जब अपनी सच्ची मोहब्बत किसी और की होने लगे, तो कैसा लगता है?
जब अपना सबसे प्यारा इंसान किसी और का बनने लगे, तब दिल हर पल चुपचाप टूटता,रोता और तड़पता रहता है।
प्यार में वादा करना आसान होता है, लेकिन उसे आख़िरी साँस तक निभाना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
यह अनुराग और अदिति की दर्द भरी प्रेम कहानी है, जहाँ एक झूठे वादे ने दो सच्चे दिल हमेशा के लिए अलग कर दिए।
अगर आपने कभी किसी से सच्ची मोहब्बत की है, तो यह कहानी आपकी आँखें नम कर देगी और दिल को गहराई तक छू जाएगी।
वह वादा जिसने दो जिंदगियाँ बदल दी। Sad Love Story In Hindi
इंदौर शहर की सुबह हमेशा की तरह भागदौड़ से भरी हुई थी। हर कोई अपने सपनों को पूरा करने की उम्मीद लेकर घर से निकला था।
उसी भीड़ में दो अनजान चेहरे भी अपने भविष्य की तलाश में एक ही कंपनी की ओर बढ़ रहे थे।
उन दोनों को बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि आज का दिन उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कहानी की शुरुआत बनने वाला है।
लड़के का नाम अनुराग था। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह कई महीनों से नौकरी की तलाश कर रहा था।
वह पढ़ाई में होशियार, व्यवहार में शांत और अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था।
उसके पिता शिवकुमार एक छोटी किराने की दुकान चलाते थे। माँ शांति हमेशा यही चाहती थीं कि उनका बेटा मेहनत करके अपनी अलग पहचान बनाए और सम्मान की ज़िंदगी जिए।
उधर दूसरी तरफ़ अदिति अपने छोटे से घर से निकल रही थी। उसके पिता गोपाल गाँव में खेती और दिहाड़ी करके किसी तरह परिवार चलाते थे। माँ सरोज घरों में सिलाई करके परिवार का हाथ बँटाती थीं।
अदिति बेहद सुंदर थी, लेकिन उसे अपनी सुंदरता पर कभी घमंड नहीं था।
उसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी मेहनत, सादगी और स्वाभिमान था। वह हमेशा कहती थी, “इंसान की असली खूबसूरती उसके व्यवहार में होती है।”
सुबह का समय था। अदिति ने अपनी पुरानी फ़ाइल को सीने से लगाया, माँ के चरण छुए और मुस्कुराते हुए बोली, “माँ, इस बार मुझे पूरा विश्वास है कि नौकरी मिल जाएगी।”
सरोज ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “बेटी, नौकरी मिले या न मिले, लेकिन अपना आत्मविश्वास कभी मत हारना। मेहनत करने वालों को भगवान कभी खाली हाथ नहीं लौटाते।”
अदिति मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे घर की गरीबी का दर्द साफ़ दिखाई देता था।
वह चाहती थी कि सबसे पहले अपने माता-पिता की सारी परेशानियाँ खत्म कर दे।
करीब एक घंटे बाद वह इंटरव्यू देने कंपनी पहुँच गई। वहीं दूसरी तरफ़ अनुराग भी अपने सभी दस्तावेज़ लेकर कंपनी के बाहर खड़ा था।
दोनों की नज़र पहली बार रिसेप्शन के बाहर मिली। बस एक पल के लिए दोनों ने एक-दूसरे को देखा और फिर अपनी-अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
कुछ देर बाद एचआर अधिकारी रिया मेहरा ने सभी उम्मीदवारों को इंटरव्यू हॉल में बुला लिया। एक-एक करके सभी उम्मीदवार अंदर जाते रहे।
अनुराग का इंटरव्यू अच्छा गया, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि इस बार भी शायद किस्मत उसका साथ नहीं देगी। उधर अदिति ने भी पूरे आत्मविश्वास से हर सवाल का जवाब दिया।
दो अनजान लोगों की हुई मुलाकात
दुर्भाग्य से अनुराग का भी चयन नहीं हुआ और अदिति का भी नाम सूची में नहीं था।
दोनों के चेहरे पर मायूसी साफ़ दिखाई दे रही थी। महीनों की मेहनत एक बार फिर अधूरी रह गई थी।
अनुराग धीरे-धीरे कंपनी से बाहर निकला। सामने सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। उसने सोचा, “चलो… एक कप चाय पीकर घर चलता हूँ।”
वह चाय की दुकान की ओर बढ़ ही रहा था कि उसकी नज़र अदिति पर पड़ी। वह भी उसी दुकान के बाहर खड़ी थी और शायद जेब में पैसे गिन रही थी।
अनुराग ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “अगर आपको बुरा न लगे… तो क्या हम एक-एक कप चाय साथ पी सकते हैं? आज का दिन वैसे भी हम दोनों के लिए एक जैसा रहा।”
अदिति कुछ पल चुप रही। फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, “दोस्ती की शुरुआत चाय से हो… इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?”
