शापित भूतिया आईना सिर्फ एक पुराना आईना नहीं था। उसमें झाँकने वाला हर इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता था।
एक क्लास टीचर ने सबकी चेतावनी को मज़ाक समझा। फिर उसने बंद कमरा खोला और उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
क्या वह उस शापित आईने से बाहर निकल पाई, या उसकी आत्मा भी हमेशा के लिए उसी अंधेरी दुनिया में कैद हो गई?
पूरी कहानी जानने के लिए पढ़िए “शापित भूतिया आईना” जो कहानी आपको एक डरावनी दुनिया में ले जाएगी।
सर्दियों की वह शाम और शापित घर की पहली चेतावनी। Haunted Mirror Story In Hindi
सर्दियों की ठंडी शाम थी। सूरज धीरे-धीरे जंगल के पीछे छिप रहा था। आसमान पर हल्की लालिमा फैली हुई थी और ठंडी हवाएँ पूरे गाँव में सिहरन भर रही थीं।
सरकारी स्कूल की छुट्टी होते ही बत्तीस वर्ष की सुनीता रोज़ की तरह गाँव की पगडंडी पर टहलने निकल पड़ी। उसे नए स्थानों को देखना और लोगों से मिलना अच्छा लगता था।
गाँव के बीचोंबीच एक विशाल बरगद का पेड़ था। उसके नीचे कई बुज़ुर्ग और किसान जलते अलाव के चारों ओर बैठकर अपने हाथ सेंक रहे थे।
कुछ किसान बैलगाड़ियों में अनाज भरकर खेतों से लौट रहे थे। उनके बैलों की घंटियाँ ठंडी हवा में अजीब और रहस्यमयी आवाज़ पैदा कर रही थीं।
कुछ लड़कियाँ सिर पर घास के गट्ठर रखे धीरे-धीरे घर लौट रही थीं। उनके पीछे गाय और भैंसों के झुंड धूल उड़ाते हुए चल रहे थे।
सुनीता मुस्कुराते हुए सबको नमस्ते करती रही, लेकिन किसी ने भी उसकी ओर मुस्कुराकर नहीं देखा। सभी लोग अचानक चुप हो गए थे।
ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे गाँव ने किसी अनकहे डर के कारण उससे दूरी बना ली हो। वह बात समझ नहीं पा रही थी।
सुनीता ने एक बुज़ुर्ग महिला से मुस्कुराकर पूछा, “काकी, सब लोग इतने चुप क्यों रहते हैं?”
बुज़ुर्ग महिला ने काँपते हाथों से शापित मकान की दिशा दिखाई, फिर बिना कुछ बोले तेज़ कदमों से वहाँ से चली गई।
यह देखकर सुनीता हल्का-सा हँस पड़ी। उसे लगा, शायद गाँव वाले पुराने अंधविश्वासों में आज भी जी रहे हैं।
उसी समय लगभग अस्सी वर्ष के अमर काका धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए उसके पास आए। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “बेटी, उस पुराने मकान को तुरंत छोड़ दो। दूसरा घर मिल जाएगा, लेकिन वह घर किसी का नहीं होता।”
सुनीता मुस्कुराई और बोली, “अमर काका, मैं भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती। मुझे स्कूल के पास यही घर ठीक लगा।”
अमर काका ने गहरी साँस ली। उनकी आँखों में कई वर्षों का दर्द छिपा हुआ था, जिसे शब्दों में कहना आसान नहीं था।
उन्होंने धीरे से कहा, “जिसने भी उस घर में रहने की ज़िद की, वह एक दिन बिना कोई निशान छोड़े हमेशा के लिए गायब हो गया।”
सुनीता ने हँसते हुए जवाब दिया, “अगर भूत सच में होते, तो अब तक मुझे भी मिल चुके होते।”
आसपास बैठे लोगों ने उसकी बात सुन ली। किसी ने विरोध नहीं किया, लेकिन सभी के चेहरों पर डर पहले से और गहरा हो गया।
रात धीरे-धीरे पूरे गाँव पर उतरने लगी। जंगल की तरफ़ से उल्लुओं की आवाज़ें आने लगीं और कुत्ते बिना कारण रोने लगे।
अचानक तेज़ ठंडी हवा चली। अलाव की लपटें एक साथ काँप उठीं और बरगद पर बैठे सारे कौए शोर मचाते हुए उड़ गए।
अमर काका ने आसमान की ओर देखा। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। उन्होंने बहुत धीरे कहा, “आज फिर वह जाग गया है…”
सुनीता यह सुनकर मुस्कुराती हुई अपने किराए के मकान की ओर चल पड़ी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि यह उसकी सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली है।
बंद कमरे का ताला टूटा और मौत का दरवाज़ा खुल गया

पुराना मकान गाँव के बिल्कुल आखिरी छोर पर था। उसके पीछे घना जंगल शुरू हो जाता था, जहाँ रात में कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था।
घर का मालिक शहर में रहता था। चाबी देते समय उसने केवल एक बात कही थी, “कोने वाले बंद कमरे का ताला कभी मत खोलना।”
