बिहार के सोनबरसा गाँव में दस साल बाद विकास अपने पुश्तैनी घर लौटता है। पीछे का बंद कमरा आठ साल पहले निखिल की मौत का गवाह था। पहली रात कमरे से टीवी चलने की आवाज आती है और दूसरी रात आरव एक मरे हुए भैया को देखता है। बरगद तक जाने वाले रास्ते पर रहस्यमय पैरों के निशान मिलते हैं। फिर पुलिस के सामने भी कमरे में कोई दिखाई देने लगता है।
कहानी का डर तब बढ़ता है, जब विकास को समझ आता है कि बंद कमरा खाली नहीं है।
कुछ आवाजें मरने के बाद भी खत्म नहीं होतीं, वे किसी को अपने पास बुलाती रहती हैं।
और इस घर में वह आवाज अब सिर्फ कमरे के अंदर से नहीं आ रही थी।
बिहार का वह डरावना गाँव। Horror Story in Hindi
दस साल बाद विकास जब बिहार के सोनबरसा गाँव पहुँचा, तब शाम तेजी से उतर रही थी। गाँव पहले से ज्यादा शांत लग रहा था।
उसका पुश्तैनी घर गाँव के आखिरी छोर पर था। घर के पीछे करीब सौ मीटर दूर एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ खड़ा था। उसकी मोटी शाखाएँ दूर से ही किसी विशाल आकृति जैसी दिखाई देती थीं।
घर में तीन कमरे थे। आगे के दो कमरे कई साल से बंद पड़े थे, लेकिन सबसे पीछे वाला छोटा कमरा लोहे के पुराने ताले से बंद था।
घर की सफाई करते समय पड़ोसी कमला ने धीमी आवाज में विकास से कहा, “पीछे वाला कमरा मत खोलना।”
विकास ने हँसते हुए पूछा, “क्यों? इतने साल से बंद क्यों है?”
कमला कुछ देर चुप रही। फिर उसने कमरे की तरफ देखा और बोली, “वहीं तुम्हारे चचेरे भाई निखिल की मौत हुई थी।”
विकास को यह बात पहले से पता थी। परिवार ने बताया था कि आठ साल पहले निखिल ने उसी कमरे में आत्महत्या कर ली थी। लेकिन उस घटना के बाद घर को लगभग बंद ही कर दिया गया था।
कमला ने कहा कि मौत के बाद कई रातों तक उस कमरे से कुर्सी घिसटने, किसी के चलने और कभी-कभी धीमे बोलने की आवाजें आती थीं।
गाँव वालों के मुताबिक, निखिल की मौत के बाद उस कमरे में रात को किसी के चलने की आवाज आने लगी थी।
कमला ने यह भी बताया कि बरगद के पेड़ तक जाने वाले रास्ते पर कई बार किसी के पैरों के निशान दिखाई दिए थे, जबकि वहाँ रात में कोई जाता नहीं था।
रात को विकास ने घर का दरवाजा बंद किया और सोने चला गया। उसे लगा कि गाँव वालों ने पुरानी घटना को जरूरत से ज्यादा डरावना बना दिया है।
बंद कमरे में पहली रात
रात करीब साढ़े ग्यारह बजे घर पूरी तरह शांत था। बाहर दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। तभी पीछे वाले कमरे की दिशा से टीवी चलने की आवाज आई।
