कहानी “बेपरवाह दिल मेरा” ❤️ में प्रेम के जीवन में काव्या के आते ही उसका जीवन रंगों से भर गया।
काव्या और प्रेम का एक स्पर्श दोनों को बहुत सुकून दे रहा था, शायद यही शिद्दत वाला सच्चा प्यार था।
प्रेम की छोटी बहन निशा बहुत नटखट थी, जिसने अनजाने में दोनों को मिलाया और उनकी पहली मुलाकात को खास बना दिया।
पहली नजर की मुस्कान से शुरू हुआ यह रिश्ता धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदलने लगा, जहाँ हर मुलाकात दिल की धड़कन बढ़ाती थी।
स्कूल के बाहर की मुलाकातों से लेकर प्रेम के घर तक, दोनों के बीच कई प्यारे पल आए, लेकिन क्या यह रिश्ता अपनी मंजिल पाएगा?
“तो जानिए, इस बेपरवाह दिल मेरा की कहानी में प्रेम और काव्या के रिश्ते की राह आगे किस मोड़ पर जाएगी और उनके प्यार का क्या होगा।”
स्कूल की राह और भाई-बहन की नोकझोंक। Romantic Love Story In Hindi
“ओ हो भैया, जल्दी बाइक चलाओ। मैं स्कूल के लिए लेट हो जाऊँगी। आज फिर मैडम ने डाँट दिया, तो मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”
निशा की बात सुनकर प्रेम मुस्कुरा दिया। उसने बाइक की रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई और हँसते हुए बोला, “अरे पगली, अभी समय है।”
निशा ने मुँह बनाकर कहा, “आपको हर बात मज़ाक लगती है। मेरी पहली क्लास छूट गई, तो उसकी जिम्मेदारी आपकी होगी।”
प्रेम हँस पड़ा। उसने कहा, “ठीक है मैडम, आज आपको समय पर पहुँचा दूँगा। लेकिन शाम को आइसक्रीम मेरी पसंद की खिलानी होगी।”
निशा ने तुरंत जवाब दिया, “वाह! गलती आपकी और खर्चा मेरा। आप दुनिया के सबसे चालाक भैया हो।”
दोनों की हँसी पूरे रास्ते गूँजती रही। सुबह की ठंडी हवा और हल्की धूप उस सफ़र को और भी खूबसूरत बना रही थी।
प्रेम फर्स्ट ईयर में पढ़ता था। पढ़ाई चल रही थी, लेकिन उसके मन में आगे की राह को लेकर कई सवाल हर दिन उठते रहते थे।
उसने पुराने दोस्तों से दूरी बना ली थी। उनकी आदतें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। अब वह अपने छोटे परिवार में ही सबसे ज़्यादा खुश रहता था।
पहली नज़र जिसने सब बदल दिया सब कुछ

कुछ ही देर बाद दोनों स्कूल के मुख्य गेट पर पहुँच गए। प्रेम ने बाइक रोकी और निशा उतरकर अंदर जाने लगी।
तभी पीछे से एक मीठी आवाज़ आई, “निशा… रुको, मैं भी आ गई।”
निशा मुस्कुराकर पीछे मुड़ी। अगले ही पल एक लड़की दौड़कर आई और उसने निशा को खुशी से गले लगा लिया।
प्रेम की नज़र पहली बार उस लड़की पर पड़ी। वह कुछ पल तक उसे देखता ही रह गया, जैसे समय वहीं ठहर गया हो।
उसने नीले रंग का साफ़ स्कूल सूट पहन रखा था। दो चुटिया लंबे बाल हवा में धीरे-धीरे लहरा रहे थे और चेहरे पर सच्ची मुस्कान खिल रही थी।
उसकी बड़ी, नीली-सी चमक वाली आँखें पहली ही नज़र में अलग दिखाई देती थीं। पतली कमर और सादा अंदाज़ उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे।
प्रेम ने मन ही मन सोचा, “अरे! निशा की इतनी प्यारी सहेली है, और मुझे आज तक इसके बारे में पता भी नहीं था।”
लड़की ने मुस्कुराकर प्रेम की ओर देखा। फिर धीरे से निशा से पूछा, “निशा, ये कौन हैं?”
