दिसंबर का महीना था। दिल्ली में ठंडी हवाएँ चल रही थीं और लोग नए साल के स्वागत की तैयारियों में जुटे थे। इसी बीच दो अनजान लोग एक ऐसे सफर पर निकलने वाले थे, जो उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देने वाला था।
कबीर पच्चीस साल का एक सीधा-सादा लड़का था। वह सुशांत के साथ काम करता था। सुशांत एक बड़े बिजनेस परिवार से था, जिसका परिवार देश के अलग-अलग शहरों में शादी, पार्टियों और बड़े इवेंट आयोजित करवाता था। कबीर उन आयोजनों की तैयारियों और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालता था।
लेकिन काम के अलावा कबीर की जिंदगी में इन दिनों कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा था। वह नायरा नाम की लड़की से करीब दो साल तक प्यार करता रहा था। उसने उसके साथ अपना भविष्य देखा था, लेकिन नायरा की जिंदगी में एक अमीर लड़का आ गया। धीरे-धीरे वह कबीर से दूर हो गई और आखिरकार उसने उसी लड़के से शादी करने का फैसला कर लिया। अगले महीने उसकी शादी होने वाली थी।
कबीर यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहा था। वह आज भी नायरा की तस्वीर अपने फोन में रखे हुए था और अक्सर उसे देखकर उदास हो जाता था।
दिल्ली से शिमला की ओर एक नया सफर – Love Story In Hindi
दूसरी तरफ सिया तेईस साल की हँसमुख लड़की थी। उसे फोटोग्राफी का बहुत शौक था। वह कभी किसी शादी में तो कभी छोटे-मोटे कार्यक्रमों में तस्वीरें खींचकर पैसे कमाती थी। उसके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं थी और वह अच्छे काम की तलाश में रहती थी।
नए साल के मौके पर शिमला में एक बड़ा इवेंट आयोजित होने वाला था। सिया को यह काम उसकी सहेली पलक ने दिलवाया था। उसे एक सप्ताह तक वहाँ आने वाले मेहमानों और कार्यक्रमों की तस्वीरें खींचनी थीं। यह उसके लिए अच्छा मौका था, इसलिए उसने खुशी-खुशी जाने की तैयारी कर ली।
15 दिसंबर की शाम कबीर भी दिल्ली से शिमला जाने वाली ट्रेन में सवार हुआ। उसे उसी इवेंट की जिम्मेदारी संभालने के लिए जाना था। उसे नहीं पता था कि सिया भी उसी कार्यक्रम में काम करने जा रही है।
कबीर फर्स्ट एसी के डिब्बे में अपनी सीट पर पहुँचा। आमने-सामने की सीटों वाले छोटे से केबिन में बैठकर उसने खिड़की के बाहर देखा। कुछ देर बाद उसने फोन निकाला और नायरा की तस्वीर देखने लगा। तस्वीर देखते ही उसकी आँखें नम हो गईं।
थोड़ी देर बाद सिया भी अपना बैग और कैमरा लेकर वहाँ पहुँची। उसने सामने वाली सीट पर बैठकर कैमरा निकाला और स्टेशन की तस्वीरें खींचने लगी। कभी वह प्लेटफॉर्म की तस्वीर लेती, तो कभी ट्रेन के बाहर दिखाई देने वाली रोशनियों की।
कुछ देर बाद उसकी नजर सामने बैठे कबीर पर पड़ी। वह फोन में किसी लड़की की तस्वीर देख रहा था और काफी उदास लग रहा था। सिया से रहा नहीं गया।
एक सवाल जिसने दोनों को करीब ला दिया

सिया ने धीरे से पूछा, “एक्सक्यूज मी, मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?”
कबीर ने फोन से नजर हटाई। “जी, पूछिए।”
सिया ने कहा, “नया साल आने वाला है और आप इतने उदास क्यों बैठे हैं? लोग तो इस समय घूमने और खुशियाँ मनाने की तैयारी कर रहे हैं।”
कबीर ने उदास आवाज में कहा, “तुम्हें क्या पता किसी की जिंदगी में कितनी तबाही मची हुई है।”
सिया ने जवाब दिया, “देखो, हर इंसान की जिंदगी में परेशानियाँ होती हैं। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम जीना ही छोड़ दें। मेरे दादाजी कहते थे कि खुद खुश रहो और दूसरों को भी खुश रखो। इसलिए मैं नहीं चाहती कि मेरे सामने बैठा कोई इंसान उदास रहे।”
कबीर उसकी बातें चुपचाप सुनता रहा। सिया ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे क्या हम दोस्त बन सकते हैं? एक दोस्त की तरह पूछ रही हूँ।”
कबीर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, “हाँ, क्यों नहीं?”