दोनों लकड़ी की पुरानी बेंच पर बैठ गए। चाय वाले ने दो कुल्हड़ों में गर्म चाय लाकर उनके सामने रख दी।
पहली बार दोनों बिना किसी झिझक के एक-दूसरे से बात करने लगे। उन्हें बिल्कुल भी एहसास नहीं था कि यही छोटी-सी मुलाकात आगे चलकर उनकी पूरी ज़िंदगी बदल देगी…

चाय की प्याली से शुरू हुआ रिश्ता मजबूत
अनुराग ने मुस्कुराते हुए चाय का कुल्हड़ उठाया और बोला, “वैसे… मेरा नाम अनुराग है। शायद आज किस्मत ने नौकरी तो नहीं दी, लेकिन एक अच्छी पहचान ज़रूर दे दी।”
अदिति हल्का-सा मुस्कुराई। उसने भी अपना कुल्हड़ उठाया और बोली, “मैं अदिति हूँ।
नौकरी नहीं मिली, लेकिन हिम्मत अभी भी बाकी है। शायद भगवान ने हमारे लिए कुछ बेहतर सोच रखा होगा।”
दोनों धीरे-धीरे चाय पीते रहे। उनके बीच अब पहले जैसी झिझक नहीं रही थी। बातचीत इतनी सहज थी कि जैसे वे कई वर्षों से एक-दूसरे को जानते हों।
अनुराग ने पूछा, “अगर बुरा न मानो, तो क्या मैं तुम्हारे परिवार के बारे में जान सकता हूँ?” अदिति कुछ पल चुप रही। उसकी आँखें अचानक नम हो गईं।
उसने धीमी आवाज़ में कहा, “मेरे पापा गोपाल गाँव में खेती और दिहाड़ी करते हैं।
माँ सरोज घरों में सिलाई करती हैं। हमारे घर की हालत अच्छी नहीं है, लेकिन मेरे माता-पिता ने कभी मुझे पढ़ाई से समझौता नहीं करने दिया।”
अनुराग ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि सामने बैठी यह लड़की सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं, बल्कि संघर्षों से लड़ना भी जानती है।
अनुराग मुस्कुराकर बोला, “तुम्हारे माता-पिता सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं। इतनी समझदार और मेहनती बेटी हर किसी को नहीं मिलती।”
यह सुनते ही अदिति की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई। शायद बहुत समय बाद किसी ने उसकी मेहनत की दिल से तारीफ़ की थी।
अब अदिति ने भी मुस्कुराकर पूछा, “और तुम्हारा परिवार?” अनुराग ने बिना किसी झिझक के अपने माता-पिता, छोटी-सी दुकान और अपने सपनों के बारे में सब कुछ बता दिया।
दोनों बातचीत में इतने खो गए कि समय का बिल्कुल भी एहसास नहीं रहा। चाय कब खत्म हुई और दुकान पर भीड़ कब बढ़ गई, उन्हें पता ही नहीं चला।
चाय वाले ने मुस्कुराकर कहा, “लगता है आप दोनों पुराने दोस्त हैं। इतनी देर से बातें कर रहे हैं कि दूसरी बार चाय बनानी पड़ेगी।”
दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देखकर हँस पड़े। वह उनकी पहली खुलकर आई हँसी थी, जिसने दोनों के दिल का बोझ कुछ हल्का कर दिया।
अनुराग और अदिति की हुई पक्की दोस्ती की शुरुआत
चाय की दुकान से निकलते समय अनुराग ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “अगर तुम्हें ठीक लगे, तो क्या हम दोस्त बन सकते हैं? शायद नौकरी की तैयारी भी साथ कर लेंगे।”
अदिति कुछ पल सोचती रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “दोस्ती दिल से निभानी आती हो, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।”
अनुराग ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और बोला, “तो फिर आज से हमारी दोस्ती पक्की।
अपना नंबर दे दो, ताकि कभी पढ़ाई या नौकरी की जानकारी मिले तो एक-दूसरे को बता सकें।”
अदिति ने अपना नंबर लिख दिया। अनुराग ने भी अपना नंबर उसके मोबाइल में सेव कर दिया। दोनों के चेहरों पर एक अनजानी खुशी दिखाई दे रही थी।
शाम ढलने लगी थी। सड़क पर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। दोनों बस स्टॉप तक साथ-साथ पैदल चलने लगे। रास्ते में भी उनकी बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
बस आने से पहले अनुराग बोला, “मुझे पूरा विश्वास है, हमारी अगली मुलाकात सिर्फ़ नौकरी की वजह से नहीं होगी।”
अदिति मुस्कुराकर बोली, “कभी-कभी भगवान बिना बताए ऐसे रिश्ते बना देता है, जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती।”
