उत्तराखंड के पहाड़ों में खावड़ा नाम का एक गाँव है, जहाँ हर रात ठीक दो बजे एक पुरानी हवेली से घुँघरुओं की आवाज़ सुनाई देती है। गाँववालों का कहना है कि वहाँ रखी लाल डोली में गौरा नाम की दुल्हन की आत्मा कैद है। जिस रात उसकी विदाई होनी थी, उसी रात उसे एक बंद कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया गया था। उसकी मौत के बाद हवेली में ऐसा डर फैला, जो कई पीढ़ियों बाद भी खत्म नहीं हुआ। कहते हैं, अब उस डोली में गौरा अकेली नहीं बैठती। उसके साथ दो और लोग भी कैद हैं, जो कभी वहाँ से लौटकर नहीं आ सके।
लाल डोली का खौफ: दो बजे बजने वाले घुँघरुओं का खौफनाक रहस्य
खावड़ा गाँव दिन में बहुत सुंदर दिखाई देता था। चारों ओर पहाड़ियाँ, घने पेड़ और पत्थरों से बने छोटे-छोटे घर थे। लेकिन सूरज ढलते ही गलियाँ सुनसान हो जातीं। लोग अपने दरवाजे बंद कर लेते और बच्चों को बाहर निकलने से रोकते थे। इसकी वजह गाँव के आखिरी छोर पर बनी एक पुरानी हवेली थी।
हवेली की दीवारों में दरारें थीं। छत से मिट्टी झड़ती रहती और लकड़ी के दरवाजे हवा चलने पर अपने आप हिलने लगते थे। उसके पीछे जंगल की ओर जाने वाला एक टूटा रास्ता था, जहाँ दिन में भी कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था।
हवेली के सबसे पुराने कमरे में लाल रंग की एक डोली रखी थी। उसके किनारों पर पीतल के छोटे-छोटे घुँघरू लगे थे। डोली का रंग जगह-जगह से उतर चुका था, लेकिन घुँघरू अब भी चमकते थे। अंदर बिछे लाल कपड़े पर मिट्टी और पुराने गहरे दाग दिखाई देते थे।
गाँववालों का कहना था कि हर रात दो बजे डोली अपने आप हिलने लगती थी। पहले एक घुँघरू बजता, फिर दूसरा। कुछ ही देर में पूरी डोली झूलने लगती, मानो उसे उठाकर ले जाने वाले लोग कमरे में घूम रहे हों। इसके बाद किसी लड़की के रोने की आवाज़ सुनाई देती थी।
“मुझे घर पहुँचा दो… मेरी विदाई करवा दो…”
कभी यह आवाज़ हवेली के अंदर से आती, तो कभी सुनसान रास्ते पर किसी व्यक्ति के कानों में गूँजती। जिसने भी जवाब दिया, अगले दिन उसके घर के बाहर गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते। वे निशान घर से शुरू होकर हवेली तक जाते थे, लेकिन वापस लौटने के निशान कभी नहीं मिलते थे।
गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि वह आवाज़ गौरा की है। कई साल पहले उसके साथ ऐसा अन्याय हुआ था, जिसे गाँव के कुछ ताकतवर लोगों ने मिलकर छिपा दिया था। वे यह नहीं जानते थे कि गौरा की मौत का सच एक दिन फिर सामने आएगा।
रणवीर का वादा और गौरा का इंतजार
कई दशक पहले गौरा इसी गाँव में अपने गरीब परिवार के साथ रहती थी। वह खुशमिजाज और मेहनती लड़की थी। घर के कामों में हाथ बँटाने के बाद वह अपने छोटे-से आँगन में बैठकर भविष्य के सपने देखा करती थी। उसकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि उसका विवाह रणवीर से हो जाए और दोनों मिलकर एक छोटा-सा घर बसा लें।
रणवीर गाँव के धनी परिवार का बेटा था। उसके पिता प्रताप सिंह के पास खेत, जमीन और बड़ी हवेली थी। उन्हें अपनी संपत्ति पर बहुत घमंड था और वह गरीब परिवार के लोगों को अपने बराबर नहीं समझते थे। इसके बावजूद रणवीर और गौरा एक-दूसरे से प्रेम करते थे। रणवीर ने गौरा से वादा किया था कि वह उससे विवाह जरूर करेगा।
गौरा को उसकी बात पर पूरा भरोसा था। दोनों के परिवारों के बीच विवाह की बात चली और शादी का दिन भी तय हो गया। गौरा के घर में खुशी का माहौल था। उसकी माँ ने विवाह के लिए कपड़े सँभालकर रखे और रिश्तेदार तैयारियों में जुट गए।
लेकिन प्रताप सिंह इस रिश्ते के खिलाफ थे। उन्होंने रणवीर को अपने कमरे में बुलाकर कहा कि अगर उसने गौरा से शादी की, तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा और संपत्ति में से एक पैसा भी नहीं मिलेगा।