सिया ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “तो पक्का! अब तुम मेरे दोस्त हो।”
कुछ देर बाद कबीर ने उसे नायरा के बारे में सब बता दिया। उसने बताया कि दोनों दो साल तक साथ थे, लेकिन अब नायरा किसी अमीर लड़के से शादी करने जा रही है।
सिया उसकी बात सुनकर हँस पड़ी। कबीर ने हैरानी से पूछा, “तुम हँस क्यों रही हो?”
सिया बोली, “क्योंकि अगर नायरा को तुमसे सच्चा प्यार होता, तो वह तुम्हें छोड़कर नहीं जाती। जो तुम्हारे साथ रहना ही नहीं चाहती, उसके लिए तुम अपनी जिंदगी क्यों खराब कर रहे हो? हो सकता है तुम्हें इस बात का ज्यादा दुख हो कि वह अब किसी और की होने वाली है।”
कबीर के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। सिया ने पूछा कि उसके पास नायरा की कितनी तस्वीरें हैं। कबीर ने बताया कि उसके पास केवल एक तस्वीर है।
सिया ने कहा, “उसे निकालो। उसके पीछे बड़े अक्षरों में GET OUT लिखो और फिर फाड़कर फेंक दो। आज के बाद उस तस्वीर को देखकर खुद को दुख नहीं देना।”
कबीर कुछ देर सोचता रहा। आखिर उसने तस्वीर निकाली, उसके पीछे GET OUT लिखा और उसे फाड़कर खिड़की के पास से बाहर फेंक दिया। तस्वीर के टुकड़े हवा में उड़ते हुए पीछे छूट गए।
सिया ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “अब वादा करो कि किसी के चले जाने से अपनी जिंदगी खराब नहीं करोगे। तुम्हें खुश रहना है।”
कबीर ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “वादा करता हूँ।”
दोनों ने एक-दूसरे को अपना नाम बताया। कबीर को सिया की बातें अच्छी लगने लगी थीं। उस रात दोनों काफी देर तक बातें करते रहे। सिया ने उसे बताया कि उसके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं है और वह फोटोग्राफी के छोटे-मोटे काम करती है। उसने कबीर से कहा कि कहीं काम मिले तो उसे जरूर बताए।
जब कबीर ने पूछा कि वह शिमला क्यों जा रही है, तो सिया ने उसे इवेंट के बारे में बताया। यह सुनकर कबीर हैरान रह गया।
“अरे! तुम उसी इवेंट में जा रही हो जिसकी जिम्मेदारी मैं संभालने वाला हूँ।”
सिया खुशी से उछल पड़ी। “सच में? तो अब मेरा काम भी अच्छे से हो जाएगा!”
खुशी में उसने कबीर को गले लगा लिया। यह एक दोस्ताना हग था, लेकिन कबीर को उस पल एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। सिया भी उसकी बाँहों में कुछ पल ठहरी रही। दोनों को समझ नहीं आया कि यह नया एहसास क्या था।
कुछ स्टेशनों बाद पलक भी ट्रेन में चढ़ गई। सिया ने उसे कबीर से मिलवाया। तीनों बातें करते हुए शिमला की ओर बढ़ते रहे।
शिमला की वादियाँ और सुशांत की पहली नजर
शिमला पहुँचकर सिया पहाड़ों और ठंडी हवाओं को देखकर बहुत खुश हुई। वह स्टेशन से बाहर निकलते ही तस्वीरें खींचने लगी। कबीर ने हँसकर कहा, “तुम्हें हर जगह फोटो खींचनी होती है क्या?”