पहले विकास को लगा कि शायद बिजली आ गई होगी। लेकिन उस कमरे की बिजली कई साल पहले ही काट दी गई थी।
वह धीरे-धीरे कमरे के दरवाजे तक पहुँचा। अंदर से पुराने टीवी की खरखराती आवाज साफ सुनाई दे रही थी। कभी आवाज तेज होती, फिर अचानक धीमी पड़ जाती।
दरवाजे के नीचे से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी। विकास ने झुककर अंदर देखने की कोशिश की, लेकिन नीचे की जगह से सिर्फ अंधेरा दिखाई दिया।
अचानक अंदर रखी कुर्सी घिसटने की आवाज आई। जैसे कोई धीरे-धीरे कुर्सी को दरवाजे की तरफ खींच रहा हो। फिर सब शांत हो गया।
विकास पीछे हटने ही वाला था कि दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
उसने खुद को समझाया कि शायद पुरानी लकड़ी की आवाज होगी। तभी दरवाजे के नीचे से कुछ काला दिखाई दिया।
दरवाजे के नीचे से काली उंगलियाँ धीरे-धीरे बाहर निकलीं और फर्श को टटोलने लगीं।
विकास पीछे हट गया। उसकी नजर उन उंगलियों पर जम गई। वे कुछ सेकंड तक फर्श पर रेंगती रहीं और फिर अचानक वापस अंदर खिंच गईं।
उसी समय कमरे के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई, “विकास…”
वह आवाज बिल्कुल निखिल जैसी थी। विकास के गले से आवाज नहीं निकली।
फिर अंदर से किसी के नंगे पैर चलने की आवाज आई। एक कदम… फिर दूसरा… फिर तीसरा। आवाज दरवाजे तक आई और अचानक रुक गई।
विकास दौड़कर अपने कमरे में गया। कुछ देर बाद जब उसने बाहर देखा, तो गलियारे में एक छोटी खिलौना कार पड़ी थी। वह कार उसके कमरे के पास पहले नहीं थी।
सबसे अजीब बात यह थी कि कार के पहिए धीरे-धीरे घूम रहे थे, जबकि फर्श बिल्कुल स्थिर था।
आरव ने जिसे देखा
अगली सुबह विकास ने किसी को रात की बात नहीं बताई। वह खुद भी तय नहीं कर पा रहा था कि उसने वास्तव में क्या देखा था।
उसका पाँच साल का बेटा आरव सुबह घर के पीछे खेल रहा था। अचानक उसने पीछे वाले कमरे की ओर देखते हुए कहा, “पापा, भैया वहाँ खड़े हैं।”
विकास ने पूछा, “कौन भैया?”
आरव ने कमरे की तरफ उंगली की और बोला, “वही… निखिल भैया।”
विकास के हाथ से गिलास लगभग छूट गया। उसने आरव को तुरंत अपने पास बुला लिया।
आरव ने कहा, “वो मुझे अंदर आने को बोल रहे थे। लेकिन मैंने कहा कि पापा मना करेंगे।”
विकास ने पूछा, “तुमने उन्हें देखा कहाँ?”
आरव ने बरगद की तरफ देखा और बहुत सामान्य आवाज में कहा, “पहले कमरे में थे, फिर पेड़ के पास चले गए।”
आरव ने धीरे से कहा, “पापा, निखिल भैया अकेले नहीं हैं… अंदर कोई और भी रहता है।”
विकास के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने पूछा, “और कौन रहता है?”