निशा हँसते हुए बोली, “अरे, यही मेरे शरारती भैया प्रेम हैं। इनके बिना घर में एक दिन भी शांति नहीं रहती।”
प्रेम मुस्कुराकर बोला, “और मुझे आज पता चला कि मेरी बहन की इतनी अच्छी सहेली भी है।”
लड़की हल्का-सा मुस्कुराई। उसने कहा, “मेरा नाम काव्या है। आपसे मिलकर अच्छा लगा।”
प्रेम ने भी मुस्कुराकर सिर हिलाया। दोनों की नज़रें कुछ पल के लिए मिलीं, फिर दोनों ने चुपचाप अपनी नज़रें झुका लीं।
एक प्यारी मुस्कान जो दिल में बस गई
निशा और काव्या स्कूल के अंदर चली गईं। प्रेम कुछ पल वहीं खड़ा रहा, फिर धीरे से बाइक स्टार्ट करके घर की ओर चल पड़ा।
रास्ते भर उसका मन बार-बार उसी मुस्कान को याद करता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक छोटी-सी मुलाकात इतना असर कैसे कर सकती है।
घर पहुँचते ही पिता रामानंद जी दुकान जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने प्रेम को देखते ही मुस्कुराकर पूछा, “क्या बात है बेटा, आज बड़े खुश दिख रहे हो?”
प्रेम ने तुरंत जवाब दिया, “ऐसी कोई बात नहीं है बाबा। बस आज सुबह मौसम बहुत अच्छा था, इसलिए मन भी अच्छा लग रहा है।”
रसोई से शांति देवी बाहर आईं। उन्होंने प्रेम का चेहरा देखा और मुस्कुराकर बोलीं, “मैं इसकी माँ हूँ। इसके चेहरे की खुशी मुझसे छिप नहीं सकती।”
रामानंद जी हँसते हुए बोले, “लगता है हमारा बेटा अब बड़ा हो गया है। कुछ बातें अब दिल में रखने लगा है।”
प्रेम हल्का-सा मुस्कुराया और बिना कुछ बोले अपने कमरे में चला गया। वह बिस्तर पर लेटा, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार काव्या का मुस्कुराता चेहरा ही आ रहा था।
उसने पहली बार महसूस किया कि कभी-कभी एक छोटी-सी मुलाकात भी दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे भुलाना आसान नहीं होता।
काव्या की याद में बदलता प्रेम
घर लौटने के बाद प्रेम अपने कमरे में बैठा रहा, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार काव्या का मुस्कुराता चेहरा घूम रहा था।
कई महीनों से प्रेम का किसी काम में मन नहीं लगता था, लेकिन काव्या को देखते ही उसके अंदर नई उमंग पैदा हो गई।
उसने कभी नहीं सोचा था कि किसी लड़की की एक मुस्कान उसकी बेरंग जिंदगी में अचानक इतने सारे रंग भर देगी।
प्रेम बिस्तर पर लेटे हुए मुस्कुराया और मन ही मन बोला, “आखिर काव्या को देखकर मुझे इतना अच्छा क्यों लग रहा है?”
वह खुद भी इस सवाल का जवाब नहीं जानता था, लेकिन दिल बार-बार उसी लड़की के बारे में सोच रहा था।
अब प्रेम दिन में 2 बजे से पहले ही निशा को स्कूल लेने जाने के लिए प्रेम बार-बार घड़ी देख रहा था। और फिर अचानक बाइक की चाबी उठाकर सीधा निशा के स्कूल निकल गया।
निशा को स्कूल लेने पहुँचा प्रेम

प्रेम स्कूल के बाहर समय से काफी पहले पहुँच गया। उसने बाइक खड़ी की और निशा के बाहर आने का इंतजार करने लगा।
कुछ देर बाद निशा अपनी सहेलियों के साथ गेट से बाहर आई। प्रेम को देखकर वह हैरान रह गई और उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
निशा ने पास आकर पूछा, “भैया, आज आपको क्या हुआ? आप मुझे लेने खुद स्कूल आ गए?”