सिया ने जवाब दिया, “खूबसूरत पल बार-बार नहीं आते। इसलिए उन्हें कैमरे में कैद करना पड़ता है।”
तीनों इवेंट की जगह पहुँचे। वहाँ बड़े मंच, रोशनी और सजावट की तैयारियाँ चल रही थीं। कबीर ने अपनी जिम्मेदारी संभाली और सिया को फोटोग्राफी टीम से मिलवाया। उसका काम भी तय हो गया।
कुछ देर बाद सुशांत वहाँ पहुँचा। कबीर ने उसे सिया से मिलवाया। सिया की मुस्कान और बातचीत से सुशांत प्रभावित हो गया। धीरे-धीरे वह उसे पसंद करने लगा, लेकिन सिया के मन में कबीर के लिए भावनाएँ जन्म लेने लगी थीं।
दोस्ती के बीच पनपता प्यार

इवेंट की तैयारियों के बीच जब भी समय मिलता, कबीर, सिया और पलक घूमने निकल जाते। कभी बाजार जाते, कभी मॉल रोड पर चाय पीते और कभी पहाड़ों के बीच बैठकर बातें करते। सिया हर जगह तस्वीरें खींचती और कबीर उसकी शरारतों पर मुस्कुराता रहता।
एक दिन पलक ने सिया से कहा, “यार, कबीर कितना अच्छा और हैंडसम है। तू मेरी उससे सेटिंग करवा दे ना।”
यह सुनकर सिया को अच्छा नहीं लगा। उसने बात टालते हुए कहा, “पहले घूम तो ले।”
पलक ने मुस्कुराकर पूछा, “कहीं तू खुद तो उसे पसंद नहीं करने लगी?”
सिया ने तुरंत मना कर दिया, लेकिन उसके मन में कबीर के लिए कुछ बदल रहा था। वह कबीर को किसी दूसरी लड़की से बात करते देखती तो उसे अच्छा नहीं लगता।
एक शाम तीनों बाजार में घूम रहे थे। सिया की नजर चाँदी की सुंदर पायल पर पड़ी। उसे वह बहुत पसंद आई, लेकिन कीमत देखकर उसने खरीदने से मना कर दिया। कबीर ने उसकी बात सुन ली।
अगले दिन कबीर ने चुपचाप वही पायल खरीद ली। उसकी कीमत लगभग सात हजार रुपये थी। शाम को जब तीनों पहाड़ों के बीच एक खूबसूरत जगह पर बैठे थे, तब कबीर ने सिया को वह डिब्बा दिया।
सिया ने डिब्बा खोला तो पायल देखकर हैरान रह गई। “कबीर, यह बहुत महँगी है। मैं इसे नहीं ले सकती।”
कबीर ने कहा, “तुम्हें पसंद आई थी, इसलिए ले आया। दोस्ती में इतना तो कर सकता हूँ।”
सिया ने कुछ देर बाद कहा, “कबीर, मेरे लिए पायल बहुत खास है। मैं इसे तभी पहनूँगी, जब मेरा पति मुझे पहनाएगा। मैं किसी और से इसे नहीं पहन सकती।”
कबीर का दिल थोड़ा उदास हो गया। वह सिया को चाहने लगा था, लेकिन उसने अपनी भावना छिपाते हुए कहा, “ठीक है, तुम्हारा पति ही तुम्हें पहनाएगा। फिलहाल इसे अपने पास रख लो।”
सिया ने पायल रख ली। वह कबीर की बातों में छिपे एहसास को पूरी तरह समझ नहीं पाई, लेकिन उसके मन में एक हलचल जरूर हुई।
कुछ दिन बाद एक शाम अचानक पहाड़ों पर बारिश शुरू हो गई। तीनों पास की एक दुकान के छज्जे के नीचे रुक गए। पलक फोन पर बात करने लगी और कबीर तथा सिया थोड़ी दूर खड़े होकर बारिश देखने लगे।
सिया ने बारिश की बूँदों को हथेली पर लेते हुए कहा, “मुझे बारिश बहुत पसंद है। ऐसा लगता है जैसे सारी थकान धुल गई हो।”
कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “और अगर ठंड लग गई तो?”
सिया हँसकर बोली, “तो तुम दोस्त हो ना, चाय पिला देना।”
कबीर ने उसे देखा। बारिश की हल्की बूँदें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। उसने मन ही मन सोचा कि वह अब सिया के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं कर पा रहा था।
नए साल की रात और दिलों का बदलता एहसास
आखिर नए साल की रात आ गई। पूरा इवेंट रोशनी और संगीत से जगमगा रहा था। लोग जश्न मना रहे थे और सिया अपने कैमरे से तस्वीरें खींच रही थी। कबीर भी अपनी जिम्मेदारियों के बीच उसे देखता रहता था।
रात के बारह बजने में कुछ समय बाकी था। कबीर ने कैमरा हाथ में लेकर सिया से कहा, “आज नया साल है। क्या मुझे दोस्ती वाला हग मिलेगा?”