रणवीर ने पहली बार अपने पिता का विरोध किया। उसने कहा कि वह गौरा से प्रेम करता है और अपना वादा नहीं तोड़ सकता। प्रताप सिंह ने मेज पर हाथ मारते हुए जवाब दिया, “तुम्हें उस लड़की से शादी करनी है, तो पहले यह घर छोड़ने की तैयारी कर लो। मेरे रहते वह इस घर की बहू कभी नहीं बनेगी।”
रणवीर अपने पिता के गुस्से और आरामदायक जिंदगी को खोने के डर से पीछे हट गया। प्रताप सिंह ने उसी रात उसे अपने एक आदमी के साथ दूर शहर भेज दिया। रणवीर ने गौरा को कोई खबर नहीं दी। जाते समय उसने खुद को समझाया कि कुछ दिनों बाद लौटकर सब ठीक कर देगा।
लेकिन गौरा के लिए वे कुछ दिन उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाले थे।
लाल डोली में बैठी दुल्हन
विवाह वाले दिन गौरा लाल जोड़े में तैयार हुई। उसकी माँ ने उसके माथे पर बिंदी लगाई और आँसू भरी आँखों से उसे गले लगाया। गौरा बार-बार पूछती रही कि रणवीर कब आएगा। परिवारवालों ने उसे समझाया कि दूल्हा रास्ते में होगा और थोड़ी देर में पहुँच जाएगा।
शाम ढल गई। गाँव के लोग इकट्ठा होकर इंतजार करते रहे, लेकिन रणवीर नहीं आया। गौरा बार-बार रास्ते की ओर देखती रही। रात गहरी होने लगी, फिर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी।
आखिरकार उसने एक रिश्तेदार को रणवीर के घर भेजा। वह कुछ देर बाद लौटा और बताया कि रणवीर घर पर नहीं है। प्रताप सिंह भी किसी से मिलने को तैयार नहीं थे।
गौरा के हाथ ठंडे पड़ गए। जिस आदमी ने जीवन भर साथ देने का वादा किया था, वह शादी के दिन उसे अकेला छोड़ गया था। फिर भी वह डोली से नहीं उतरी। उसे विश्वास था कि रणवीर आखिरी समय पर जरूर आएगा।
आधी रात बीत गई। मेहमान जाने लगे और डोली उठाने वाले भी लौटने की बात करने लगे। गौरा ने आखिरी बार रास्ते की ओर देखा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन रणवीर कहीं दिखाई नहीं दिया।
उस रात उसकी विदाई नहीं हुई। लाल डोली, जो उसके लिए खुशियों की निशानी होनी चाहिए थी, उसके टूटे हुए सपनों की गवाह बन गई।
बंद कमरे में गौरा की आखिरी रात
अगली सुबह प्रताप सिंह का एक आदमी गौरा के घर आया। उसने कहा कि प्रताप सिंह उससे बात करना चाहते हैं। गौरा को लगा कि शायद रणवीर के बारे में कोई खबर मिली होगी, इसलिए वह उनके साथ हवेली चली गई।
प्रताप सिंह ने उसे देखते ही कहा कि रणवीर अब उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहता। गौरा ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया और रणवीर से मिलने की माँग की।
“तुम्हारी वजह से मेरे घर की बदनामी हो रही है। यहाँ से चली जाओ और दोबारा मेरे बेटे का नाम मत लेना,” प्रताप सिंह ने गुस्से में कहा।
गौरा ने साफ कह दिया कि वह रणवीर से बात किए बिना वापस नहीं जाएगी। प्रताप सिंह को डर था कि वह गाँववालों के सामने सच बता देगी और सबको पता चल जाएगा कि रणवीर को उन्होंने ही गाँव से दूर भेजा था।
उन्होंने अपने छोटे बेटे केशव को बुलाया। दोनों ने मिलकर गौरा को हवेली के पीछे बने एक पुराने कमरे में बंद कर दिया। गौरा दरवाजा पीटते हुए चिल्लाई, “मुझे बाहर निकाल दो! मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है?”
केशव कुछ देर दरवाजे के पास खड़ा रहा। अंदर से गौरा के रोने की आवाज़ आ रही थी। उसने कुंडी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन पिता के डर से पीछे हट गया। प्रताप सिंह ने नौकरों को भी उस कमरे के पास जाने से मना कर दिया था।
उस रात पहाड़ों पर तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली चमक रही थी और हवेली के पुराने दरवाजे हवा से काँप रहे थे। जिस कमरे में गौरा बंद थी, उसकी पिछली दीवार पहले से कमजोर थी। बारिश का पानी भरने से आधी रात के बाद दीवार का एक बड़ा हिस्सा टूटकर गिर पड़ा। पत्थर और मिट्टी ने बाहर निकलने का रास्ता बंद कर दिया।
गौरा ने मदद के लिए चिल्लाकर प्रताप सिंह और केशव को पुकारा। उसने दरवाजा पीटा, लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आया।
“कोई तो दरवाजा खोल दो! मुझे बाहर निकाल दो!”
उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई। कमरे में पानी भर रहा था और टूटे पत्थरों के बीच से मिट्टी गिर रही थी। गौरा ने आखिरी बार दरवाजे पर हाथ मारा। फिर अंदर सन्नाटा छा गया।
सुबह नौकरों ने मलबा हटाया, तो गौरा का शरीर मिला। उसका लाल जोड़ा मिट्टी से भर चुका था और एक हाथ दरवाजे की ओर बढ़ा हुआ था। उसके नाखून टूटे हुए थे, जैसे उसने आखिरी साँस तक बाहर निकलने की कोशिश की हो।
प्रताप सिंह ने गाँववालों से कहा कि भारी बारिश के कारण दीवार गिर गई थी और गौरा की मौत एक हादसा थी। उसके परिवार को डर और बदनामी के कारण चुप रहना पड़ा। किसी ने यह नहीं बताया कि गौरा को कमरे में किसने बंद किया था।
लेकिन उसी रात से हवेली में ऐसी घटनाएँ शुरू हुईं, जिनका जवाब किसी के पास नहीं था। यही वह समय था, जब गाँव में लाल डोली का खौफ फैलने लगा।
प्रताप सिंह की पहली रात
गौरा की मौत के तीसरे दिन रात को प्रताप सिंह अपने कमरे में सो रहे थे। अचानक गलियारे में पायल और घुँघरुओं की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ धीरे-धीरे उनके कमरे के दरवाजे तक आई और रुक गई।
उन्होंने नौकर को पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। लालटेन जलाकर दरवाजा खोला, तो गलियारा खाली था। तभी पुराने कमरे की तरफ से किसी लड़की के सिसकने की आवाज़ आई।
“प्रताप… दरवाजा खोल दो…”
प्रताप सिंह के हाथ से लालटेन लगभग छूट गई। वह आवाज़ गौरा की थी। उन्होंने खुद को समझाया कि यह उनके मन का डर है और तेजी से कमरे में लौटकर दरवाजा बंद कर लिया। तभी खिड़की के शीशे पर किसी के हाथ की छाप उभरी।
खिड़की के बाहर लाल शादी के जोड़े में एक लड़की खड़ी थी। उसके बाल भीगे हुए थे और माथे पर मिट्टी तथा खून लगा था। उसके पैरों के नीचे कीचड़ था, जबकि बाहर की जमीन सूखी थी।
प्रताप सिंह पीछे हट गए। “क… कौन है?”
लड़की ने धीरे-धीरे घूँघट उठाया। उसका चेहरा गौरा का था, लेकिन आँखें पूरी तरह काली थीं। उसने पूछा, “जब मैं मदद माँग रही थी, तब तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला?”
प्रताप सिंह ने दरवाजा खोलकर भागने की कोशिश की, लेकिन कुंडी नहीं हिली। पीछे से घुँघरुओं की आवाज़ आई। वह पलटे, तो गौरा अब खिड़की के बाहर नहीं, बल्कि कमरे के बीचोंबीच खड़ी थी।
“मैंने कुछ नहीं किया! दीवार अपने आप गिरी थी!” वह चिल्लाए।
गौरा उनके करीब आई। उसके कपड़ों से मिट्टी और सड़े पानी की गंध आ रही थी। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “दीवार गिरी थी, लेकिन दरवाजा तुमने बंद किया था।”
अचानक लालटेन बुझ गई। अँधेरे में प्रताप सिंह को लगा कि किसी ने उनकी गर्दन पकड़ ली है। उन्होंने हाथ-पैर मारे, लेकिन आवाज़ गले में ही दब गई। फिर किसी भारी चीज के गिरने की आवाज़ आई।
सुबह ओमप्रकाश काका उन्हें जगाने पहुँचे। प्रताप सिंह फर्श पर मृत पड़े थे। उनकी आँखें खुली थीं और चेहरा डर से बिगड़ा हुआ था। दरवाजे के पास गीली मिट्टी में छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे, जो बिस्तर तक जाते थे।
दीवार पर गीली मिट्टी से लिखा था—
“पहला हिसाब पूरा हुआ।”
ओमप्रकाश काका घबराकर पीछे हटे। तभी पुराने कमरे की दिशा से तीन बार घुँघरू बजे। वह बिना पीछे देखे हवेली से बाहर भाग गए।
केशव की परछाईं
पिता की मौत के बाद केशव डर गया था, लेकिन उसे अपनी संपत्ति खोने की चिंता भी थी। उसने सोचा कि हवेली बेचने से पहले पुराने कागज और कीमती सामान निकाल लेने चाहिए। गाँववालों से उसने कहा कि उसके पिता की मौत शायद दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। उसे गौरा की आत्मा की बात पर विश्वास नहीं था।