बस आ चुकी थी। अदिति बस में बैठ गई। खिड़की से उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। अनुराग अब भी वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था।
अदिति ने भी मुस्कुराकर हाथ हिलाया। शायद दोनों के दिलों में एक नई उम्मीद जन्म ले चुकी थी।
उन्हें अभी यह बिल्कुल भी नहीं पता था कि यही छोटी-सी दोस्ती एक दिन इतनी गहरी मोहब्बत में बदल जाएगी, जिसके लिए उन्हें पूरी दुनिया से लड़ना पड़ेगा…
दोनों की दोस्ती ने लिया गहरी मोहब्बत का रूप
बस के जाने के बाद भी अनुराग कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। उसकी नज़रें उस बस को तब तक देखती रहीं, जब तक वह उसकी आँखों से पूरी तरह ओझल नहीं हो गई।
उस दिन के बाद दोनों की बातचीत लगभग हर रोज़ होने लगी। कभी नौकरी की जानकारी साझा होती, तो कभी घंटों तक सपनों, परिवार और आने वाले कल की बातें चलती रहती थीं।
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बनते जा रहे थे। सुबह का पहला संदेश और रात की आख़िरी शुभरात्रि अब दोनों के दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन चुकी थी।
कई बार दोनों अलग-अलग कंपनियों में इंटरव्यू देने साथ जाते, लेकिन किस्मत हर बार उनसे थोड़ी और परीक्षा ले लेती। नौकरी अब भी दोनों से दूर थी।
एक दिन अनुराग ने फ़ोन पर मुस्कुराते हुए कहा, “अदिति, आज इंटरव्यू के बाद कहीं चलोगी? एक ऐसी जगह दिखाऊँगा, जहाँ पहुँचकर शहर का हर शोर पीछे छूट जाता है।”
अदिति कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “अगर जगह सुरक्षित है, तो मुझे कोई परेशानी नहीं। वैसे भी आज घर जाने की जल्दी नहीं है।”
अनुराग खुशी से बोला, “तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो। मैं तुम्हें ऐसी जगह ले जाऊँगा, जहाँ सिर्फ़ सुकून मिलेगा।”
इंटरव्यू खत्म होने के बाद दोनों कंपनी के बाहर मिले। अनुराग ने अपनी बाइक स्टार्ट की और मुस्कुराकर बोला, “चलो, आज तुम्हें अपने सबसे पसंदीदा ठिकाने से मिलवाता हूँ।”
अदिति ने हल्की मुस्कान के साथ हेलमेट पहना और बाइक पर बैठ गई। हवा के हल्के झोंके उसके चेहरे को छू रहे थे, जबकि अनुराग के चेहरे पर अनजानी खुशी साफ़ दिखाई दे रही थी।
करीब बीस मिनट बाद शहर की भीड़ पीछे छूट चुकी थी। अब सड़क के दोनों ओर हरियाली थी। दूर-दूर तक खेत फैले हुए थे और ठंडी हवा मन को सुकून दे रही थी।
कुछ देर बाद अनुराग ने बाइक एक कच्चे रास्ते पर मोड़ दी। सामने एक पुराना बगीचा दिखाई दे रहा था, जिसके बीचों-बीच विशाल बरगद का पेड़ अपनी घनी शाखाएँ फैलाए खड़ा था।
बरगद के पास पहुँचते ही अदिति की आँखें चमक उठीं। सामने ऊँचे पहाड़ दिखाई दे रहे थे। नीचे गहरी घाटी थी, जहाँ से ठंडी हवा लगातार ऊपर आ रही थी।
पेड़ों पर बैठे पक्षियों की मीठी आवाज़ पूरे वातावरण को और भी खूबसूरत बना रही थी। ऐसा लग रहा था, मानो प्रकृति ने इस जगह को सिर्फ़ प्रेम करने वालों के लिए सजाया हो।
अदिति मुस्कुराकर बोली, “अनुराग… मैंने इतनी शांत और खूबसूरत जगह पहले कभी नहीं देखी। सच कहूँ, मेरा मन कर रहा है कि यहीं घंटों बैठी रहूँ।”
अनुराग हँसते हुए बोला, “जब भी मन परेशान होता है, मैं यहीं आ जाता हूँ। आज पहली बार किसी को अपने इस ठिकाने पर लेकर आया हूँ।”
यह सुनकर अदिति ने हैरानी से उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँखों में एक अलग ही चमक दिखाई दे रही थी।
दोनों बरगद के नीचे बैठ गए। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ हवा की सरसराहट और पक्षियों की आवाज़ उनके बीच चल रही खामोशी को और भी सुंदर बना रही थी।
अदिति ने पूछा अनुराग के दिल की बातें
अचानक अदिति ने धीरे से पूछा, “अनुराग… अगर तुम्हें एक दिन बहुत बड़ी नौकरी मिल जाए, तो सबसे पहले क्या करोगे?”