सिया मुस्कुराई और तेजी से उसकी तरफ दौड़ी। वह इतनी तेजी से आई कि कबीर अपना संतुलन नहीं संभाल पाया। दोनों पास की घास पर गिर पड़े और सिया उसके ऊपर आ गई। कबीर ने उसे संभालने के लिए बाँहों में थाम लिया। गिरते समय उसके होंठ अनजाने में सिया के कान के पास छू गए। सिया ने शर्म से आँखें बंद कर लीं।
कुछ देर बाद सिया बोली, “कबीर, मुझे छोड़ो प्लीज!”
कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “अरे, तुम मेरे ऊपर हो, मैं तुम्हारे ऊपर नहीं हूँ।”
सिया झट से उठ गई। दोनों हँसने लगे, लेकिन उस पल ने सिया को अपने दिल की बात समझा दी थी। वह कबीर से प्यार करने लगी थी।
दूर खड़ी पलक ने भी यह सब देख लिया था। उसे दोनों का करीब आना अच्छा नहीं लगा। सुशांत भी उन्हें देखकर मन ही मन परेशान हो गया।
सुशांत का प्रस्ताव और कबीर की गलतफहमी

कुछ दिनों बाद सुशांत ने सिया से अपने दिल की बात कह दी। उसने बताया कि वह उसे पसंद करता है और उससे शादी करना चाहता है।
सिया ने साफ जवाब दिया, “सर, मैं आपकी इज्जत करती हूँ, लेकिन आपसे प्यार नहीं करती। मेरे दिल में किसी और के लिए जगह है।”
सुशांत ने उसकी बात स्वीकार कर ली। उसने बातचीत खत्म करते हुए सिया से हाथ मिला लिया। दूर खड़े कबीर ने दोनों को हाथ मिलाते देख लिया, लेकिन वह उनकी बातचीत नहीं सुन पाया। उसे लगा कि शायद सिया ने सुशांत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है।
कबीर के मन में शक बैठ गया। वह सिया से पूछना चाहता था, लेकिन डर रहा था कि कहीं सच सुनकर फिर से उसका दिल न टूट जाए।
पलक का झूठ और प्यार का बिछड़ना
पलक अब कबीर को लेकर बहुत जलने लगी थी। वह जानती थी कि कबीर सिया को पसंद करता है। एक दिन वह कबीर के कमरे में गई और कुछ सामान लेकर बाहर आई। सिया ने उसे वहाँ से निकलते देखा तो पूछा, “तू कबीर के कमरे में क्या कर रही थी?”
पलक ने बात छिपाते हुए कहा, “कुछ नहीं। वैसे तुझे एक बात बताऊँ? आज कबीर ने मुझे हग किया और किस भी किया। शायद वह मुझे पसंद करता है।”
यह सुनकर सिया के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उसे पलक पर भरोसा था। उसने कभी नहीं सोचा था कि कबीर ऐसा कर सकता है। वह बिना कुछ कहे वहाँ से चली गई। उसकी आँखों में आँसू थे और दिल में बहुत सारे सवाल।
कबीर भी सिया से दूर रहने लगा। उसे लगता था कि सिया सुशांत को चुन चुकी है। दोनों के बीच बातें बंद होने लगीं, जबकि दोनों ही एक-दूसरे से बात करना चाहते थे।
इवेंट का एक सप्ताह पूरा हुआ और सभी को वापस लौटना था। स्टेशन पर कबीर और सिया आमने-सामने आए, लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा। दोनों की आँखों में बहुत कुछ था, मगर गलतफहमी ने उन्हें बोलने नहीं दिया।
ट्रेन चलने लगी। सिया खिड़की से बाहर देख रही थी। प्लेटफॉर्म पर खड़े कबीर से उसकी नजर मिली। उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। कबीर भी उसे जाते हुए देखता रहा। वह चाहता था कि सिया एक बार उसे रोक ले, लेकिन ट्रेन आगे बढ़ गई। दोनों अलग हो गए।
दिल्ली की रात और यादों का दर्द

दिल्ली लौटकर सिया अपने कमरे में गई। उसने कैमरा खोला तो उसमें शिमला की तस्वीरों के बीच कबीर की मुस्कुराती हुई तस्वीर दिखाई दी। उसे ट्रेन की पहली मुलाकात, पहाड़ों में साथ घूमना और पायल वाला दिन याद आने लगा। वह तस्वीर देखते हुए रो पड़ी।
कबीर भी सिया को भूल नहीं पा रहा था। वह कई बार उसका नंबर खोलता, लेकिन फोन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। दिनेश ने उसकी उदासी देखकर पूछा, “भाई, आखिर हुआ क्या है? शिमला से लौटने के बाद से तू बिल्कुल बदल गया है।”
कबीर ने उसे सारी बात बता दी। दिनेश ने कहा, “तूने सिया से पूछा क्यों नहीं? सिर्फ हाथ मिलाते देखकर तूने कैसे मान लिया कि उसने सुशांत को हाँ कह दी?”
