डरावना झूला गाँव के बाहर एक पुराने पेड़ पर लगा था। कहते थे कि रात में उस पर एक ऐसा बच्चा दिखाई देता था, जिसके पैर कभी जमीन को नहीं छूते थे। गाँव की अनिता भी उसके प्रभाव में आ गई थी। रवि और किशन ने उसका रहस्य जानने की कोशिश की, लेकिन जो कुछ उन्होंने देखा, उसके बाद पूरा गाँव उजड़ने लगा।
अंधेरी रात में रवि का सफर । Horror Child In The Dark Night
रात काफी हो चुकी थी। रवि अपने दोस्त किशन के साथ खेतों के बीच बने कच्चे रास्ते से बस अड्डे की ओर जा रहा था।
चारों तरफ घना अंधेरा था। दूर किसी घर की रोशनी तक दिखाई नहीं दे रही थी। चलते-चलते किशन ने रवि को एक पुरानी घटना सुनानी शुरू की।
किशन ने बताया कि कई साल पहले एक आदमी रात में इसी रास्ते से गुजर रहा था। तभी उसे किसी छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।
आवाज खेत के किनारे खड़े एक पुराने पेड़ के नीचे से आ रही थी। उस पेड़ पर रस्सियों से बँधा एक झूला लटक रहा था।
आदमी ने पास जाकर देखा तो झूले पर एक छोटा बच्चा बैठा था। उसे लगा कि शायद कोई बच्चे को वहाँ अकेला छोड़ गया है।
वह बच्चे को उठाने के लिए आगे बढ़ा। जैसे ही उसने उसे गोद में लिया, बच्चे का शरीर अचानक इतना भारी हो गया कि उसके हाथ काँपने लगे।
आदमी ने नीचे देखा तो बच्चे के पैर अस्वाभाविक रूप से लंबे होने लगे। घबराकर उसने बच्चे को छोड़ दिया और वह मिट्टी पर जा गिरा।
बच्चे ने धीरे-धीरे चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखें गहरी और होंठों पर डरावनी मुस्कान थी। फिर उसके मुँह से किसी बूढ़े आदमी जैसी भारी आवाज निकली।
उसने कहा, “अगर मेरे पैर जमीन पर पड़ जाते, तो तुम कभी यहाँ से जिंदा नहीं जा पाते।” अगले ही पल बच्चा गायब हो गया।
वह आदमी किसी तरह घर पहुँचा और कई दिनों तक तेज बुखार में पड़ा रहा। ठीक होने पर उसने गाँववालों को घटना बताई, लेकिन किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।
रामेसर काका का पेड़ और अनिता
किशन ने बताया कि वह पेड़ रामेसर काका के खेत में था। तीन साल पहले रामेसर काका ने उसी पेड़ पर फाँसी लगाकर जान दे दी थी।
उस घटना के बाद गाँववाले रात में उस रास्ते से गुजरने से बचने लगे। लेकिन कुछ दिन पहले अनिता नाम की लड़की अजीब व्यवहार करने लगी थी।
अनिता दिन में सामान्य रहती, मगर रात होते ही उसकी नजर बार-बार गाँव के बाहर वाले रास्ते पर टिक जाती। कई बार वह घर से निकलकर उसी पेड़ तक पहुँच जाती।
एक रात उसकी माँ ने उसे झूले पर बैठे देखा। अनिता खाली हवा में किसी से बातें कर रही थी, जबकि उसके सामने कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
माँ उसे खींचकर घर ले आई। अनिता चुपचाप बिस्तर पर बैठी रही। काफी देर बाद उसने कहा, “वह बच्चा फिर बुलाएगा। उसे मेरे बिना झूलना अच्छा नहीं लगता।”
उसकी माँ डर गई। अगले कुछ दिनों में अनिता की हालत बिगड़ने लगी। वह खाना छोड़ने लगी और रात में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगती थी।
पेड़ के नीचे जलता दीया
उस रात रवि घर लौट रहा था। किशन की कहानी उसके दिमाग में घूम रही थी। पेड़ के पास पहुँचते ही उसकी नजर नीचे जलते एक दीये पर पड़ी।
दीये के चारों ओर मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे। वे खेत की तरफ से शुरू होकर सीधे झूले तक जा रहे थे, लेकिन लौटने के निशान नहीं थे।
रवि ने पेड़ की ओर देखा। झूला अपने आप हिल रहा था। उसकी ऊपरी डालियों पर कई कौवे बैठे थे, जो आधी रात के सन्नाटे में लगातार आवाज कर रहे थे।
तभी झूले पर एक बच्चा दिखाई दिया। उसका चेहरा नीचे झुका था और लंबे पैर जमीन से काफी ऊपर लटक रहे थे। रवि की साँस अटक गई।
बच्चे ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसका चेहरा पीला था और आँखें अँधेरे जैसी गहरी थीं। उसके होंठों पर वही भयानक मुस्कान थी, जिसका जिक्र किशन ने किया था।
रवि की नजर फिर पैरों के निशानों पर गई। वे झूले तक तो पहुँचते थे, लेकिन वहाँ से वापस लौटने का एक भी निशान नहीं था।
