छह साल तक पत्नी ने रखा दूर । अनुराग का दर्द और राधा का रोमेटिक प्यार । Love Story In Hindi

छह साल तक पत्नी ने रखा दूर । अनुराग का दर्द और राधा का रोमेटिक प्यार । Love Story In Hindi

क्या कोई पत्नी अपने पति को छह साल तक अपने करीब नहीं आने देती? बिना सुहागरात के छह साल कैसे बिताए होंगे अनुराग मेहरा ने? यह अनुराग और राधा की प्रेम कहानी है। अनुराग के पास दौलत की कमी नहीं थी, लेकिन जिस प्यार के लिए वह तरसता था, वह उसे अपनी पत्नी से कभी नहीं मिला। फिर उसकी जिंदगी में राधा आई। उसने अनुराग को समझा, उसके दुख में उसका साथ दिया और धीरे-धीरे उसके दिल में अपनी जगह बना ली। मगर जब दोनों ने नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया, तभी एक दिन उनकी खुशियों के बीच सुष्मिता लौट आई।

Hindi Rama | लव स्टोरी

Love Story In Hindi: अनुराग की अधूरी मोहब्बत

अनुराग मेहरा कपड़ों का थोक कारोबार करता था। कारोबार अच्छा चलता था। शहर में उसका अपना मकान था, गाड़ी थी और जरूरत की हर चीज मौजूद थी। उसकी माँ सावित्री भी उसी के साथ रहती थीं। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन घर के भीतर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे वह किसी से कह नहीं पाता था।

छह साल पहले उसकी शादी राजेंद्र मल्होत्रा की बेटी सुष्मिता से हुई थी। सुष्मिता खूबसूरत थी और अमीर घर में पली-बढ़ी थी। उसे अपनी पसंद से जीने की आदत थी। अनुराग ने सोचा था कि समय के साथ दोनों के बीच प्यार बढ़ेगा, लेकिन शादी के बाद से ही सुष्मिता उससे दूरी बनाए रखने लगी।

सुहागरात को भी उसने अनुराग को अपने करीब नहीं आने दिया था। अनुराग ने उस रात सोचा कि शायद वह घबराई हुई है और उसे समय चाहिए। मगर दिन महीने बने और महीने साल। छह साल गुजर गए, लेकिन उनके बीच पति-पत्नी जैसा अपनापन कभी नहीं आया।

अनुराग कभी उसके लिए पसंद का खाना मँगवाता, कभी कोई उपहार लाता, तो कभी शाम को साथ बैठकर बात करने की कोशिश करता। सुष्मिता को इनमें से किसी बात में दिलचस्पी नहीं थी।

एक शाम अनुराग ने हिम्मत करके पूछा, “सुष्मिता, मुझसे कोई शिकायत है तो बता दो। मैं उसे दूर करने की कोशिश करूँगा। आखिर हम पति-पत्नी हैं। कब तक ऐसे अलग-अलग रहेंगे?”

सुष्मिता ने फोन से नजर हटाए बिना कहा, “अनुराग, हर दिन एक ही बात लेकर मत बैठ जाया करो। मुझे इस रिश्ते में दिलचस्पी नहीं है। तुम्हें जो करना है, करो और मुझे अपनी जिंदगी जीने दो।”

अनुराग कुछ देर उसे देखता रहा। फिर बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया। वह जानता था कि बहस करने से कुछ नहीं बदलेगा।

उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। माँ सावित्री बेटे की उदासी समझती थीं, लेकिन अनुराग उनके सामने भी हँसकर बात करता, ताकि उन्हें अपनी चिंता न हो।

“बेटा, कभी अपने मन की बात भी बता दिया कर,” सावित्री ने एक दिन कहा।

अनुराग ने मुस्कराने की कोशिश की। “कुछ नहीं, माँ। काम थोड़ा ज्यादा है। आप परेशान मत हुआ करो।”

सावित्री ने उसकी आँखों में देखा, मगर आगे कुछ नहीं पूछा। वह समझ गई थीं कि उनका बेटा कुछ छिपा रहा है।

