कुएँ से आती खौफ़नाक बच्चे की आवाज़ । Darawani Kahani

कुएँ से आती खौफ़नाक बच्चे की आवाज़ । Darawani Kahani
Hindi Rama | डरावनी कहानी

बरगदपुर के पुराने कुएँ से हर आधी रात किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी। वह कभी किसी राहगीर को भैया, कभी माँ और कभी काका कहकर बुलाता था। गाँव वाले जानते थे कि उस कुएँ में वर्षों पहले एक बच्चा मर चुका है, लेकिन उसकी आवाज़ आज भी मदद माँगती थी।

बरगदपुर गाँव और डरावना कुआँ  – Darawani Kahani

बरगदपुर गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना कुआँ था। उसके चारों तरफ विशाल बरगद की जड़ें फैली थीं। दिन में भी वहाँ अजीब सन्नाटा रहता था और रात होते ही रास्ता सुनसान हो जाता था।

कुएँ की पत्थर वाली मुंडेर टूट चुकी थी। भीतर झाँकने पर केवल गहरा अंधेरा दिखाई देता था। आधी रात के बाद वहाँ बर्फ जैसी ठंडी हवा चलती और पानी में किसी के चलने की आवाज़ सुनाई देती थी।

कुत्ते उस रास्ते पर पहुँचते ही दुम दबाकर पीछे हट जाते थे। सबसे भयानक बात तब होती, जब कुएँ के भीतर से किसी छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगती।

वह किसी भी राहगीर को भैया, माँ या काका कहकर पुकारता और मदद माँगता था। जो भी उसकी आवाज़ सुनकर कुएँ के पास जाता, उसे अंधेरे में किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई देती थी।

गाँव के बुजुर्ग हमेशा चेतावनी देते थे कि उस बच्चे की आवाज़ का जवाब मत देना। उनका मानना था कि उसकी पुकार सुनकर कुएँ के पास जाने वाले के पीछे कोई अनदेखी चीज़ घर तक पहुँच जाती है।

उस कुएँ में कोई अकेला नहीं था। अंधेरे के भीतर कोई हर रात किसी नए इंसान का इंतजार करता था।

सिद्धार्थ की गाँव में वापसी और पुराने कुएँ का डरावना रहस्य

कई वर्षों तक शहर में रहने के बाद सिद्धार्थ अपने गाँव बरगदपुर वापस आया। वह अपनी माँ सरोज के साथ कुछ दिन बिताना चाहता था और पुराने घर की देखभाल भी करना चाहता था।

गाँव पहुँचकर वह बचपन की गलियों से गुजर रहा था। बरगद के पास पहुँचते ही उसके कदम रुक गए। वही पुराना कुआँ आज भी वहाँ था, जिसकी टूटी मुंडेर पर काई जमी हुई थी।

तभी पीछे से गोपाल दास काका की आवाज़ आई, “सिद्धार्थ बेटा, वहाँ क्या देख रहे हो? उस जगह के पास मत जाना।”

सिद्धार्थ ने पूछा, “काका, आखिर इस कुएँ में ऐसा क्या है, जिससे पूरा गाँव डरता है?” गोपाल दास ने गंभीर आवाज़ में कहा, “उसके भीतर एक बच्चे की आवाज़ बंद है।”

सिद्धार्थ हँस पड़ा। उसने कहा, “काका, कोई बच्चा कुएँ में कैसे बोल सकता है? शायद गाँव वालों ने कोई कहानी बना रखी है।”

गोपाल दास ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। जाते-जाते केवल इतना बोले, “रात में अगर कोई तुम्हें कुएँ की तरफ से बुलाए, तो समझ लेना कि वह इंसान नहीं है।”

सिद्धार्थ को अंदाजा नहीं था कि उसी रात कोई उसकी खिड़की के बाहर उसका इंतजार करने वाला है।

आधी रात को आई बच्चे की आवाज़ और खिड़की पर दिखाई दी काली परछाईं

उस रात सिद्धार्थ अपने कमरे में सो रहा था। अचानक खिड़की जोर से काँपी और उसकी नींद खुल गई। उसने घड़ी देखी तो रात के ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट हुए थे।

कमरे में अजीब ठंडक फैल चुकी थी। तभी कुएँ की दिशा से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। कुछ ही पलों में वह आवाज़ साफ सुनाई देने लगी।