अचानक बच्चे ने रवि की ओर हाथ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ अस्वाभाविक रूप से लंबी थीं। रवि पीछे मुड़ा और बिना रुके घर की ओर भाग गया।
रवि और किशन ने अनिता को बचाया
अगली सुबह रवि ने किशन को अपनी आँखों से देखी घटना बताई। दोनों तुरंत अनिता के घर पहुँचे। वहाँ उसकी माँ रोते हुए उसके पास बैठी थी।
अनिता खिड़की की तरफ देख रही थी। रवि को देखते ही बोली, “तुमने भी उसे देख लिया। अब वह तुम्हें भी अपने पास बुलाएगा।”
किशन ने पूछा कि वह बच्चा उससे क्या चाहता है। अनिता ने काँपती आवाज में बताया कि बच्चा उसे बार-बार झूले पर बैठने को कहता था।
उसने बताया कि हर बार झूले पर बैठते ही उसे लगता, जैसे उसके पैर उसके शरीर के नहीं रहे। बच्चा उसे कहता कि एक दिन उसके पैर भी जमीन तक पहुँच जाएँगे।
यह सुनकर रवि को उस आदमी की कहानी याद आई। उसे समझ आ गया कि बच्चे का जमीन छूना किसी अनजान खतरे का संकेत था।
दोनों ने गाँव के बुजुर्गों से मदद माँगी। एक बुजुर्ग ने सलाह दी कि अनिता को अकेला न छोड़ा जाए और उसे उस पेड़ के पास बिल्कुल न जाने दिया जाए।
उस रात अनिता फिर घर से निकलने लगी। उसकी माँ और किशन ने उसे रोक लिया। वह रोती रही और कहती रही कि झूले पर बैठा बच्चा उसे बुला रहा है।
रवि ने उसके पास बैठकर उससे बात की। उसने कहा कि वह बच्चा उसे डराकर अपने पास बुलाता है, लेकिन उसे उसके पास वापस जाने की जरूरत नहीं है।
परिवार ने कई दिनों तक अनिता का ध्यान रखा। रात में उसके कमरे का दरवाजा खुला नहीं छोड़ा और उसे अकेले नहीं रहने दिया। धीरे-धीरे उसकी नींद और हालत सुधरने लगी।
कुछ दिनों बाद अनिता ने पहली बार चैन से रात बिताई। फिर उसने झूले पर जाने की इच्छा जताना बंद कर दिया। वह सामान्य जीवन में लौट आई, लेकिन उस पेड़ का नाम सुनकर आज भी काँप उठती थी।
झूले का डर गाँव में फैल गया
गाँववालों को लगा कि अब मुसीबत टल गई है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद पेड़ के नीचे फिर एक जलता हुआ दीया दिखाई दिया। उसके पास ताजा पैरों के निशान भी थे।
एक चरवाहे ने दावा किया कि उसने आधी रात को झूले पर उसी बच्चे को बैठे देखा था। इस बार उसके लंबे पैर जमीन के बेहद करीब थे।
अगली सुबह पेड़ के आसपास की मिट्टी पर गहरे निशान मिले। किसी को समझ नहीं आया कि वे किसके थे। गाँववालों ने बच्चों को उस तरफ जाने से रोक दिया।
धीरे-धीरे लोग रात में अपने दरवाजे बंद रखने लगे। कुछ परिवारों ने गाँव छोड़ने का फैसला किया, क्योंकि वे अपने बच्चों को उस पेड़ के आसपास सुरक्षित नहीं समझते थे।
कुछ परिवार अपना सामान समेटकर गाँव से दो-तीन किलोमीटर दूर नई बस्ती में रहने चले गए। फिर दूसरे परिवार भी जाने लगे। पुराने गाँव के घर एक-एक करके खाली होने लगे।
कुछ महीनों में अधिकतर परिवार वहाँ से जा चुके थे। जहाँ कभी बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं, वहाँ अब खाली आँगन और बंद दरवाजे रह गए थे।
झूले का रहस्य आज भी बाकी है
एक दिन रवि आखिरी बार पुराने गाँव को देखने पहुँचा। वह दूर खड़ा होकर उस पेड़ को देख रहा था, जहाँ से सारी घटनाएँ शुरू हुई थीं।
झूले पर कोई बैठा हुआ था। दूरी के कारण उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। पेड़ के नीचे वही दीया जल रहा था और कौवे डालियों पर बैठे थे।
रवि ने आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं की। तभी झूले पर बैठे बच्चे ने अपना सिर उठाया। उसकी नजर सीधे रवि पर टिक गई।
रवि वहाँ से लौटने लगा। पीछे मुड़कर देखा तो झूला अब भी हिल रहा था, जबकि आसपास हवा तक नहीं चल रही थी।
अनिता ठीक हो चुकी थी, लेकिन उस पेड़ का डर कभी उसके मन से पूरी तरह नहीं निकला। रवि ने भी दोबारा वहाँ जाने की हिम्मत नहीं की।
पुराना गाँव धीरे-धीरे उजड़ गया, मगर पेड़ और झूला वहीं रह गए। आज भी लोग कहते हैं कि आधी रात को उस झूले पर एक बच्चा दिखाई देता है।
कोई नहीं जानता कि वह बच्चा कौन था और उसे जमीन छूने से इतना डर क्यों लगता था। लेकिन गाँववालों के लिए उस झूले का भय कभी खत्म नहीं हुआ।