राधा की सादगी ने अनुराग का दिल जीत लिया

कुछ समय बाद अनुराग के कार्यालय में राधा वर्मा ने सेक्रेटरी के रूप में काम शुरू किया। वह साँवले रंग की सुंदर लड़की थी। उसके कपड़े साधारण होते थे, लेकिन बात करने का तरीका इतना अच्छा था कि सामने वाला सहज महसूस करता था। वह ईमानदार थी और अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाती थी।

कार्यालय में शंकर दास नाम का एक भरोसेमंद कर्मचारी भी था, जो कारोबार के जरूरी काम सँभालता और हर अहम जानकारी अनुराग तक पहुँचाता था।

राधा अपना काम समय पर करती थी। कोई कर्मचारी गलती कर देता, तो वह उसे सबके सामने शर्मिंदा करने के बजाय चुपचाप समझा देती। चपरासी से लेकर बड़े कारोबारी तक, वह हर किसी से सम्मान से बात करती थी।

एक दिन अनुराग ने देखा कि राधा अपना लंच खोले बैठी थी, लेकिन सामने बैठी दूसरी कर्मचारी की परेशानी सुनकर उसने अपना खाना एक तरफ रख दिया। वह कर्मचारी घर की किसी समस्या के कारण परेशान थी। राधा ने उसे कुछ देर समझाया और फिर अपना काम करने लगी।

अनुराग ने यह सब देखा, मगर कुछ कहा नहीं। उसे राधा का यह स्वभाव अच्छा लगा।

राधा के घर की जिंदगी भी आसान नहीं थी। उसके पिता गोपाल वर्मा और माँ कमला वर्मा उम्रदराज थे। उसका भाई शराब की लत में पड़ गया था, जिसकी वजह से घर में अक्सर परेशानी रहती थी। राधा नौकरी करती, घर सँभालती और माता-पिता की चिंता भी करती थी।

एक दिन बातचीत के दौरान अनुराग को उसके भाई की हालत के बारे में पता चला। उसने राधा से कहा कि वह किसी अच्छे नशामुक्ति केंद्र में इलाज की व्यवस्था करने में मदद कर सकता है। राधा पहले झिझकी, लेकिन परिवार की हालत देखते हुए उसने मदद स्वीकार कर ली।

अनुराग ने इलाज की व्यवस्था कराने में सहयोग दिया। इससे राधा के परिवार को बड़ी राहत मिली।

राधा ने एक दिन कार्यालय में उससे कहा, “सर, आपने मेरे परिवार के लिए जो किया है, उसके लिए मेरे पास धन्यवाद कहने के अलावा कुछ नहीं है।”

अनुराग ने सहजता से जवाब दिया, “धन्यवाद की कोई जरूरत नहीं है। अगर किसी की मदद कर सकता हूँ, तो मुझे करनी चाहिए। बस तुम्हारे भाई का इलाज ठीक से चलता रहे।”

उस दिन राधा को अनुराग के बारे में एक नई बात समझ आई। वह जितना शांत दिखाई देता था, उतना ही संवेदनशील भी था। उसके पास पैसा था, मगर वह दूसरों को छोटा समझकर बात नहीं करता था।

धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लगी। कभी कार्यालय के काम को लेकर चर्चा होती, तो कभी चाय पीते समय घर-परिवार की बातें निकल आतीं। अनुराग को राधा से बात करके अच्छा लगता था। वह उसके सामने अपनी परेशानी छिपाने के लिए हर समय मुस्कराने का नाटक नहीं करता था।

राधा भी समझने लगी थी कि अनुराग के शांत चेहरे के पीछे बहुत-सा दुख छिपा है। उसे उसके लिए हमदर्दी हुई, और फिर धीरे-धीरे वही हमदर्दी एक गहरे लगाव में बदलने लगी।

करवाचौथ की शाम ने दोनों को करीब ला दिया

करवाचौथ के दिन सुष्मिता ने अनुराग से कहा कि घर और बगीचे को सजाने के लिए अपनी सेक्रेटरी को बुला ले। अनुराग ने राधा से बात की, तो वह काम के बाद सजावट करने आ गई।

राधा ने फूलों और रोशनी से बगीचे को सजा दिया। शाम तक घर बहुत सुंदर लगने लगा। सावित्री उसकी तारीफ करते नहीं थक रही थीं, लेकिन सुष्मिता का ध्यान अपने फोन से हट ही नहीं रहा था।