प्रेम ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं छोटी, आज मेरे पास समय था, इसलिए सोचा तुम्हें घर लेता चलूँ।”
निशा ने प्रेम को ध्यान से देखा। उसे साफ समझ आ गया कि उसके भाई के मन में जरूर कुछ चल रहा है।
उसी समय काव्या भी बाहर आई। प्रेम को वहाँ देखकर उसके चेहरे पर भी हल्की खुशी दिखाई दी।
प्रेम ने काव्या की ओर देखकर धीरे से कहा, “अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हें भी तुम्हारे घर छोड़ सकता हूँ।”
निशा यह सुनते ही जोर-जोर से हँसने लगी। उसकी हँसी देखकर प्रेम और काव्या दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
निशा ने हँसते हुए कहा, “प्रेम भैया, आज आपको क्या हो गया? कहीं बुखार तो नहीं है?”
फिर उसने प्रेम के माथे पर हाथ रखा और बोली, “आज तक मुझे लेने नहीं आए,और आज सूरज कहाँ से निकला है पता करना ही पड़ेगा!”
यह सुनते ही काव्या अपनी हँसी रोक नहीं पाई। उसने निशा को हल्की डाँट देते हुए कहा, “अरे चुप हो जा पगली, तू भी ना कुछ भी बोलती रहती है।”
प्रेम ने हँसते हुए कहा, “छोटी, ज्यादा बोलोगी तो अभी यहीं तुम्हारी खबर ले लूँगा।”
निशा ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “ठीक है भैया, आज तो बच गई। चलिए अब घर चलते हैं।”
बाइक पर प्यार की पहली नज़दीकी
तीनों बाइक के पास पहुँचे। निशा ने जानबूझकर काव्या से कहा, “काव्या, तू बीच में बैठ जा, कहीं तू पीछे बैठी तो गिर जाएगी।”
काव्या ने हैरानी से पूछा, “लेकिन मैं बीच में कैसे बैठूँ? तेरे भाई के पास बैठना पड़ेगा।”
निशा मुस्कुराकर बोली, “अरे मेरा भाई इतना स्मार्ट है, उसके पास बैठने से तो तेरे भाग खुल जाएँगे।”
काव्या यह सुनकर शर्माते हुए हँस पड़ी। प्रेम ने सब सुन लिया, लेकिन उसने चुप रहना ही बेहतर समझा।
काव्या प्रेम के पीछे बैठ गई और निशा सबसे पीछे बैठी। प्रेम के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी।
प्रेम ने बाइक धीरे-धीरे चलानी शुरू की। वह चाहता था कि काव्या के साथ यह सफर थोड़ा और लंबा चलता रहे।
कुछ दूर जाने के बाद निशा बोली, “भैया, थोड़ा तेज चलाओ। मुझे बहुत भूख लगी है, घर जल्दी पहुँचना है।”
प्रेम ने हँसकर कहा, “तेरी चिंता मत कर, तू बाइक से गिर भी जाएगी तो ज्यादा टेंशन नहीं होगी।”
फिर उसने मज़ाक में कहा, “लेकिन काव्या को कुछ नहीं होना चाहिए, आखिर मेरी इज्जत का सवाल है।”
निशा फिर हँसने लगी। काव्या ने भी मुस्कुराकर सिर झुका लिया और प्रेम के चेहरे पर खुशी और बढ़ गई।
काव्या का घर और उसके पिता से मुलाकात

काव्या का घर ज्यादा दूर नहीं था। कुछ ही देर में प्रेम ने बाइक उसके घर के पास रोक दी।
बाहर काव्या के पिता शंकर दास खड़े थे। उन्होंने प्रेम को देखा और फिर काव्या की ओर देखकर पूछा, “बेटी, यह लड़का कौन है?”
काव्या ने तुरंत कहा, “पिताजी, यह मेरी सहेली निशा के भैया हैं। आज मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं थी, इसलिए मुझे घर छोड़ने आए हैं।”
शंकर दास ने प्रेम की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, धन्यवाद। आजकल कौन किसी के लिए इतना समय निकालता है?”