“भैया… मुझे बाहर निकाल दो… यहाँ बहुत अंधेरा है…” आवाज़ सुनते ही सिद्धार्थ बिस्तर से उठा और खिड़की की तरफ बढ़ने लगा।

पर्दा हटाते ही उसे कुएँ की मुंडेर पर एक छोटे बच्चे की काली परछाईं दिखाई दी। उसका शरीर स्थिर था, लेकिन सिर धीरे-धीरे घूम रहा था। उसके पैर जमीन से ऊपर थे।

बच्चे ने फिर आवाज़ लगाई, “भैया… मुझे अकेला मत छोड़ो…” सिद्धार्थ दरवाजा खोलने ही वाला था कि पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

वह उसकी माँ सरोज थी। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसने सिद्धार्थ को पीछे खींचते हुए दरवाजा बंद कर दिया और फुसफुसाकर बोली, “उसकी आवाज़ का जवाब मत देना। वह किसी को भी भैया, माँ या काका कहकर बुलाता है।”

सिद्धार्थ ने पूछा, “माँ, तुम्हें उसके बारे में इतना सब कैसे पता है?” सरोज ने जवाब नहीं दिया। तभी बाहर से आवाज़ आई, “माँ… तुम भी मुझे छोड़कर चली गईं?”

सरोज ने दोनों कान बंद कर लिए और सिद्धार्थ को अपने सीने से लगा लिया।

खिड़की के बाहर परछाईं गायब थी, लेकिन कमरे के दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा था।

प्रिया ने बताया पुराना रहस्य और सविता की दर्दनाक कहानी

अगली सुबह सिद्धार्थ ने रात की पूरी घटना अपनी बचपन की दोस्त प्रिया को बताई। कुएँ का नाम सुनते ही प्रिया उसे एकांत जगह पर ले गई और पूछा, “क्या आवाज़ ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर आई थी?”

सिद्धार्थ के हाँ कहने पर प्रिया ने वर्षों पुरानी घटना बताई। बरगदपुर में सविता नाम की एक महिला अपने छोटे बीमार बच्चे के साथ रहती थी। वह अक्सर उसके इलाज के लिए परेशान रहती थी।

एक रात सविता अपने बच्चे के लिए दवा लेकर घर लौट रही थी। उसके पास कुछ छोटे गहने भी थे, जिन्हें उसने कपड़े में बाँधकर पोटली में रख रखा था। उसे नहीं पता था कि बरगद के पास चार चोर छिपे बैठे हैं।

वे चोर कई दिनों से लोगों को लूट रहे थे और कुएँ के नीचे अपना चोरी का सामान छिपाते थे। सविता को अकेला देखकर उन्होंने उसका रास्ता रोक लिया और पोटली छीनने लगे।

सविता ने बच्चे को सीने से लगाकर विरोध किया और मदद के लिए चिल्लाने लगी। उसकी आवाज़ सुनकर गाँव वाले घरों से बाहर आ गए, लेकिन चोरों के डर से कोई आगे नहीं बढ़ा।

झाड़ियों के पीछे जवान गोपाल दास काका भी लाठी लेकर खड़े थे। वे सविता को बचाना चाहते थे, लेकिन चोरों ने उन्हें धमकी दी कि आगे आए तो उनका परिवार भी नहीं बचेगा।

सविता बार-बार कहती रही, “मेरे बच्चे को छोड़ दो। तुम्हें जो चाहिए, मुझसे ले लो।” लेकिन चोरों ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।

उस रात गाँव में कई दरवाजे खुले थे, लेकिन किसी इंसान ने सविता की मदद के लिए कदम नहीं बढ़ाया।

कुएँ के नीचे छिपी दो सुरंगें और चोरों के सोने का खौफनाक रहस्य

प्रिया ने बताया कि पुराने कुएँ के नीचे एक गुप्त सुरंग बनी हुई थी। चोर कई वर्षों से उसमें चोरी का सोना और कीमती सामान छिपाते थे। उस सुरंग के दो रास्ते थे।

पहला रास्ता खेतों के पीछे निकलता था, जबकि दूसरा पुराने तहखाने तक जाता था। खतरा होने पर चोर इन रास्तों से अलग-अलग दिशाओं में भाग जाते थे।