आरव ने जवाब नहीं दिया। उसने बस कमरे की तरफ देखा और अपनी उंगली होंठों पर रख दी, जैसे किसी को चुप रहने का इशारा कर रहा हो।
कुछ देर बाद सरोज ने विकास को बताया कि निखिल की मौत से पहले भी घर में अजीब घटनाएँ होने लगी थीं।
वह कई बार रात में उठकर किसी से बात करता था। कभी कहता कि कमरे में कोई उसके पीछे खड़ा है और कभी कहता कि बरगद के पास से कोई उसे बुला रहा है।
निखिल की मौत का पुराना राज
सरोज ने बताया कि मौत से कुछ दिन पहले निखिल ने अपनी किताबें भी घर के पीछे बरगद के पास ले जाना शुरू कर दिया था।
एक रात उसने परिवार से कहा था कि उसे कमरे में किसी की साँस लेने की आवाज सुनाई देती है। परिवार ने इसे तनाव समझकर नजरअंदाज कर दिया।
उसने यह भी कहा था कि कभी-कभी कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा होकर उसका नाम लेता है। लेकिन जब वह मुड़ता है तो कमरे में कोई नहीं होता।
फिर एक सुबह वह कमरे के अंदर मृत मिला। दरवाजा अंदर से बंद था और खिड़की भी बंद थी। पुलिस को कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे किसी दूसरे व्यक्ति के कमरे में आने की बात साबित हो सके।
मामला आत्महत्या मानकर बंद कर दिया गया। लेकिन मौत से पहले निखिल ने दीवार पर कुछ लिखा था।
दीवार पर लिखा था—“ये कमरा अब भी मेरा है।”
परिवार ने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया। किसी ने फिर उसे खोलने की हिम्मत नहीं की।
विकास को अब पहली बार लगा कि कमरे में बंद सिर्फ निखिल की याद नहीं थी। वहाँ कुछ और भी था।
उसी दिन बिजली ठीक करने आए रमेश ने भी पीछे वाले कमरे का जिक्र सुनकर साफ कहा कि उसने उस कमरे की लाइन वर्षों पहले काट दी थी।
उसने कहा, “अगर रात में वहाँ से आवाज आए, तो जवाब मत देना। और ताला खोलने की गलती मत करना।”
विकास ने पूछा, “तुम्हें इतना कैसे पता?”
रमेश ने कुछ पल विकास को देखा और फिर कहा, “मैंने भी एक रात वह आवाज सुनी थी। पहले मुझे लगा कोई अंदर बंद है। फिर आवाज मेरे पीछे से आई।”
यह कहकर रमेश चुप हो गया। उसने कमरे की तरफ दोबारा नहीं देखा।
बरगद तक जाने वाला रास्ता
अगली दोपहर विकास, दूधवाला गोपाल और गाँव के रामदीन के साथ बरगद के पेड़ तक गया। दिन का समय था, फिर भी उस जगह पर अजीब ठंडक महसूस हो रही थी।
पेड़ के नीचे मिट्टी थोड़ी गीली थी। वहाँ पुराने पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे। कुछ निशान नंगे पैर के थे और कुछ ऐसे लग रहे थे जैसे कोई भारी चीज घसीटकर ले गया हो।
गोपाल ने जमीन से एक पुरानी चाबी उठाई। वह चाबी बिल्कुल उसी आकार की थी, जैसी पीछे वाले कमरे के ताले में लग सकती थी।
विकास ने चाबी हाथ में ली तो बरगद की शाखाओं से अचानक सूखी पत्तियाँ गिरने लगीं। हवा बिल्कुल नहीं चल रही थी।
रामदीन ने कहा, “इसे वापस रख दो।”
तभी पेड़ के पीछे से किसी के हँसने की बहुत धीमी आवाज आई। तीनों ने एक साथ पीछे देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
गोपाल ने फिर नीचे देखा। मिट्टी पर एक नया पैरों का निशान बना था। उसके बाद दूसरा। फिर तीसरा।
बरगद के नीचे अचानक नए गीले पैरों के निशान बने, जो पेड़ से सीधे विकास के घर की तरफ जा रहे थे।
गोपाल ने डरते हुए कहा, “ये अभी बने हैं।”
विकास ने पीछे मुड़कर घर की ओर देखा। पीछे वाले कमरे की खिड़की बंद थी, लेकिन उसके अंदर हल्की पीली रोशनी दिखाई दे रही थी।