प्रेम बाइक पर बैठे-बैठे ही थोड़ा झुका और बोला, “नमस्ते अंकल। मेरे पिता कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।”
फिर प्रेम ने मुस्कुराकर कहा, “काव्या मेरी बहन की दोस्त है, इसलिए वह भी मेरे लिए अपने परिवार जैसी है।”
शंकर दास प्रेम की बात सुनकर खुश हो गए। उन्होंने कहा, “बहुत अच्छी बात है बेटा। तुम जैसे बच्चे आजकल बहुत कम मिलते हैं।”
प्रेम ने मुस्कुराकर कहा, “अंकल, काव्या को कभी भी मेरी जरूरत हो तो बता दीजिएगा। मैं जरूर मदद करूँगा।”
काव्या प्रेम की बात सुनकर चुपचाप मुस्कुराती रही। शायद उसके दिल में भी प्रेम के लिए सम्मान की एक छोटी-सी जगह बन चुकी थी।
प्रेम ने काव्या को नमस्ते किया और बाइक लेकर वापस चल पड़ा। काव्या काफी देर तक उसे जाते हुए देखती रही।
काव्या के फोन नंबर के लिए बहन से सौदा
घर लौटते समय निशा ने प्रेम को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे भाई, तुम तो बहुत चालाक निकले। एक दिन में ही काव्या को घर छोड़ने लगे।”
प्रेम ने हँसकर कहा, “चुप कर छोटी। ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है।”
निशा ने तुरंत कहा, “मुझे सब समझ आ रहा है। अब घर जाकर मम्मी और बाबा को सारी बात बताऊँगी।”
प्रेम घबरा गया और बोला, “अच्छा छोटी, यह बता तुझे चॉकलेट में कौन-सी सबसे ज्यादा पसंद है?”
निशा तुरंत समझ गई कि भाई उसे खुश करने की कोशिश कर रहा है। उसने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा! मुझे खरीदने की कोशिश हो रही है?”
प्रेम ने कहा, “जो चाहिए ले लेना, बस आज की बात घर में किसी को मत बताना।”
निशा ने कहा, “ठीक है, लेकिन मेरा स्कूल का काम भी करना होगा।”
प्रेम हँसकर बोला, “ठीक है, तेरा हर काम कर दूँगा। लेकिन मेरी भी एक शर्त है।”
निशा ने पूछा, “अब आपकी क्या शर्त है?” प्रेम थोड़ा झिझका और बोला, “मुझे काव्या का नंबर चाहिए। लेकिन तू खुद उससे मेरा नाम लेकर नंबर माँगेगी।”
निशा जोर से हँसी और बोली, “अच्छा! तो मामला यहाँ तक पहुँच गया है। ठीक है भैया, मैं कोशिश करूँगी।”
प्रेम ने की दोस्ती की पहली बात

अगले दिन प्रेम फिर निशा को स्कूल छोड़ने पहुँचा। बाइक चलाते हुए उसने धीरे से कहा, “छोटी, अपना वादा भूलना मत। मुझे काव्या का नंबर चाहिए।”
निशा मुस्कुराकर बोली, “ठीक है, लेकिन काव्या को उसके घर से थोड़ा दूर छोड़ना। उसके पिताजी को शक हो सकता है।”
प्रेम ने तुरंत कहा, “ठीक है, लेकिन नंबर जरूर चाहिए। मैं तुझे रोज स्कूल छोड़ने और लेने आऊँगा।”
स्कूल पहुँचकर निशा ने काव्या से कहा, “काव्या, मेरे भैया को तुम्हारा नंबर चाहिए। अगर तुम चाहो तो दे सकती हो।”
काव्या यह सुनते ही थोड़ी देर चुप रही। फिर उसके चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान आ गई।
काव्या ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हारा भाई मेरा नंबर क्यों मांग रहा है? वैसे वह काफी स्मार्ट और अच्छा लगता है।”
निशा हँसते हुए बोली, “तू भी कम खूबसूरत नहीं है। अगर मेरी भाभी बन गई, तो मुझे बहुत मजा आएगा।”
काव्या शर्माकर बोली, “निशा, तू भी ना! अभी से क्या-क्या सोचने लगी?”