एक रात वह लाल डोली वाले कमरे में पहुँचा। लालटेन लेकर उसने संदूक खोला और कागज निकालने लगा। तभी उसकी नजर दीवार पर पड़ी। वहाँ उसकी परछाईं दिखाई दे रही थी, लेकिन वह उसकी हरकतों की नकल नहीं कर रही थी।
केशव ने दायाँ हाथ उठाया, मगर परछाईं स्थिर रही। उसने लालटेन नीचे की, फिर भी परछाईं के हाथ में रोशनी दिखाई देती रही। धीरे-धीरे उसके सिर पर लाल घूँघट उभर आया।
केशव के हाथ से कागज गिर गए। उसने दरवाजे की ओर दौड़ लगाई, लेकिन दरवाजा बंद हो चुका था। तभी डोली के भीतर से नाखून रगड़ने की आवाज़ आने लगी।
खर्र… खर्र… खर्र…
डोली का पर्दा अपने आप उठ गया। अंदर दो गंदे हाथ दिखाई दिए। उँगलियों पर गीली मिट्टी लगी थी और नाखूनों के नीचे पत्थर के छोटे टुकड़े फँसे थे।
“तुमने भी मेरी आवाज़ सुनी थी, केशव।”
केशव घुटनों के बल बैठ गया। “मैंने तो बस अपने पिता की बात मानी थी। मैंने तुम्हें नहीं मारा। मुझे छोड़ दो!”
“तुम दरवाजा खोल सकते थे, लेकिन तुमने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया।”
केशव ने सिर झुका लिया। तभी उसके पीछे किसी के चलने की आवाज़ आई। वह पलटा, तो उसकी अपनी परछाईं सामने खड़ी थी। उसका चेहरा केशव जैसा नहीं था। सिर पर लाल घूँघट था और मुँह से काला पानी बह रहा था।
परछाईं ने उसकी बाँह पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं। केशव ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन वह उसे घसीटते हुए डोली के पास ले गई। अचानक कमरे में अँधेरा छा गया। कुछ देर तक केशव की चीखें सुनाई देती रहीं, फिर सब शांत हो गया।
सुबह उसका शरीर पुराने कमरे के बाहर मिला। दरवाजा अंदर से बंद था और चाबी उसकी जेब में पड़ी थी। उसकी मुट्ठी में लाल कपड़े का एक टुकड़ा था। उस दिन के बाद गाँववालों ने हवेली की तरफ जाना छोड़ दिया। ओमप्रकाश काका भी गाँव छोड़कर चले गए।
देवकी देवी को सुनाई दी गौरा की आवाज़
प्रताप सिंह और केशव की मौत के बाद देवकी देवी हवेली में अकेली रह गईं। वह रणवीर की माँ थीं। उन्हें पता था कि गौरा के साथ अन्याय हुआ है, लेकिन उन्होंने अपने पति का विरोध नहीं किया था। उन्हें डर था कि सच सामने आने पर परिवार की बदनामी होगी। अब अपनी चुप्पी याद करके उन्हें रात भर नींद नहीं आती थी।
एक रात ठीक दो बजे उनके कमरे के बाहर घुँघरू बजे। उन्होंने दरवाजा खोला, तो सामने लाल डोली रखी थी। उसके पर्दे से पानी टपक रहा था और फर्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।
अंदर से आवाज़ आई, “माँ… मुझे घर जाना है।”
देवकी देवी की आँखों में आँसू आ गए। “गौरा, मुझे माफ कर दे। मैं तुम्हें बचा सकती थी। मुझे सच बोलना चाहिए था।”
डोली का पर्दा खुला। गौरा का चेहरा दिखाई दिया। उसके माथे पर गहरा घाव था और बालों में मिट्टी भरी हुई थी। आवाज़ अचानक देवकी देवी के पीछे से आई।
“जब मैं उस कमरे में मदद माँग रही थी, तब तुमने भी मेरी आवाज़ सुनी थी।”
देवकी देवी पलटीं। गौरा उनके ठीक पीछे खड़ी थी। उसके लाल जोड़े से पानी टपक रहा था।
“मैं डर गई थी, बेटी। मुझे लगा कि अगर मैंने कुछ कहा, तो मेरा परिवार बर्बाद हो जाएगा।”
गौरा ने सिर एक तरफ झुका लिया। उसकी गर्दन से हड्डी टूटने जैसी आवाज़ आई।
“मेरा जीवन बचाने से ज्यादा तुम्हें अपने परिवार की इज्जत प्यारी थी।”
देवकी देवी ने हाथ जोड़ दिए। “मुझे माफ कर दे।”
गौरा ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ इतनी ठंडी थीं कि देवकी देवी की चीख निकल गई। कमरे की दीवारों से पानी रिसने लगा और फर्श पर गीली मिट्टी फैल गई। देखते ही देखते कमरा उसी पुराने बंद कमरे जैसा दिखाई देने लगा, जहाँ गौरा ने अपनी आखिरी रात बिताई थी।
देवकी देवी दरवाजे की ओर भागीं, लेकिन रास्ता बंद था। उन्होंने जोर-जोर से दरवाजा पीटा। दीवार के पीछे से गौरा के रोने की आवाज़ आने लगी और फिर उनके कान के पास आकर रुक गई।
