रतनगढ़ के राजमहल में रहने वाली यामिनी की जिंदगी तब बदल गई जब महाराज ने उसे मौत के कुएँ में धकेलवा दिया। अब उसकी आत्मा महल में लौटकर खौफनाक घटनाएँ करने लगी। क्या देवराज भी उसके बदले का शिकार बनेगा?
खूबसूरत यामिनी, एक नौकरानी की बेटी। The Haunted Mystery Of Yamini
आज से लगभग 200 साल पहले रतनगढ़ नाम का एक बहुत बड़ा राज्य हुआ करता था। उस समय यह राज्य बहुत सुखी और खुशहाल माना जाता था।
वहाँ के महाराज वीरेंद्र सिंह के पास सोने-चाँदी के खजाने, हजारों सैनिक और एक बहुत विशाल महल था। उनका राज पूरे राज्य में चलता था।
महल इतना बड़ा था कि उसमें सैकड़ों नौकर-चाकर काम करते थे। दिन में वहाँ गीत गूँजते थे और रात में पूरा महल रोशनी से जगमगाता था।
लेकिन उस महल में एक ऐसी लड़की भी रहती थी, जिसकी सुंदरता की चर्चा हर जगह होती थी। उसका नाम यामिनी था और वह सबकी प्यारी थी।
यामिनी एक साधारण नौकरानी की बेटी थी। उसकी माँ महल में काम करती थी और वह भी अपनी माँ के साथ महल में ही रहती थी।
लेकिन यामिनी इतनी सुंदर थी कि उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि वह किसी नौकरानी की बेटी है। उसकी सुंदरता सबको आकर्षित करती थी।
उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, लंबे काले घने बाल और चाँद जैसा चेहरा हर किसी को अपनी ओर खींच लेते थे। उसे देखकर लोग उसकी तारीफ करते थे।
वह हमेशा हँसती रहती थी और पूरे महल में खुशियाँ फैलाती थी। जब भी वह गलियारों से गुजरती, तो दूसरे नौकरों के चेहरों पर भी मुस्कान आ जाती थी।
हर सुबह यामिनी महाराज वीरेंद्र सिंह और महारानी रजनी के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेती थी। महारानी रजनी उसे अपनी पुत्री के समान मानती थीं।
लेकिन महाराज वीरेंद्र सिंह को यामिनी का महल में रहना कभी पसंद नहीं था। वह उसे हमेशा नीची नजर से देखते थे और उससे दूरी बनाए रखते थे।
उनके मन में यामिनी के लिए एक अजीब-सी नफरत थी। यामिनी यह बात जानती थी, लेकिन फिर भी वह हमेशा महाराज का सम्मान करती थी।
महाराज का एकमात्र पुत्र देवराज था। वह बहुत बहादुर, सुंदर और दयालु राजकुमार था। बचपन से ही वह यामिनी के साथ खेला करता था।
समय बीतने के साथ देवराज और यामिनी बड़े होते गए। उनकी दोस्ती भी गहरी होती गई और दोनों एक-दूसरे की खुशी तथा परेशानी समझने लगे।
देवराज जब भी उदास होता, तो यामिनी उसे हँसा देती थी। जब यामिनी परेशान होती, तो देवराज उसकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता था।

सुहानी बरसात, जब देवराज और यामिनी के बीच हुआ प्रेम
एक दिन शाम के समय देवराज और यामिनी महल से दूर जंगल के किनारे घूमने गए। मौसम बहुत सुहाना था और चारों ओर ठंडी हवा चल रही थी।
दोनों बातें करते हुए एक पुराने रास्ते पर चल रहे थे कि अचानक आसमान में काले बादल छा गए। देखते ही देखते मौसम बदलने लगा।
कुछ ही पलों में तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली इतनी जोर से चमक रही थी कि पूरा जंगल कुछ क्षणों के लिए सफेद दिखाई देता था।
बिजली चमकने के बाद जंगल फिर से अंधेरे में डूब जाता था। बारिश लगातार तेज होती जा रही थी, इसलिए दोनों ने सुरक्षित जगह ढूँढ़नी शुरू कर दी।
आखिरकार दोनों भागकर एक पुराने खंडहर में पहुँच गए। वहाँ बारिश से बचने की जगह तो मिल गई, लेकिन बाहर तूफान लगातार तेज होता जा रहा था।