कबीर ने उदास होकर कहा, “मुझे डर था कि कहीं वह सच में किसी और को न चुन चुकी हो। मैं फिर से टूटना नहीं चाहता था।”
दिनेश ने समझाया, “बिना सच जाने किसी को खो देना सबसे बड़ा पछतावा होता है। एक बार उससे बात तो कर।”
कुछ दिनों बाद कबीर ने सुशांत के साथ काम छोड़ने का फैसला कर लिया। शिमला की हर याद उसे सिया की याद दिलाती थी। उसने सुशांत को अपनी जिम्मेदारियाँ सौंप दीं और बिना किसी झगड़े के काम से अलग हो गया। वह अपनी जिंदगी में कुछ नया शुरू करना चाहता था।
पलक का सच और सिया की बेचैनी
उधर सिया के मन में भी कबीर को लेकर सवाल उठते रहते थे। एक दिन उसने पलक से पूछा, “तूने कहा था कि कबीर ने तुझे हग और किस किया था। क्या यह सच था?”
पलक पहले बात टालती रही, लेकिन सिया के बार-बार पूछने पर उसने आखिर सच बता दिया। उसने कहा, “नहीं सिया, कबीर ने ऐसा कुछ नहीं किया था। मैंने झूठ बोला था। मुझे कबीर पसंद था और तुम दोनों को साथ देखकर जलन होती थी। इसलिए मैंने तुम्हें वह बात बताई।”
सिया की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “तू मेरी सबसे अच्छी सहेली थी। मैंने तुझ पर भरोसा किया और तेरे एक झूठ की वजह से मैं कबीर से दूर हो गई।”
पलक ने माफी माँगी, लेकिन सिया का दिल टूट चुका था। अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। उसने कबीर से बिना पूछे उस पर भरोसा करना छोड़ दिया था। काश, उसने उसी दिन कबीर से बात कर ली होती।
घर में भी सिया की शादी की बातें शुरू हो गई थीं। एक परिवार का रिश्ता आया और घरवालों को लड़का पसंद आ गया। बातचीत आगे बढ़ने लगी, लेकिन सिया किसी और से शादी करने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
एक रात उसने पायल का डिब्बा खोला। पायल को हथेली पर रखकर उसकी आँखें भर आईं। वह धीरे से बोली, “कबीर, तुमने कहा था कि यह पायल मेरा पति ही पहनाएगा। मैं तो चाहती थी कि तुम ही मुझे पहनाओ। तुम कहाँ चले गए?”
उसे डर था कि कहीं परिवार उसकी शादी किसी और से न कर दे। दूसरी तरफ कबीर भी दिनेश की बात याद कर रहा था। उसे लगा कि अगर उसने अब भी सिया से बात नहीं की, तो वह जिंदगी भर पछताएगा। आखिर उसने उसका नंबर मिलाया।
एक फोन कॉल और आँसुओं में बहता प्यार

सिया अपने कमरे में बैठी थी। फोन की घंटी बजी तो स्क्रीन पर कबीर का नाम देखकर उसकी धड़कन तेज हो गई। उसने काँपते हाथों से कॉल उठा लिया।
कबीर ने कहा, “हेलो सिया, कैसी हो?”
सिया ने खुद को संभालते हुए कहा, “मैं ठीक हूँ। तुम कैसे हो?”
कबीर ने पूछा, “क्या तुम उदास हो?”
