क्या सुहागरात की पहली रात ही एक ऐसा फैसला हो सकता है, जो पूरे परिवार की जिंदगी बदल दे?
रोहित और पवित्रा की नई जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी, तभी घर में अचानक बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
जिस रात घर में खुशियाँ होनी चाहिए थीं, उसी रात रिश्तों के बीच संपत्ति को लेकर तनाव बढ़ने लगा।
रोहित के पिता हरिदास अपने भाई मोहनदास पर भरोसा करते थे, लेकिन उस भरोसे के पीछे क्या छिपा था?
बंटवारे की बात अचानक इतनी गंभीर क्यों हो गई और कुछ कागजों ने सबको चिंता में क्यों डाल दिया?
पवित्रा ने परिवार का झगड़ा शांत कराने के लिए एक बात कही, लेकिन क्या वही बात उसके खिलाफ चली जाएगी?
कुछ दिनों बाद सामने आया एक ऐसा सच, जिसने हरिदास के परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी।
घर, कर्ज और रिश्तों से जुड़ा ऐसा रहस्य सामने आया, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।
पवित्रा पर सवाल उठने लगे, जबकि वह खुद इस परिवार को टूटने से बचाने की कोशिश कर रही थी।
इसी बीच उसकी जिंदगी में कॉलेज का पुराना दोस्त अविनाश फिर से एक महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई देता है।
अविनाश बेहद संपन्न परिवार से था, लेकिन पवित्रा के लिए वह आज भी सिर्फ एक भरोसेमंद दोस्त था।
क्या अविनाश इस परिवार की मुश्किलें दूर कर पाएगा या कहानी में कोई और बड़ा राज छिपा है?
मोहनदास आखिर ऐसा क्या चाहता था, जिसके लिए उसने अपने ही भाई के सामने इतना बड़ा कदम उठाया?
हरिदास क्यों चुपचाप सबकुछ सहने को तैयार हो गए और पवित्रा ने अचानक कौन सा फैसला लिया?
इस परिवार की कहानी में हर मोड़ के साथ एक नया सवाल खड़ा होता है और हर जवाब नया रहस्य खोलता है।
जानिए कैसे एक नई बहू के सामने ऐसा संकट आया, जिसने उसके धैर्य और रिश्तों की सच्चाई दोनों को परख लिया।
नई दुल्हन पवित्रा का पहला दिन। Family Story In Hindi

कल ही रोहित और पवित्रा की शादी धूमधाम से हुई थी, और आज उनके जीवन की नई शुरुआत होने वाली थी।
सुबह से ही हरिदास के घर में रिश्तेदारों और मेहमानों की भीड़ लगी हुई थी, जिससे पूरा घर खुशियों से भरा दिखाई दे रहा था।
आँगन में महिलाएँ बैठकर शादी की बातें कर रही थीं, जबकि बच्चे इधर-उधर दौड़ते हुए घर में शोर मचा रहे थे।
सुनीता देवी अपनी नई बहू पवित्रा को बार-बार देखतीं, लेकिन उनके चेहरे पर खुशी के साथ कुछ अनकहा भाव भी दिखाई देता था।
साक्षी अपनी भाभी के पास बैठी रही और बार-बार उनसे बातें करती, क्योंकि पवित्रा का शांत स्वभाव उसे पहली नजर में पसंद आया था।
पवित्रा भी मुस्कुराकर सबकी बातें सुन रही थी, लेकिन नए घर के माहौल को समझने की कोशिश कर रही थी।
उसे मन ही मन डर था कि पता नहीं आने वाले दिनों में ससुराल के लोग उसे कितना अपनाएँगे।
फिर भी उसने अपने मन में तय किया था कि वह रिश्तों को पूरी ईमानदारी और प्यार से निभाने की कोशिश करेगी।
शाम होते-होते घर में मेहमानों की भीड़ कम होने लगी और धीरे-धीरे पूरा घर रात की शांति में बदलने लगा।
सुहागरात का सजा हुआ कमरा

