बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल । 28 साल बाद खुला एक भयानक राज

बच्चों की डरावनी हंसी वाला स्कूल । 28 साल बाद खुला एक भयानक राज

महाराष्ट्र के एक सुनसान गाँव में एक पुराना स्कूल था, जो अट्ठाईस साल से बंद पड़ा था। गाँव वालों का कहना था कि हर रात ठीक बारह बजे वहाँ से बच्चों की हँसी सुनाई देती थी।

एक रात अर्णव देशमुख नाम का एक YouTuber कैमरा लेकर उस स्कूल में पहुँचा। वह वहाँ की सच्चाई जानना चाहता था, लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होने वाला है।

स्कूल के अंदर उसे एक पुराना रजिस्टर मिला, एक ऐसा कमरा मिला जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खुलना चाहिए था, और कुछ ऐसी आवाज़ें सुनाई दीं जिनका कोई जवाब उसके पास नहीं था।

सबसे डरावनी बात तो बाद में सामने आई। उस स्कूल में पहले बारह बच्चों की उपस्थिति दर्ज होती थी, लेकिन अर्णव के जाने के बाद वहाँ एक नई सीट दिखाई देने लगी।

Hindi Rama | डरावनी कहानी

बच्चों की डरावनी हँसी वाले स्कूल का भयानक राज़

गाँव के बाहर एक सुनसान मैदान में वह स्कूल बना हुआ था। दूर से देखने पर उसकी हालत किसी पुरानी हवेली जैसी लगती थी। दीवारों का पीला रंग उतर चुका था और जगह-जगह काले निशान पड़े थे। छत की कई टाइलें टूट चुकी थीं।

स्कूल के सामने एक विशाल पेड़ खड़ा था। उसकी सूखी शाखाएँ हवा चलने पर खिड़कियों से टकराती थीं। दिन में भी गाँव के बच्चे उसके पास जाने से बचते थे। शाम ढलते ही उस रास्ते पर सन्नाटा छा जाता था।

गाँव के लोगों का कहना था कि आधी रात के बाद पेड़ के नीचे बच्चों की परछाइयाँ दिखाई देती थीं। कभी कोई परछाईं स्कूल की ओर बढ़ती, तो कभी बिना हिले-डुले वहीं खड़ी रहती। किसी ने उनके चेहरे साफ नहीं देखे थे।

स्कूल की टूटी खिड़कियों के पीछे कभी-कभी हल्की रोशनी चमकती थी, जबकि वहाँ की बिजली वर्षों पहले काट दी गई थी। हर रात ठीक बारह बजे पुरानी घंटी बजती और उसके बाद बच्चों के हँसने की आवाज़ आने लगती। कुछ देर बाद कोई आवाज़ शिक्षक को पुकारती सुनाई देती थी।

गाँव के बुज़ुर्गों को पता था कि इन आवाज़ों के पीछे साल 1998 की एक भयानक घटना छिपी हुई थी। उस घटना के बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता था, लेकिन हर कोई जानता था कि उस स्कूल में कुछ ऐसा हुआ था जिसे भुला पाना आसान नहीं था।

1998 की आग और बंद दरवाज़ा

साल 1998 में एक शाम स्कूल की कक्षा में बारह बच्चे पढ़ रहे थे। छुट्टी का समय हो चुका था, लेकिन बच्चे शोर मचा रहे थे। स्कूल के एक कर्मचारी ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला किया। उसने सभी बच्चों को कक्षा में बैठाया और बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर वह कुछ देर के लिए वहाँ से चला गया।

बच्चों ने पहले दरवाज़ा खटखटाया। जब कोई नहीं आया, तो वे ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए पुकारने लगे। उन्हें लगा कि कर्मचारी जल्द ही लौट आएगा, लेकिन बाहर से कोई जवाब नहीं मिला।

उसी समय कमरे की पुरानी बिजली की वायरिंग में चिंगारी निकली। दीवार के पास रखे सामान में आग लग गई। सूखे पर्दों और लकड़ी की बेंचों ने आग को और भड़का दिया। देखते ही देखते कमरे में धुआँ भरने लगा।

बच्चों को समझ आ गया कि अब बाहर निकलना ज़रूरी है। वे दरवाज़े की तरफ दौड़े और पूरी ताकत से उसे धक्का देने लगे। किसी ने कुंडी खींची, तो किसी ने दरवाज़े पर मुक्के मारे। मगर दरवाज़ा बाहर से बंद था।

अंदर से लगातार धड़ाम-धड़ाम की आवाज़ें आती रहीं। बच्चों की चीखें पूरे स्कूल में गूँज रही थीं, लेकिन जब तक लोगों को आग का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। धुआँ इतना बढ़ गया था कि कमरे में साँस लेना मुश्किल हो गया था।