गाँव के कुछ लोगों को सुरंगों की जानकारी थी, लेकिन चोरों ने सभी को धमका रखा था। डर के कारण कुछ गाँव वाले उन्हें खाना पहुँचाते और छिपने की जगह भी देते थे।

चोरों को भरोसा था कि कोई भी उस डरावने कुएँ के भीतर जाने की हिम्मत नहीं करेगा। इसलिए उनका खजाना वर्षों से सुरक्षित था। सविता पर हमला होने वाली रात भी वे उसी खजाने की रखवाली करके लौट रहे थे।

जिस कुएँ को गाँव वाले भूतिया समझते थे, उसके नीचे चोरों का ऐसा रहस्य छिपा था, जिसकी कीमत कई जानों से चुकाई जाने वाली थी।

सविता पर चोरों का हमला और गाँव वालों की खामोशी

उस रात सविता अपने बच्चे को गोद में लेकर कुएँ के पास पहुँची ही थी कि चारों चोर झाड़ियों से बाहर निकल आए। एक ने उसका रास्ता रोका और दूसरे ने पोटली छीन ली।

सविता ने अपने बच्चे को बचाते हुए चोरों का विरोध किया। उसकी चीख सुनकर गाँव वाले बाहर आए, लेकिन हथियारों से लैस चोरों को देखकर कोई आगे नहीं बढ़ा।

गोपाल दास काका ने लाठी उठाकर आगे कदम बढ़ाया, लेकिन एक चोर ने उन्हें धमकी दी कि अगर वे बीच में आए तो उनका परिवार भी नहीं बचेगा। गोपाल दास डरकर रुक गए।

सविता ने गाँव वालों की तरफ देखकर आखिरी बार चिल्लाया, “कोई तो मेरे बच्चे को बचा लो! ये लोग उसे मार डालेंगे!” लेकिन जवाब में केवल सन्नाटा सुनाई दिया।

तभी एक चोर ने सविता की गोद से बच्चे को छीन लिया। सविता उसके पीछे दौड़ी और चिल्लाई, “उसे छोड़ दो! वह बहुत छोटा है!”

बच्चे को कुएँ में फेंक दिया गया और सविता की दुनिया उजड़ गई

चोर बच्चे को लेकर कुएँ की मुंडेर तक पहुँच गया। सविता उसकी तरफ भागी, लेकिन दूसरे चोरों ने उसे पकड़कर जमीन पर गिरा दिया।

अगले ही पल उस चोर ने बच्चे को गहरे कुएँ में फेंक दिया। एक तेज चीख अंधेरे में गूँजी और फिर पानी में कुछ गिरने की भारी आवाज़ सुनाई दी।

सविता किसी तरह चोरों की पकड़ से छूटी और कुएँ की मुंडेर तक पहुँची। नीचे से बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी, “माँ… मुझे बाहर निकालो…”

उसने गाँव वालों से रस्सी माँगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया। सविता ने खुद नीचे उतरने की कोशिश की, मगर गीली दीवारों और टूटे पत्थरों के कारण बार-बार फिसलती रही।

कुछ देर बाद बच्चे की आवाज़ कमजोर होने लगी। उसने आखिरी बार सुना, “माँ… बहुत अंधेरा है…” और फिर कुएँ में अचानक सन्नाटा छा गया।

सविता ने चोरों और गाँव वालों की तरफ देखकर काँपती आवाज़ में कहा, “तुम सबने मेरे बच्चे को मुझसे छीन लिया है। अब तुममें से कोई चैन से नहीं सो पाएगा।”

उस रात एक माँ ने अपने बच्चे को खोया और बरगदपुर ने अपनी सबसे भयानक कहानी को जन्म लेते देखा।

सविता की आखिरी छलांग और कुएँ में हुई दो मौतें

सविता ने एक बार फिर कुएँ के भीतर झाँका। नीचे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, लेकिन उसे लग रहा था कि उसका बच्चा अब भी अंधेरे में उसे पुकार रहा है।

उसने चोरों की तरफ देखकर कहा, “तुमने मेरा बच्चा छीना है। मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगी।” इसके बाद उसने किसी की परवाह किए बिना कुएँ में छलांग लगा दी।

पानी में जोरदार आवाज़ हुई। कुएँ के एक किनारे पर छिपी सुरंग का रास्ता पानी के पास खुलता था। सविता नीचे गिरकर उसी जगह जा पहुँची, जहाँ उसका बच्चा पड़ा था।

