चतुर पंडित और खतरनाक जिन्न – Horror Story In Hindi ।
⇒ रामनगर में चरणदास नाम का एक पंडित अपनी पत्नी पंडिताइन के साथ रहता था । पंडित चरणदास समझदार तो बहुत था । लेकिन बहुत गरीबी के कारण , पत्नी के सामने उसकी एक भी ना चलती थीं । चरणदास ज्यादा नहीं कमा पाता था । इसलिए दोनों में घर खर्च की वजह से हमेशा झगड़ा होता रहता था ।
⇒ एक दिन पंडित चरणदास की पत्नी नें कहा —सुनो जी ! कान खोलकर सउन लीजिए । अगर आज कुछ कमा धमा कर नहीं लाए तो , खाने को हवा और पीने को पनि ही मिलेगा । जानता हु भाग्यवान ! सुन लिया , अच्छा अब मैं चलता हूँ । यह कहकर पंडित चरणदास किसी यजमान कइ तलाश में चल पड़ा ।
⇒ तभी एक व्यक्ति नें आवाज देकर कहा — पंडित जी जरा रुकिए ! आज मेरे पिताजी की 13वी हैं । क्या आप मेरे घर चलकर भोजन करने कइ कृपा करेंगे ? यह सुनकर पंडित जी के चेहरे पर भारी मुस्कान आ गई । और पंडित जी बोले — क्यों नहीं भाई यह तो हमारा खानदानी काम हैं । लेकिन खाना खिलाने के बाद दान – दक्षिणा तो आप देंगे ना ? क्योंकि दक्षिणा दिए बगैर तुम्हारा पुण्य अधूरा रह जाएगा । चलिए पंडित जी , आप कहते हैं तो दक्षिणा भी दे दूँगा ।
⇒ लेकिन अब आप जल्दी से घर चलने कइ कृपा कीजिए । क्योंकि सब लोग हमारा इंतजार कर रहे हैं । एक ब्राह्मण कइ ओर कमी थीं । सो आप मिल गए । फिर पंडित चरणदास उस व्यक्ति के साथ चल पड़ा । और मन ही मन सोचने लगा । वाह — लगता हैं आज दिन तो बहुत शुभ हैं ।
⇒ आज लगता हैं मुझे भी पेट भर खाना मिलेगा । और पत्नी के लिए भी थोड़ी सामग्री बाँध कर ले जाऊँगा । और साथ ही दक्षिणा भी मिलेगी । उस व्यक्ति के घर पहुँचकर पंडित चरणदास नें अन्य पंडितों के साथ मिलकर प्रेम पूर्वक भोजन किया । भोजन के बाद पंडित बोला — भाई भोजन तो मैंने कर लिया ! अब जरा घर के लिए दान और अन्न , वस्त्र , फल और दक्षिणा दे दीजिए । आपकी इच्छा अनुसार दे दीजिए । जो भी आपका दिल करें ।
⇒ व्यक्ति बोला ! क्षमा कीजिए पंडित जी , मैं वास्तव में बहुत शर्मिंदा हूँ । दरअसल बात यह हैं कि — पिताजी के श्राद्ध की व्यवस्था करने के लिए मैंने अपना मकान बर्तन , भांडे , कपड़े , लत्ते सब कुछ बेच दिया । तब जाकर कहीं मुश्किल से यह सारा काम हो पाया हैं । और कल ही मुझे खरीदार को इस मकान के साथ – साथ सारा बेचा हुआ समान भी सौंपना हैं ।
⇒ इसलिए अफसोस हैं कि दान में , मैं आपको कुछ भी नहीं दे सकूँगा । लेकिन दक्षिणा के रूप में आप यह शीशा स्वीकार करें । और हाँ पंडित जी यह कोई मामूली शीशा नहीं । यह हमारा खानदानी शीशा हैं । मेरे दादा व परदादा रोज सुबह उठकर इसी में अपना मुहँ देखा करतें थें । और मेरे पिता नें भी मरते समय मुझसे कहा था । कि बेटा इस शीशे को संभाल के रखना यह बहुत ही कीमती शीशा हैं । इसलिए मैंने घर का तिनका – तिनका बेच दिया लेकिन इसे नहीं बेचा ।
⇒ परंतु क्या करू ? मैंने आपको दक्षिणा देने का वादा किया था । इसलिए इस शीशे को मैं आपको दे रहा हूँ । पंडित चरणदास सोच में पड़ गया । और आखिर में उसने सोचा , कि पंडिताइन जब इस आईने में अपना सुंदर मुखड़ा देखेगी । तो खुशी से झूम उठेगी ।