सिया ने पहले मना किया, लेकिन फिर उसकी आवाज भर्रा गई। “हाँ कबीर, मैं बहुत उदास हूँ।”
कबीर ने कहा, “क्या तुम्हें वह दिन याद है जब मैं ट्रेन में उदास बैठा था? तुमने मुझे समझाया था कि किसी के जाने से जिंदगी खत्म नहीं होती। आज शायद तुम्हें पता चल रहा होगा कि जिससे सच्चा प्यार हो जाए, उससे दूर रहना कितना मुश्किल होता है।”
सिया फूट-फूटकर रोने लगी। “कबीर, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। मैंने तुम्हें गलत समझ लिया। मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”
कबीर की आँखें भी नम हो गईं। उसने कहा, “मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ, सिया। लेकिन मुझे लगा था कि तुमने सुशांत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है।”
सिया ने तुरंत कहा, “नहीं कबीर! उन्होंने मुझसे शादी के लिए पूछा था, लेकिन मैंने मना कर दिया था। मैंने उनसे कहा था कि मेरे दिल में कोई और है।”
कबीर ने बताया कि उसने दोनों को हाथ मिलाते देखा था और इसी वजह से गलत समझ लिया। फिर सिया ने पलक के झूठ के बारे में बताया। दोनों को एहसास हुआ कि अगर उन्होंने समय पर एक-दूसरे से बात कर ली होती, तो इतना दर्द नहीं सहना पड़ता।
कबीर ने कहा, “सिया, मुझे अमीरी या किसी बड़े घर की जरूरत नहीं है। मैं बस तुम्हारे साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता हूँ।”
सिया ने रोते हुए जवाब दिया, “मुझे भी कुछ नहीं चाहिए, कबीर। मुझे बस तुम चाहिए। मैं किसी और से शादी नहीं करना चाहती।”
कबीर ने पूछा, “क्या तुम मुझसे मिल सकती हो?”
सिया की आवाज में खुशी लौट आई। “हाँ कबीर, बताओ कहाँ आना है?”
कबीर ने कहा, “इंडिया गेट के पास एक रेस्टोरेंट है। वहीं मिलते हैं।”
इंडिया गेट पर दो दिलों का मिलन
फोन रखते ही सिया जल्दी से तैयार होने लगी। उसने सुंदर-सा सूट पहना, बाल ठीक किए और पायल का डिब्बा अपने बैग में रख लिया। कई दिनों बाद उसके चेहरे पर खुशी लौट आई थी। उसे लग रहा था जैसे उसकी खोई हुई दुनिया वापस मिलने वाली है।
कबीर भी खुशी-खुशी तैयार हुआ। दिनेश ने उसे देखकर पूछा, “कहाँ जा रहा है भाई?”
कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “सिया से मिलने।”
दिनेश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “इस बार दिल की बात साफ-साफ कहना। कोई गलतफहमी मत रखना।”
दोनों इंडिया गेट के पास रेस्टोरेंट पहुँचे। सिया ने अंदर आते ही कबीर को देख लिया। वह तेजी से उसके पास गई और बिना कुछ कहे उसे कसकर गले लगा लिया। कबीर ने भी उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
सिया रोते हुए बोली, “मुझे लगा था कि मैं तुम्हें हमेशा के लिए खो चुकी हूँ।”
कबीर ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मैं भी तुम्हारे बिना बहुत परेशान था। हर दिन तुम्हें याद करता था।”
दोनों बैठकर काफी देर तक बातें करते रहे। सिया ने पलक के झूठ के बारे में बताया और कबीर ने सुशांत के साथ हुई गलतफहमी साफ की। कबीर ने माना कि उसे सिया से सीधे पूछना चाहिए था। सिया ने भी कहा कि उसे पलक की बात पर भरोसा करने से पहले कबीर से बात करनी चाहिए थी।
कबीर ने बताया कि उसने सुशांत के साथ काम छोड़ दिया है और अब अपनी जिंदगी में कुछ नया करना चाहता है। उसने सिया का हाथ पकड़कर कहा, “मैं तुम्हारे साथ अपना भविष्य बनाना चाहता हूँ। अगर तुम मेरा साथ दो, तो हम मिलकर सब संभाल लेंगे।”
सिया ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ना चाहती।”
इंडिया गेट के पार्क में हमेशा साथ रहने का वादा

रेस्टोरेंट से निकलकर दोनों इंडिया गेट के पास बने पार्क में चले गए। वहाँ कुछ देर बैठकर वे पुरानी बातें याद करने लगे। सिया ने अपना सिर कबीर के कंधे पर रख दिया और उसका हाथ थाम लिया।
कबीर ने कहा, “तुम्हें याद है, ट्रेन में जब मैं नायरा की तस्वीर देखकर रो रहा था?”