अनुराग मुस्कुराया और बोला, “सबसे पहले पापा की दुकान बड़ी करूँगा। फिर माँ को तीर्थ यात्रा पर भेजूँगा। उन्होंने पूरी ज़िंदगी हमारे लिए मेहनत की है।”
अदिति उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दी। फिर बोली, “मेरी पहली तनख़्वाह मिलेगी, तो मैं माँ के लिए नई सिलाई मशीन और पापा के लिए एक अच्छी मोटरसाइकिल खरीदूँगी।”
अनुराग ने उसकी तरफ़ देखा। उस पल उसे एहसास हुआ कि सामने बैठी लड़की सिर्फ़ सुंदर नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए जीने वाली इंसान है।
कुछ पल बाद अनुराग बोला, “अदिति… पता है, आजकल मैं हर छोटी-बड़ी बात तुम्हें बताना चाहता हूँ। अगर एक दिन तुमसे बात न हो, तो पूरा दिन अधूरा लगता है।”
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यह सुनते ही अदिति ने नज़रें झुका लीं। उसके गाल हल्के गुलाबी हो गए। उसने मुस्कुराकर कहा, “शायद… मुझे भी अब तुम्हारी आदत होने लगी है।”
दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए। उन्हें अभी भी एहसास नहीं था कि दोस्ती कब चुपचाप मोहब्बत की दहलीज़ तक पहुँच चुकी थी।
उसी समय अचानक तेज़ हवा चली। बरगद की सूखी पत्तियाँ उड़कर उनके चारों ओर बिखर गईं। दूर आसमान में काले बादल भी धीरे-धीरे घिरने लगे।
अनुराग ने ऊपर देखा और मुस्कुराकर कहा, “लगता है… आज बारिश भी हमारी दोस्ती की गवाह बनने वाली है।”
अदिति ने आसमान की ओर देखा। उसके होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन शायद किस्मत उन दोनों के लिए कुछ और ही लिख चुकी थी…

उस दिन पहली बारिश और हुआ पहला प्यार का इज़हार
बरगद की घनी शाखाएँ तेज़ हवा के साथ झूमने लगीं। कुछ ही पलों में आसमान पूरी तरह काले बादलों से भर गया। पहाड़ों के पीछे से उठती ठंडी हवा पूरे बगीचे में फैल गई।
अदिति ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा और बोली, “लगता है, आज बारिश ज़रूर होगी। मुझे बारिश बहुत पसंद है, लेकिन भीगना बिल्कुल नहीं।”
अनुराग हँस पड़ा। उसने मज़ाक करते हुए कहा, “आज अगर बारिश हुई, तो मैं तुम्हें भीगने नहीं दूँगा। यह मेरी ज़िम्मेदारी रहेगी।”
अदिति उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दी। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन तभी तेज़ बिजली चमकी और कुछ ही सेकंड बाद मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।
दोनों जल्दी-जल्दी उठकर बरगद के मोटे तने के पास आकर खड़े हो गए। पेड़ बड़ा था, लेकिन बारिश इतनी तेज़ थी कि हवा के साथ आती बूँदें उन्हें लगातार भिगो रही थीं।
अदिति अपने बालों से पानी झटकते हुए बोली, “लगता है, तुम्हारी ज़िम्मेदारी पहली ही बारिश में पूरी नहीं हो पाई।”
अनुराग हँसते हुए बोला, “बारिश को कौन रोक सकता है? लेकिन कोशिश पूरी कर रहा हूँ।”
दोनों हँस पड़े। उस हँसी में अपनापन था, सुकून था और एक अनकहा रिश्ता भी था।
कुछ देर बाद बारिश हल्की होने लगी। सामने पहाड़ों पर बादल उतर आए थे। पूरी घाटी धुंध से ढक गई थी। वह दृश्य इतना सुंदर था कि दोनों कुछ देर तक बिना बोले उसे देखते रहे।
अचानक अदिति धीरे से बोली, “काश… ज़िंदगी भी इस मौसम जैसी होती। थोड़ी देर बरसती और फिर हमेशा के लिए साफ़ हो जाती।”
अनुराग ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में पहली बार एक अलग ही चमक दिखाई दे रही थी।
अदिति ने कहा, सिर्फ दोस्ती या कुछ और
बारिश रुकने के बाद दोनों फिर उसी पुराने पत्थर पर बैठ गए। हवा अब पहले से भी ठंडी हो चुकी थी। बरगद की पत्तियों से टपकती बूँदें वातावरण को और भी शांत बना रही थीं।
अनुराग ने धीरे से कहा, “अदिति, क्या मैं तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ?”
अदिति मुस्कुराई और बोली, “आज तक तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं माना। पूछो।”
अनुराग कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “अगर एक दिन मुझे अच्छी नौकरी मिल जाए... और मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ… तब क्या तुम हमेशा मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनी रहोगी?”
अदिति उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “सिर्फ़ दोस्त…?”