पवित्रा के लिए कमरे को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया था, जहाँ फूलों की खुशबू और हल्की रोशनी मनमोहक वातावरण बना रही थी।
पवित्रा को भी लाल रंग की सुंदर साड़ी पहनाकर दुल्हन की तरह सजाया गया था, जिससे उसका चेहरा और ज्यादा खिल उठा था।
वह पलंग के किनारे चुपचाप बैठी थी और अपने नए जीवन के बारे में सोच रही थी।
तभी दरवाजा धीरे से खुला और रोहित कमरे के अंदर आया, जिसके चेहरे पर हल्की मुस्कान दिखाई दे रही थी।
रोहित कुछ पल पवित्रा को देखता रहा, फिर धीरे से उसके पास बैठकर बोला, “आज का दिन तुम्हारे लिए बहुत थकाने वाला रहा होगा।”
पवित्रा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, लेकिन शादी के बाद ऐसा होना तो स्वाभाविक है।”
रोहित ने पूछा, “तुम्हें मेरा घर और यहाँ के लोग कैसे लगे? अगर कोई बात बुरी लगी हो, तो मुझे जरूर बताना।”
पवित्रा ने कुछ पल सोचकर कहा, “सब अच्छे हैं, बस नया घर होने के कारण मुझे थोड़ा समय लगेगा।”
रोहित ने उसका हाथ थामते हुए कहा, “तुम्हें किसी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।”
पवित्रा ने रोहित की ओर देखा और बोली, “मुझे बस इतना चाहिए कि हम दोनों हर परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ दें।”
रोहित ने मुस्कुराकर कहा, “यह वादा रहा, चाहे जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”
दोनों काफी देर तक अपने बचपन, पसंद, सपनों और आने वाले जीवन के बारे में बातें करते रहे।
पवित्रा को पहली बार महसूस हुआ कि शायद उसे ऐसा जीवनसाथी मिला है, जो उसके मन की बात समझ सकता है।
लेकिन किस्मत ने उस रात उनके लिए ऐसी परीक्षा तैयार कर रखी थी, जिसकी उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी।
रात साढ़े ग्यारह बजे मचा हंगामा

रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे अचानक बाहर से तेज आवाजें आने लगीं, जिससे पवित्रा और रोहित दोनों चौंककर खड़े हो गए।
दरवाजे के बाहर मोहनदास गुस्से में चिल्ला रहा था और उसके साथ उसका बेटा जतिन भी खड़ा था।
मोहनदास सीधे हरिदास के सामने पहुँचा और ऊँची आवाज में बोला, “मुझे मेरे पैसे अभी चाहिए, आज ही घर का बंटवारा होगा।”
हरिदास ने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा, “भाई, आज रोहित की शादी हुई है, सुबह बैठकर आराम से सारी बात कर लेंगे।”
मोहनदास ने गुस्से में कहा, “मैंने बहुत इंतजार कर लिया, अब मुझे सुबह तक कोई इंतजार नहीं करना है।”
जतिन भी अपने पिता के पीछे खड़ा था और लगातार अपने पिता की बातों का समर्थन कर रहा था।
हरिदास ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “मोहन, आज घर में खुशी का मौका है, कल सुबह तुम्हारा हिस्सा पूरी ईमानदारी से दे दूँगा।”
मोहनदास ने तुरंत जवाब दिया, “हर बार यही कहते हो, लेकिन अब मैं किसी बात पर भरोसा नहीं करूँगा।”
आवाजें बढ़ती गईं और घर में मौजूद कुछ रिश्तेदार भी बाहर निकलकर उस झगड़े को देखने लगे।
शोर सुनकर रोहित भी कमरे से बाहर आया और उसने अपने चाचा मोहनदास को शांत करने की कोशिश की।
रोहित ने कहा, “चाचा जी, आप चिंता मत करिए, सुबह आपका बंटवारा बिल्कुल सही तरीके से करवा देंगे।”
मोहनदास ने रोहित की तरफ देखते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मैं आज ही फैसला चाहता हूँ।”
रोहित ने अपने पिता हरिदास की ओर देखा, जिन्हें अचानक पैदा हुई इस स्थिति से काफी परेशानी हो रही थी।
पवित्रा ने रखी एक बात