चाँद निकलने तक अनुराग सबके साथ बगीचे में बैठा रहा। सुष्मिता बीच-बीच में फोन पर बात करती और कभी अनुराग को झिड़क देती। चाँद निकला, तो उसने पूजा की रस्में पूरी कीं और जल्दी से अंदर चली गई।

अनुराग कुछ देर वहीं बैठा रहा। उसने राधा की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, “राधा, देखा तुमने? पैसा होने के बावजूद भी हर घर में उजाला नहीं होता।”

राधा को समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। उसे अनुराग के लिए बुरा लगा। उसने सम्मान से उसके पैर छूकर कहा, “सर, आपने मेरे परिवार की मुश्किल घड़ी में मदद की। मैं हमेशा आपकी इज्जत करूँगी।”

अनुराग ने उसे तुरंत उठाया। “अरे, ऐसा मत करो। तुमने भी तो हमेशा मेरा साथ दिया है।”

“मैंने तो अपना काम किया है, सर,” राधा ने कहा।

“नहीं, राधा। काम तो बहुत लोग करते हैं। हर कोई दूसरे की परेशानी को अपनी परेशानी नहीं समझता।”

राधा कुछ नहीं बोली। उस छोटी-सी बातचीत में दोनों ने एक-दूसरे के लिए जो महसूस किया, उसे कहने की जरूरत नहीं पड़ी।

सिंगापुर में प्यार का इजहार

कुछ समय बाद कारोबार के सिलसिले में अनुराग को सिंगापुर जाना पड़ा। जरूरी कामों में मदद के लिए वह राधा को भी साथ ले गया। दोनों ने दिनभर बैठकों और खरीदारी से जुड़े कामों में समय बिताया। शाम को काम खत्म हुआ, तो अनुराग ने कहा, “अगर तुम थकी नहीं हो, तो थोड़ी देर घूम आएँ? कल फिर काम शुरू हो जाएगा।”

राधा मुस्कराई। “चल सकते हैं, सर। पूरा दिन तो होटल और बैठकों में ही निकल गया।”

दोनों समुद्र किनारे पहुँच गए। हवा में हल्की ठंडक थी। पानी की लहरें किनारे से टकरातीं और वापस लौट जातीं। राधा कुछ देर तक समुद्र देखती रही। उसके चेहरे पर एक अलग ही सुकून था।

अनुराग ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

“कुछ नहीं। बस अच्छा लग रहा है। रोज घर, काम और जिम्मेदारियों के बीच समय निकल जाता है। कभी-कभी ऐसे बैठना भी जरूरी होता है।”

अनुराग ने उसकी ओर देखा। “तुम अपने लिए भी कभी समय निकाल लिया करो। हमेशा दूसरों की चिंता करती रहती हो।”

राधा हँस पड़ी। “आप भी तो यही करते हैं। अपने बारे में कब सोचते हैं?”

अनुराग के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई। वह कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि एक तेज लहर किनारे तक आ गई। राधा पीछे हटने लगी, मगर उसका पैर गीली रेत पर फिसल गया। अनुराग ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया।

“अरे, सँभलकर!” उसने कहा।

राधा ने उसका हाथ थामे हुए खुद को सँभाला। दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। अनुराग ने उसका हाथ छोड़ने की कोशिश नहीं की और राधा ने भी अपना हाथ वापस नहीं खींचा।

“आप हमेशा मेरी मदद के लिए तैयार रहते हैं,” राधा ने धीमे से कहा।

“काश, मैं अपनी जिंदगी की कुछ चीजें भी इतनी आसानी से सँभाल पाता,” अनुराग के मुँह से निकल गया।

राधा ने उसकी तरफ देखा। “फिर वही बात? आप आज भी अपनी पत्नी के बारे में सोच रहे हैं?”