अनुराग कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन दिल की धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं।
अदिति भी मुस्कुराने लगी। दोनों समझ चुके थे कि अब उनके बीच सिर्फ़ दोस्ती नहीं बची थी।
अनुराग ने काँपती आवाज़ में कहा, “अदिति… शायद मैं तुम्हें अपनी आदत से भी ज़्यादा पसंद करने लगा हूँ। जब तुम सामने नहीं होती, तो सब कुछ अधूरा लगता है।”
यह सुनते ही अदिति की आँखें झुक गईं। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। उसने धीरे से कहा, “मुझे लगा था… यह बात सिर्फ़ मेरे दिल में है।”
अनुराग हैरान होकर उसे देखने लगा।
अदिति बोली, “मैं भी हर सुबह सबसे पहले तुम्हारा संदेश पढ़ती हूँ। अगर एक दिन तुम्हारा फ़ोन न आए, तो पूरा दिन खाली-खाली लगता है। शायद… मुझे भी तुमसे प्यार हो गया है।”
यह सुनते ही अनुराग की आँखों में खुशी छलक उठी। उसने भगवान का धन्यवाद किया। उसे लगा, जैसे उसकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। उस पल किसी ने कोई बड़ा वादा नहीं किया। बस दोनों की मुस्कान ने सब कुछ कह दिया।
प्यार का एक सच्चा वादा, जो हमेशा के लिए था
शाम ढलने लगी थी। सूरज की आख़िरी किरणें पहाड़ों के पीछे छिप रही थीं। पूरा बगीचा सुनहरी रोशनी में नहा गया था।
अनुराग ने बरगद के तने पर हाथ रखते हुए कहा, “आज से यह जगह सिर्फ़ एक बगीचा नहीं रही। यह हमारी सबसे खूबसूरत याद बन गई है।”
अदिति मुस्कुराई और बोली, “जब भी ज़िंदगी थका देगी, हम यहीं आकर बैठेंगे। यहाँ आकर लगता है, जैसे सारी परेशानियाँ पीछे छूट जाती हैं।”
अनुराग ने कहा, “वादा है, चाहे ज़िंदगी कैसी भी हो जाए, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”
अदिति ने भी मुस्कुराकर अपना हाथ आगे बढ़ाया और बोली, “मैं भी वादा करती हूँ, जब तक साँस चलेगी, तुम्हारे भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगी।”
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। उन्हें क्या पता था कि किस्मत बहुत जल्द उनके इसी वादे की सबसे कठिन परीक्षा लेने वाली थी।
प्यार की खुशियों के बीच आया सबसे बड़ा तूफ़ान
बरगद के पेड़ के नीचे किया गया वह वादा दोनों के दिलों में बस चुका था। अब जब भी समय मिलता, अनुराग अपनी बाइक लेकर अदिति को उसी बगीचे में ले जाता।
कभी दोनों पहाड़ों को निहारते, तो कभी घाटी से आती ठंडी हवा के बीच अपने भविष्य के सुंदर सपने बुनते। उन्हें लगता था कि एक दिन उनकी हर इच्छा पूरी होगी।
कुछ ही दिनों में दोनों ने कई नई कंपनियों में आवेदन कर दिया। हर इंटरव्यू में वे एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते और हमेशा मुस्कुराकर कहते, “इस बार किस्मत ज़रूर हमारा साथ देगी।”
एक सुबह अनुराग को एक बड़ी कंपनी से इंटरव्यू का कॉल आया। उसी कंपनी ने अदिति को भी बुलाया था। दोनों खुशी-खुशी साथ इंटरव्यू देने पहुँचे।
इस बार किस्मत ने साथ दिया। दोनों का चयन हो गया। नियुक्ति पत्र हाथ में आते ही दोनों की आँखें खुशी से भर आईं।
अदिति ने सबसे पहले अपने माता-पिता को फ़ोन किया। सरोज की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। गोपाल बार-बार भगवान का धन्यवाद करने लगे।
उधर अनुराग के घर भी खुशी का माहौल था। शिवकुमार ने गर्व से बेटे को गले लगाया, जबकि शांति ने उसकी आरती उतारकर मिठाई खिलाई।
अब दोनों की नौकरी शुरू हो चुकी थी। हर दिन दफ़्तर साथ जाना, लौटते समय कुछ देर बरगद के पेड़ के नीचे बैठना और फिर अपने-अपने घर लौट जाना उनकी आदत बन गई।
समय के साथ उनका रिश्ता और भी मज़बूत होता गया। दोनों अब शादी के सपने देखने लगे थे। उन्हें विश्वास था कि उनके परिवार भी एक दिन उनकी खुशी को समझ लेंगे।
बड़े घर आए अनुराग के रिश्ते नें अदिति को रुला दिया
एक शाम अनुराग हमेशा की तरह बरगद के पेड़ के नीचे पहुँचा, लेकिन आज उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उसकी आँखें बुझी हुई थीं और आवाज़ भी काँप रही थी।
अदिति ने उसे देखते ही पूछा, “क्या बात है, अनुराग? आज तुम इतने परेशान क्यों हो? क्या घर पर सब ठीक है?”
अनुराग ने कुछ पल तक कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप सामने पहाड़ों की ओर देखता रहा। उसकी खामोशी अदिति के मन में अनजाना डर पैदा कर रही थी।
काफ़ी देर बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा, “अदिति… आज घर में मेरे लिए रिश्ता आया था।”
यह सुनते ही अदिति के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “फिर… तुमने क्या कहा?”
अनुराग ने गहरी साँस ली और बोला, “मैंने मना कर दिया था। मैंने पापा को हमारे बारे में सब बता दिया। मैंने कहा कि मैं सिर्फ़ तुमसे शादी करूँगा।”
अदिति की आँखों में उम्मीद लौट आई। उसने तुरंत पूछा, “फिर अंकल ने क्या कहा?”
