नंदी कैसे बने शिव की सवारी ? Story Of Nandi In Hindi
⇒ नंदी कैसे बने भगवान शिव की सवारी ? और आज क्यों भगवान शिव के साथ ही नंदी बैल की भव्य पूजा की जाती हैं ? तो आइए आज हम आपको सुनाएंगे , कैसे बने नंदी भगवान शिव की सवारी ? उनकी पूरी कथा सरल हिंदी में ।
पढ़िए नंदी बैल की पूरी कथा
⇒ बहुत समय पहले की बात है। एक महान ऋषि थे जिनका नाम शिलाद था। वे बहुत अच्छे । ज्ञानी और भगवान शिव के सच्चे भक्त थे । उनका जीवन तप, पूजा और लोगों की सेवा में बीतता था। फिर भी उनके मन में एक दुख था।
⇒ उनके संतान नही थी। वे चाहते थे कि उन्हे एक पुत्र मिले जो धर्म का पालन करे और भगवान की भक्ति में जीवन बिताए।
⇒ इस अच्छा को पूरा करने के लिए शिलाद ऋषि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू की।
⇒ वे कई वर्षों तक जंगल में रहकर शिवजी का ध्यान करते रहे। उन्होंने अपने मन को पूरी तरह भगवान की भक्ति में लगा दिया।
⇒ उनकी सच्ची भक्ति देखकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए । एक दिन वे शिलाद ऋषि के सामने प्रकट हुए और बोले, ऋषिवर मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।
⇒ अपने इच्छा बताओ। शिलाद ऋषि ने हाथ जोड़कर कहा, प्रभु मुझे एक ऐसा पुत्र चाहिए जो आपका भक्त हो और सद्गुणों से भरा हो।
⇒ भगवान शिव मुस्कुराये और बोले , तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। तब तुम्हें एक दिव्य पुत्र मिलेगा।
⇒ कुछ समय बाद शिलाद ऋषि को एक पुत्र प्राप्त हुआ। उसका नाम नंदी रखा गया । नंदी कोई साधारण बालक नही थे ।
⇒ उनके चेहरे पर अलग ही तेज था। बचपन से ही उनका मन भगवान शिव की भक्ति में लगा रहता था।
⇒ नंदी धीरे – धीरे बड़े होने लगे। वे अपने पिता का आदर करते थे , सभी लोगो से प्रेम से बात करते थे और हमेशा सच बोलते थे।
⇒ आश्रम में आने वाले सभी लोग नंदी के स्वभाव की प्रशंसा करते थे।
भगवान शिव नें ली नंदी की बड़ी परीक्षा
⇒ एक दिन कुछ महान ऋषि शिलाद ऋषि के आश्रम में आए। शिलाद ऋषि ने उनका सम्मान किया , जब उन सभी ऋषियों की नजर नंदी पर पड़ी ।
⇒ तो, वे कुछ देर तक चुप रहे । शिलाद ऋषि ने उन ऋषियों से पूछा की क्या हुआ महाराज ? आप इतना चिंतित क्यों हैं ?
⇒ ऋषियों ने कहा, नंदी बहुत महान बालक है, लेकिन हमे उसके जीवन में एक बहुत कठिन समय दिखाई दे रहा है।
⇒ यह सुनकर शिलाद ऋषि का मन दुख से भर गया । उन्हे अब अपने पुत्र की चिंता होने लगी।
⇒ जब नंदी ने अपने पिता को उदास देखा तो उनहोने कारण पुछा । शिलाद ऋषि ने उन्हे सारी बात बता दी।
⇒ यह सुनकर नंदी घबराए नही। उन्होंने शांत स्वर में कहा, पिताजी , यदि भगवान शिव की कृपा मेरे साथ है तो मुझे किसी बात का डर नही है।
⇒ नंदी ने निश्चय किया की वे भगवान शिव की शरण में जाएंगे और उनकी कृपा प्राप्त करेंगे । अगले ही दिन गए, महीने बीत गए और फिर वर्ष भी बीतने लगे।
⇒ नंदी बिना किसी शिकायत के भगवान शिव की कठौर तपस्या करते रहे । उनके मन में केवल एक ही इच्छा भी — भगवान शिव की कृपा।
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⇒ उनकी भक्ति इतनी गहरी थी की देवता भी उनकी तपस्या को देखकर आश्चर्य करने लगे।
नंदी की तपस्या से भगवान शिव हुए प्रसन्न
⇒ कई वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव और माता पार्वती नंदी के सामने प्रकट हुए ।
⇒ उनके सामने अपने आराध्य को देखकर नन्दी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। भगवान शिव ने प्रेम से कहा, नंदी मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ ।
⇒ बताओ , तुम्हें क्या वरदान चाहिए ?