तभी पवित्रा भी अपने कमरे से बाहर आ गई और उसने देखा कि पूरा परिवार तनाव में खड़ा हुआ था।
सुनीता देवी ने पवित्रा को देखते ही नाराज नजरों से देखा, जैसे उन्हें उसके बाहर आने से भी परेशानी हो रही हो।
पवित्रा ने सबकी तरफ देखते हुए शांत आवाज में कहा, “अगर बंटवारा कल होना ही है, तो आज कर देने में शायद मामला शांत हो जाएगा।”
उसकी बात सुनकर सुनीता देवी और साक्षी दोनों ने उसे हैरानी से देखा, क्योंकि उन्हें लगा कि पवित्रा को बीच में नहीं बोलना चाहिए।
लेकिन पवित्रा ने किसी की नाराजगी की परवाह नहीं की और बोली, “रात में झगड़ा करने से कोई फायदा नहीं होगा, बेहतर है फैसला अभी कर लिया जाए।”
मोहनदास ने तुरंत उसकी बात का समर्थन किया और कहा, “देखा हरिदास, तुम्हारी बहू भी समझती है कि बात आज ही खत्म होनी चाहिए।”
हरिदास कुछ देर चुप रहे, फिर उन्होंने मजबूरी में बंटवारे के लिए कागज और जरूरी दस्तावेज मंगवाने की बात कही।
किसी को अंदाजा नहीं था कि मोहनदास पहले से ही पूरी तैयारी करके आया था और उसके पास कागज तैयार थे।
बंटवारे के पीछे छिपी चाल

कुछ देर बाद मोहनदास ने कागज निकालकर सबके सामने रख दिए, जिन्हें देखकर हरिदास को थोड़ी हैरानी हुई।
हरिदास ने कागजों को ध्यान से देखा और पूछा, “मोहन, ये कागज पहले से तैयार करवाकर क्यों लाए हो?”
मोहनदास ने बिना घबराए कहा, “मैं बस चाहता था कि आज कोई बहाना न बने और फैसला तुरंत पूरा हो जाए।”
रोहित ने भी कागजों को ध्यान से देखने की कोशिश की, लेकिन देर रात होने के कारण सब कुछ समझना आसान नहीं था।
बंटवारे की बातचीत शुरू हुई और संपत्ति के हिस्से तय किए जाने लगे, लेकिन मोहनदास लगातार अपनी बात मनवाने की कोशिश करता रहा।
धीरे-धीरे हरिदास को एहसास होने लगा कि कागजों में कुछ हिस्से उसके लिए नुकसानदायक तरीके से लिखे गए थे।
लेकिन परिवार में बढ़ते विवाद को देखकर वह उस समय ज्यादा बहस नहीं करना चाहते थे।
मोहनदास ने चालाकी से अपनी तरफ आने वाली संपत्ति का हिस्सा अधिक रखा और कई जिम्मेदारियाँ हरिदास के हिस्से डाल दीं।
सबसे बड़ी परेशानी तब सामने आई, जब लगभग बीस लाख रुपये का कर्ज हरिदास के हिस्से में आने की बात सामने आई।
हरिदास ने घबराकर पूछा, “इतना बड़ा कर्ज मेरे हिस्से में कैसे आ गया?”
मोहनदास ने तुरंत कहा, “भाई, जो कर्ज तुम्हारे नाम से जुड़ा है, उसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी।”
हरिदास को अपनी जिंदगी में पहली बार लगा कि उनका अपना भाई ही उनके साथ इतना बड़ा छल कर रहा है।
फिर मोहनदास ने पुराने कर्ज की कुछ रकम खुद भरने का नाटक किया, जिससे सबको लगा कि वह भी जिम्मेदारी निभा रहा है।
लेकिन असल में उसने अपने लिए ज्यादा संपत्ति बचा ली और अधिकांश आर्थिक बोझ हरिदास के हिस्से में डाल दिया।
चार बजे हुआ बंटवारा