बारहों बच्चों ने आखिरी बार दरवाज़ा पीटकर मदद माँगी, लेकिन कोई उन्हें बाहर नहीं निकाल सका। सुबह जब लोग वहाँ पहुँचे, तो कक्षा की दीवारें काली पड़ चुकी थीं और अंदर का सामान राख में बदल गया था। उस हादसे में बारहों बच्चों की मौत हो गई थी।

हादसे के बाद स्कूल क्यों नहीं सोया

हादसे के बाद स्कूल को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। सरकारी रिकॉर्ड में आग लगने की वजह खराब बिजली की वायरिंग बताई गई, लेकिन गाँव में इस घटना को लेकर दूसरी ही बातें होने लगीं।

लोगों का मानना था कि उन बच्चों की आत्माएँ आज भी स्कूल में भटक रही थीं। वे आखिरी समय तक दरवाज़ा खोलने के लिए चिल्लाते रहे थे। शायद इसी वजह से उनकी आवाज़ें आज भी उस इमारत में गूँजती थीं।

हादसे के कुछ दिनों बाद ही एक रात स्कूल के अंदर से घंटी बजने की आवाज़ सुनाई दी। इसके बाद बच्चों की प्रार्थना सुनाई दी और फिर बारह बच्चों की हँसी गूँजने लगी। उस समय स्कूल में कोई नहीं था, फिर भी आवाज़ें इतनी साफ थीं कि आसपास के घरों तक सुनाई दीं।

गाँव के बुज़ुर्ग विठ्ठल काका अक्सर कहा करते थे कि स्कूल की सबसे डरावनी चीज़ आग नहीं थी। असली डर उस बंद दरवाज़े में था, जिसे बच्चे अपनी आखिरी साँस तक खोलने की कोशिश करते रहे थे।

विठ्ठल काका ने कई बार रात में स्कूल के अंदर से बेंच घिसटने और छोटे बच्चों के कदमों की आवाज़ें सुनी थीं। जब भी कोई उन आवाज़ों के पीछे स्कूल तक जाता, सब कुछ अचानक शांत हो जाता। ऐसा लगता, जैसे अंदर मौजूद कोई चीज़ उसके आने का इंतज़ार कर रही हो।

उनका कहना था कि स्कूल तो अट्ठाईस साल पहले बंद हो गया था, लेकिन उन बच्चों की आखिरी रात कभी खत्म नहीं हुई। इसी डर से गाँव वालों ने एक नियम बना लिया था। आधी रात के बाद स्कूल से कोई आवाज़ आए, तो उसका जवाब नहीं देना है।

सावित्री ताई ने दी आखिरी चेतावनी

गाँव की बुज़ुर्ग महिला सावित्री ताई भी उस स्कूल से जुड़ी कई अजीब घटनाएँ देख चुकी थीं। एक रात उन्होंने स्कूल की खिड़की में बारह बच्चों को बैठे देखा था। सभी बच्चे चुपचाप एक ही दिशा में देख रहे थे, जैसे किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हों।

सावित्री ताई ने कुछ पल तक उन्हें देखा। फिर डर के मारे आँखें बंद कर लीं। जब उन्होंने दोबारा खिड़की की तरफ देखा, तो वहाँ कोई नहीं था। अगले दिन उन्होंने गाँव वालों को यह बात बताई, लेकिन किसी ने उन्हें फिर कभी उस स्कूल के पास जाने नहीं दिया।

उसी गाँव में एक रात अर्णव देशमुख पहुँचा। वह YouTube पर डरावनी जगहों के वीडियो बनाता था। जब उसे उस पुराने स्कूल और वहाँ सुनाई देने वाली बच्चों की हँसी के बारे में पता चला, तो उसने तय कर लिया कि वह आधी रात को वहाँ जाकर सब कुछ कैमरे में रिकॉर्ड करेगा।

विठ्ठल काका को जब उसकी योजना के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की। उन्होंने साफ कहा कि रात में उस स्कूल के अंदर जाना ठीक नहीं होगा। वहाँ जो कुछ भी होता है, उसे देखने की कोशिश करने वाले अक्सर डरकर लौट आते हैं।

अर्णव ने उनकी बात सुनी, लेकिन उसे लगा कि गाँव वाले बेवजह डरते हैं। उसे विश्वास था कि कैमरे में सब कुछ रिकॉर्ड हो जाएगा और वह लोगों को उस जगह की सच्चाई दिखा सकेगा।

सावित्री ताई ने भी उसे समझाया। उन्होंने कहा, “अगर अंदर कोई बच्चा तुम्हें सर कहकर बुलाए, तो उसे जवाब मत देना।”

