहले बारह आवाजें आती थीं, फिर अर्णव की आवाज उनमें शामिल हो गई और संख्या तेरह हो गई।

कुछ दिनों बाद गांव वालों ने चौदहवीं आवाज भी सुनी, जो बाकी आवाजों से बिल्कुल अलग थी।

विठ्ठल काका ने स्कूल की तरफ देखना बंद कर दिया और शाम होते ही घर के दरवाजे बंद कर देते थे।

सावित्री ताई किसी बच्चे की हंसी सुनते ही खिड़कियां बंद कर देतीं और भगवान का नाम लेने लगती थीं।

पाटील साहब ने स्कूल को फिर से बंद करवाया, लेकिन वहां से आने वाली आवाजें कभी बंद नहीं हुईं।

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हर रात पहले घंटी बजती, फिर प्रार्थना होती और उसके बाद किसी शिक्षक की तरह उपस्थिति पुकारने की आवाज आती।

बारह पुराने नामों के बाद अर्णव का नाम लिया जाता और तेरह बच्चों की आवाज एक साथ आती।

फिर कुछ सेकंड की खामोशी होती और अंधेरे से आवाज आती, “सर… मेरी सीट कहां है?”

गांव वालों को डर था कि अगली रात स्कूल में एक और नई सीट दिखाई दे सकती है।

कहानी खत्म नहीं हुई

आज भी गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि उस स्कूल की डरावनी कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

अगर कोई आधी रात को वहां से गुजरता है, तो पहले धीमी बच्चों की हंसी सुनाई देती है।

फिर स्कूल की घंटी बजती है और किसी बंद कक्षा में बेंच खिसकने की आवाज आती है।

कुछ देर बाद कोई बच्चा दरवाजे के पीछे से मासूम आवाज में उस व्यक्ति को सर कहकर बुलाता है।

अगर वह व्यक्ति जवाब दे दे, तो अगली सुबह पुराने रजिस्टर में एक नया नाम दिखाई देता है।

कहा जाता है कि अर्णव का नाम आज भी उसी रजिस्टर में सबसे नीचे मौजूद है।

उसके नीचे बनी खाली लाइन अब पहले से लंबी हो चुकी है और उसके आगे नई सीट दिखाई देती है।

किसी को नहीं पता कि अगला नाम किसका होगा और वह बच्चा उस स्कूल तक कैसे पहुंचेगा।

बस इतना पता है कि रात बारह बजे स्कूल की घंटी आज भी अपने आप बजती है।

और घंटी के बाद अगर कोई आवाज तुम्हें “सर” कहकर बुलाए, तो कभी पीछे मुड़कर जवाब मत देना।

क्योंकि शायद वह आवाज तुम्हें नहीं, उस खाली सीट को बुला रही हो जो अगली अटेंडेंस का इंतजार कर रही है।

बच्चों की डरावनी हँसी वाला स्कूल की सबसे डरावनी बात यह है कि उस कक्षा की अटेंडेंस आज भी पूरी नहीं हुई।

कक्षा बंद है, बच्चे मर चुके हैं, अर्णव वापस नहीं आया, फिर भी हर रात अंदर कोई नया नाम पुकारा जाता है।

क्या अगली रात बच्चों की डरावनी हँसी वाला स्कूल वह चौदहवीं सीट खाली रखेगा, या उस पर किसी नए बच्चे की परछाईं बैठी मिलेगी?

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नोट: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें बताए गए पात्र, स्कूल, घटनाएं और रहस्यमयी परिस्थितियां मनोरंजन के लिए रची गई हैं। इसका उद्देश्य किसी वास्तविक स्कूल, व्यक्ति या घटना के बारे में तथ्यात्मक दावा करना नहीं है।

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