बारिश के बीच देवराज और यामिनी का प्यार
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उस खंडहर में केवल यामिनी और देवराज थे। ठंडी हवा चल रही थी और बाहर बादल गरज रहे थे।
खंडहर के अंदर दोनों की धड़कनों की आवाज सुनाई दे रही थी। देवराज ने पहली बार यामिनी का हाथ पकड़ा और उससे अपने दिल की बात कही।
देवराज ने कहा, यामिनी, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता। उसकी बात सुनकर यामिनी भावुक हो गई।
यह सुनकर यामिनी रो पड़ी। उसने धीरे से कहा, मैं भी आपको अपनी जान से ज्यादा चाहती हूँ, देवराज। दोनों ने एक-दूसरे के सामने अपने प्यार को स्वीकार किया।
उस रात उनके प्यार की शुरुआत हुई। दोनों ने एक-दूसरे से हमेशा साथ रहने का वादा किया, लेकिन उन्हें आने वाले खतरे का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था।
उन्हें नहीं पता था कि उनका यह प्यार पूरे रतनगढ़ के लिए श्राप बन जाएगा। जल्द ही उनके रिश्ते की खबर महल में फैलने वाली थी।
महाराज वीरेंद्र सिंह का क्रोध
कुछ ही समय में पूरे महल में देवराज और यामिनी के प्रेम की चर्चा होने लगी। नौकरों के बीच भी उनके रिश्ते को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई।
आखिरकार यह बात महाराज वीरेंद्र सिंह तक पहुँच ही गई। जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा एक नौकरानी की बेटी से विवाह करना चाहता है, तो वह क्रोधित हो गए।
महाराज अपना गुस्सा संभाल नहीं सके। उन्होंने तुरंत देवराज को दरबार में बुलाया, ताकि उससे इस रिश्ते के बारे में सीधे सवाल कर सकें।
महाराज ने गरजते हुए पूछा, क्या यह सच है, देवराज? क्या तुम एक नौकरानी की बेटी से विवाह करना चाहते हो?
देवराज ने बिना किसी हिचकिचाहट और डर के जवाब दिया, हाँ पिता जी, मैं यामिनी से प्रेम करता हूँ और उसी से विवाह भी करूँगा।
यह सुनकर महाराज का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसी समय उन्होंने एक बड़ा फैसला कर लिया, जिसका असर यामिनी की जिंदगी पर पड़ने वाला था।
खौफनाक पुराने मौत के कुएँ की साजिश
कुछ दिनों बाद महाराज ने यामिनी को अपने पास बुलाया और उससे बड़े प्यार से बात करने लगे। यामिनी को लगा कि शायद महाराज ने उसे स्वीकार कर लिया है।
महाराज ने उससे कहा, जंगल में एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। तुम वहाँ जाकर दर्शन कर आओ। उनकी बात सुनकर यामिनी बहुत खुश हो गई।
यामिनी सैनिकों के साथ रथ में बैठकर मंदिर के लिए रवाना हो गई। शाम होते-होते वे सभी एक घने और सुनसान जंगल में पहुँच गए।
जंगल में एक बहुत पुराना कुआँ था। लोग कहते थे कि उस कुएँ में कई लोग मर चुके हैं, इसलिए गाँव वाले उसे मौत का कुआँ कहते थे।
अचानक सैनिकों ने यामिनी को पकड़ लिया। वह घबराकर चिल्लाई, मुझे छोड़ दो! मैंने क्या किया है? लेकिन सैनिकों ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।
कुछ ही देर बाद सैनिकों ने यामिनी को कुएँ में धक्का दे दिया। वह अंधेरे कुएँ में गिरती चली गई और उसकी भयानक चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।
गिरते समय यामिनी की आखिरी आवाज देवराज का नाम थी। वह दर्द से चिल्लाई, देवराज! लेकिन उसकी आवाज सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।