अनुराग की आँखें भर आईं। उसने सिर झुकाकर कहा, “उन्होंने मेरी एक भी बात नहीं सुनी। उनका कहना है कि वह रिश्ता बहुत बड़े घर से आया है। अगर मैंने मना किया, तो उनका सम्मान मिट्टी में मिल जाएगा।”
अदिति कुछ पल तक बिल्कुल चुप रही। उसकी धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं।
अनुराग ने आगे कहा, “मैंने बहुत कोशिश की… सच कह रहा हूँ, बहुत कोशिश की। लेकिन घर में कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं है।”
अदिति ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, “कोशिश अभी खत्म नहीं हुई है, अनुराग। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो हमें आख़िरी साँस तक लड़ना चाहिए।”
अनुराग ने उसकी ओर देखा, लेकिन इस बार उसकी आँखों में पहले वाला आत्मविश्वास नहीं था।
वह धीमी आवाज़ में बोला, “मैं… थक गया हूँ, अदिति। रोज़ घर में झगड़ा हो रहा है। माँ रोती रहती हैं। पापा मुझसे बात तक नहीं कर रहे।”
अदिति का दिल बैठने लगा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि अनुराग की आवाज़ में हार छिपी हुई है।
तभी अनुराग ने काँपते हुए शब्दों में कहा, “मैंने… उनकी बात मान ली है।”
यह सुनते ही अदिति के हाथ अपने-आप पीछे हट गए। उसकी आँखें अनुराग के चेहरे पर टिक गईं, लेकिन उसके होंठों से एक भी शब्द नहीं निकला।
बरगद के पेड़ के नीचे अचानक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे हवा भी रुक गई हो।
अदिति की आँखों से धीरे-धीरे आँसू बहने लगे। उसने बस इतना कहा, “तो… हमारे सारे वादे इतने कमज़ोर थे, अनुराग?”
अनुराग सिर झुकाकर खड़ा रहा। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

आज तुम अपने प्यार से हार गए,अनुराग
बरगद के पेड़ के नीचे अचानक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे हवा भी रुक गई हो।
अदिति की आँखों से धीरे-धीरे आँसू बहने लगे। उसने बस इतना कहा, “तो… हमारे सारे वादे इतने कमज़ोर थे, अनुराग?”
अनुराग सिर झुकाकर खड़ा रहा। उसके पास कोई जवाब नहीं था। उसे लग रहा था कि वह अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा अपराध कर चुका है।
काफ़ी देर बाद उसने काँपती आवाज़ में कहा, “अदिति… मैं आज भी सिर्फ़ तुमसे प्यार करता हूँ। मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया। मैं बस अपने परिवार के सामने हार गया।”
अदिति दर्द भरी मुस्कान के साथ बोली, “हार तुम अपने परिवार से नहीं, अपने प्यार से गए हो, अनुराग। अगर प्यार के लिए हिम्मत नहीं थी, तो वादे भी नहीं करने चाहिए थे।”
यह सुनते ही अनुराग की आँखों से आँसू बह निकले। उसने पहली बार महसूस किया कि किसी का विश्वास टूटने की आवाज़ कानों से नहीं, दिल से सुनाई देती है।
वह अदिति के सामने हाथ जोड़कर बोला, “एक बार मुझे माफ़ कर दो। शायद सब ठीक हो जाए।”
अदिति ने सिर हिलाते हुए कहा, “कुछ चीज़ें टूटने के बाद कभी पहले जैसी नहीं होतीं। विश्वास भी उन्हीं में से एक है।”
इतना कहकर वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी और बरगद के पेड़ से दूर चली गई। अनुराग उसे जाते हुए देखता रहा, लेकिन उसके कदम जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।
उस दिन पहली बार बरगद का वह पेड़ दोनों को रोक नहीं पाया। शायद उसे भी समझ आ गया था कि कुछ बिछड़नें हमेशा के लिए होती हैं।
अनुराग की शादी का दिन और तड़पती अदिति
समय किसी का इंतज़ार नहीं करता। देखते ही देखते अनुराग की शादी का दिन भी आ गया।
पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। ढोल बज रहे थे। रिश्तेदार हँस रहे थे। हर कोई खुश था, लेकिन उस भीड़ में एक इंसान ऐसा भी था जिसकी मुस्कान पूरी तरह खो चुकी थी।
अनुराग दूल्हे के कपड़ों में आईने के सामने खड़ा था, लेकिन उसे अपना ही चेहरा अजनबी लग रहा था।
बार-बार उसकी आँखों के सामने वही बरगद का पेड़ और अदिति का रोता हुआ चेहरा आ रहा था।
शादी की सभी रस्में पूरी होने लगीं। तभी एक रिश्तेदार ने आकर कहा, “अनुराग… तुम्हारे नाम एक छोटा-सा गिफ्ट आया है।” अनुराग ने हैरानी से वह पैकेट अपने हाथ में लिया।
उस पर भेजने वाले का नाम नहीं लिखा था।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। न जाने क्यों उसे महसूस हुआ कि यह गिफ्ट किसी अपने ने भेजा है।