वह घायल अवस्था में बच्चे तक पहुँची और उसे सीने से लगा लिया। उसने कई बार उसका नाम पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। कुछ ही देर बाद सविता की भी मृत्यु हो गई।

ऊपर खड़े चोरों को लगा कि सब खत्म हो चुका है। लेकिन तभी पानी की सतह पर गोल लहरें उठने लगीं और सुरंग से ठंडी हवा बाहर आने लगी।

कुछ क्षण बाद कुएँ के भीतर से बच्चे के हँसने की आवाज़ आई। चोरों ने नीचे देखा तो पानी के पास एक छोटी आकृति खड़ी थी और उसके पीछे सविता की परछाईं दिखाई दे रही थी।

सविता मर चुकी थी, उसका बच्चा भी मर चुका था, लेकिन उस कुएँ में उनकी कहानी अब शुरू हुई थी।

सविता और उसका बच्चा पिशाच बन गए, अब कुएँ से कोई सुरक्षित नहीं था

कुएँ के अंधेरे में सविता ने अपने बच्चे को सीने से लगा रखा था। दोनों की आत्माएँ उसी दर्द में भटकने लगीं, जिसे मौत भी उनसे अलग नहीं कर पाई थी।

बच्चे ने पूछा, “माँ, अब हम घर कब जाएँगे?” सविता ने उसे कसकर पकड़ लिया, लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था। कुछ देर बाद बच्चा बोला, “माँ, मुझे भूख लगी है।”

उस रात दोनों आत्माएँ पिशाच जैसी भटकती शक्तियों में बदल गईं। उनकी आँखें अंधेरे में चमकती थीं और आसपास का पानी बिना किसी कारण उबलने लगता था।

सविता के भीतर अपने बच्चे को खोने का दर्द और उन लोगों के खिलाफ भयानक क्रोध था, जिन्होंने उसकी मदद नहीं की थी। उसने तय किया कि किसी निर्दोष बच्चे को नुकसान नहीं पहुँचाएगी, लेकिन उसके बच्चे की मौत के जिम्मेदार लोगों को चैन से नहीं रहने देगी।

उस रात से कुएँ में सिर्फ पानी नहीं था। वहाँ एक माँ का क्रोध और एक बच्चे की अधूरी पुकार भी कैद हो गई थी।

चोरों का सोना कुएँ में ही रह गया और पहली बार बच्चे ने अपना चेहरा दिखाया

कुछ दिनों बाद चारों चोर अपना छिपाया हुआ सोना निकालने आधी रात को कुएँ पर पहुँचे। वे रस्सी और टॉर्च लेकर आए थे। पहला चोर रस्सी पकड़कर नीचे उतरने लगा।

पानी के पास पहुँचते ही उसे बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। उसने टॉर्च घुमाई, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। तभी पानी की सतह पर एक छोटा बच्चा खड़ा नजर आया। उसके कपड़े भीगे थे और बाल चेहरे से चिपके हुए थे।

बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा, “चाचा, आप मुझे घर छोड़ने आए हो?” चोर के हाथ से टॉर्च छूटते-छूटते बची। वह तुरंत रस्सी पकड़कर ऊपर चढ़ने लगा।

तभी पीछे से आवाज़ आई, “मेरे बच्चे को क्यों मारा?” चोर ने पलटकर देखा तो सुरंग के मुहाने पर सविता खड़ी थी। उसके बाल जमीन तक लटक रहे थे और कपड़ों से पानी टपक रहा था।

चोर ने चीखकर रस्सी खींचने को कहा। ऊपर खड़े बाकी तीनों चोरों ने किसी तरह उसे बाहर निकाला। वे सोना वहीं छोड़कर भाग गए।

सविता ने चोरों को सजा दी और उनके घरों तक पहुँच गई उसकी परछाईं

सविता ने एक-एक करके चारों चोरों को डराना शुरू कर दिया। किसी के घर में आधी रात को बच्चे के पैरों की आवाज़ सुनाई देती, तो किसी के दरवाजे पर गीले हाथों के निशान दिखाई देते थे।

एक चोर ने अपने कमरे में बच्चे को चारपाई के नीचे बैठा देखा। उसने पूछा, “तू यहाँ कैसे आया?” बच्चे ने सिर उठाकर कहा, “चाचा, उस रात मुझे क्यों नहीं बचाया?”