अनुराग ने समुद्र की तरफ नजर कर ली। “सोचने की कोशिश नहीं करता, फिर भी याद आ जाता है। छह साल तक मैं यही सोचता रहा कि शायद कल सब ठीक हो जाएगा। मैं उसके लिए कुछ करता, तो उम्मीद बँध जाती। फिर वही दूरी, वही बेरुखी। कभी-कभी लगता है कि शायद मुझमें ही कोई कमी है।”

“ऐसा मत सोचिए,” राधा ने तुरंत कहा। “किसी का प्यार न मिलना यह साबित नहीं करता कि आप प्यार के लायक नहीं हैं।”

अनुराग ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं। “तुम्हें पता है, राधा, तुम्हारे साथ बात करते हुए मुझे पहली बार लगता है कि कोई मेरी बात समझ रहा है। मेरे पास सब कुछ है, फिर भी घर लौटने का मन नहीं करता। तुम्हारे साथ कुछ देर बिताता हूँ, तो लगता है कि दिन भर का बोझ हल्का हो गया।”

राधा की आँखें भी भर आईं। वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “मुझे भी आपके साथ अच्छा लगता है। आप दूसरों की मदद करते हैं, सबका ध्यान रखते हैं, लेकिन अपने दुख की बात किसी से नहीं कहते। मैं चाहती हूँ कि आप खुश रहें।”

अनुराग ने धीमी आवाज में पूछा, “अगर मेरी जिंदगी की परिस्थितियाँ अलग होतीं, तो क्या तुम मेरे साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहतीं?”

राधा ने नजरें झुका लीं। वह जानती थी कि इस सवाल का जवाब उसके दिल में पहले से मौजूद है, लेकिन उसे कहने में डर लग रहा था।

“हाँ,” उसने आखिरकार कहा, “शायद मैं भी यही चाहती। लेकिन आप शादीशुदा हैं, अनुराग। मैं किसी का घर तोड़कर अपना घर नहीं बनाना चाहती। और न ही चाहती हूँ कि कल आपको लगे कि आपने भावनाओं में आकर कोई गलत फैसला कर लिया।”

अनुराग ने सिर हिलाया। “मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। मैं तुम्हें किसी मुश्किल में नहीं डालना चाहता।”

कुछ देर दोनों चुपचाप समुद्र देखते रहे। फिर अनुराग ने संकोच से पूछा, “क्या मैं तुम्हें गले लगा सकता हूँ? अगर तुम नहीं चाहतीं, तो कोई बात नहीं।”

राधा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में कोई जल्दबाजी नहीं थी, बस एक ऐसे इंसान की चाह थी, जो कुछ पल अपना दुख भूलना चाहता था। उसने धीरे से सिर हिला दिया।

अनुराग ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। राधा भी उसके करीब आ गई और अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। कुछ पल तक दोनों वैसे ही खड़े रहे। समुद्र की आवाज के बीच राधा ने महसूस किया कि अनुराग का शरीर भावनाओं से काँप रहा था।

“सब ठीक हो जाएगा,” उसने धीरे से कहा।

अनुराग ने जवाब दिया, “तुम साथ हो, तो शायद मैं फिर से ठीक होना सीख जाऊँ।”

राधा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “लेकिन हमें सही फैसला लेना होगा। मैं आपसे प्यार करती हूँ, मगर चाहती हूँ कि हम अपनी जिंदगी ईमानदारी से शुरू करें।”

अनुराग ने उसकी बात मान ली। उस शाम दोनों ने अपने प्यार को स्वीकार किया, लेकिन यह भी तय किया कि वे अपने रिश्ते का अगला कदम सोच-समझकर उठाएँगे।

भारत लौटने के बाद दोनों अपने काम में लग गए। उनके बीच का लगाव अब छिपा नहीं था, लेकिन अनुराग जानता था कि पहले उसे अपनी शादी के बारे में अंतिम फैसला करना होगा।

सुष्मिता ने सबके सामने अनुराग का अपमान किया

सुष्मिता का विक्की चौहान के साथ संबंध बढ़ता जा रहा था। विक्की दिखावे में माहिर था और उसे सुष्मिता के पैसों से मतलब था। सुष्मिता उसकी बातों में आ चुकी थी, जबकि अनुराग को इस रिश्ते की सच्चाई का पता नहीं था।

इसी बीच अनुराग के कारोबार को एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला। उसने खुशी में पार्टी रखी और सुष्मिता से भी साथ देने की उम्मीद की। पार्टी में कारोबारी मेहमानों के साथ राधा भी मौजूद थी।

अनुराग सुष्मिता के पास गया। “आज का दिन मेरे लिए बहुत खास है। क्या तुम मेरे साथ डांस करोगी?”