“अब तुम्हें पता चलेगा कि बंद कमरे में कैद होना कैसा लगता है।”
अगली सुबह देवकी देवी अपने बिस्तर के पास मृत मिलीं। कमरे का फर्श सूखा था, लेकिन उनके पैरों के आसपास गीली मिट्टी फैली थी। दरवाजे पर लाल उँगलियों के पाँच निशान बने थे। अब हवेली में रहने वाला कोई नहीं बचा था।
रणवीर की वापसी और गौरा का आखिरी सवाल
गाँव से दूर रहने के बाद रणवीर ने शादी कर ली थी। उसका एक बेटा हुआ, जिसका नाम मोहन था। उसने अपनी पत्नी और बेटे को गौरा के बारे में कभी नहीं बताया। वह पुराने जीवन को भूलना चाहता था, लेकिन हर रात उसे सपना आता कि गौरा लाल डोली में बैठी उससे पूछ रही है कि वह शादी के दिन क्यों नहीं आया।
एक दिन उसे खबर मिली कि उसके पिता, भाई और माँ की मौत हो चुकी है। गाँव से आए एक आदमी ने बताया कि तीनों की मौत से पहले हवेली में रात के दो बजे घुँघरू बजते थे। यह सुनकर रणवीर को गौरा की याद आई। उसे एहसास हुआ कि जिस सच से वह वर्षों तक भागता रहा, वह अब भी उसका पीछा कर रहा था।
कुछ दिनों तक वह गाँव लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। आखिर उसने तय किया कि हवेली जाकर गौरा से माफी माँगेगा। उसे लगा कि शायद सच स्वीकार करने से उसका डर खत्म हो जाए।
जब रणवीर हवेली पहुँचा, तो आँगन में सूखे पत्ते भरे थे। दरवाजों पर जाले लगे थे और कमरों से सीलन की गंध आ रही थी। वह उस कमरे तक पहुँचा जहाँ लाल डोली रखी थी। उसके सामने ताजे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।
रणवीर ने काँपती आवाज़ में पुकारा, “गौरा… मैं लौट आया हूँ।”
पहले कोई जवाब नहीं आया। फिर डोली के घुँघरू अपने आप बजने लगे। पर्दा हिला और गौरा बाहर आ गई। उसका लाल जोड़ा मिट्टी से भरा था, माथे का घाव खुला हुआ था और आँखों से काले आँसू बह रहे थे।
रणवीर उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। “मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें बचा सकता था, लेकिन अपने पिता से डर गया। मुझे लगा था कि कुछ समय बाद सब ठीक हो जाएगा।”
गौरा ने उसे ध्यान से देखा। “तुम्हें याद है, मैं उस रात कितनी देर तक तुम्हारा इंतजार करती रही थी?”
रणवीर रो पड़ा। “मुझे सब याद है। मैं जानता हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ गलत किया।”
“जब मैं बंद कमरे में मदद माँग रही थी, तब तुम कहाँ थे?”
रणवीर ने सिर झुका लिया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।
गौरा उसके करीब आई। “तुम्हारे पिता ने दरवाजा बंद किया। तुम्हारे भाई ने उसे खुलने नहीं दिया और तुम्हारी माँ सच जानते हुए भी चुप रही। लेकिन तुमने मुझे सबसे बड़ा धोखा दिया। तुमने वादा किया था कि तुम आओगे।”
रणवीर ने हाथ जोड़कर कहा, “मुझे जो सजा देनी है, दे दो। लेकिन मेरे बेटे को कुछ मत करना। उसे इस कहानी के बारे में कुछ पता नहीं है।”
गौरा के चेहरे पर दर्द उभरा। “मुझे किसी का बुरा नहीं चाहिए था, रणवीर। मैं तो सिर्फ अपना घर बसाना चाहती थी। लेकिन तुम सबने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया।”
उसी समय कमरे के दरवाजे अपने आप बंद हो गए। डोली के पीछे तीन परछाइयाँ दिखाई दीं। प्रताप सिंह, केशव और देवकी देवी के चेहरे साफ नजर आ रहे थे। वे चुपचाप रणवीर को देख रहे थे।
रणवीर पीछे हटने लगा, लेकिन गौरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह हिल भी नहीं पाया।
“तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया था। अब तुम भी अकेले रहोगे।”
डोली का पर्दा खुला। उसके भीतर गहरा अँधेरा था। रणवीर ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन गौरा उसे डोली की ओर खींचने लगी। वह पूरी ताकत से चिल्लाया, “मुझे छोड़ दो! गौरा, मुझे माफ कर दो!”