आखिरकार आधी रात के बाद कागजों पर हस्ताक्षर होने लगे और परिवार के सामने बंटवारे की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
पवित्रा चुपचाप सब देख रही थी, लेकिन उसके मन में लगातार यह सवाल उठ रहा था कि कहीं कोई गलती तो नहीं हुई।
मोहनदास ने कागजों को अपने पास सुरक्षित रखा और जतिन के साथ वहाँ से जाने की तैयारी करने लगा।
रात के लगभग चार बज चुके थे और घर में शादी की सारी खुशियाँ अचानक भारी खामोशी में बदल चुकी थीं।
मेहमान अपने कमरों में जा चुके थे और आँगन में पड़े फूल भी उस रात की थकान की कहानी सुना रहे थे।
मोहनदास और जतिन के जाने के बाद हरिदास एक जगह चुपचाप बैठे रहे और लगातार जमीन की ओर देखते रहे।
तभी सुनीता देवी ने पवित्रा की तरफ देखते हुए कहा, “बहू, तुम्हें बीच में बोलने की जरूरत नहीं थी।”
पवित्रा कुछ समझ पाती, उससे पहले सुनीता देवी ने कहा, “तुम्हारी बात मानकर आज हमारा कितना बड़ा नुकसान हो गया।”
पवित्रा की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने अपनी सास को जवाब देने की बजाय सिर झुका लिया।
तभी हरिदास ने तुरंत कहा, “सुनीता, बहू को दोष मत दो, उसने जो कहा था वह गलत नहीं था।”
उन्होंने आगे कहा, “गलती मोहनदास की चालाकी में हुई है, वह पहले से सब तैयारी करके आया था।”
हरिदास की बात सुनकर पवित्रा की आँखों से आँसू निकल आए और उसने पहली बार महसूस किया कि ससुर उसे समझते हैं।
हरिदास पर टूटा दुखों का पहाड़

बंटवारे के बाद हरिदास के पास वही घर बचा था जिसमें वह रह रहे थे, लेकिन साथ में भारी कर्ज भी आ गया था।
लगभग बीस लाख रुपये का कर्ज उनके सिर पर था और इतनी बड़ी जिम्मेदारी ने उन्हें अंदर से पूरी तरह हिला दिया।
हरिदास ने अपना माथा पकड़ लिया और धीमी आवाज में कहा, “मैं यह सब कैसे चुका पाऊँगा?”
रोहित तुरंत अपने पिता के पास बैठ गया और उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “पिताजी, आप बिल्कुल चिंता मत करिए।”
हरिदास ने बेटे की ओर देखा, लेकिन उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
रोहित ने कहा, “आपने पूरी जिंदगी हमारे लिए मेहनत की है, अब आपकी परेशानी मेरी जिम्मेदारी है।”
हरिदास ने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, बीस लाख रुपये कोई छोटी रकम नहीं है, तुम अकेले कैसे चुका पाओगे?”
रोहित ने दृढ़ता से कहा, “मैं मेहनत करूँगा, चाहे जितना समय लगे, लेकिन आपका कर्ज मैं खुद चुकाऊँगा।”
पवित्रा चुपचाप यह सब सुन रही थी और उसके मन में अपने पति के लिए सम्मान और भी बढ़ गया।
उसे समझ आ गया था कि रोहित सिर्फ उसका जीवनसाथी नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए जिम्मेदार बेटा भी है।
तभी हरिदास की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी और उन्हें चक्कर आने लगे, जिससे घर के सभी लोग घबरा गए।
रोहित और साक्षी तुरंत उन्हें संभालकर उनके कमरे में ले गए और सुनीता देवी ने घबराकर डॉक्टर को फोन किया।
कुछ देर बाद डॉक्टर ने आकर हरिदास की स्थिति देखी और उन्हें आराम करने की सलाह दी।
रोहित पूरी रात अपने पिता के पास बैठा रहा और बार-बार उन्हें हिम्मत देता रहा।
पवित्रा ने लिया एक बड़ा फैसला