फिर काव्या ने अपना नंबर निशा को दे दिया। निशा ने वह नंबर प्रेम को दे दिया।
प्रेम ने शाम को नंबर देखते ही मुस्कुराकर फोन हाथ में लिया। उसके दिल की धड़कन अचानक थोड़ी तेज हो गई।
कुछ देर बाद उसने काव्या को संदेश भेजा, “हैलो काव्या, मैं प्रेम हूँ। उम्मीद है तुम्हें मेरा संदेश बुरा नहीं लगा होगा।”
कुछ समय बाद काव्या का जवाब आया, “नहीं, बिल्कुल बुरा नहीं लगा। वैसे तुम अभी क्या कर रहे हो?”
प्रेम ने लिखा, “बस तुम्हारे संदेश का इंतजार कर रहा था।”
काव्या ने मुस्कुराते हुए लिखा, “अच्छा जी! इतनी जल्दी बातें बनाना भी सीख गए?”
प्रेम ने जवाब दिया, “शायद तुम्हारी वजह से। वैसे तुम आगे क्या पढ़ना चाहती हो?”
काव्या ने लिखा, “मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके कुछ अच्छा करना चाहती हूँ। तुम आगे क्या बनना चाहते हो?”
प्रेम कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने लिखा, “मैं कंप्यूटर सीख रहा हूँ। मेरा सपना है कि आगे चलकर एक अच्छा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनूँ।”
काव्या ने तुरंत जवाब दिया, “तो फिर अपने सपने के लिए खूब मेहनत करना। पढ़ाई को कभी बीच में मत छोड़ना।”
काव्या की बात प्रेम के दिल में उतर गई। उसने पहली बार अपने सपने को लेकर इतनी सच्ची बात किसी से सुनी थी।
प्रेम ने मुस्कुराकर लिखा, “काव्या, क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी?”
काव्या ने कुछ देर बाद जवाब दिया, “दोस्ती कर लूँगी, लेकिन दोस्ती करना आसान है और उसे निभाना बहुत मुश्किल होता है। सोच लेना।”
प्रेम ने लिखा, “अब हमारी दोस्ती मेरे लिए बहुत खास होगी। मैं इसे हमेशा दिल से निभाऊँगा।”
काव्या ने केवल इतना लिखा, “ठीक है, फिर आज से हम अच्छे दोस्त हैं।”
उस रात प्रेम ने फोन एक तरफ रखा और मुस्कुराते हुए आसमान की ओर देखा। उसके अंदर पढ़ाई और अपने सपने के लिए एक नई ताकत पैदा हो चुकी थी।
अगली सुबह प्रेम पहले से जल्दी उठ गया। उसने किताबें खोलीं और कई महीनों बाद पूरे मन से पढ़ाई करने बैठ गया।
अब उसके पास सिर्फ प्यार की नई खुशी नहीं थी, बल्कि अपने सपने को पूरा करने की एक नई वजह भी थी।
स्कूल के बाहर दो धड़कनों की मुलाकात

अगली सुबह प्रेम निशा को स्कूल छोड़ने निकला, लेकिन आज उसके दिल में पढ़ाई से ज्यादा काव्या से मिलने की खुशी थी।
निशा बाइक पर बैठी तो प्रेम ने मुस्कुराकर पूछा, “छोटी, आज इतनी चुप क्यों हो? कहीं मेरी कोई शिकायत तो नहीं है?”