⇒ नंदी ने हाथ जोड़कर कहा, प्रभु , मुझे धन, सोना , राज्य या शक्ति नही चाहिए। मैं केवल आपने चरणों में स्थान चाहता हूँ।
⇒ नंदी की यह बात सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। उन्हे नंदी की सच्ची भक्ति और विनम्रता बहुत अच्छी लगी।
⇒ भगवान शिव बोले, नंदी तुम केवल मेरे भक्त नही हो। तुम मेरे सबसे प्रिय सेवकों में से एक हो।
⇒ फिर भगवान शिव ने नंदी को आशीर्वाद दिया और कहा, आज से तुम मेरे गणों के प्रमुख होंगे, सभी गण तुम्हारा सम्मान करेंगे।
⇒ नंदी ने सिर झुका कर भगवान शिव को प्रणाम किया। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हे एक और महान सम्मान दिया ।
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⇒ उन्होंने कहा, आज से तुम मेरे वाहन भी बनोगे। तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे और संसार तुम्हें मेरे सबसे प्रिय भक्त के रूप में जानेगा।
⇒ यह सुनकर नंदी का हृदय आनंद से भर गया। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में प्रणाम किया।

नंदी बैल बने शिवजी की सवारी
⇒ उस दिन से नंदी भगवान शिव की सवारी बन गए। वे हमेशा भगवान शिव के साथ रहने लगे । कैलाश पर्वत पर उन्हे विशेष स्थान मिला।
⇒ नंदी केवल शिवजी के वाहन नही थे । वे उनके सबसे विश्वसपात्र सेवक और भक्त भी थे।
⇒ जब भी भगवान शिव किसी कार्य के लिए, जाते नंदी उनके साथ रहते । वे हर समय शिवजी की सेवा में लगे रहते थे। नंदी के मन में कभी घमंड नही आया।
⇒ इतना बड़ा सम्मान मिलने के बाद भी वे पहले की तरह विनम्र बने रहे। यही कारण है कि भगवान शिव उन्हे बहुत प्रेम करते थे।
मंदिरों में नंदी जी का महत्व
⇒ आज भी लगभग हार शिव मंदिर में नंदी की मूर्ति स्थापित की जाती है। नंदी हमेशा शिव की ओर मुख करके बैठे नजर आते हैं।
⇒ लोग मानते हैं कि नंदी ,,भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्त हैं, इसलिए कोई भक्त नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं।
⇒ यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी लोग श्रद्धा के साथ इसका पालन करते हैं। नंदी धैर्य , विश्वास , भक्ति और सेवा के प्रतीक माने जाते है।
⇒ उनकी कहानी हमे सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा से भगवान की कृपा अवश्य मिलती है।
नंदी की इस कथा से मिलने वाली सीख
⇒ सच्ची भक्ति करने वाले की भगवान हमेशा मदद करते हैं उन्हे कभी भी अकेला छोड़ते । कठिन समय में हमेशा डरने के बजाय विश्वास बनाए रखना चाहिए ।
⇒ सम्मान और शक्ति मिलने पर भी विनम्र रहना चाहिए । अपने जीवन को सरल रखना चहिए ।
⇒ सेवा और समर्पण इंसान को महान बनाते हैं। भगवान को सबसे अधिक प्रिय होता है जो सच्चे मन से उनकी भक्ति करता है।
⇒ इसीलिए ही आज नंदी जी की भगवान शिव के साथ पूजा की जाती हैं । और हर मंदिर में भी आज भगवान के सामने उनकी मूर्ति जरूर होती हैं ।
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