सुबह होने लगी थी, लेकिन पवित्रा की आँखों में नींद नहीं थी और वह पूरी रात हुई घटनाओं के बारे में सोच रही थी।
उसने मन ही मन फैसला किया कि वह इस परिवार को टूटने नहीं देगी, चाहे उसे कितनी भी मुश्किलों का सामना करना पड़े।
सुनीता देवी अभी भी उससे नाराज थीं, लेकिन पवित्रा ने उनके प्रति अपने मन में कोई शिकायत नहीं रखी।
पवित्रा ने रोहित से धीरे से कहा, “आप अकेले यह कर्ज मत उठाइए, मैं भी आपके साथ खड़ी हूँ।”
रोहित ने उसकी ओर देखा और बोला, “पवित्रा, तुम्हें शादी के अगले ही दिन इतनी परेशानियाँ मिल गईं, मुझे बहुत बुरा लग रहा है।”
पवित्रा ने मुस्कुराकर कहा, “शादी सिर्फ खुशियों में साथ रहने का नाम नहीं, मुश्किल समय में साथ निभाने का नाम भी है।”
रोहित कुछ पल तक उसे देखता रहा और उसकी आँखों में सच्चाई साफ दिखाई दे रही थी।
उसे महसूस हुआ कि जिस लड़की को वह कल तक सिर्फ अपनी पत्नी समझता था, आज वही उसके परिवार की ताकत बन रही थी।
लेकिन पवित्रा को अभी यह पता नहीं था कि मोहनदास ने बंटवारे के कागजों में एक और ऐसी चाल छिपाई थी।
वह चाल कुछ दिनों बाद पूरे परिवार के सामने आने वाली थी और उसके बाद इस परिवार की जिंदगी फिर बदलने वाली थी।
मोहनदास की छिपी हुई चाल

बंटवारे वाली रात के बाद एक सप्ताह तक हरिदास के घर में अजीब सी खामोशी बनी रही, जैसे खुशियाँ अचानक कहीं खो गई थीं।
हरिदास धीरे-धीरे अपनी बीमारी से ठीक हो रहे थे, जबकि रोहित लगातार पिता की दवाइयों और घर की जिम्मेदारियों में लगा रहता था।
पवित्रा भी बिना शिकायत किए पूरे घर का काम संभाल रही थी और सुनीता देवी की नाराजगी के बावजूद उनका ध्यान रखती थी।
इसी बीच पवित्रा को अपने कॉलेज के पुराने दोस्त अविनाश की याद आई, जो उसकी शादी में भी शामिल हुआ था।
अविनाश और पवित्रा की दोस्ती कॉलेज के दिनों से थी और पढ़ाई पूरी होने के बाद भी दोनों एक-दूसरे के अच्छे दोस्त बने रहे।
अविनाश के पिता शहर की बहुत बड़ी कंपनी के मालिक थे और उनका परिवार बेहद संपन्न माना जाता था।
इतना पैसा और बड़ी हैसियत होने के बावजूद अविनाश के व्यवहार में जरा भी घमंड नहीं था, यही बात पवित्रा को हमेशा पसंद थी।
शादी में भी अविनाश साधारण कपड़ों में आया था और उसने पवित्रा को खुश देखकर सच्चे दिल से उसे शुभकामनाएँ दी थीं।
पवित्रा ने कभी अपने दोस्त की अमीरी को महत्व नहीं दिया था, क्योंकि उसके लिए अविनाश हमेशा केवल एक अच्छा इंसान रहा था।
लेकिन अब परिस्थितियाँ ऐसी बनने वाली थीं, जहाँ शायद उसी पुराने दोस्त की मदद बहुत जरूरी होने वाली थी।
एक सप्ताह बाद खुला सबसे बड़ा राज