तीनों घर की तरफ चलने लगे। कुछ दूर आने के बाद विकास ने पीछे देखा तो पैरों के निशान अब भी बन रहे थे। कोई दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन मिट्टी पर एक-एक करके नए निशान उभरते जा रहे थे।
वे तीनों जल्दी से घर लौट आए। विकास ने चाबी किसी को नहीं दी और उसे जेब में रख लिया।
पुलिस फिर घर पहुँची
शाम होते-होते विकास ने पुलिस को सारी बात बता दी। थोड़ी देर बाद दो पुलिसकर्मी घर पहुँचे और उन्होंने पीछे वाले कमरे तथा बरगद के आसपास की जगह देखी।
कमरे का ताला बाहर से बंद था। पुलिस ने आसपास कोई संदिग्ध व्यक्ति नहीं पाया। बरगद के पास मिले निशानों को उन्होंने जानवरों के निशान मान लिया।
एक पुलिसकर्मी ने कहा, “पुराना घर है। आवाजें आती रहती हैं। डरने की जरूरत नहीं।”
लेकिन पुलिस के जाने के कुछ मिनट बाद घर के अंदर अचानक एक तेज चीख सुनाई दी।
आवाज उसी बंद कमरे से आई थी।
विकास ने दरवाजे की ओर देखा। ताला अब भी लगा था। फिर अंदर से किसी के तेज कदमों की आवाज आई।
धड़… धड़… धड़…
आवाज दरवाजे के ठीक पीछे आकर रुक गई।
फिर बंद दरवाजे के पीछे से निखिल की आवाज आई, “दरवाजा खोलो विकास… मैं बहुत देर से बाहर खड़ा हूँ।”
विकास पीछे हट गया। उसकी समझ में नहीं आया कि अगर आवाज कमरे के अंदर से आ रही है तो निखिल खुद को बाहर क्यों बता रहा है।
तभी कमरे का पुराना टीवी अपने आप चलने लगा। जबकि उस कमरे में बिजली का कनेक्शन नहीं था। स्क्रीन पर सिर्फ काली और सफेद रेखाएँ थीं।
कुछ सेकंड बाद स्क्रीन पर कमरे का ही दृश्य दिखाई देने लगा। उसमें विकास खुद कमरे के बाहर खड़ा दिखाई दे रहा था।
लेकिन स्क्रीन के अंदर उसके पीछे एक आदमी खड़ा था।
विकास ने घबराकर पीछे देखा। वहाँ कोई नहीं था। उसने फिर टीवी की तरफ देखा तो स्क्रीन में वह आकृति पहले से भी करीब खड़ी थी।
कमरे के अंदर कोई बैठा था
विकास ने स्क्रीन से नजर हटाई और पीछे देखा। गलियारा खाली था। फिर उसने स्क्रीन की तरफ देखा तो वह आदमी और करीब दिखाई दे रहा था।
अचानक टीवी बंद हो गया। उसी समय कमरे के अंदर कुर्सी घिसटने की आवाज आई।
विकास ने जेब से चाबी निकाली। कुछ पल तक वह ताले को देखता रहा। फिर उसने चाबी ताले में डाल दी।
ताला बिना किसी आवाज के खुल गया।
कमरे के अंदर धूल जमी थी। हवा में सीलन और पुराने कपड़ों जैसी गंध थी। एक पुरानी कुर्सी बीच में रखी थी। दीवार पर वही पुराना लिखा हुआ वाक्य अब भी मौजूद था—“ये कमरा अब भी मेरा है।”
लेकिन कुर्सी पर कोई बैठा हुआ था।
वह निखिल था। उसका चेहरा वैसा ही था जैसा आठ साल पहले था। कपड़े भी वही थे जिनका जिक्र परिवार ने उसकी मौत के समय किया था। लेकिन उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
निखिल ने सिर उठाकर कहा, “तू इतने साल बाद मेरे कमरे में आया है, विकास… लेकिन अब यह सिर्फ मेरा कमरा नहीं है।”
विकास कुछ बोल नहीं पाया। उसकी नजर निखिल के चेहरे पर थी, लेकिन निखिल की आँखें लगातार दरवाजे के बाहर देख रही थीं।
निखिल ने बरगद की दिशा में देखते हुए कहा कि मौत से पहले उसे भी किसी आवाज ने इसी रास्ते पर बुलाया था।
वह आवाज कभी उसकी माँ जैसी होती, कभी किसी दोस्त जैसी और कभी खुद उसकी अपनी आवाज जैसी।
निखिल ने बताया कि वह आवाज लोगों को बरगद तक बुलाती है और फिर उनकी आवाजों की नकल करने लगती है।
विकास ने पूछा, “तो तुम यहाँ क्यों फँसे हो?”