मौत के बाद यामिनी की वापसी और देवराज की तलाश
बहुत दिनों तक देवराज यामिनी को ढूँढ़ता रहा, लेकिन उसका कहीं कोई पता नहीं चला। वह हर जगह उसे खोजता रहा, मगर उसे निराशा ही हाथ लगी।
एक रात देवराज अपने कमरे में बैठा रो रहा था। तभी अचानक कमरे की सारी मोमबत्तियाँ बुझ गईं और चारों ओर अंधेरा छा गया।
कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं। ठंडी हवा तेजी से अंदर आने लगी और देवराज को कुछ अजीब होने का एहसास हुआ।
कमरे में बिल्कुल ठंडी हवा भर गई। तभी कमरे के एक कोने में सफेद रंग की एक आकृति दिखाई दी, जिसे देखकर देवराज चौंक गया।
देवराज ने ध्यान से देखा तो वह यामिनी थी। लेकिन अब वह पहले जैसी नहीं दिख रही थी। उसका रूप देखकर कोई भी डर जाता।
उसके बाल बिखरे हुए थे और कपड़े फटे हुए थे। उसका चेहरा भी पहले जैसा नहीं था और उसकी आँखें पूरी तरह काली दिखाई दे रही थीं।
उसके चेहरे पर मिट्टी और खून लगा हुआ था। उसके पैर उल्टे थे और उसकी आवाज ऐसी लग रही थी, जैसे किसी गहरे कुएँ से आ रही हो।
देवराज बहुत डर गया था, लेकिन यामिनी को देखकर उसकी आँखों में आँसू भी आ गए। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ क्या हुआ।
उस रात के बाद यामिनी हर रात महल में आने लगी। उसकी मौजूदगी से धीरे-धीरे पूरे महल में डर और बेचैनी का माहौल फैलने लगा।
भयानक डर का महल
धीरे-धीरे पूरे महल में अजीब घटनाएँ होने लगीं। आधी रात को गलियारों में पायल की आवाज गूँजती थी, जबकि वहाँ कोई दिखाई नहीं देता था।
खाली कमरों से किसी लड़की के बहुत तेज रोने की आवाज आने लगी। कई नौकरों ने दावा किया कि उन्होंने यामिनी को छत पर खड़े देखा है।
एक रात नौकर रामू अपने लिए पानी लेने गया। उसने देखा कि कुएँ के पास एक औरत खड़ी थी, जिसके लंबे काले बाल नीचे लटक रहे थे।
उसके लंबे काले बाल जमीन को छू रहे थे। रामू धीरे-धीरे उसके पास गया, लेकिन जैसे ही वह औरत पलटी, रामू की साँसें थम गईं।
उसका चेहरा पूरी तरह सड़ा हुआ था। उसकी आँखों की जगह काले गड्ढे थे और उसके मुँह से कीड़े निकल रहे थे।
नौकर रामू की चीख पूरे महल में गूँज उठी। अगली सुबह उसकी लाश मिली और उसकी आँखें डर की वजह से खुली की खुली रह गई थीं।
ऐसा लग रहा था, जैसे उसने मौत को बहुत करीब से देखा हो। इस घटना के बाद महल में रहने वाले सभी लोग बुरी तरह डर गए।
तांत्रिक और यामिनी के खौफ का सामना
अब पूरा महल खाली होने लगा। सभी नौकर वहाँ से भाग गए और सैनिक भी रात की ड्यूटी करने से डरने लगे। कोई भी महल में रुकना नहीं चाहता था।
तब महाराज ने एक खतरनाक तांत्रिक को बुलाया, जिसका नाम कालाग्नि था। महाराज को उम्मीद थी कि वह यामिनी की आत्मा से महल को बचा सकेगा।
कालाग्नि काले कपड़े पहनता था। उसकी गर्दन में हड्डियों की माला थी और उसकी आँखें लाल अंगारों जैसी चमकती थीं। उसका रूप बहुत डरावना था।
आधी रात को उसने महल के बीच में हवन शुरू किया। वह लगातार मंत्र पढ़ने लगा और पूरे महल में अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं।
जैसे-जैसे वह मंत्र पढ़ता गया, महल में अजीब घटनाएँ होने लगीं। अचानक सभी दरवाजे अपने आप खुल गए और महल की दीवारें काँपने लगीं।
कुछ ही देर में जोर-जोर से किसी स्त्री के हँसने की आवाज गूँजने लगी। वहाँ मौजूद सभी लोग डर गए और चारों ओर देखने लगे।