गौरा ने उसकी आँखों में देखा। “मैंने भी तुम्हें पुकारा था। तुम नहीं आए।”
अचानक रणवीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई। उसे लगा जैसे वह किसी गहरे कुएँ में गिर रहा हो। उसने डोली का किनारा पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसकी उँगलियाँ लकड़ी के आर-पार निकल गईं। अगले ही पल वह डोली के भीतर खिंच गया और पर्दा अपने आप बंद हो गया।
कमरे में एक तेज चीख गूँजी। फिर घुँघरू बजने लगे। आवाज़ बंद हुई, तो वहाँ कोई नहीं था। केवल रणवीर की घड़ी फर्श पर पड़ी थी। उसकी सुइयाँ दो बजकर तेरह मिनट पर रुक गई थीं।
सुबह गाँववालों ने हवेली में खोजबीन की, लेकिन रणवीर का कोई निशान नहीं मिला। किसी ने उसका शव नहीं देखा। वह ऐसे गायब हुआ, जैसे कभी वहाँ आया ही न हो।
रणवीर के वंशज तक पहुँचा गौरा का डर
रणवीर के गायब होने के बाद उसका बेटा मोहन शहर में रहने लगा। रणवीर की पत्नी ने उसे बताया कि उसके पिता एक दिन गाँव गए थे और फिर कभी वापस नहीं आए। समय बीतता गया। मोहन बड़ा हुआ, उसकी शादी हुई और उसके परिवार में अगली पीढ़ी आई। परिवार ने खावड़ा और पुरानी हवेली से अपना रिश्ता लगभग खत्म कर दिया।
मोहन के बेटे देवेंद्र की मृत्यु के बाद उसके बेटे निखिल को परिवार के कुछ पुराने दस्तावेज मिले। उनमें हवेली की जमीन से जुड़ा एक कागज भी था। निखिल को पता चला कि संपत्ति उत्तराखंड के खावड़ा गाँव में है। उसने फैसला किया कि वह गाँव जाकर हवेली देखेगा। उसे पुरानी जगहों के वीडियो बनाना पसंद था और वह इस हवेली की कहानी भी रिकॉर्ड करना चाहता था।
खावड़ा पहुँचकर उसकी मुलाकात भीम सिंह नाम के एक बुजुर्ग से हुई। भीम सिंह ने उसे गौरा, लाल डोली और रात के दो बजे सुनाई देने वाली आवाज़ों के बारे में बताया। निखिल हँस पड़ा।
“इतने साल पुरानी बात को लोग अब तक सच मानते हैं? भूत-प्रेत जैसी चीजें सिर्फ कहानियों में होती हैं।”
भीम सिंह ने गंभीर होकर कहा, “अगर यह सिर्फ कहानी होती, तो रणवीर उस हवेली से गायब क्यों होता? उसके पिता, भाई और माँ की मौत के बाद वह वहाँ गया था। फिर कोई उसे नहीं देख पाया।”
निखिल की मुस्कान गायब हो गई। उसने पूछा, “रणवीर का मुझसे क्या संबंध है?”