उसने धीरे-धीरे पैकेट खोला।
अंदर एक पुराना लकड़ी का छोटा-सा डिब्बा रखा था।
जब उसने डिब्बा खोला, तो उसकी साँसें थम गईं।
उसमें वही सूखा हुआ बरगद का पत्ता रखा था, जिसे एक दिन अदिति ने मुस्कुराते हुए कहा था, “इसे संभालकर रखना। जिस दिन यह पत्ता खो जाएगा, समझना हमारा प्यार भी खो जाएगा।”
उस पत्ते के साथ एक छोटी-सी चिट्ठी भी थी।
अनुराग काँपते हाथों से उसे पढ़ने लगा।
उसमें लिखा था…
“तुम्हें तुम्हारी नई ज़िंदगी मुबारक हो, अनुराग।
मैंने कभी तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि प्यार में ज़बरदस्ती नहीं होती।
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आज मैं तुम्हें वापस वही पत्ता लौटा रही हूँ। इसे अब सँभालने का कोई हक़ मेरा नहीं रहा।
बस एक बात याद रखना…
जिस दिन किसी अपने का विश्वास टूटता है, उसी दिन प्यार भी धीरे-धीरे मरने लगता है।
खुश रहना…
तुम्हारी—अदिति” जो अब तुम्हारी नहीं।
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते अनुराग की आँखों से आँसू टपकने लगे।
उसने उस सूखे पत्ते को अपने सीने से लगा लिया और बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगा।
आसपास खड़े लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक दूल्हे को क्या हो गया।
सब उसे संभालने लगे, लेकिन उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसने सिर्फ़ एक लड़की नहीं खोई… उसने अपनी पूरी दुनिया खो दी थी। उधर उसी रात अदिति अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी आसमान को देख रही थी।
उसकी आँखों से भी लगातार आँसू बह रहे थे।
उसने काँपती आवाज़ में सिर्फ़ इतना कहा, “भगवान… अगर सच्चा प्यार बिछड़ने के लिए ही होता है, तो किसी को इतना गहरा प्यार मत देना…”
और उसी पल बरगद के पेड़ से एक सूखा पत्ता टूटकर ज़मीन पर आ गिरा…

जब अपनी मोहब्बत किसी और की होने लगे, तो कैसा लगता हैं?
अनुराग की शादी को लगभग आठ महीने बीत चुके थे। बाहर से उसकी ज़िंदगी सामान्य दिखाई देती थी, लेकिन भीतर हर दिन एक अधूरी कहानी उसे चैन से जीने नहीं देती थी।
वह हर सुबह काम पर जाता, लोगों से मुस्कुराकर बात करता और शाम को घर लौट आता। मगर रात होते ही उसकी आँखों के सामने सिर्फ़ अदिति का चेहरा आ जाता।
एक दिन दफ़्तर में काम करते समय उसके मोबाइल पर मनीष का फ़ोन आया। उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा धीमी थी।
मनीष बोला, “अनुराग… एक बात कहूँ, लेकिन खुद को संभाल लेना।”
अनुराग का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने घबराकर पूछा, “क्या हुआ? सब ठीक तो है?”
मनीष ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “अदिति की शादी अगले हफ़्ते तय हो गई है।”
बस… इतना सुनना था कि अनुराग के हाथ से मोबाइल फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी आँखें खुली रह गईं और पूरा शरीर काँपने लगा।
उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उसकी साँसें छीन ली हों। वह कुर्सी पर बैठा रहा, लेकिन उसके कानों में अब कोई आवाज़ नहीं पहुँच रही थी।
उसकी आँखों के सामने पहली मुलाक़ात घूमने लगी। वही छोटी-सी चाय की दुकान, मिट्टी के कुल्हड़, अदिति की मासूम मुस्कान और उसकी वह पहली बात…
“दोस्ती की शुरुआत चाय से हो… इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?”
अनुराग की आँखों से आँसू बह निकले।
उसे बरगद का वह पेड़ याद आया, जहाँ अदिति ने उसका हाथ पकड़कर कहा था, “जब तक साँस चलेगी, तुम्हारे भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगी।”
वह दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर रोने लगा।
आज पहली बार उसे अपनी शादी का हर पल याद आने लगा।
उसे याद आया कि जिस दिन वह दूल्हा बना था, उसी दिन कहीं अदिति अकेले बैठकर टूट रही होगी।
उसे याद आया कि जब लोग उसे बधाई दे रहे थे, तब शायद अदिति अपने आँसू छिपा रही होगी।
उसे याद आया कि जिस रात वह नई ज़िंदगी की रस्में निभा रहा था, उसी रात शायद अदिति भगवान से सिर्फ़ एक सवाल पूछ रही होगी…
“मेरा कसूर क्या था?” अनुराग ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ा।