बंटवारे के लगभग एक सप्ताह बाद सुबह मोहनदास अचानक कुछ लोगों के साथ हरिदास के घर पहुँचा।
उसके हाथ में कुछ कागज थे और चेहरे पर ऐसी कठोरता थी, जिसे देखकर घर के सभी लोग घबरा गए।
मोहनदास ने कागज हरिदास के सामने रखते हुए कहा, “अब यह घर भी मेरे हिस्से में आ चुका है, इसलिए आपको इसे खाली करना होगा।”
हरिदास ने हैरानी से कागज देखा और काँपती आवाज में पूछा, “मोहन, यह कैसी बात कर रहे हो, मेरा घर तुम्हारे हिस्से में कैसे आ गया?”
मोहनदास ने कहा, “बंटवारे के कागजों में सब कुछ साफ लिखा है, और इन कागजों पर तुम्हारे हस्ताक्षर भी मौजूद हैं।”
रोहित ने तुरंत कागज अपने हाथ में लिया और ध्यान से देखने लगा, लेकिन कुछ ही पलों में उसका चेहरा बदल गया।
कागजों में एक ऐसी शर्त लिखी थी, जिसके अनुसार हरिदास जिस घर में रह रहे थे, उसका मालिकाना अधिकार मोहनदास को मिलना था।
हरिदास को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा कोई कागज उन्होंने कभी देखा या समझा था, क्योंकि उस रात सब कुछ बहुत जल्दी हुआ था।
उस रात चिंता और तनाव में हरिदास ने कई जगह अंगूठे और हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन शायद उन्होंने दस्तावेजों को ठीक से पढ़ा नहीं था।
मोहनदास ने इसी कमजोरी का फायदा उठाकर पहले से तैयार किए गए कागजों पर हरिदास के हस्ताक्षर करवा लिए थे।
अब उसकी चाल पूरी तरह सफल हो चुकी थी और हरिदास के पास अपने ही घर को बचाने के लिए कोई तत्काल रास्ता नहीं था।
पुलिस के साथ पहुँचा मोहनदास

मोहनदास अकेला नहीं आया था, बल्कि उसके साथ पुलिसकर्मी भी मौजूद थे, जिससे घर का माहौल अचानक बेहद गंभीर हो गया।
पुलिसकर्मी ने हरिदास को समझाते हुए कहा, “कागजों के अनुसार आपको दो महीने के भीतर यह घर खाली करना होगा।”
हरिदास कुछ देर तक पुलिसकर्मी का चेहरा देखते रहे और फिर धीरे से चारपाई पर बैठ गए, जैसे उनकी सारी ताकत खत्म हो चुकी हो।
रोहित गुस्से में मोहनदास के पास गया और बोला, “चाचा जी, आपने हमारे साथ इतना बड़ा धोखा कैसे कर दिया?”
मोहनदास ने ठंडी आवाज में कहा, “मैंने कोई धोखा नहीं किया, तुम्हारे पिता ने अपनी मर्जी से कागजों पर हस्ताक्षर किए हैं।”
पवित्रा दूर खड़ी सबकुछ सुन रही थी और उसके मन में सबसे ज्यादा चिंता हरिदास की हालत को लेकर थी।
हरिदास अभी पूरी तरह स्वस्थ भी नहीं हुए थे और इस नए सदमे ने उनकी तबीयत फिर से बिगाड़नी शुरू कर दी थी।
सुनीता देवी भी परेशान होकर अपने पति के पास बैठ गईं और बार-बार भगवान से इस मुसीबत को दूर करने की प्रार्थना करने लगीं।
रोहित ने पिता को संभालते हुए कहा, “पिताजी, आप घबराइए मत, हम किसी न किसी रास्ते से यह समस्या जरूर हल करेंगे।”
लेकिन हरिदास की आँखों में निराशा थी और उन्हें लग रहा था कि उनकी पूरी जिंदगी की मेहनत अचानक उनसे छिन गई।
सारा दोष पवित्रा के सिर आया