⇒ और वैसे भी इस शीशे के सिवा देने को इस व्यक्ति के पास और कुछ भी नहीं । यह सोचकर बेचारे पंडित नें मन मसूस कर वो शीशा अपने साथ ले गया । और घर लौटते हुए सोचने लगा । कि मैं घर जाकर पत्नी को क्या जवाब दूँगा । जब चरणदास घर पहुँचा तो उसकि पत्नी नें पूछा । आज क्या कमाकर लाए हों ? पंडित चरणदास बोला — कि मैं कमा धमा कर तो कुछ नहीं लाया । हाँ तुम्हारा सुंदर मुहँ देखने के लिए एक शीशा जरूर लाया हूँ । लो इसे संभाल कर रख लों ।
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⇒ क्योंकि यह बड़ा ही कीमती शीशा हैं । ए जी मैं पूछती हूँ , यह शीशा तुम किस कूड़ेदान से उठा लाए हों । यह तो बहुत ही पुराने जमाने का शीशा हैं । अरें भाग्यवान ! यह मुझे एक यजमान नें दक्षिणा में दिया हैं । फिर पंडित चरणदास नें अपनी पत्नी को उस व्यक्ति की सारी बात बताई ।
⇒ सारी बात सुनकर पत्नी का गुस्सा सांतवे आसमान पर चढ़ गया । और उसने शीशे को जमीन पर पटकते हुए गुस्से में कहा — यदि उस व्यक्ति नें आपको मूर्ख बनाया था । तो इस शीशे को आपने उसके ही सिर पर देकर क्यों नहीं मारा ? इसे मेरे सिर पर मारने के लिए क्यों ले आए ? सत्यानाश हों उस कलमूहे का ।
⇒ लेकिन अचानक शीशे के चकनाचूर होते ही उसमें से धुआँ निकलने लगा । और एक लंबा – चौड़ा जिन्न उनके सामने प्रकट हो गया । उस जिन्न को देखकर पंडित और पंडिताइन दोनों ही बहुत बुरी तरह से घबरा गए । और चिल्लाने लगे — अरे बाप रें ! भूत – भूत – भूत भागों यहाँ से वरना यह हमें मार डालेगा ।
⇒ फिर वह जिन्न बोला — अरे ठहरों ! मेरे महरबानों तुम दोनों मुझसे भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहें हों ? मुझसे डरने की कोई जरूरत नहीं हैं । मैं तुम्हें नुकसान पहुँचाने नहीं आया हूँ । बल्कि मैं तो तुम दोनों का एहसानमंद हूँ । जिसने मुझे शीशे की कैद से आजाद कराया । जिन्न कइ बात सुनकर पंडित बोला — तो तुम कौन हों भाई ? और शीशे के टूटते ही हमारे घर में धुआँ बनकर कहाँ से आए हों ? जिन्न बोला — मैं एक जिन्न हूँ मुझे एक दुष्ट जादूगर नें सताने के लिए इस शीशे में कैद कर दिया था ।
⇒ लेकिन आज तुमने इस शीशे को तोड़कर मुझे आजाद कर दिया हैं । मैं तुम लोगों का यह उपकार कभी नहीं भूल पाऊँगा । मेरे लायक कोई सेवा हो तो आप जरूर बताइए । सेवा की बात सुनकर पंडित चरणदास की पत्नी खुश हो गई । और दोनों के ही चेहरे प्रसन्नता से खिल उठें ।
⇒ तभी पंडित बोला — जिन्न भाई ! हमारे घर में राशन बिल्कुल भी नहीं हैं । कई – कई दिन तो हमें भोजन भी नसीब नही होता । क्या तुम हमारे लिए राशन , पानी दाल , सब्जी का प्रबंध कफ़र सकते हों ? जिन्न बोला — क्यों नही ! बिल्कुल कर सकता हूँ । मैं तो हर काम कर सकता हूँ ।
⇒ ठहरो — मैं तुम्हें अभी अपना चमत्कार दिखाता हूँ । फिर जिन्न नें कहा — अनाज – घी – शक्कर – मिर्च – सब्जी – फल – कपड़े – बर्तन – भांडे सब आजा । और पलक झपकते ही पंडित का घर हर प्रकार की वस्तुओ से भर गया । यह देखकर पंडित और पंडिताइन हैरान रह गए ।
⇒ तभी पंडित बोला — जिन्न भाई मेरी पत्नी को भूख लगी हैं । क्या तुम तुरंत दाल रोटी का प्रबंध कर सकतें हों । जिन्न बोला — दाल रोटी क्यों ? मैं तुम दोनों मेहरबानों के लिए दुनियाँ भर के स्वादिष्ट से स्वादिष्ट के समान प्रस्तुत करता हूँ । जरा रुको । फिर जिन्न नें कुछ कहा , और तुरंत ही अलग – अलग प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन उनके सामने प्रस्तुत हो गए ।