अर्णव ने पूछा कि आखिर बच्चे उसे सर क्यों कहेंगे। सावित्री ताई ने कोई लंबा जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस इतना कहा, “अगर वे तुम्हें सर कहें, तो समझना कि अब स्कूल तुम्हें अपना चुका है।”

अर्णव ने उनकी चेतावनी कैमरे में रिकॉर्ड की। फिर अपना सामान उठाया और रात पौने बारह बजे अकेला स्कूल की तरफ निकल पड़ा।

11:45 पर जंग लगा गेट अपने आप खुला

रात के 11 बजकर 45 मिनट पर अर्णव स्कूल के पुराने गेट के सामने पहुँचा। गेट पर मोटी जंजीर लटक रही थी। हवा चलती, तो जंजीर लोहे से टकराकर खनखनाने लगती। आसपास दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

अर्णव ने कैमरा चालू किया और दर्शकों को स्कूल की हालत दिखाने लगा। उसने बताया कि यह जगह अट्ठाईस साल से बंद है और आज वह अंदर जाकर पता लगाएगा कि रात में यहाँ बच्चों की हँसी क्यों सुनाई देती है।

वह गेट के पास पहुँचा ही था कि अचानक जंजीर नीचे गिर गई। अर्णव ने उसे छुआ तक नहीं था। कुछ पल बाद गेट अपने आप खुलने लगा। उसके पुराने कब्ज़ों से ऐसी आवाज़ निकली, जैसे कोई बहुत भारी दरवाज़ा दर्द से कराह रहा हो।

अर्णव कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर उसने टॉर्च जलाई और अंदर कदम रख दिया। बरामदे में धूल की मोटी परत जमी हुई थी। दीवारों पर मकड़ी के जाले थे और कोनों में सूखे पत्ते जमा थे। लेकिन धूल के बीच छोटे पैरों के ताज़ा निशान दिखाई दे रहे थे।

वे निशान गेट से शुरू होकर सीधे उसी पुरानी कक्षा की तरफ जा रहे थे, जहाँ 1998 में आग लगी थी। अर्णव ने कैमरा नीचे करके उन निशानों को रिकॉर्ड किया और फिर आगे बढ़ने लगा।

तभी उसके पीछे गेट ज़ोर से बंद हो गया। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि अर्णव चौंककर पलट गया। उसी पल अँधेरे में किसी बच्चे ने धीरे से फुसफुसाया, “सर आ गए।”

अर्णव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई। वहाँ कोई नहीं था। गेट बंद पड़ा था और उसके पार सुनसान गाँव दिखाई दे रहा था। उसने खुद को समझाया कि शायद हवा की वजह से उसे कोई आवाज़ सुनाई दी है, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा था।

अँधेरे बरामदे में कोई उसके पीछे चल रहा था

अर्णव ने कैमरा फिर से संभाला और बरामदे में आगे बढ़ने लगा। कुछ कदम चलने के बाद उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी। वह रुक गया, तो आवाज़ भी रुक गई। उसने दोबारा चलना शुरू किया, तो कदम फिर उसके पीछे सुनाई देने लगे।

उसने कैमरा घुमाकर पीछे देखा। स्क्रीन पर खाली बरामदा था। टॉर्च की रोशनी में सिर्फ टूटी दीवारें और धूल दिखाई दे रही थी। कोई उसके पीछे नहीं था, फिर भी कदमों की आवाज़ बंद नहीं हुई।

तभी एक पुरानी बेंच फर्श पर घिसटती हुई उसके सामने आ गई। अर्णव घबराकर पीछे हट गया। उसने बेंच को ध्यान से देखा, लेकिन उसे हिलाने वाला कोई दिखाई नहीं दिया।

बरामदे की दीवार पर बच्चों के पुराने चित्र लगे हुए थे। हर चित्र के नीचे 1998 की तारीख लिखी थी। उन चित्रों में वही बारह बच्चे थे, जिनकी मौत आग में हुई थी। एक चित्र में सभी बच्चे अपनी कक्षा में बैठे थे और दरवाज़ा बाहर से बंद दिखाई दे रहा था।

अर्णव ने एक चित्र को पास से देखा। उसे लगा कि उसमें बैठा एक बच्चा सीधे उसकी तरफ देख रहा है। उसने पलक झपकाई, तो चित्र फिर पहले जैसा दिखाई देने लगा। वह कुछ समझ पाता, उससे पहले ही ऊपर की मंज़िल से छोटे पैरों के दौड़ने की आवाज़ आने लगी।

अर्णव सीढ़ियों के पास पहुँचा। वहाँ कोई नहीं था, लेकिन आखिरी सीढ़ी पर एक छोटी जली हुई जूती पड़ी थी। अजीब बात यह थी कि उसके आसपास धूल जमी थी, जबकि जूती पर धूल नहीं थी। वह अभी-अभी वहाँ रखी गई लग रही थी।