चोर दरवाजा खोलकर भागना चाहता था, लेकिन बाहर भी वही बच्चा खड़ा था। उसकी छोटी उँगलियों से पानी टपक रहा था और वह लगातार मुस्कुरा रहा था।

दूसरे चोर को हर रात अपने आँगन में सविता के रोने की आवाज़ सुनाई देती। तीसरे की नींद ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर खुलती और उसकी खिड़की पर तीन बार दस्तक होती।

चौथे चोर ने एक रात अपने कमरे में सविता को खड़ा देखा। उसके पीछे वही बच्चा था, जिसे उसने कुएँ में फेंका था। सविता ने पूछा, “क्या तुम्हें मेरी चीख याद है?”

चोर जमीन पर गिर पड़ा और माफी माँगने लगा। सविता ने उसे कुछ देर घूरा और फिर अंधेरे में गायब हो गई। उसने किसी चोर की जान नहीं ली, लेकिन चारों इतने डर गए कि अपने घर छोड़कर अलग-अलग जगहों पर भाग गए।

गाँव वालों को भी मिली चेतावनी और हर घर तक पहुँची सविता की चीख

चोरों के भाग जाने के बाद गाँव वालों ने राहत की साँस ली, लेकिन उनका डर खत्म नहीं हुआ। अब सविता की आत्मा कभी बरगद के नीचे तो कभी गाँव की गलियों में दिखाई देने लगी थी।

आधी रात को घरों के दरवाजों पर किसी महिला के रोने की आवाज़ सुनाई देती। लोग बाहर निकलते तो रास्ते के आखिरी छोर पर सफेद कपड़ों में एक आकृति खड़ी दिखाई देती।

वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ती और पूछती, “जब मैं मदद माँग रही थी, तब तुम सब कहाँ थे?” कुछ गाँव वाले हाथ जोड़कर कहते कि चोरों ने उन्हें धमकाया था।

सविता जवाब देती, “मैं भी अपने बच्चे को बचाना चाहती थी। मैंने भी मदद माँगी थी। तुम सबने मेरी आवाज़ सुनी, फिर भी कोई मेरे पास नहीं आया।”

इसके बाद वह अचानक गायब हो जाती और घर के भीतर किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई देने लगती। सविता ने किसी गाँव वाले की जान नहीं ली, लेकिन वह उन्हें उस रात की याद दिलाती रही।

बरगदपुर में अब रात होते ही लोग दरवाजे बंद कर लेते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि अगली दस्तक उनके घर पर होगी।

गोपाल दास काका का सबसे बड़ा पछतावा और दरवाजे पर खड़ी सविता

गोपाल दास काका के मन में सबसे ज्यादा डर था। उन्होंने सविता और उसके बच्चे को अपनी आँखों के सामने मरते देखा था, लेकिन उन्हें बचाने के लिए आगे नहीं बढ़े थे।

उनके पास लाठी थी, लेकिन परिवार को नुकसान पहुँचने के डर से वे पीछे हट गए थे। यह पछतावा उन्हें वर्षों से अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

एक रात उनके कमरे में अचानक ठंड फैल गई। दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा और फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बनने लगे।

गोपाल दास काका ने काँपते हाथों से दरवाजा खोला। सामने वही छोटा बच्चा खड़ा था, जिसके शरीर से पानी टपक रहा था। उसके पीछे सविता की धुंधली आकृति दिखाई दे रही थी।

गोपाल दास घुटनों पर गिर पड़े। वे रोते हुए बोले, “सविता, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें बचा सकता था, लेकिन डर गया था। मैंने तुम्हारी चीख सुनी और तुम्हारे बच्चे को कुएँ में गिरते देखा, फिर भी कुछ नहीं किया।”

सविता कुछ देर उन्हें देखती रही। फिर बच्चे ने उसका हाथ पकड़ लिया। जाते-जाते सविता ने कहा, “तुम्हें वह रात कभी नहीं भूलनी चाहिए।”

अगली सुबह गोपाल दास के कमरे का दरवाजा खुला मिला। फर्श पर पानी फैला था और बिस्तर के पास मिट्टी से बने दो छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