मोहनदास और पुलिस के जाने के बाद घर के अंदर ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे किसी ने अचानक सभी आवाजें बंद कर दी हों।
सुनीता देवी की नजर पवित्रा पर पड़ी और उनके भीतर जमा हुआ गुस्सा अचानक बाहर निकल आया।
उन्होंने कहा, “अगर तुम उस रात बंटवारे के लिए नहीं कहतीं, तो आज हमारे सामने यह दिन देखने की नौबत नहीं आती।”
पवित्रा ने शांत आवाज में कहा, “माँ जी, मुझे सच में नहीं पता था कि मोहनदास जी पहले से ऐसे कागज तैयार करके लाए थे।”
सुनीता देवी ने गुस्से में कहा, “लेकिन तुम्हीं ने सबको समझाया था कि रात में ही बंटवारा कर देना चाहिए।”
यह सुनकर पवित्रा की आँखें भर आईं, क्योंकि वह जानती थी कि उसकी सलाह का उद्देश्य केवल झगड़ा खत्म करवाना था।
तभी सुनीता देवी ने गुस्से में पवित्रा को थप्पड़ मार दिया और कमरे में मौजूद सभी लोग कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए।
पवित्रा ने अपने गाल पर हाथ रखा, लेकिन उसने पलटकर कोई जवाब नहीं दिया और केवल अपनी सास की तरफ देखती रही।
रोहित तुरंत अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया और बोला, “माँ, पवित्रा की कोई गलती नहीं है, कृपया उसे दोष मत दीजिए।”
हरिदास ने भी कमजोर आवाज में कहा, “सुनीता, बहू को दोष देने से पहले हमें अपनी गलती देखनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा, “हम सभी पढ़े-लिखे थे, फिर भी हमने उस रात कागजों को ध्यान से पढ़ने की गलती नहीं की।”
उनकी बात सुनकर सुनीता देवी चुप हो गईं, लेकिन उनके चेहरे पर चिंता और गुस्सा अभी भी साफ दिखाई दे रहा था।
पवित्रा ने लिया बड़ा फैसला

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला, फिर पवित्रा ने अपने आँसू पोंछे और बेहद शांत आवाज में अपनी बात रखी।
उसने कहा, “माँ जी, अगर आपको लगता है कि यह सब मेरी वजह से हुआ है, तो इसे ठीक करने की जिम्मेदारी भी मुझे दीजिए।”
सुनीता देवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा, जबकि रोहित और साक्षी भी चुपचाप उसकी बात सुनने लगे।
पवित्रा ने कहा, “अगर चालाकी वे लोग जानते हैं, तो हम भी पढ़े-लिखे हैं और अपने दिमाग का सही इस्तेमाल कर सकते हैं।”
उसने आगे कहा, “हम सारे कागज किसी अच्छे वकील को दिखाएँगे और जरूरत पड़ी तो मोहनदास के खिलाफ कानूनी कदम उठाएँगे।”
रोहित ने पवित्रा की तरफ देखा और पहली बार उसके चेहरे पर डर की जगह मजबूत आत्मविश्वास दिखाई दिया।
हरिदास ने तुरंत कहा, “नहीं बेटा, मुझे कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने, मेरी अब वह उम्र और ताकत नहीं रही।”
उन्होंने भारी आवाज में कहा, “हम यह घर छोड़ देंगे और अगले महीने अपने पुराने गाँव चले जाएँगे।”
यह सुनते ही पवित्रा कुछ पल चुप रही, क्योंकि उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि हरिदास इतनी आसानी से अपना घर छोड़ देंगे।
रोहित भी पिता के सामने बैठ गया और बोला, “पिताजी, यह आपका घर है, इसे छोड़कर जाना मुझे बिल्कुल सही नहीं लगता।”
हरिदास ने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, कभी-कभी जिंदगी बचाने के लिए इंसान को अपनी कुछ चीजें छोड़नी पड़ती हैं।”
लेकिन पवित्रा के मन में एक अलग ही विचार जन्म ले चुका था, जिसे वह अभी किसी के सामने नहीं रखना चाहती थी।
साक्षी के शब्दों ने पवित्रा को तोड़ दिया