अर्णव ने उसे उठाया ही था कि स्कूल की पुरानी घंटी एक बार अपने आप हिल गई। उसने ऊपर देखा। घंटी स्थिर थी, लेकिन उसके बजने की आवाज़ पूरे बरामदे में गूँज रही थी।

ठीक बारह बजे घंटी ने स्कूल जगा दिया

घड़ी में ठीक बारह बजे थे। अचानक स्कूल की पुरानी घंटी ज़ोर से बज उठी। टननन… टननन… टननन… उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि अर्णव ने दोनों हाथों से अपने कान ढक लिए।

घंटी की आवाज़ बंद हुई, तो पुराने स्पीकर से खरखराहट सुनाई देने लगी। ऐसा लग रहा था, जैसे टूटे हुए तारों में अचानक बिजली दौड़ गई हो। कुछ सेकंड बाद उसी स्पीकर से बच्चों की सामूहिक प्रार्थना सुनाई देने लगी। आवाज़ बिल्कुल वैसी थी, जैसी किसी स्कूल में सुबह की प्रार्थना के समय सुनाई देती है।

अर्णव ने कैमरा स्पीकर की तरफ किया। उसे यकीन था कि कहीं कोई छिपा हुआ उपकरण लगा होगा। लेकिन जब उसने आसपास देखा, तो वहाँ बिजली का कनेक्शन तक मौजूद नहीं था। तारें टूटी हुई थीं और दीवार पर लगा स्विच वर्षों से खराब पड़ा था।

प्रार्थना खत्म हुई, तो स्कूल में सन्नाटा छा गया। अर्णव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ने लगा। तभी बंद कक्षा के भीतर से कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई। वह दरवाज़े के पास पहुँचा, तो अंदर से हँसी सुनाई देने लगी।

पहले एक बच्चा हँसा। फिर दूसरे की आवाज़ आई। देखते ही देखते पूरी कक्षा बच्चों की हँसी से गूँज उठी। अर्णव दरवाज़े के सामने खड़ा था और अंदर छोटे-छोटे कदमों की आवाज़ें इधर-उधर घूम रही थीं।

कुछ ही पल बाद बारह आवाज़ें एक साथ गूँजीं, “सर आ गए… सर आ गए…”

अर्णव का हाथ दरवाज़े पर ही रुक गया। उसे सावित्री ताई की चेतावनी याद आ गई। उसने जवाब नहीं दिया। फिर भी अंदर से बच्चों की हँसी जारी रही, मानो उन्हें पता हो कि वह बाहर खड़ा है।

बारह जले हुए बच्चे उसी बेंच पर बैठे थे

अर्णव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े को धक्का दिया। दरवाज़ा चरमराता हुआ खुल गया। उसने टॉर्च की रोशनी अंदर डाली। पहले रोशनी काली पड़ी दीवार पर गई, फिर पुराने ब्लैकबोर्ड से होती हुई सामने रखी बेंचों पर पड़ी।

वहाँ बारह बच्चे बैठे थे। सभी की पीठ दरवाज़े की तरफ थी। वे बिल्कुल शांत थे, जैसे किसी शिक्षक के आने का इंतज़ार कर रहे हों। उनकी स्कूल यूनिफॉर्म जली हुई थी और कपड़ों पर काले धब्बे साफ दिखाई दे रहे थे।

अर्णव ने एक कदम पीछे लिया। उसी क्षण सभी बच्चों ने एक साथ अपनी गर्दन घुमाकर उसकी तरफ देखा। उनके चेहरे असामान्य रूप से काले थे। आँखों की जगह गहरी चमक दिखाई दे रही थी। उन्हें देखकर अर्णव के हाथ काँपने लगे और कैमरा फिसलकर ज़मीन पर गिर गया।

सबसे आगे बैठे बच्चे ने अपनी उँगली बेंच पर रखी और तीन बार थपथपाया। ठक… ठक… ठक… उसके बाद बाकी ग्यारह बच्चों ने भी उसी लय में बेंच पर हाथ मारना शुरू कर दिया। उनकी आवाज़ें एक साथ गूँजने लगीं।

कुछ ही देर में सभी बच्चों ने अपना सिर झुका लिया। कमरे की हवा अचानक इतनी ठंडी हो गई कि अर्णव की साँस से भाप निकलने लगी। वह दरवाज़े की तरफ भागना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन पर जम गए थे।

तभी सबसे आगे बैठे बच्चे ने धीरे से हाथ उठाया और अर्णव को देखकर बोलने लगा।

“सर, हमें भी बचाओ ना…”