निशा हँसते हुए बोली, “नहीं भैया, मैं तो सोच रही हूँ कि आज काव्या से मिलने के बाद आपका चेहरा कितना बदलता है।”
प्रेम ने तुरंत कहा, “तू भी ना, सुबह-सुबह मुझे परेशान करना शुरू कर देती है। चुपचाप बैठ और स्कूल पहुँचने दे।”
निशा मन ही मन हँसती रही, क्योंकि वह समझ चुकी थी कि प्रेम के दिल में अब काव्या के लिए कुछ खास था।
कुछ देर बाद दोनों स्कूल पहुँचे। गेट के पास काव्या अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी और प्रेम को देखते ही मुस्कुराने लगी।
प्रेम ने बाइक रोकी और निशा नीचे उतर गई। काव्या धीरे-धीरे उनके पास आई और प्रेम को देखकर हल्की मुस्कान दे दी।
निशा ने दोनों के चेहरे देखे और तुरंत समझ गई कि आज दोनों कुछ देर अकेले रहना चाहते हैं।
वह जानबूझकर अपनी एक सहेली के पास चली गई और प्रेम तथा काव्या को स्कूल के गेट से दूर अकेला छोड़ दिया।
काव्या ने निशा को दूर जाते देखा और मुस्कुराकर बोली, “तुम्हारी बहन हमें अकेला छोड़कर क्यों चली गई?”
प्रेम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “शायद उसे पता है कि मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं।”
काव्या का चेहरा हल्का लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं और धीरे से पूछा, “मुझसे ऐसी कौन-सी बात करनी है?”
प्रेम कुछ पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से काव्या का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसकी तरफ प्यार से देखने लगा।
काव्या को प्रेम के हाथ का वह हल्का स्पर्श ऐसा लगा, जैसे उसके दिल में प्यार का मीठा करंट अचानक दौड़ गया।
उसकी धड़कन तेज हो गई और चेहरे पर शर्मीली मुस्कान आ गई। उसने अपना हाथ प्रेम से अलग करने की कोशिश भी नहीं की।
प्रेम ने धीमे स्वर में पूछा, “काव्या, क्या तुम्हें मेरे साथ रहना अच्छा लगता है?” काव्या ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
काव्या बोली, “हाँ प्रेम, तुम्हारे साथ रहने पर मुझे पता नहीं क्यों, बाकी सारी बातें कुछ देर के लिए भूल जाती हूँ।”
प्रेम उसकी बात सुनकर मुस्कुराया। उसने धीरे से कहा, “शायद मेरे साथ भी यही हो रहा है, जब तुम सामने होती हो।”
दोनों कुछ पल एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे। आसपास बच्चों की आवाजें थीं, लेकिन दोनों को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
प्रेम थोड़ा पास आया और बहुत धीरे से काव्या के कान के पास बोला, “काव्या, क्या दोस्ती में हग हो सकता है?”
यह सुनते ही काव्या के दिल की धड़कन और तेज हो गई। उसने प्रेम की ओर देखा और शर्माते हुए धीरे से हाँ कह दी।
प्रेम ने पूछा, लेकिन कब दोगी मुझे प्यारा सा हग?
काव्य बोली, पता नहीं। काव्या की आँखों में शर्म थी और प्रेम के चेहरे पर ऐसी खुशी थी, जिसे वह छिपा नहीं पा रहा था।
दूर खड़ी निशा ने दोनों को देखा और मुस्कुराकर मन ही मन कहा, “मेरे भैया तो सच में काव्या के प्यार में पड़ गए हैं।”
काव्या पहली बार प्रेम के घर पहुँची

कुछ दिनों बाद एक रविवार को सुबह काव्या निशा से मिलने उसके घर पहुँची। उस समय प्रेम अपने कमरे में सुबह की कसरत कर रहा था।
निशा ने दरवाजा खोला तो सामने काव्या को देखकर बहुत खुश हुई और उसे प्यार से अंदर ले आई।
काव्या ने घर में कदम रखते ही शांति देवी और रामानंद जी को नमस्ते किया। दोनों ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया।
निशा ने कहा, “माँ, पिताजी, यही मेरी सबसे प्यारी सहेली काव्या है, जिसके बारे में मैं आप दोनों को बताती रहती हूँ।”
शांति देवी ने प्यार से कहा, “आओ बेटी, बैठो। आज तुम पहली बार हमारे घर आई हो, इसलिए तुम्हें खूब बातें करनी होंगी।”
काव्या मुस्कुराकर बोली, “जी माँजी, मुझे भी आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। आपका घर देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।”
रामानंद जी ने हँसते हुए कहा, “बेटी, निशा की दोस्त हो तो हमारे लिए भी बेटी जैसी ही हो। बिल्कुल संकोच मत करना।”
शांति देवी ने प्यार से पूछा, “बेटी, तुम्हारे घर में कौन-कौन हैं और तुम्हारे माता-पिता के नाम क्या हैं?”