घर में तनाव बढ़ता जा रहा था और हर कोई आने वाले दिनों को लेकर चिंता में डूबा हुआ था।
साक्षी अपनी माँ के पास बैठी थी और उसकी आँखों में भी पवित्रा के लिए नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी।
साक्षी ने धीमी आवाज में कहा, “माँ, भाभी के इस घर में कदम रखते ही जैसे हमारे परिवार की सारी खुशियाँ खत्म हो गईं।”
पवित्रा और रोहित पास के कमरे में खड़े थे और अनजाने में साक्षी की यह पूरी बात सुन चुके थे।
पवित्रा के चेहरे का रंग फीका पड़ गया और उसकी आँखों में फिर से आँसू भरने लगे।
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उसे लगा जैसे शादी के दूसरे ही सप्ताह उसके नए घर ने उसे पूरी तरह स्वीकार करने से पहले ही दोषी बना दिया था।
वह कुछ बोलने वाली थी, लेकिन रोहित ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने पास खींच लिया।
रोहित ने पवित्रा को सीने से लगाकर कहा, “तुम इन बातों को दिल पर मत लो, मेरे घरवाले गुस्से में बहुत कुछ कह रहे हैं।”
पवित्रा ने रोते हुए कहा, “लेकिन रोहित, कहीं सच में सबको लगता है कि मेरी वजह से यह घर बर्बाद हुआ है?”
रोहित ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “नहीं पवित्रा, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और मैं जानता हूँ कि तुम्हारी नीयत गलत नहीं थी।”
उसने कहा, “तुमने उस रात सिर्फ झगड़ा खत्म करवाने के लिए बात कही थी, तुम्हें मोहनदास की चाल के बारे में कैसे पता होता?”
पवित्रा ने रोहित के सीने पर सिर रखते हुए कहा, “मैं इस परिवार को टूटते हुए नहीं देख सकती, चाहे लोग मुझे कुछ भी समझें।”
रोहित ने दृढ़ आवाज में कहा, “हम दोनों मिलकर इस परेशानी का रास्ता निकालेंगे, और मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
पवित्रा के मन में जागी उम्मीद

उस रात पवित्रा बहुत देर तक जागती रही और उसके मन में मोहनदास के कागजों को लेकर कई सवाल उठते रहे।
उसे याद आया कि बंटवारे वाली रात मोहनदास असामान्य रूप से जल्दी में था और हर बात पहले से तैयार करके आया था।
पवित्रा को लगा कि अगर कागज पहले से तैयार थे, तो जरूर उनकी तैयारी के पीछे कोई और मकसद छिपा हुआ था।
तभी उसे अपने पुराने दोस्त अविनाश की याद आई, जिसके पिता की कंपनी में कई अनुभवी कानूनी सलाहकार भी काम करते थे।
पवित्रा जानती थी कि अविनाश केवल अमीर परिवार से नहीं था, बल्कि समझदार और भरोसेमंद इंसान भी था।
लेकिन वह यह भी जानती थी कि बिना परिवार की अनुमति के किसी पुराने पुरुष मित्र से मदद माँगना घर में नई परेशानी पैदा कर सकता था।
इसलिए उसने पहले रोहित से बात करने का फैसला किया और सुबह होने का इंतजार करने लगी।
उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अविनाश की मदद से आने वाले दिनों में मोहनदास की सबसे बड़ी चाल सामने आने वाली है।
लेकिन उससे पहले पवित्रा को अपने ही परिवार का विश्वास जीतना था, क्योंकि सबसे कठिन लड़ाई शायद घर के अंदर ही शुरू हो चुकी थी।
सुबह की पहली किरण खिड़की से कमरे में पहुँची और पवित्रा ने मन ही मन एक संकल्प लिया कि वह हार नहीं मानेगी।
उसे अपना घर बचाना था, अपने ससुर का सम्मान बचाना था और उस परिवार को फिर से एक साथ लाना था।
अगले भाग में पढ़िए—पवित्रा आखिर ऐसा कौन-सा कदम उठाने वाली है, जिससे मोहनदास की चाल का पूरा सच सामने आ सकता है?