बच्चे की आवाज़ धीमी थी, लेकिन खाली कक्षा में बार-बार गूँज रही थी। उसने अर्णव से कहा, “सर, हमें भी बचाओ ना…” बाकी ग्यारह बच्चों ने भी वही शब्द दोहराए।

अर्णव ने काँपती आवाज़ में जवाब दिया कि वह उनका शिक्षक नहीं है। उसे उनके बारे में कुछ नहीं पता और वह सिर्फ वीडियो बनाने आया था। उसकी बात सुनकर सभी बच्चे चुप हो गए। कुछ सेकंड तक कमरे में बिल्कुल सन्नाटा रहा।

फिर एक बच्चे ने धीरे से सिर उठाया और दरवाज़े की तरफ देखने लगा। अर्णव ने भी पलटकर देखा। दरवाज़ा बंद हो चुका था। वह बिल्कुल उसी तरह बाहर से बंद था, जैसे 1998 में उन बच्चों के साथ हुआ था।

दीवारों पर अचानक आग की लपटों जैसी चमक दिखाई देने लगी। कमरे में धुआँ भरने लगा और बच्चों के पीछे जलती हुई कक्षा का दृश्य उभर आया। अर्णव की आँखों के सामने वही पुरानी घटना दोबारा घटने लगी।

उसे बच्चों की चीखें सुनाई देने लगीं। कोई दरवाज़ा पीट रहा था, कोई मदद के लिए पुकार रहा था और कोई रोते हुए कह रहा था कि उसे बाहर जाना है। अर्णव को ऐसा लगा, जैसे वह अब स्कूल में नहीं, बल्कि 1998 की उसी जलती हुई कक्षा में खड़ा है।

चारों तरफ से आवाज़ें आने लगीं, “दरवाज़ा खोलो सर… हमें बाहर निकालो…” अर्णव ने दरवाज़े की तरफ दौड़कर उसे पीटना शुरू कर दिया। तभी पीछे मेज़ पर रखा पुराना रजिस्टर अपने आप खुल गया।

अटेंडेंस रजिस्टर में अर्णव का नाम

मेज़ पर पड़ा रजिस्टर बिना किसी हवा के तेजी से खुला और उसके पन्ने अपने आप पलटने लगे। कुछ ही देर में वे आखिरी पन्ने पर जाकर रुक गए। उस पन्ने पर 1998 में मारे गए बारह बच्चों के नाम लिखे हुए थे।

अर्णव ने टॉर्च की रोशनी पन्ने पर डाली। तभी बारहों नामों के नीचे काली स्याही फैलने लगी। स्याही पहले एक धब्बे जैसी दिखाई दी, फिर धीरे-धीरे अक्षरों का रूप लेने लगी। कुछ ही क्षणों में वहाँ साफ लिखा दिखाई दिया—अर्णव देशमुख।

अर्णव के हाथ से टॉर्च लगभग छूट गई। उसने अपना नाम वहाँ लिखते हुए किसी को नहीं देखा था। वह रजिस्टर से दूर हटना चाहता था, लेकिन उसके पैर हिल नहीं रहे थे। तभी उसके नाम के सामने एक और शब्द अपने आप उभर आया—“उपस्थित।”

उसने रजिस्टर बंद करने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ भारी होने लगे। कक्षा में बैठे बारहों बच्चे अब उसी पन्ने को देख रहे थे। उनकी गर्दनें धीरे-धीरे एक साथ हिल रही थीं।

तभी किसी ने अँधेरे में कहा, “अटेंडेंस अभी पूरी नहीं हुई है। बाकी नाम भी पुकारने होंगे।”

अर्णव ने नीचे देखा। उसके नाम के ठीक नीचे स्याही फिर फैलने लगी। कुछ ही पल में वहाँ लिखा दिखाई दिया, “उपस्थित… अगला नाम अभी बाकी है।”

अर्णव पीछे हट गया। अब बच्चों की हँसी पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ हो चुकी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वहाँ से कैसे निकले। उसे बस इतना पता था कि उस रजिस्टर में उसका नाम दर्ज हो चुका था और स्कूल उसे जाने नहीं देना चाहता था।

कमरे में फिर वही आग जलने लगी

पुरानी बिजली की तारें अचानक चमकने लगीं। दीवारों से धुआँ निकलने लगा और कमरे में गर्मी बढ़ती चली गई। अर्णव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी बाहर से बंद थी। उसने पूरी ताकत लगा दी, फिर भी दरवाज़ा नहीं हिला।