भीम सिंह ने बताया कि रणवीर उसका परदादा था। निखिल को अपने परिवार का इस डरावनी कहानी से संबंध होने पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उसने हवेली जाकर सब कुछ कैमरे में रिकॉर्ड करने का फैसला किया।
भीम सिंह ने उसे रोकने की कोशिश की। “दिन में जाना हो तो चले जाना, लेकिन रात में वहाँ मत रुकना। खासकर दो बजे के समय तो बिल्कुल नहीं।”
निखिल ने उनकी बात गंभीरता से नहीं ली। भीम सिंह ने जाते-जाते उसे चेतावनी दी, “अगर वहाँ कोई औरत तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारे, तो जवाब मत देना। उसकी आवाज़ पर भरोसा मत करना।”
निखिल की आखिरी रात
रात करीब साढ़े ग्यारह बजे निखिल मोबाइल और टॉर्च लेकर हवेली पहुँचा। गाँव की गलियाँ खाली थीं और दूर जंगल से झींगुरों की आवाज़ आ रही थी। हवेली के पास पहुँचते ही उसे गीली मिट्टी की गंध आई। मुख्य दरवाजा आधा खुला था, जबकि गाँववालों का कहना था कि उसे कई साल से किसी ने नहीं खोला था।
निखिल ने मोबाइल पर रिकॉर्डिंग शुरू की और अंदर चला गया। गलियारे में धूल जमी थी। उसने एक-एक कमरा देखा। कहीं टूटी कुर्सियाँ थीं, कहीं पुराने बर्तन और कहीं दीवार से लटकते कपड़े। हर कमरे में उसे अजीब ठंड महसूस हो रही थी।
आखिर वह उस कमरे में पहुँचा जहाँ लाल डोली रखी थी। उसने कैमरा उसकी ओर किया और कहा, “यह वही डोली है, जिसके बारे में गाँव के लोग कहते हैं कि इसमें एक दुल्हन की आत्मा रहती है। मैं यहाँ रात बिताकर देखूँगा कि सच क्या है।”
उसने टॉर्च डोली के अंदर डाली। वह खाली थी। सामने गीले पैरों के निशान बने थे, जो डोली तक पहुँचकर खत्म हो जाते थे। निखिल ने उन्हें रिकॉर्ड किया और हँसते हुए कहा कि शायद किसी जानवर के पैरों के निशान होंगे।
तभी उसके पीछे घुँघरुओं की आवाज़ आई। निखिल ने पलटकर देखा, लेकिन कमरा खाली था। वह फिर डोली की ओर मुड़ा, तो उसका शरीर ठंडा पड़ गया। अब डोली के भीतर लाल जोड़े में एक स्त्री बैठी थी। उसका घूँघट नीचे तक लटक रहा था और उँगलियों से पानी टपक रहा था।
निखिल के हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। “गौरा?”
स्त्री ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसके चेहरे पर मिट्टी चिपकी थी, माथे पर गहरा घाव था और आँखों में सफेदी नहीं दिख रही थी। निखिल पीछे हट गया, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जम गए थे।
गौरा ने पूछा, “तुम रणवीर के परिवार से हो?”
निखिल ने काँपते हुए कहा, “हाँ… वह मेरे परदादा थे। मुझे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता था।”
गौरा डोली से बाहर आई। उसके पैर जमीन को छूते, तो वहाँ गीली मिट्टी फैल जाती। वह निखिल के सामने आकर रुकी।
“तुम्हारे परिवार ने मेरी मौत का सच छिपाया। सबने मुझे अकेला छोड़ दिया। अब कोई मेरी बात सुनने नहीं आता।”
निखिल ने हाथ जोड़ दिए। “मैं सुबह सबको सच बता दूँगा। तुम्हारी कहानी लोगों तक पहुँचाऊँगा। मुझे जाने दो।”
गौरा ने उसकी ओर देखा। “तुम्हारे परदादा ने भी मुझसे वादा किया था। उसने कहा था कि वह आएगा। मैं सारी रात डोली में बैठी रही, लेकिन वह नहीं आया।”
निखिल ने दरवाजे की तरफ देखा। वह अपने आप बंद हो चुका था। उसने कुंडी खींची, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। मोबाइल से मदद माँगने की कोशिश की, पर नेटवर्क नहीं था। तभी स्क्रीन पर उसके पीछे एक लंबी काली आकृति दिखाई दी।
निखिल ने झटके से पलटकर देखा। वहाँ कोई नहीं था। उसने फिर स्क्रीन की ओर देखा। इस बार वह आकृति डोली के भीतर बैठी थी। उसका चेहरा निखिल जैसा था, लेकिन आँखें काली थीं और होंठों पर अजीब मुस्कान थी।
उसी समय गौरा ने उसके कान के पास फुसफुसाकर कहा, “अब तुम्हें पता चलेगा कि बंद कमरे में मदद माँगना कैसा होता है।”
निखिल ने भागने की कोशिश की। तभी फर्श की दरारों से काले धुएँ जैसी परछाइयाँ निकलने लगीं और उसके पैरों से लिपट गईं। उसने उन्हें झटकने की कोशिश की, लेकिन वे उसे डोली की ओर खींचने लगीं।
“मुझे छोड़ दो! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?” निखिल चीखा।