उस दिन के बाद गोपाल दास काका ने रात में कभी अकेले सोने की हिम्मत नहीं की।

सिद्धार्थ और प्रिया ने खोजा आत्मा की शांति का रास्ता

सिद्धार्थ समझ चुका था कि कुएँ में दिखाई देने वाली आत्माएँ सविता और उसका बच्चा थीं। प्रिया ने बताया कि दोनों को कभी ठीक से अंतिम विदाई नहीं मिली थी, इसलिए उनकी आत्माएँ उसी जगह भटकती रहीं।

गोपाल दास काका ने उन्हें कुएँ के नीचे जाने वाली दोनों सुरंगों का रास्ता बताया। तीनों ने रात में वहाँ जाने का फैसला किया। वे अपने साथ लालटेन, दीपक, गंगाजल और सविता की पुरानी दवा की खाली शीशी लेकर पहुँचे।

कुएँ के पास पहुँचते ही हवा तेज हो गई। बरगद की जड़ें हिलने लगीं और नीचे से बच्चे के हँसने की आवाज़ सुनाई दी। गोपाल दास ने सुरंग का रास्ता दिखाया और तीनों भीतर चले गए।

पहली सुरंग में उन्हें मिट्टी से ढके पुराने सोने के सिक्के दिखाई दिए, लेकिन सिद्धार्थ ने उन्हें छुआ तक नहीं। कुछ दूर जाने पर वे पानी से भरी उस जगह पहुँचे, जहाँ सविता और उसका बच्चा आखिरी बार जीवित थे।

अचानक अंधेरे से आवाज़ आई, “माँ… ये लोग फिर यहाँ क्यों आए हैं?” सिद्धार्थ ने दीपक आगे करके कहा, “हम तुम्हें नुकसान पहुँचाने नहीं आए हैं। हम चाहते हैं कि तुम्हें इस अंधेरे से छुटकारा मिले।”

जवाब में किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी और सुरंग के भीतर जलता दीपक अचानक बुझ गया।

सविता का आखिरी सामना और सुरंग में गूँजती भयानक चीखें

दीपक बुझते ही चारों तरफ घना अंधेरा फैल गया। सुरंग की दीवारों से बच्चों के रोने की आवाज़ें आने लगीं और पानी में किसी के चलने की हलचल सुनाई देने लगी।

प्रिया ने सिद्धार्थ का हाथ पकड़ लिया। गोपाल दास पीछे हटने लगे, लेकिन तभी उनके पैरों के पास एक छोटी गीली हथेली दिखाई दी। सुरंग के दूसरे छोर पर सविता की परछाईं खड़ी थी।

उसके बाल बिखरे हुए थे और कपड़ों से पानी टपक रहा था। पीछे वही बच्चा खड़ा था। वह तीनों को देखकर धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

सविता ने सिद्धार्थ से कहा, “मेरा बच्चा मर रहा था। मैं मदद माँगती रही, लेकिन किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। तुम लोग अब यहाँ क्या लेने आए हो?”

सिद्धार्थ ने जवाब दिया, “हम तुम्हारा दर्द समझना चाहते हैं। तुम्हारे बच्चे को अब इस अंधेरे में अकेला नहीं रहना चाहिए।”

गोपाल दास काका उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए। वे रोते हुए बोले, “सविता, उस रात मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई थी। मैं तुम्हें बचाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। तुम्हारी चीख आज भी मेरे कानों में गूँजती है।”

सविता चुप रही। उसके पीछे खड़ा बच्चा आगे आया और गोपाल दास की तरफ हाथ बढ़ाकर बोला, “काका, आप उस रात मुझे लेने क्यों नहीं आए थे? मैं बहुत देर तक माँ को बुलाता रहा था।”

सुरंग के भीतर अचानक पानी ऊपर उठने लगा और सविता की चीख से पूरा कुआँ काँप उठा।

सविता और उसके बच्चे को मिली शांति, लेकिन अंधेरे में कुछ और जाग उठा

सिद्धार्थ ने दीपक दोबारा जलाया और सविता के सामने रख दिया। फिर उसने बच्चे की पुरानी दवा की खाली शीशी भी उसके पास रख दी।

प्रिया ने हाथ जोड़कर कहा, “तुम दोनों इस अंधेरे से बाहर निकल सकते हो। अब तुम्हें किसी को पुकारने की जरूरत नहीं है।” गोपाल दास काका ने भी अपनी गलती स्वीकार की और माफी माँगी।