कुछ ही देर में उसकी साँस लेना मुश्किल हो गया। एक पुरानी बेंच में आग लग गई और उसके पास रखी दूसरी बेंच भी जलने लगी। आग की लपटें ऊपर उठने लगीं, लेकिन बारहों बच्चे अपनी जगह पर बैठे रहे। ऐसा लगता था, जैसे आग उन्हें छू भी नहीं रही हो।

अर्णव ने उनकी तरफ देखकर पूछा कि वे उससे क्या चाहते हैं। किसी ने जवाब नहीं दिया। सबसे पीछे बैठे बच्चे ने बस दरवाज़े की तरफ उँगली उठा दी। अर्णव को समझ आ गया कि वे उससे क्या चाहते हैं।

वे बच्चे उसी बंद दरवाज़े के सामने फँसे हुए थे, जहाँ 1998 में उनकी जान गई थी। शायद वे चाहते थे कि इस बार कोई उस दरवाज़े को खोल दे। लेकिन अर्णव खुद उसी कैद में फँस चुका था।

उसने दरवाज़े पर पूरी ताकत से हाथ मारे और मदद के लिए चिल्लाया। उसकी आवाज़ आग के शोर में दबती जा रही थी। तभी बारहों बच्चों ने एक साथ उसकी तरफ देखा और कहा, “सर, इस बार दरवाज़ा मत बंद करना।”

अर्णव ने आखिरी बार दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। उसकी उँगलियाँ कुंडी तक पहुँचीं, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। अगले ही पल पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया। आग, धुआँ और बच्चों की आवाज़ें सब कुछ जैसे एक साथ गायब हो गए।

अर्णव की आखिरी चीख और कैमरे की रिकॉर्डिंग

घने अँधेरे में अर्णव ने ज़मीन पर पड़ा कैमरा उठाया और मदद के लिए चीखने लगा। उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वह कभी दरवाज़े की तरफ हाथ बढ़ाता, तो कभी दीवार पकड़कर बाहर निकलने का रास्ता खोजता।

उसकी चीख के तुरंत बाद बच्चों की हँसी गूँज उठी। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा कमरा काँपता हुआ महसूस हो रहा था। कैमरा फिर उसके हाथ से गिर गया। उसकी रिकॉर्डिंग में धुआँ, अजीब परछाइयाँ और टूटती हुई आवाज़ें दिखाई देने लगीं।

कुछ सेकंड तक अर्णव दरवाज़ा पीटता रहा। फिर उसकी आवाज़ अचानक बंद हो गई। कैमरे में अब सिर्फ बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी। धीरे-धीरे वह हँसी तेज़ होती गई, फिर एक भारी आवाज़ सुनाई दी और स्क्रीन पूरी तरह काली हो गई।

सुबह होने तक अर्णव गाँव वापस नहीं लौटा। उसका मोबाइल भी बंद मिल रहा था। विठ्ठल काका और सावित्री ताई समझ गए कि कुछ अनहोनी हो चुकी है। उन्होंने पुलिस को पूरी बात बताई। इसके बाद पाटील साहब पुलिसकर्मियों के साथ स्कूल पहुँचे।

बरामदे में अर्णव का कैमरा पड़ा था। उसके आसपास कोई नहीं था, लेकिन बंद कक्षा के अंदर से बच्चों की धीमी हँसी सुनाई दे रही थी। पुलिसकर्मियों ने दरवाज़ा खोला और टॉर्च की रोशनी भीतर डाली।

कक्षा में बारह बच्चों वाली बेंच पर अब तेरहवीं जगह पर अर्णव बैठा था। उसकी आँखें बंद थीं। चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान थी और उसके होंठ हल्के-हल्के हिल रहे थे, जैसे वह किसी बच्चे की तरह कुछ बोल रहा हो।

तेरहवीं सीट पर अर्णव बैठा था

पाटील साहब ने अर्णव को आवाज़ दी, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह बिल्कुल स्थिर बैठा रहा। उसके पास पुराना रजिस्टर खुला पड़ा था। उसमें पहले बारह बच्चों के नाम दर्ज थे और उनके नीचे अर्णव का नाम लिखा था। उसके सामने “उपस्थित” लिखा हुआ था।

लेकिन अर्णव के नाम के नीचे एक और खाली लाइन थी। पाटील साहब ने रजिस्टर बंद कर दिया। कुछ ही सेकंड बाद वह अपने आप फिर खुल गया। सावित्री ताई ने खाली लाइन देखी, तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। वह घबराकर पीछे हट गईं।

विठ्ठल काका समझ गए कि अर्णव अब उस कक्षा की अटेंडेंस का हिस्सा बन चुका है। पाटील साहब ने दो पुलिसकर्मियों को उसे बाहर निकालने के लिए आगे भेजा। जैसे ही एक पुलिसकर्मी ने अर्णव के कंधे को छुआ, पूरी कक्षा में बच्चों की हँसी गूँज उठी।