सिया हँसकर बोली, “हाँ, और मैंने तुम्हें कितनी बातें सुनाई थीं।”
कबीर ने कहा, “तुमने मुझे फिर से खुश रहना सिखाया। लेकिन इस बार मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”
सिया ने अपने बैग से पायल का डिब्बा निकाला। उसने उसे कबीर के हाथ में देते हुए कहा, “मैंने इसे आज तक नहीं पहना। तुमने कहा था कि मेरा पति ही मुझे यह पायल पहनाएगा। मैं चाहती हूँ कि एक दिन तुम ही मुझे पहनाओ।”
कबीर ने उसका हाथ थाम लिया। “सिया, मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। वादा करता हूँ कि तुम्हारे अलावा किसी और से शादी नहीं करूँगा। जिंदगी में कितनी भी मुश्किल आए, तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगा।”
सिया की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “मैं भी वादा करती हूँ कि तुम्हारे अलावा किसी और से शादी नहीं करूँगी। मुझे महँगा घर या बड़ी गाड़ी नहीं चाहिए। मुझे बस तुम्हारा साथ चाहिए।”
कबीर ने उसे अपने करीब खींच लिया। दोनों ने एक-दूसरे को कसकर गले लगाया। कबीर ने सिया के माथे पर प्यार से किस किया। तभी आसमान में बादल घिर आए और हल्की बारिश शुरू हो गई।
पार्क में बैठे लोग बारिश से बचने के लिए जाने लगे, लेकिन कबीर और सिया वहीं खड़े रहे। बारिश की बूँदें उनके चेहरे पर गिर रही थीं। सिया ने मुस्कुराकर कहा, “आज तुम्हारे साथ बारिश में भीगने का मन है।”
कबीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। सिया ने अपना चेहरा उसके करीब किया और दोनों ने प्यार से एक-दूसरे को किस किया। उस पल उनके बीच कोई शिकायत नहीं थी। बस एक-दूसरे को खो देने का डर और अब साथ रहने की खुशी थी।
एक नई शुरुआत
बारिश धीमी हुई तो दोनों पार्क से बाहर निकलने लगे। सिया ने कबीर का हाथ कसकर पकड़ रखा था। कबीर ने मुस्कुराकर पूछा, “अब कहाँ चलना है, मैडम फोटोग्राफर?”
सिया ने कहा, “जहाँ तुम ले चलो, लेकिन इस बार मुझे अकेला छोड़कर मत जाना।”
कबीर हँसकर बोला, “अब तो पूरी जिंदगी साथ चलना है।”
दोनों आगे बढ़ गए। कबीर को ट्रेन की वह रात याद आई, जब वह नायरा की तस्वीर देखकर रो रहा था। सिया को भी वह पहली मुलाकात याद आई, जब उसने एक अनजान लड़के को हँसाने की कोशिश की थी। दोनों नहीं जानते थे कि वह छोटी-सी बातचीत एक दिन उनके जीवन का सबसे खास रिश्ता बन जाएगी।
सिया ने चलते-चलते कहा, “अगर उस दिन ट्रेन में तुम इतने उदास नहीं होते, तो शायद मैं तुमसे बात ही नहीं करती।”
कबीर मुस्कुराया। “और अगर तुमने बात नहीं की होती, तो शायद मैं आज भी पुरानी यादों में खोया रहता।”
सिया ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। अब दोनों के सामने जिंदगी का नया सफर था। उन्हें अपने परिवारों से बात करनी थी, अपने सपनों को पूरा करना था और एक-दूसरे के साथ भविष्य बनाना था।
उनकी कहानी में दर्द भी था, पछतावा भी, बिछड़ने की तकलीफ भी और फिर मिलने की खुशी भी। लेकिन इस बार दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया था कि कोई भी बात मन में रखने के बजाय वे एक-दूसरे से खुलकर बात करेंगे।
दिसंबर की ठंडी वादियों में शुरू हुई उनकी दोस्ती अब जिंदगी भर के प्यार में बदल चुकी थी। और अब उनका सफर अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ आगे बढ़ने वाला था।
कुछ मुलाकातें अचानक होती हैं, लेकिन उनकी यादें पूरी जिंदगी साथ रहती हैं। कभी-कभी एक अनजान सफर ही जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर बन जाता है।