सुष्मिता ने बिना उसकी तरफ देखे मना कर दिया।

अनुराग ने कहा, “बस एक डांस, सुष्मिता। मैं चाहता हूँ कि हम कम से कम आज तो ठीक से बात करें।”

वह उसका हाथ पकड़कर डांस फ्लोर की ओर ले जाने लगा, लेकिन सुष्मिता ने झटके से हाथ छुड़ाया। उसने गुस्से में अपनी कोल्ड ड्रिंक अनुराग की शर्ट पर फेंक दी और उसे थप्पड़ मार दिया।

“हाउ डेयर यू! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की?” वह चिल्लाई।

आसपास खड़े लोग चुप हो गए। अनुराग को जैसे समझ ही नहीं आया कि अभी क्या हुआ है।

सुष्मिता ने सबके सामने कहा, “मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती। मुझे तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखनी। मेरी जिंदगी से निकल जाओ!”

अनुराग की आँखें भर आईं। वह घुटनों के बल बैठ गया। राधा तुरंत आगे बढ़ी और मेहमानों से विनम्रता से कहा कि पार्टी समाप्त हो चुकी है। सावित्री और राधा ने मिलकर अनुराग को उठाया और उसे कमरे में ले गईं।

उस रात अनुराग अपने कमरे में बैठा रोता रहा। दुख में उसने अपने हाथ पर हल्की चोट लगा ली। राधा ने चोट देखकर उसे साफ कपड़े से ढका और उसके पास बैठ गई।

कुछ देर बाद सुष्मिता कमरे में आई। उसके हाथ में तलाक के कागज थे।

“अनुराग, मैं तलाक चाहती हूँ। अब यह रिश्ता खत्म होना चाहिए,” उसने कहा।

अनुराग ने उसकी तरफ देखा। “क्या छह साल बाद भी तुम्हें लगता है कि मैंने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया है?”

“मुझे कोई सफाई नहीं चाहिए,” सुष्मिता ने कहा। “मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती।”

राधा ने उसे शांत रहने को कहा, मगर सुष्मिता ने गुस्से में राधा को थप्पड़ मार दिया। अनुराग यह देखकर आपा खो बैठा और उसने भी सुष्मिता को थप्पड़ मार दिया।

“राधा से इस तरह बात मत करना,” उसने गुस्से में कहा। “तुम्हें मुझसे शिकायत है, तो मुझसे कहो। उसे बीच में मत लाओ।”

कमरे में कुछ देर सन्नाटा रहा। अनुराग ने तलाक के कागज उठाए और उन पर हस्ताक्षर कर दिए। फिर उसने बीस करोड़ रुपये का चेक सुष्मिता की तरफ बढ़ाया।

“यह तुम्हारे लिए है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हें पैसों की परेशानी हो। आगे क्या करना है, यह तुम्हारा फैसला है।”

सुष्मिता ने चेक ले लिया। जाते-जाते उसने कहा, “मेरी जिंदगी में दोबारा दखल मत देना।”

अनुराग ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। दरवाजा बंद हुआ, तो वह कुर्सी पर बैठ गया। छह साल तक जिस रिश्ते को बचाने की उम्मीद लगाए बैठा था, वह आखिरकार खत्म हो गया था।

राधा उसके पास बैठी रही। उसने कोई लंबा भाषण नहीं दिया, बस पानी का गिलास उसके हाथ में रखकर कहा, “थोड़ा पानी पी लीजिए। अभी आपको खुद को सँभालना होगा।”

अनुराग ने गिलास पकड़ लिया। कुछ देर बाद उसने कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि मैं इतने साल किस उम्मीद में जीता रहा।”

राधा ने धीरे से जवाब दिया, “आपने अपनी तरफ से रिश्ता निभाने की कोशिश की। अब खुद को दोष देना बंद कीजिए।”

राधा के लिए अनुराग ने लिया बड़ा फैसला

तलाक के बाद अनुराग धीरे-धीरे अपने काम पर लौटने लगा। राधा उसका साथ देती रही। वह उसके लिए किसी चमत्कार की तरह सब कुछ ठीक नहीं कर सकती थी, लेकिन उसकी मौजूदगी से अनुराग को अपने जीवन में फिर से स्थिरता महसूस होने लगी।