पहले बारह आवाज़ें सुनाई दीं। फिर उनके बीच अर्णव की आवाज़ भी मिल गई। अब वहाँ तेरह बच्चों की हँसी थी। पुलिसकर्मी डरकर पीछे हट गए। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि दोबारा अर्णव को छू सके।

पाटील साहब की नज़र फिर रजिस्टर की खाली लाइन पर गई। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अगली उपस्थिति किसकी होने वाली है। तभी उनकी नज़र कक्षा के पीछे रखी एक बेंच पर पड़ी। वह बेंच बाकी बेंचों से अलग थी और उन्हें याद नहीं था कि उसे वहाँ पहले कभी देखा हो।

नई बेंच और चौदहवीं सीट का रहस्य

कक्षा के पीछे रखी नई बेंच बिल्कुल साफ थी। बाकी बेंचों पर धूल जमी हुई थी, लेकिन उस पर धूल का एक कण भी नहीं था। लकड़ी पर छोटे बच्चे की उँगलियों जैसे निशान बने हुए थे।

पाटील साहब ने टॉर्च की रोशनी बेंच पर डाली। वहाँ धूल से एक वाक्य लिखा हुआ था—“अटेंडेंस अभी पूरी नहीं हुई है।” कमरे में मौजूद सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। किसी को समझ नहीं आया कि यह किसने लिखा था।

तभी अर्णव ने धीरे-धीरे आँखें खोल दीं। उसने पहले सामने देखा और फिर अपनी नज़र नई बेंच पर जमा दी। उसका सिर एक तरफ झुक गया। कुछ पल बाद उसके मुँह से बच्चे जैसी आवाज़ निकली।

सावित्री ताई ने डर के मारे अपने कान ढक लिए। लेकिन अर्णव की आवाज़ पूरे कमरे में साफ सुनाई दे रही थी। उसने पूछा, “सर… मेरी सीट कहाँ है?”

उसके सवाल के तुरंत बाद नई बेंच की तरफ से चौदहवीं हँसी सुनाई दी। बेंच धीरे-धीरे पीछे खिसकने लगी। उसके नीचे से एक पुरानी घंटी निकलकर फर्श पर लुढ़क गई। किसी ने उस घंटी को छुआ नहीं था। फिर भी वह कुछ देर तक अपने आप हिलती रही।

तेरहवीं आवाज़ के बाद चौदहवीं आवाज़

पाटील साहब ने काँपते हाथों से पुरानी घंटी उठाई। उसी क्षण स्कूल की सभी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं। बाहर की ठंडी हवा कक्षा में घुस आई और बच्चों की जली हुई यूनिफॉर्म हिलने लगी।

अर्णव अपनी जगह बैठा था, लेकिन उसकी उँगलियाँ मेज़ पर लगातार एक ही ताल बजा रही थीं। ठक… ठक… ठक… पहले यह आवाज़ धीमी थी, फिर पूरे कमरे में गूँजने लगी। कुछ देर बाद उस ताल में एक और आवाज़ जुड़ गई। वह आवाज़ नई बेंच की तरफ से आ रही थी।

अचानक बेंच के पास से किसी बच्चे के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी। सभी लोग उस तरफ देखने लगे। वहाँ कोई नहीं था, सिर्फ वही खाली बेंच पड़ी थी। लेकिन अगले ही पल उस पर एक छोटी-सी परछाईं दिखाई दी। वह परछाईं धीरे-धीरे नीचे बैठ गई, जैसे कोई बच्चा अपनी जगह पर आकर बैठा हो।

विठ्ठल काका ने काँपती आवाज़ में कहा, “लगता है, अब अटेंडेंस किसी चौदहवें बच्चे का इंतज़ार कर रही है।” उनकी बात सुनकर सावित्री ताई और पीछे हट गईं।

तभी अर्णव अपनी जगह से उठा। उसकी चाल और बोलने का तरीका बदल चुका था। वह बिल्कुल किसी शिक्षक की तरह सामने देखने लगा। फिर उसने खाली जगह की तरफ इशारा करके कहा, “तेरहवीं सीट के बाद वाली सीट खाली है। अगला बच्चा बैठ जाए।”

नई बेंच पर बैठी परछाईं ने पहली बार साफ आवाज़ में जवाब दिया, “सर… मैं आ गया।”

उस आवाज़ के बाद कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर पुरानी घंटी अपने आप बज उठी। पाटील साहब ने अर्णव को देखा, लेकिन अब उसके चेहरे पर वही अजीब मुस्कान थी। ऐसा लग रहा था, जैसे वह उस कक्षा का हिस्सा बन चुका हो और अब वहीं पढ़ाने वाला हो।