⇒ जिन्न बोला — अब तुम दोनों आराम से भोजन करों । तब तक मैं बाहर बैठता हूँ । यदि किसी चीज की ओर जरूरत हो । तो मुझे आवाज लगा देना । वरना मैं तुम्हरा भोजन करने के बाद अपनें देश चला जाऊँगा । तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद ।
⇒ जिन्न यह कहकर बाहर चला गया । और पंडित और पंडिताइन मजे से भोजन करने लगे । पंडिताइन बोली — वाह ! क्या स्वादिष्ट भोजन हैं । मजा ही आ गया । मैंने तो शायद पहले कभी ऐसा स्वादिष्ट भोजन कभी नहीं किया होगा ।
⇒ भाग्यवान ! मुझे तो यह जिन्न बड़े ही कमका लगता हैं । देखा नहीं । उसके कहते ही सब समान और खाना हमारे सामने आ गया । हमे इसे किसी भी कीमत पर जाने से रोकना होगा । हाँ स्वामी हमें ऐसा ही करना चाहिए ।
⇒ तभी खाना खाने के बाद पंडित चरणदास नें जिन्न को आवाज लगाकर कहा — जिन्न भाई – जिन्न भाई कहाँ हों तुम ? हमने भोजन कर लिया हैं । अगले ही पल जिन्न उनके सामने प्रकट हुआ । और बोला कहों — मेहरबानों भोजन कैसा लगा ? बहुत अच्छा जिन्न भाई , ऐसा स्वादिष्ट भोजन तों हमने जीवन में पहली बार खाया हैं ।
⇒ जिन्न बोला मेहरबानों — मेरे लिए और कोई सेवा हों तो कहों वरना मैं चलता हूँ । सेवा तो और कोई नहीं हैं । जिन्न भाई लेकिन एक प्राथना हैं । यदि तुम हमारे पास रुक जाओ तो हम तुम्हारा एहसान जीवन भर नहीं भूलेंगे । जिन्न बोला — मेहरबानों यह काम बड़ा मुश्किल हैं । रुकने के लिए , मैं क्षमा चाहता हूँ ।
⇒ कोई ओर सेवा हो तो बताओ । जिन्न भाई अभी तो तुम कह रहें थें कि तुम्हारे लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं । फिर हमारे पास ठहरने में तुम्हें क्या मुश्किल हैं ? महरबानों मुझे तो कोई मुश्किल नहीं हैं । लेकिन मेरे रहने से तुम्हें जरूर मुश्किल हो जाएगी ।
⇒ क्योंकि मैं जहाँ रहता हूँ । वहाँ एक शर्त पर रहता हूँ । और मैं इसी शर्त पर तुम्हारे पास रह सकता हूँ । कि तुम मुझे एक काम निपटाने के बाद तुरंत दूसरा काम दे दोगे । क्योंकि मैं एक क्षण भी खाली नहीं बैठ सकता । मैं हर समय काम में लगा रहना चाहता हूँ । पंडित बोला अरे भाई यह कौनसी मुश्किल बात हैं ? हमारे पास तो इतना काम हैं कि तुम जीवन भर भी नहीं निपटा सकोगे । पंडित चरणदास बोला — हमें तुम्हारी यह छोटी सी शर्त मंजूर हैं ।
⇒ जिन्न बोला — एक बार फिर सोच लो मेहरबानों ! यदि तुम्हारे पास रहते हुए मैं एक क्षण के लिए भी खाली रहा तो मेरा दिमाग खराब हो जाएगा । और मैं तुम दोनों को ही साबूत – साबूत निगल जाऊँगा । यदि मैं तुम्हरा कोई काम नही कर सका तो फिर यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर रहेगा कि तुम मुझे रखो या निकाल दो।
⇒ इसलिए अच्छी तरह से सोच लो। वे दोनों बोले हमने अच्छी तरह से सोच लिया है। जिन्न भाई ना तुम खाली रहोगे और ना ही ऐसी नौबत आएगी । बस तुम हमारे पास रह जाओ ।
क्या जिन्न को अपने घर में रखना पड़ेगा भारी या जिन्न करेगा ।
उनकी सारी इच्छा पूरी …… आगे की कहानी पार्ट 2 में पढ़ने को मिलेगी दोस्तों ….. जिसका लिंक मैं यहाँ भी लगा दूँगा
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