फिर यामिनी प्रकट हुई। इस बार उसका रूप पहले से भी ज्यादा भयानक था। उसे देखकर महाराज, सैनिक और तांत्रिक सभी घबरा गए।
उसके चेहरे से खून बह रहा था। उसके हाथों के नाखून पंजों जैसे लंबे हो चुके थे और उसके चारों ओर काला धुआँ घूम रहा था।
यामिनी ने इतनी भयानक चीख मारी कि कई सैनिक वहीं बेहोश हो गए। पूरा महल उसकी आवाज से गूँज उठा और हर कोई डरने लगा।
कालाग्नि तांत्रिक ने मंत्रों की शक्ति से यामिनी को रोकने की कोशिश की। उसने हवन के सामने बैठकर लगातार मंत्र पढ़े, लेकिन उसकी कोशिश सफल नहीं हुई।
यामिनी ने एक ही झटके में हवन की आग बुझा दी। इसके बाद उसने तांत्रिक की तरफ देखा और कालाग्नि का पूरा शरीर काँपने लगा।
अगले ही पल वह अपना सामान छोड़कर महल से भाग गया। जाते-जाते वह चिल्लाया, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है, बल्कि बदले की आग में जलती हुई प्रेतनी है।
राजा के बेटे देवराज की आखिरी रात
इसके बाद यामिनी हर रात देवराज के पास आने लगी। वह उसे अपने साथ चलने के लिए कहती और बार-बार अपने पुराने प्यार की याद दिलाती थी।
वह कहती, मेरे पास आओ देवराज, हम फिर कभी अलग नहीं होंगे। धीरे-धीरे देवराज उसकी बातों के वश में आने लगा और खुद को रोक नहीं पाया।
फिर अमावस्या की एक काली रात आई। यामिनी देवराज को जंगल में उसी मौत के कुएँ के पास ले गई, जहाँ उसकी जान गई थी।
चारों ओर घना अँधेरा था। दूर कहीं भेड़ियों के रोने की आवाज आ रही थी और जंगल में एक अजीब-सा सन्नाटा छाया हुआ था।
यामिनी कुएँ के किनारे खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और देवराज धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।
देवराज उसके पास पहुँचा ही था कि अगले ही पल वह सीधे कुएँ में गिर गया। उसकी चीख दूर-दूर तक सुनाई दी और फिर सब शांत हो गया।
अमावस्या का वह खतरनाक श्राप
अपने बेटे की मौत के बाद महाराज पूरी तरह टूट गए। उन्हें अपने किए हुए पाप का एहसास हो चुका था और अब उनके पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा था।
महारानी रजनी रोती हुई यामिनी की आत्मा के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हुईं। उन्होंने कहा, बेटी, हमें माफ कर दो। हमने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया है।
इसके बाद पूरे राज्य में सबसे बड़ा हवन कराया गया। महाराज और महारानी ने यामिनी तथा देवराज की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
कुएँ से यामिनी और देवराज की अस्थियाँ निकाली गईं। इसके बाद दोनों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।
उसी रात लोगों ने देखा कि आसमान में एक चमकदार रोशनी उठी। उस रोशनी को देखकर सभी लोग हैरान रह गए और उसे ध्यान से देखने लगे।
उस रोशनी में यामिनी और देवराज साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे। धीरे-धीरे दोनों हवा में गायब हो गए और आसमान में फैली रोशनी भी मिट गई।
लेकिन लोग कहते हैं कि आज भी रतनगढ़ के पुराने खंडहर में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं। एक सुंदर लड़की और उसके साथ एक राजकुमार नजर आता है।
अगर कोई आधी रात को उस मौत के कुएँ के पास चला जाए, तो उसे आज भी एक धीमी आवाज सुनाई देती है।
देवराज, यामिनी तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ।