अब स्कूल किसका इंतज़ार कर रहा था

उस रात के बाद गाँव वालों ने स्कूल की तरफ जाने वाला रास्ता पूरी तरह छोड़ दिया। शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते थे। किसी को भी उस इमारत के पास जाने की हिम्मत नहीं होती थी।

हर रात ठीक बारह बजे घंटी बजती। उसके बाद बच्चों की प्रार्थना सुनाई देती और फिर हँसी गूँजने लगती। पहले बारह बच्चों की आवाज़ें आती थीं। कुछ दिनों बाद उनमें अर्णव की आवाज़ भी शामिल हो गई। अब गिनती तेरह तक पहुँच चुकी थी।

फिर एक रात गाँव वालों ने चौदहवीं आवाज़ भी सुनी। वह बाकी आवाज़ों से अलग थी। उसमें किसी छोटे बच्चे की मासूमियत थी, लेकिन उसे सुनते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता था।

विठ्ठल काका ने स्कूल की तरफ देखना तक बंद कर दिया। शाम होते ही वह अपने घर के दरवाज़े बंद कर लेते थे। सावित्री ताई किसी बच्चे की हँसी सुनतीं, तो खिड़कियाँ बंद करके भगवान का नाम लेने लगती थीं।

पाटील साहब ने स्कूल को फिर से बंद करवाया, लेकिन वहाँ से आने वाली आवाज़ें नहीं रुकीं। हर रात पहले घंटी बजती, फिर प्रार्थना होती और उसके बाद किसी शिक्षक की तरह उपस्थिति पुकारने की आवाज़ सुनाई देती।

बारह पुराने नामों के बाद अर्णव का नाम लिया जाता। तेरह आवाज़ें एक साथ जवाब देतीं। उसके बाद कुछ पल खामोशी रहती और फिर अँधेरे से कोई पूछता, “सर… मेरी सीट कहाँ है?”

गाँव वालों को डर था कि किसी रात स्कूल में एक और नई सीट दिखाई देगी। उन्हें यह भी डर था कि अगली बार जिस व्यक्ति को वह आवाज़ सुनाई देगी, उसका नाम भी उसी रजिस्टर में दर्ज हो जाएगा।

कहानी खत्म नहीं हुई

आज भी गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं कि उस स्कूल की डरावनी कहानी खत्म नहीं हुई है। अगर कोई आधी रात को वहाँ से गुज़रता है, तो सबसे पहले बच्चों की धीमी हँसी सुनाई देती है। उसके बाद स्कूल की घंटी बजती है और बंद कक्षा के भीतर बेंच खिसकने की आवाज़ आने लगती है।

कुछ देर बाद दरवाज़े के पीछे से कोई बच्चा मासूम आवाज़ में उस व्यक्ति को सर कहकर बुलाता है। आवाज़ इतनी सामान्य लगती है कि किसी को भी पलटकर जवाब देने का मन हो सकता है। लेकिन गाँव वालों को पता है कि उस आवाज़ का जवाब देना कितना खतरनाक हो सकता है।

कहा जाता है कि अगर कोई उस पुकार का जवाब दे दे, तो अगली सुबह पुराने रजिस्टर में एक नया नाम दिखाई देता है। अर्णव का नाम आज भी उस रजिस्टर में सबसे नीचे लिखा हुआ है। उसके नीचे बनी खाली लाइन पहले से लंबी हो चुकी है और उसके सामने एक नई सीट दिखाई देती है।

किसी को नहीं पता कि अगला नाम किसका होगा। यह भी कोई नहीं जानता कि वह व्यक्ति उस स्कूल तक कैसे पहुँचेगा। लेकिन एक बात आज भी वैसी ही है। रात के बारह बजते ही स्कूल की घंटी अपने आप बजने लगती है।

अगर कभी उस घंटी के बाद कोई आवाज़ तुम्हें “सर” कहकर बुलाए, तो पीछे मुड़कर जवाब मत देना। हो सकता है कि वह आवाज़ तुम्हें नहीं, बल्कि उस खाली सीट को बुला रही हो जो अगली अटेंडेंस का इंतज़ार कर रही है।

बच्चों की डरावनी हँसी वाले स्कूल का सबसे डरावना रहस्य यही है कि उस कक्षा की अटेंडेंस आज तक पूरी नहीं हुई। कक्षा बंद है, बारह बच्चे मर चुके हैं और अर्णव कभी वापस नहीं आया। फिर भी हर रात वहाँ किसी नए नाम की प्रतीक्षा की जाती है।

अब सवाल यह है कि अगली रात उस स्कूल की चौदहवीं सीट खाली रहेगी, या उस पर किसी नए बच्चे की परछाईं बैठी मिलेगी?

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