कुछ दिनों बाद कार्यालय में दोनों के रिश्ते को लेकर बातें होने लगीं। एक कर्मचारी ने राधा से कहा, “आपने तो अनुराग सर को अपने प्यार में फँसा लिया। अब उनकी दौलत पर आपका ही अधिकार होगा।”

राधा को यह सुनकर बहुत बुरा लगा। उसने कभी अनुराग की दौलत के बारे में नहीं सोचा था। उसे लगा कि उसकी वजह से अनुराग की प्रतिष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं, इसलिए उसने इस्तीफा दे दिया और घर चली गई।

जब अनुराग को पता चला, तो उसने उस कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया। फिर उसने बाकी कर्मचारियों से साफ कहा, “राधा ने मुझे कभी नहीं फँसाया। उसने मुश्किल समय में मेरा साथ दिया है। मैं उससे प्यार करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ। आगे से उसके बारे में ऐसी बातें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी।”

इसके बाद अनुराग राधा के घर पहुँचा। राधा उसे देखकर चौंक गई।

“आप यहाँ क्यों आए हैं?” उसने पूछा।

“तुम्हारा इस्तीफा स्वीकार करने नहीं,” अनुराग ने कहा। “मैं तुम्हें वापस लेने आया हूँ।”

राधा की आँखें भर आईं। “लोग बातें बनाएँगे। उन्हें लगेगा कि मैंने आपको पैसों के लिए चुना है।”

अनुराग ने शांत स्वर में कहा, “लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही। लेकिन तुम जानती हो कि हमारे बीच क्या है। मैं तुम्हारे साथ इसलिए रहना चाहता हूँ क्योंकि तुम मुझे समझती हो। अगर तुम मेरे साथ जिंदगी बिताना चाहती हो, तो मैं तुम्हें पूरे सम्मान के साथ अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ।”

राधा ने कुछ देर सोचा। उसे अनुराग की भावनाओं पर भरोसा था, लेकिन वह जल्दबाजी नहीं करना चाहती थी।

“मैं भी आपके साथ रहना चाहती हूँ,” उसने कहा, “लेकिन हमें एक-दूसरे का सम्मान हमेशा बनाए रखना होगा।”

अनुराग मुस्कराया। “यही तो मैं चाहता हूँ।”

राधा ने शादी के लिए हाँ कह दी। सावित्री ने उसके माता-पिता, गोपाल और कमला वर्मा, से बात की। दोनों ने अपनी बेटी की खुशी को देखते हुए रिश्ते के लिए सहमति दे दी। परिवारों की मौजूदगी में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।

शादी के मंडप में सुष्मिता की वापसी

शादी का दिन आ गया। घर फूलों से सजा था और आँगन में मेहमानों की आवाजाही लगी थी। अनुराग दूल्हा बना बैठा था। जब राधा दुल्हन बनकर सामने आई, तो वह कुछ पल उसे देखता रह गया। राधा ने हल्की-सी मुस्कान दी, तो अनुराग के चेहरे पर भी खुशी आ गई।

फेरे पूरे हुए और अनुराग ने राधा के गले में मंगलसूत्र पहनाया। दोनों ने साथ निभाने का वादा किया। सावित्री की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्हें लग रहा था कि आखिरकार उनके बेटे को वह साथी मिल गया है, जिसकी उसे जरूरत थी।

तभी बाहर से किसी के रोने की आवाज आई। सुष्मिता बदहवास हालत में मंडप तक पहुँची। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

वह अनुराग के पास आकर बोली, “अनुराग, मुझे बचा लो। कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं। वे मुझे नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।”

अनुराग तुरंत खड़ा हो गया। उसने अपने बॉडीगार्ड से कहा, “बाहर जाकर देखो कि कौन लोग हैं। पता करो कि सुष्मिता के पीछे क्यों पड़े हैं और उसे सुरक्षित यहाँ लाओ।”

बॉडीगार्ड बाहर गया। कुछ देर बाद उसने बताया कि कुछ गुंडे सुष्मिता से पैसों की माँग कर रहे थे और धमकी दे रहे थे। अनुराग के आदमियों ने उन्हें वहाँ से हटा दिया और सुष्मिता को सुरक्षित अंदर पहुँचा दिया।

अनुराग ने उसे बैठने के लिए कहा और पूछा, “आखिर हुआ क्या है? तुम इस हालत में कैसे पहुँच गईं?”