सिद्धार्थ ने कुएँ के पानी में गंगाजल डाला और दोनों आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करने लगा। कुछ देर तक सुरंग में केवल पानी टपकने की आवाज़ सुनाई देती रही।

अचानक बच्चे ने माँ की तरफ देखकर पूछा, “माँ… अब मुझे भूख नहीं लग रही। क्या हम घर जा सकते हैं?” सविता की आँखों में पहली बार आँसू दिखाई दिए।

उसने बच्चे को सीने से लगाया। धीरे-धीरे उसके चेहरे का डरावना रूप बदलने लगा और आसपास फैली काली परछाईं हल्की पड़ने लगी।

सविता ने आखिरी बार सिद्धार्थ और प्रिया की तरफ देखा। फिर बोली, “अब मैं किसी बच्चे को नहीं डराऊँगी। लेकिन उस कुएँ के पास जो कुछ छिपा है, उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर वह अपने बच्चे का हाथ पकड़कर अंधेरे की तरफ बढ़ी। दोनों की परछाइयाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं और सुरंग में फैली ठंडी हवा शांत पड़ गई।

सिद्धार्थ को लगा कि आखिरकार दोनों को शांति मिल गई है, लेकिन गोपाल दास काका अब भी किसी अनजाने डर से काँप रहे थे।

सविता जाते-जाते जिस चीज़ से सावधान रहने को कह गई थी, उसके बारे में किसी ने सवाल नहीं पूछा।

कुएँ और दोनों सुरंगों को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया

अगली सुबह गाँव वालों ने मिलकर पुराने कुएँ को बंद करने का फैसला किया। बड़े पत्थर और मिट्टी मँगाई गई और बरगद के नीचे बने रास्ते को पूरी तरह ढक दिया गया।

कुएँ के नीचे जाने वाली दोनों सुरंगें भी बंद कर दी गईं। गाँव वालों ने चोरों के छिपाए सोने और पुराने अपराधों की जानकारी अधिकारियों तक पहुँचाई।

बरगद के नीचे सविता और उसके बच्चे की याद में दो दीपक जलाए गए। कुछ दिनों तक गाँव में शांति रही। रात के समय कुएँ से कोई आवाज़ नहीं आई।

कई महीने बीत गए। लोगों ने उस घटना को पुरानी कहानी समझना शुरू कर दिया, लेकिन गोपाल दास काका अब भी रात में बरगद की तरफ देखने से डरते थे।

गाँव वालों ने कुआँ बंद कर दिया था, लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि उसके नीचे वाली दूसरी सुरंग के भीतर क्या बचा रह गया था।

आखिरी डर अभी बाकी था और सिद्धार्थ के कमरे में आई अनजान परछाईं

कई महीने बाद सिद्धार्थ शहर लौटने की तैयारी कर रहा था। उसने अपना सामान बाँध लिया था और अगले दिन सुबह निकलने वाला था। लेकिन उसी रात आधी रात को उसकी खिड़की पर तीन बार दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

सिद्धार्थ ने खिड़की खोली तो बाहर कोई नहीं था। नीचे जमीन पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने थे, जो खिड़की से कमरे के भीतर आकर उसकी मेज तक पहुँच रहे थे।

मेज पर एक छोटी लाल चप्पल रखी थी। उसके पास गीली मिट्टी से एक शब्द लिखा था, “भैया…” सिद्धार्थ का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे की धीमी हँसी सुनाई दी। वहाँ एक छोटी काली परछाईं खड़ी थी। उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन पैरों से लगातार पानी टपक रहा था।

सिद्धार्थ ने काँपती आवाज़ में पूछा, “तुम कौन हो? सविता का बच्चा तो अब जा चुका है।” परछाईं कुछ पल चुप रही और फिर हँसने लगी।

उसने कहा, “मैं सविता का बच्चा नहीं हूँ। मैं तो बहुत पहले से यहाँ हूँ। तुम्हें क्या लगा, उस कुएँ में सिर्फ दो ही लोग रहते थे?”