निखिल ने धीरे से कहा, “क्योंकि मैंने उस आवाज का जवाब दिया था।”
निखिल फिर सामने आया
कमरे में अचानक ठंड बढ़ गई। निखिल की आवाज पहले से धीमी हो गई। उसने विकास को चेतावनी दी कि वह किसी ऐसी आवाज पर भरोसा न करे जो उसे अकेले बुलाए।
तभी बाहर से आरव की आवाज आई, “पापा!”
विकास दरवाजे की ओर बढ़ा, लेकिन निखिल ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“मत जाना। वह आरव नहीं है।”
विकास वहीं रुक गया। कुछ सेकंड बाद बाहर से फिर वही आवाज आई, लेकिन इस बार वह आवाज बिल्कुल विकास जैसी थी।
फिर गलियारे में छोटे पैरों की आवाज सुनाई दी। आवाज कमरे के दरवाजे तक आई और वहीं रुक गई।
दरवाजे के नीचे से पहले अंधेरा दिखाई दिया। फिर उस अंधेरे में दो छोटी उंगलियाँ फर्श पर रखी हुई दिखाई दीं।
दरवाजे के नीचे से एक छोटी काली परछाईं दिखाई दी, लेकिन उसके ऊपर किसी शरीर की परछाईं नहीं थी।
वह परछाईं कुछ पल बिल्कुल स्थिर रही। फिर धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से पीछे हट गई।
निखिल ने कहा कि यही वह चीज है जो बरगद और कमरे के बीच आती-जाती है। वह किसी इंसान की तरह दिख सकती है, लेकिन वह इंसान नहीं है।
अगली सुबह आरव ने बताया कि उसने रात में बरगद के नीचे किसी छोटे आदमी जैसी आकृति को देखा था। उसकी आँखें काली थीं और जमीन पर उसकी कोई परछाईं नहीं थी।
अब विकास ने तय किया कि इस रहस्य को खत्म किए बिना वह घर छोड़कर नहीं जाएगा।
उसने गोपाल, रामदीन और पुलिस की मदद लेने का फैसला किया।
आखिरी बार बरगद के पास
उस रात सभी लोग घर से बरगद की तरफ गए। सरोज और आरव भी साथ थे, क्योंकि विकास उन्हें घर में अकेला छोड़ना नहीं चाहता था।
जैसे ही वे आधे रास्ते पहुँचे, पीछे से घर का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। पुलिसकर्मी वापस जाने लगे, लेकिन विकास ने कहा कि अब शायद पीछे लौटने का कोई फायदा नहीं।
बरगद के पास पहुँचकर उन्हें मिट्टी में एक पुरानी डायरी मिली। डायरी निखिल की थी। उसमें आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था।
“जिसे कमरे में बंद समझते हो, वह कमरे में बंद नहीं है। वह रास्ते पर है।”
अचानक सबकी घड़ियाँ एक ही समय पर रुक गईं। बरगद के पीछे सफेद कपड़े जैसी कोई चीज दिखाई दी।
पुलिस ने टॉर्च उस तरफ की। आकृति कुछ कदम आगे आई और फिर रोशनी पड़ते ही गायब हो गई।
कुछ सेकंड तक सब चुप रहे। फिर पेड़ के पीछे से एक आवाज आई।
वह सरोज की आवाज थी—“विकास, मेरे पास आओ।”
विकास ने अपनी माँ की तरफ देखा। सरोज उसके बिल्कुल पास खड़ी थी और उसने कुछ नहीं कहा था।
अगले ही पल बरगद के नीचे दर्जनों पैरों के निशान बने और सभी निशान घर की ओर जाने लगे।
गोपाल ने डरकर कहा, “हम यहाँ से चलते हैं।”
तभी पीछे से विकास की ही आवाज आई, “गोपाल, इधर आओ।”