वह बार-बार खुद से कह रहा था, “अदिति… मेरी शादी वाले दिन तुम्हारे दिल पर क्या बीती होगी? आज समझ आया है। लेकिन आज जो दर्द मुझे हो रहा है… शायद वह तुम्हारे दर्द से भी छोटा है।”
उस रात वह बिल्कुल नहीं सोया।
सुबह होते ही वह बिना किसी को बताए सीधे अदिति के घर पहुँच गया।
घर के बाहर हलचल थी। रिश्तेदार आ-जा रहे थे। आँगन में शादी की तैयारियाँ चल रही थीं।
अनुराग को देखकर अदिति की सहेली नेहा हैरान रह गई।
उसने धीरे से कहा, “तुम बहुत देर कर चुके हो, अनुराग।”
अनुराग काँपती आवाज़ में बोला, “बस… एक बार उससे मिलवा दो। आख़िरी बार।”
नेहा कुछ पल उसे देखती रही। फिर चुपचाप अंदर चली गई।
कुछ देर बाद अदिति बाहर आई।
उसने हल्के रंग का साधारण सूट पहन रखा था। चेहरे पर मुस्कान नहीं थी, लेकिन आँखों में वही पुराना दर्द अब भी ज़िंदा था।
दोनों कुछ पल तक बिना बोले एक-दूसरे को देखते रहे।
अनुराग धीरे-धीरे उसके पास आया। अचानक उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
उसकी आवाज़ काँप रही थी। “अदिति… मुझे माफ़ कर दो।” अदिति चुप रही।
अनुराग की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
वह बोला, “जिस दिन मेरी शादी हुई थी… उस दिन तुम्हें कैसा लगा होगा, मैं कभी समझ ही नहीं पाया।”
“लेकिन आज…”
“आज जब तुम्हारी शादी की खबर सुनी है… ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने मेरा दिल निकाल लिया हो।”
“आज समझ आया कि अपने सच्चे प्यार को किसी और का होते देखना कितना दर्द देता है।”
इतना कहते-कहते अनुराग उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
उसने रोते हुए अदिति के पैर पकड़ लिए।
“एक बार… बस एक बार मुझे माफ़ कर दो।”
“मैं हार गया था, अदिति।”
“मैं अपने प्यार को बचा नहीं पाया।”
“अगर समय वापस मिल जाए… तो इस बार पूरी दुनिया से लड़ जाऊँगा।”
अदिति की आँखों से भी आँसू बहने लगे।
उसने धीरे से अनुराग को उठाया। फिर बहुत शांत आवाज़ में बोली, “अनुराग… मैं आज भी तुमसे नफ़रत नहीं करती।”
“शायद… प्यार भी आज ख़त्म नहीं हुआ।”
“लेकिन जिस दिन तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, उसी दिन मेरा विश्वास टूट गया था।”
“और टूटा हुआ विश्वास… दोबारा नहीं जुड़ता।” इतना कहकर उसने अपने आँसू पोंछ लिए।
उसी समय वह घर की ओर चली गई, लेकिन अनुराग ने पीछे से कहा- अदिति मैं तुम्हारा इंतजार हमेशा करूँगा
अदिति… सुन रही थी, लेकिन उसने ‟बिना पीछे मुड़े‟ ही कहा, ‟तुम्हारी मर्जी अनुराग, मगर मैं अब हार चुकी हूँ , शायद हम कभी-कभी मिल पाएं।”
अदिति और अनुराग ने आख़िरी बार एक दूसरे को देखा।
अनुराग की आँखों में हज़ारों अनकहे शब्द थे। लेकिन वह क्या कहता। वह तो बस प्यार के दर्द से तड़प रहा था।
जाते-जाते अदिति ने मुड़कर देखा… और वह वहाँ से चली गई।
अनुराग वहीं खड़ा रह गया।
उसने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।
शायद वह समझ चुका था…
कि कुछ रिश्ते हाथ छोड़ने के बाद कभी वापस नहीं आते।
लगभग एक साल बाद…
एक शाम वही दिन जिस दिन दोनों पहली बार वहाँ मिलें थे। अनुराग फिर उसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे पहुँचा।
सब कुछ पहले जैसा ही था।
वही ठंडी हवा… वही पहाड़… वही घाटी…
बस अदिति नहीं थी।
वह चुपचाप उसी जगह बैठ गया, जहाँ कभी दोनों घंटों बातें किया करते थे।
तभी उसे पायल की बहुत हल्की आवाज़ सुनाई दी।
उसने पलटकर देखा…कुछ ही दूरी पर अदिति खड़ी थी।
दोनों की नज़रें मिलीं। दोनों की आँखें भर आईं।
कुछ पल के लिए समय जैसे ठहर गया।
अदिति ने हल्की-सी मुस्कान दी। फिर अपने आँसू पोंछे… और बिना कुछ कहे वापस मुड़ गई।
अनुराग उसे जाता हुआ देखता रहा।
लेकिन अनुराग चिल्लाकर बोला, अदिति मैं अगले साल भी इसी दिन तुम्हारा यहीं इंतजार करूँगा।
क्या तुम आओगी मुझसे मिलने?
लेकिन अदिति कुछ न बोली।
‟अब क्या अदिति उससे मिलने आएगी या अनुराग यूँ ही जीवन भर तड़पता रहेगा?‟
कुछ मोहब्बतें ज़िंदगी में मिलती नहीं…
सिर्फ़ हमेशा के लिए याद बन जाती हैं।
दोस्तों, आपकी नज़र में इस प्रेम कहानी में गलती किसकी थी—अनुराग की या अदिति की? अपनी सच्ची राय नीचे कमेंट में ज़रूर लिखें। आपका एक कमेंट किसी की सोच बदल सकता है।
____कहानी समाप्त____