काव्या ने विनम्रता से जवाब दिया, “माँजी, मेरे पिता का नाम शंकर दास और मेरी माँ का नाम कुसुम देवी है।”
शांति देवी ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी पढ़ाई को लेकर क्या कहते हैं?” काव्या ने तुरंत जवाब दिया।
काव्या बोली, “वे हमेशा कहते हैं कि पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना और अपने सपने पूरे करना बहुत जरूरी है।”
शांति देवी को काव्या की बातें बहुत अच्छी लगीं। उसके बोलने का तरीका और बड़ों के प्रति सम्मान उन्हें दिल से पसंद आया।
काव्या की चाय और शांति देवी की नजर
कुछ देर बाद काव्या ने मुस्कुराकर कहा, “माँजी, मैं सबके लिए चाय बना देती हूँ।” शांति देवी ने खुशी से उसे रसोई दिखा दी।
काव्या रसोई में जाकर सबके लिए चाय बनाने लगी। शांति देवी उसे देखते हुए मन ही मन सोचने लगीं कि लड़की बहुत प्यारी है।
काव्या ने चाय तैयार की और फिर उसे ऊपर लेकर जाने लगी। उसे पता चला कि प्रेम अपने कमरे में कसरत कर रहा है।
निशा ने मुस्कुराकर कहा, “काव्या, भैया ऊपर कमरे में हैं। तुम चाहो तो उनसे भी मिल आओ।” काव्या धीरे से ऊपर चली गई।
उसने कमरे का दरवाजा खोला तो सामने प्रेम कसरत करते हुए अचानक रुक गया। काव्या को देखकर उसके चेहरे पर खुशी आ गई।
प्रेम ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम यहाँ?” काव्या ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “तुमसे मिलने आई हूँ, और तुम्हारे लिए चाय भी लाई हूँ।”
प्रेम ने चाय का कप लिया और बोला, “आज का दिन तो मेरे लिए बहुत ही ज्यादा खास हो गया।” काव्या हल्का-सा शर्मा गई।
तभी निशा ऊपर आ गई और दोनों को देखकर बोली, “अच्छा, यहाँ इतनी शांति क्यों है? लगता है मेरी जरूरत ही नहीं है।”
प्रेम ने हँसते हुए कहा, “तू हमेशा गलत समय पर आ जाती है।” निशा ने तुरंत कहा, “मुझे सब पता है।”
एक हग का वादा जो काव्या ने प्रेम को दिया

निशा ने कहा, “मैं नीचे से बिस्किट और नमकीन लेकर आती हूँ। तुम दोनों यहीं बैठो।” वह मुस्कुराकर नीचे चली गई।
कमरे में अब सिर्फ प्रेम और काव्या थे। कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर प्रेम ने प्यार से काव्या की तरफ देखा।
प्रेम ने धीरे से उसका हाथ थामा और कहा, “शुक्रिया काव्या, तुमने मेरे दिल को बहुत आराम दिया। प्लीज, मुझसे कभी दोस्ती मत तोड़ना।”
काव्या ने प्रेम की आँखों में देखते हुए कहा, “अंत तक मैं तुमसे दोस्ती नहीं तोड़ूँगी, जब तक मेरी साँसें चल रही हैं।”
यह सुनते ही प्रेम ने प्यार से काव्या को अपनी बाँहों में ले लिया। काव्या ने भी आँखें बंद करके उसे कुछ पल अपने पास रहने दिया।
उस छोटे-से हग में दोनों को ऐसा सुकून मिला, जैसे कई दिनों से बेचैन दिलों को आखिरकार अपना जवाब मिल गया हो।
कुछ पल बाद दोनों अलग हुए। प्रेम की आँखों में खुशी उतर आई। उसने फिर से काव्या को प्यार से अपनी बाँहों में खींच लिया और दोनों कुछ पल गले लगे रहे।
काव्या को लगा जैसे उस पल उसकी सारी बेचैनी खत्म हो गई। उसे बस प्रेम की मौजूदगी और उसके दिल की धड़कन महसूस हो रही थी।