गोपाल ने सामने खड़े विकास को देखा। विकास उसके पास ही था। फिर भी वही आवाज पेड़ के पीछे से दोबारा आई।
इस बार कोई भी पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया। सभी तेजी से घर की तरफ लौटने लगे।
घर के पास पहुँचते ही पीछे वाले कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई। अंदर से कुर्सी घिसटने की आवाज आई।
फिर खिड़की के अंदर किसी चेहरे जैसा कुछ दिखाई दिया। पुलिस ने टॉर्च डाली तो वहाँ कुछ नहीं था।
सुबह फिर लगा ताला
उस घटना के बाद परिवार ने घर को हमेशा के लिए बंद करने का फैसला किया। पीछे वाले कमरे पर नया ताला लगाया गया और बरगद तक जाने वाला रास्ता भी बंद कर दिया गया।
कुछ दिनों बाद विकास, सरोज और आरव को लेकर शहर चला गया। उसने गाँव के उस घर की तरफ फिर कभी मुड़कर नहीं देखा।
लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
कई महीने बाद एक सुबह दूध देने पहुँचे गोपाल ने देखा कि घर का पुराना ताला जमीन पर पड़ा था। दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से हल्की पीली रोशनी दिखाई दे रही थी।
वह पीछे हटने लगा तभी अंदर से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “गोपाल… दरवाजा खोल दो।”
गोपाल पहचान गया। वह निखिल की आवाज थी।
गोपाल ने घर के अंदर झाँकने की कोशिश की। उसे लगा जैसे गलियारे के आखिर में कोई खड़ा है। आकृति कुछ सेकंड तक स्थिर रही और फिर धीरे-धीरे पीछे हटकर अंधेरे में गायब हो गई।
गोपाल ने घर की ओर देखा तो बंद कमरे की खिड़की के पीछे एक आदमी कुर्सी पर बैठा था, लेकिन उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
गोपाल बिना पीछे देखे गाँव की तरफ भाग गया। उस दिन के बाद किसी ने उस घर के पास जाने की हिम्मत नहीं की।
गाँव वालों का कहना था कि रात में कभी-कभी उस घर से टीवी चलने की आवाज आती थी। कभी किसी के चलने की आवाज सुनाई देती और कभी कोई परिचित आवाज बाहर से किसी का नाम पुकारती।
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सबसे डरावनी बात यह थी कि आवाज हमेशा उसी व्यक्ति की होती थी जिसे सुनने वाला सबसे ज्यादा पहचानता था।
आज भी सोनबरसा में लोग उस पुराने घर के पास से गुजरते समय रास्ता बदल लेते हैं। बरगद के नीचे कोई नहीं जाता।
क्योंकि गाँव वालों को डर है कि कहीं पीछे से कोई अपना ही नाम लेकर न पुकार दे।
और शायद सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—उस कमरे में कोई रहता है जो मर चुका है, या कमरे के बाहर रास्ते पर अब भी कोई ऐसी चीज घूम रही है जो इंसानों की आवाज पहचान चुकी है?
सोनबरसा का वह घर आज भी बंद है। लेकिन कभी-कभी रात के सन्नाटे में वहाँ से एक आवाज सुनाई देती है—“विकास… दरवाजा खोलो।”
कहते हैं, जवाब देने वाला इंसान उस आवाज को फिर कभी भूल नहीं पाता।
और शायद यही उस घर का सबसे डरावना रहस्य है—उस कमरे में कोई रहता है जो मर चुका है।