गौरा की आँखों से आँसू बहने लगे। “मैंने भी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था।”
निखिल ने दरवाजे की चौखट पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ लकड़ी में धँस गईं, लेकिन परछाइयाँ उसे खींचती रहीं। डोली का पर्दा अपने आप खुल गया। उसके भीतर ऐसा अँधेरा था, जिसमें टॉर्च की रोशनी भी गायब हो रही थी।
घड़ी में दो बजकर तेरह मिनट हुए। उसी पल निखिल की पकड़ छूट गई और उसका शरीर डोली के भीतर खिंच गया। उसने आखिरी बार मदद के लिए चीख लगाई। फिर पर्दा बंद हो गया।
कमरे में सन्नाटा छा गया। फर्श पर केवल निखिल का मोबाइल पड़ा था। रिकॉर्डिंग अब भी चल रही थी, लेकिन स्क्रीन पर किसी का चेहरा नहीं था। कुछ क्षण बाद एक धीमी आवाज़ सुनाई दी।
“अब मेरी डोली खाली नहीं है।”
लाल डोली में कैद दो आत्माएँ
सुबह निखिल के मामा और भीम सिंह हवेली पहुँचे। निखिल रात भर घर नहीं लौटा था, इसलिए वे उसे खोजते हुए वहाँ आए थे। कमरे में उसके जूतों के निशान लाल डोली के सामने जाकर खत्म हो जाते थे। उसका मोबाइल फर्श पर पड़ा था।
मामा ने काँपते हाथों से मोबाइल उठाया और रिकॉर्डिंग चलाई। शुरुआत में निखिल कैमरे के सामने बोल रहा था। फिर डोली दिखाई दी और उसके बाद गौरा का चेहरा स्क्रीन पर उभरा। जब निखिल मदद के लिए चिल्लाया, तो वीडियो हिलने लगा। आखिरी दृश्य में डोली का पर्दा अपने आप बंद होता दिखाई दिया।
रिकॉर्डिंग खत्म होने से ठीक पहले एक स्त्री की आवाज़ आई—
“मेरी विदाई अभी बाकी है।”
निखिल के मामा ने उसे बहुत खोजा और पुलिस को भी खबर दी, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। कमरे में बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था। खिड़कियाँ बंद थीं और दरवाजे पर अंदर से कुंडी लगी थी। फिर भी निखिल वहाँ नहीं था।
गाँववालों ने हवेली से दूरी बना ली। कुछ दिनों तक निखिल की चर्चा होती रही, फिर धीरे-धीरे उसकी बात भी पुरानी पड़ गई। लेकिन रात के दो बजे घुँघरुओं की आवाज़ आना बंद नहीं हुई।
एक साल बाद उसी रात गाँव के कुछ लोगों ने हवेली की ऊपरी खिड़की में लाल रोशनी देखी। दूर खड़े होकर उन्होंने देखा कि डोली के भीतर दो आकृतियाँ बैठी थीं। एक गौरा थी और दूसरी आकृति निखिल जैसी लग रही थी।
कुछ देर बाद डोली के अंदर से आवाज़ आई, “गौरा, मेरी विदाई कब होगी?”
गौरा ने धीरे से जवाब दिया, “जब अगली सवारी आएगी।”
दूसरी आकृति ने चेहरा उठाया। वह सचमुच निखिल था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं। उसके चेहरे पर न खुशी थी, न दुख। वह सामने देख रहा था, जैसे अब उसे अपनी कैद का एहसास भी नहीं रहा हो।
उस रात के बाद गाँववालों ने हवेली की खिड़की में दो परछाइयाँ कई बार देखीं। कभी दोनों चुपचाप बैठी रहतीं, तो कभी गौरा के रोने की आवाज़ आती। कुछ लोगों का कहना था कि डोली के भीतर से दरवाजा खोलने की पुकार भी सुनाई देती है। वह आवाज़ निखिल की होती थी।
गाँव के बूढ़े कहते हैं कि गौरा ने उन लोगों से बदला लिया, जिन्होंने उसे धोखा दिया और बंद कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया। रणवीर को उसने डोली में कैद कर लिया और बाद में निखिल भी उसी डोली का हिस्सा बन गया। अब कोई नहीं जानता कि वह अगली सवारी किसे बनाएगी।
खावड़ा गाँव में आज भी लोग रात के दो बजे अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। अगर बाहर से घुँघरुओं की आवाज़ सुनाई दे, तो कोई जवाब नहीं देता। गाँववालों का मानना है कि उस आवाज़ के बाद एक लड़की की पुकार जरूर सुनाई देती है।
“क्या तुम मेरी विदाई करवाने आए हो?”
कहते हैं, अगर कोई इस सवाल का जवाब दे दे, तो लाल डोली का पर्दा अपने आप खुल जाता है। उसके भीतर गौरा बैठी होती है और उसके पास एक खाली जगह होती है।
उस जगह पर किसे बैठना है, यह गौरा पहले ही तय कर चुकी होती है।
खावड़ा की पुरानी हवेली में आज भी हर रात दो बजे घुँघरू बजते हैं। लाल डोली में बैठी गौरा अपनी अधूरी विदाई का इंतजार करती है। और गाँववालों के दिलों में आज भी लाल डोली का खौफ जिंदा है।