सिद्धार्थ दरवाजे की तरफ भागा, लेकिन दरवाजा अपने आप बंद हो गया। बच्चे ने बरगद की दिशा में उँगली उठाकर कहा, “तुमने ऊपर का रास्ता बंद किया है, भैया… नीचे वाला अभी भी खुला है।”

अगले ही पल कमरे की सारी रोशनी बुझ गई। नंगे पैरों से चलने की आवाज़ धीरे-धीरे सिद्धार्थ के बिस्तर तक आई और उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया, “कल रात मुझे लेने आना… मैं बहुत दिनों से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।”

सिद्धार्थ पूरी रात कमरे में फँसा रहा। सुबह सरोज अंदर पहुँची तो वह फर्श पर बेहोश पड़ा था। कमरे में कोई नहीं था, बस मेज पर वही लाल चप्पल रखी थी।

कहानी का अंतिम रहस्य और बरगदपुर के कुएँ से आती नई आवाज़

सुबह सिद्धार्थ ने सरोज और प्रिया को रात की पूरी घटना बताई। गोपाल दास काका ने लाल चप्पल देखते ही पहचान लिया कि वह सविता के बच्चे की नहीं थी।

उन्होंने बताया कि वर्षों पहले कुएँ के पास एक और बच्चा गायब हुआ था। कुछ लोगों का कहना था कि वह खेलते समय कुएँ के पास से लापता हो गया था, लेकिन उसका शव कभी नहीं मिला। गाँव में कोई उसके बारे में खुलकर बात नहीं करता था।

गोपाल दास काका ने काँपती आवाज़ में कहा, “मुझे लगा था कि वह पुरानी बात झूठी थी। लेकिन अगर यह सच है, तो कुएँ के नीचे कुछ ऐसा है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते।”

सिद्धार्थ ने पूछा, “काका, क्या उस कुएँ के नीचे सचमुच कोई दूसरा रास्ता है?” गोपाल दास ने सिर झुका लिया और बोले, “मैंने तुम्हें जितना बताया था, उससे भी ज्यादा वहाँ छिपा हुआ है।”

उसी रात सिद्धार्थ ने शहर लौटने का फैसला बदल दिया। वह खिड़की के पास बैठा बरगद की दिशा में देख रहा था। रात के ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर दूर से तीन दस्तक सुनाई दीं।

फिर किसी बच्चे ने धीमी आवाज़ में पुकारा, “भैया… क्या तुम आ गए?” सिद्धार्थ ने खिड़की बंद कर दी, लेकिन आवाज़ अब उसके कमरे की अलमारी के भीतर से आ रही थी।

अलमारी के नीचे से पानी बाहर बहने लगा। मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बनते हुए उसकी तरफ बढ़ने लगे। तभी अंदर से किसी बच्चे ने हँसकर कहा, “भैया… कुआँ तो बंद कर दिया, लेकिन मुझे बाहर निकालना भूल गए।”

अलमारी का दरवाजा अपने आप थोड़ा खुला और भीतर से दो छोटी चमकती आँखें दिखाई दीं। सिद्धार्थ पीछे हट गया।

अगली सुबह उसके कमरे में कोई नहीं मिला। खिड़की खुली थी, फर्श पर पानी फैला था और मेज पर मिट्टी से लिखा एक संदेश दिखाई दे रहा था।

उस पर लिखा था, “अब अगली आवाज़ तुम्हारे घर से आएगी।”

बरगदपुर के लोग आज भी कहते हैं कि अमावस्या की रात पुराने कुएँ के पास बच्चों की हँसी सुनाई देती है। कभी कोई भैया पुकारता है, कभी माँ और कभी किसी अनजान राहगीर को काका कहकर बुलाता है।

लोग उस आवाज़ का जवाब नहीं देते। वे जानते हैं कि सविता और उसका बच्चा शायद जा चुके हैं, लेकिन कुएँ के नीचे छिपा अंधेरा अब भी किसी के बाहर आने का इंतजार कर रहा है।

अब वह आवाज़ केवल कुएँ से नहीं आती। कभी किसी बंद कमरे से, कभी पुराने घर की अलमारी से और कभी सोते हुए इंसान के बिल्कुल कान के पास सुनाई देती है।

कौन जानता है, अगली आधी रात वह आवाज़ किसके दरवाजे पर दस्तक देगी। शायद किसी दिन वह आपके घर के बाहर भी खड़ी हो और बहुत प्यार से पुकारे—“भैया… दरवाजा खोलो ना…”

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