सुष्मिता की आँखों से आँसू बहने लगे। “तुम्हें छोड़ने के बाद मैंने सोचा था कि मैं अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जीऊँगी। विक्की ने मुझसे बड़े-बड़े वादे किए। मैं उसकी बातों में आती गई। उसने मुझसे पैसे खर्च करवाए। मैंने अपना पैसा भी खत्म कर दिया और अपने पिता का पैसा भी बर्बाद कर दिया। जब मुझे उसकी असलियत पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”

वह कुछ पल रुकी, फिर बोली, “अब न मेरे पास अपना घर है, न पैसे। जिन लोगों को मैं अपना समझती थी, वे ही आज मुझे धमका रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि कहाँ जाऊँ।”

अनुराग चुपचाप उसकी बात सुनता रहा। कभी यही सुष्मिता उसके साथ एक घर में रहती थी। उसने उसके लिए बहुत कुछ करने की कोशिश की थी, लेकिन उनके रिश्ते का अंत बहुत दर्दनाक हुआ था। आज उसकी हालत देखकर अनुराग को दुख तो हुआ, मगर उसके मन में पुराने रिश्ते को फिर से शुरू करने की इच्छा नहीं थी।

सुष्मिता ने हाथ जोड़ दिए। “अनुराग, मैं जानती हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। मैंने तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। मैं तुमसे यह नहीं कहूँगी कि मुझे दोबारा अपना लो। बस इतना चाहती हूँ कि तुम मुझे माफ कर दो।”

अनुराग ने कुछ नहीं कहा। वह राधा की तरफ देखने लगा। राधा को सुष्मिता के व्यवहार से हुए पुराने दुख याद थे, फिर भी उसकी मौजूदा हालत देखकर उसे दया आ रही थी।

राधा ने धीरे से कहा, “अनुराग, हम इसकी मदद कर सकते हैं। इसे अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिलना चाहिए। जो हो चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन हम इसे मुश्किल में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकते।”

अनुराग ने सिर हिलाया। उसने अपने बॉडीगार्ड को बुलाकर कहा, “मेरे अकाउंट से एक करोड़ रुपये की व्यवस्था करो। सुष्मिता के रहने और सुरक्षा का इंतजाम किया जाए। उसकी जरूरतों का भी ध्यान रखा जाए, जब तक वह खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती।”

फिर उसने सुष्मिता से कहा, “तुम चाहो तो हमारी कंपनी में अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी के लिए आवेदन कर सकती हो। मैं तुम्हें मौका देने के लिए तैयार हूँ। लेकिन तुम्हें अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।”

सुष्मिता की आँखों से आँसू बहने लगे। जिस आदमी को उसने कभी इतना दुख दिया था, वही आज उसकी मदद कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसका धन्यवाद कैसे करे।

सुष्मिता की माफी और अनुराग का अंतिम फैसला

कुछ देर बाद सुष्मिता ने अनुराग की तरफ देखा और पूछा, “क्या अब भी मेरे लिए तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी जगह बची है? क्या हम फिर से साथ नहीं रह सकते?”

अनुराग ने शांत स्वर में कहा, “सुष्मिता, मैंने तुमसे कभी झूठा प्यार नहीं किया था। मैं सच में चाहता था कि हमारा रिश्ता चले। लेकिन अब बहुत कुछ बदल चुका है। मैं तुम्हें माफ कर सकता हूँ और तुम्हारी मदद भी कर सकता हूँ, मगर तुम्हारे साथ पति-पत्नी की जिंदगी फिर से शुरू नहीं कर सकता। मैं राधा से प्यार करता हूँ।”

सुष्मिता की आँखों में आँसू भर आए। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने अपने हाथों से क्या खो दिया था। वह कुछ पल चुप रही, फिर अचानक अनुराग के सामने घुटनों के बल बैठ गई और उसके पैर पकड़कर रोने लगी।

“अनुराग, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं। तुम मेरे लिए सब कुछ करने को तैयार रहते थे, लेकिन मैंने तुम्हारे प्यार को कभी महत्व नहीं दिया। तुम मेरे साथ अच्छा व्यवहार करते रहे और मैं तुम्हें ही दुख देती रही। आज मुझे अपनी हर गलती याद आ रही है।”