उसी समय निशा चाय लेकर ऊपर आई, लेकिन उसने दोनों को गले लगे हुए नहीं देखा और उसे कुछ पता नहीं चला।
फिर भी प्रेम और काव्या के चेहरे देखकर निशा समझ गई कि उसके नीचे जाने के बाद जरूर कोई खास बात हुई है।
निशा ने चाय रखते हुए पूछा, “क्या बात है? दोनों इतने खुश क्यों दिख रहे हो?” प्रेम ने तुरंत मुस्कुराकर बात बदल दी।
निशा ने दोनों को ध्यान से देखा और फिर बिस्किट तथा नमकीन सामने रख दिए। उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान थी।
छुट्टियों में साथ घूमने का सपना
तीनों कमरे में बैठकर बातें करने लगे। निशा ने अचानक कहा, “छुट्टियाँ आने वाली हैं, क्यों ना हम तीनों कहीं घूमने चलें?”
काव्या की आँखें चमक उठीं। उसने कहा, “अगर घरवाले मान गए, तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। हम सब साथ में खूब मस्ती करेंगे।”
प्रेम मुस्कुराकर बोला, “मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूँ, जहाँ पूरा दिन घूम सकें और शाम को बैठकर बातें कर सकें।”
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निशा ने कहा, “ठीक है, जगह मैं सोचूँगी। लेकिन पहले माँ और पिताजी से इजाजत लेना जरूरी है।”
काव्या मुस्कुराकर बोली, “अगर सबकी इजाजत मिल गई, तो यह छुट्टी मेरे लिए बहुत यादगार बन जाएगी।”
प्रेम ने उसकी तरफ देखा और मन ही मन सोचा कि अगर काव्या साथ होगी, तो हर जगह उसे बेहद खूबसूरत लगेगी।
काव्या से दूरी अब बर्दाश्त नहीं होती
शाम को प्रेम और निशा पैदल काव्या को उसके घर छोड़ने निकले। रास्ते भर निशा दोनों को छेड़ती रही और दोनों मुस्कुराते रहे।
काव्या का घर पास आया तो उसने कहा, “तुम दोनों यहीं से वापस चले जाना, आगे मैं अकेली चली जाऊँगी।”
प्रेम ने कहा, “ठीक है काव्या, तुम आराम से घर चली जाओ। हम यहीं से वापस चले जाते हैं।”
काव्या कुछ कदम आगे बढ़ी, फिर अचानक पीछे मुड़कर प्रेम को देखने लगी। प्रेम भी उसे चुपचाप देखता रहा।
काव्या की आँखों में हल्के आँसू आ गए। उसने मन ही मन कहा, “काश भगवान, प्रेम मुझे हमेशा के लिए मिल जाए।”
उसने जल्दी से आँखें पोंछीं और अपने घर की ओर बढ़ गई, लेकिन बार-बार पीछे मुड़कर प्रेम को देखती रही।
उधर प्रेम और निशा वापस घर की तरफ चलने लगे। प्रेम आज पहले से ज्यादा चुप था और उसके मन में काव्या की बातें घूम रही थीं।
चलते-चलते उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, “हे भगवान, इतना बेपरवाह दिल मेरा क्यों हो रहा है?”
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि काव्या कब उसकी आदत बन गई और कब उसकी मुस्कान उसकी खुशी बन चुकी थी।
शायद प्रेम को अब यह एहसास होने लगा था कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही, बल्कि उसके दिल में काव्या के लिए प्यार जन्म ले चुका था।
अब आगे जानिए, प्रेम और काव्या के इस बेपरवाह प्यार की राह में कौन-सा नया मोड़ आएगा और दोनों का रिश्ता मंजिल तक पहुँचेगा या नहीं।