उसकी आवाज काँपने लगी।

“मैं जानती हूँ कि आज तुम मुझे नहीं अपनाओगे। अब मुझे तुमसे यह उम्मीद रखने का भी अधिकार नहीं है। काश, मैंने समय रहते तुम्हारी मेहनत और तुम्हारे प्यार को समझ लिया होता। मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की है।”

राधा की आँखें भी नम हो गईं। वह सुष्मिता को इस हालत में देखकर दुखी थी। उसने कभी नहीं चाहा था कि किसी की जिंदगी इस तरह बिखर जाए, लेकिन वह यह भी जानती थी कि अनुराग के साथ उसका रिश्ता सच्चे प्यार और आपसी सम्मान पर बना था।

अनुराग ने सुष्मिता को उठने में मदद की। “मैं तुम्हें माफ करता हूँ। लेकिन अब हमें अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना होगा। मैं तुम्हारे लिए बुरा नहीं चाहता। उम्मीद है कि तुम भी अपनी गलतियों से सीखोगी और अपनी जिंदगी सँभालोगी।”

सुष्मिता ने आँसू पोंछे। उसने राधा की तरफ देखा और कहा, “तुमने अनुराग को उस समय समझा, जब मैं उसे समझ नहीं पाई। वह तुम्हारे साथ खुश रहे, यही चाहती हूँ। मैं अब तुम्हारी जिंदगी में वापस आने की कोशिश नहीं करूँगी।”

अनुराग ने उसके रहने और सुरक्षा की व्यवस्था कराने के लिए बॉडीगार्ड को निर्देश दिए। सुष्मिता वहाँ से जाने लगी, तो उसने एक बार पीछे मुड़कर अनुराग को देखा। उसके चेहरे पर पछतावा था, लेकिन अब वह जानती थी कि उसे अपनी जिंदगी खुद सँभालनी होगी।

सच्चे प्यार की असली पहचान

सुष्मिता के जाने के बाद शादी का मंडप फिर शांत हो गया। अनुराग ने राधा का हाथ थामा। कुछ देर दोनों बिना बोले खड़े रहे।

फिर अनुराग ने कहा, “तुमने आज भी वही किया, जो हमेशा करती आई हो। तुमने मेरी परेशानी को समझा और उस इंसान की मदद करने के लिए कहा, जिसने मुझे बहुत दुख दिया था।”

राधा ने जवाब दिया, “मैं तुम्हारे पुराने दर्द को जानती हूँ, अनुराग। लेकिन मैं नहीं चाहती कि हम किसी के लिए नफरत लेकर अपनी नई जिंदगी शुरू करें। उसकी मदद करना अलग बात है और पुराने रिश्ते में लौटना अलग।”

अनुराग ने उसका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लिया। “तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया है, राधा। तुम्हारे साथ मैं सिर्फ खुश रहना नहीं, बल्कि दूसरों को समझना भी सीख रहा हूँ।”

राधा मुस्कराई। “बस एक बात याद रखना। जब भी हमारे बीच कोई परेशानी आए, हम चुप रहने या एक-दूसरे से दूर जाने के बजाय बात करेंगे।”

“वादा रहा,” अनुराग ने कहा।

सावित्री ने दोनों को साथ देखा, तो उनके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान आ गई। अनुराग और राधा ने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत प्यार, सम्मान और विश्वास के साथ की।

सुष्मिता ने भी अपनी गलतियों से सबक लिया और जिंदगी को नए सिरे से सँभालने का फैसला किया। अनुराग ने उसे माफ कर दिया, लेकिन अपने पुराने रिश्ते में वापस नहीं लौटा।

इस कहानी की सीख यही है कि सच्चा प्यार केवल किसी को पाने का नाम नहीं है। प्यार में सम्मान, समझ और जिम्मेदारी भी जरूरी हैं। किसी को माफ करना इंसानियत है, लेकिन माफी का अर्थ यह नहीं कि हर पुराना रिश्ता दोबारा शुरू किया जाए। कभी-कभी जिंदगी हमें आगे बढ़ने का मौका देती है, और उस मौके को समझदारी से अपनाना ही सबसे सही फैसला होता है।

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