उसने कारण पूछा, तो मालिक बोला, “वहाँ केवल पुराना कबाड़ रखा है। उसे छेड़ने से कोई लाभ नहीं होगा।”
सुनीता ने उस समय बात पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा, शायद कोई पारिवारिक सामान होगा जिसे मालिक सुरक्षित रखना चाहता है।
उस रात घर के भीतर अजीब सन्नाटा था। दीवार पर लगी पुरानी घड़ी ठीक बारह बजे अचानक अपने आप रुक गई।
कुछ ही क्षण बाद ऊपर की मंज़िल से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी। जबकि उस घर में सुनीता के अलावा कोई नहीं था।
उसने साहस करके पूरा घर देखा, लेकिन हर कमरा खाली मिला। फिर भी किसी की मौजूदगी साफ़ महसूस हो रही थी।
रात के लगभग दो बजे बंद कमरे की दिशा से धीमी फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। शब्द समझ नहीं आ रहे थे, लेकिन आवाज़ें लगातार बढ़ती जा रही थीं।
अचानक दरवाज़े पर किसी ने नाखून रगड़ने शुरू कर दिए। खरोंचों की आवाज़ पूरे घर में गूँजने लगी।
सुनीता ने दरवाज़ा खोला, मगर बाहर केवल घना अंधेरा था। ठंडी हवा का एक झोंका उसके शरीर से टकराकर भीतर चला गया।
वह जैसे ही वापस मुड़ी, उसे लगा किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाकर उसका नाम लिया।
“सु…नी…ता…”
उसने तुरंत पीछे देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। केवल बंद कमरे का पुराना ताला धीरे-धीरे अपने आप हिल रहा था।
सुबह होते ही सब कुछ सामान्य दिखाई दिया, लेकिन अब उसकी जिज्ञासा कई गुना बढ़ चुकी थी।
रविवार की दोपहर थी। पूरा गाँव अपने कामों में व्यस्त था और घर के आसपास गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।
सुनीता की नज़र बार-बार उसी बंद कमरे पर जा रही थी। आखिरकार उसने लोहे की एक भारी रॉड उठाई।
पहला वार हुआ।
ताला नहीं टूटा।
दूसरा वार हुआ।
पूरा घर अजीब तरह से काँप उठा। तीसरे वार के साथ ताला ज़मीन पर गिर पड़ा। दरवाज़ा अपने आप चरमराता हुआ धीरे-धीरे खुलने लगा।
कमरे के भीतर से बर्फ़ जैसी ठंडी हवा निकली। ऐसा लगा, जैसे किसी ने कई वर्षों बाद मौत का दरवाज़ा खोल दिया हो।
सुनीता ने काँपते कदमों से अंदर झाँका…
और अगले ही पल उसकी साँसें थम गईं।
बाहर से छोटा दिखने वाला वह कमरा अंदर एक विशाल हवेली जितना बड़ा था।
सबसे सामने दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर की आँखें धीरे-धीरे उसकी ओर घूम रही थीं…
और ठीक उसके सामने रखा था…
एक ऐसा रहस्यमयी आईना, जिसकी सतह पानी की तरह अपने आप लहराने लगी थी।
सुनीता की साँसें जैसे वहीं थम गईं। वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन से चिपक चुके थे।
आईने की काली दुनिया में कैद ज़िंदा इंसानों का भयानक सच

रहस्यमयी आईने की सतह अचानक तेज़ी से लहराने लगी। वह बिल्कुल शांत झील जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके भीतर गहरा अंधकार घूम रहा था।
सुनीता ने काँपते हाथों से अपना चेहरा छुआ। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके सामने रखा साधारण आईना ज़िंदा प्रतीत हो रहा था।
अचानक किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में उसका नाम पुकारा। वह आवाज़ किसी इंसान की नहीं, बल्कि कई आत्माओं की मिली-जुली फुसफुसाहट जैसी थी।
तस्वीर में बने बूढ़े आदमी की आँखें अब पूरी तरह जीवित लग रही थीं। उसके होंठों पर डरावनी मुस्कान फैलती चली जा रही थी।
कमरे का तापमान अचानक इतना गिर गया कि सुनीता की साँसों से धुआँ निकलने लगा। उसकी उँगलियाँ ठंड से सुन्न पड़ने लगीं।
वह भागने के लिए मुड़ी, लेकिन दरवाज़ा अपने आप ज़ोर से बंद हो गया। पूरा कमरा किसी अदृश्य शक्ति से काँपने लगा।
अचानक आईने के भीतर से कई काले हाथ बाहर निकले। वे धीरे-धीरे सुनीता की कलाई पकड़ने लगे।
सुनीता पूरी ताकत से चीखी, लेकिन उसकी आवाज़ कमरे की दीवारों में ही दबकर रह गई। बाहर तक कुछ भी सुनाई नहीं दिया।
एक भयानक झटके के साथ उसका पूरा शरीर आईने की ओर खिंचने लगा। उसने फर्श पकड़ने की कोशिश की, लेकिन पकड़ छूट गई।
अगले ही पल वह आईने के भीतर जा गिरी। चारों ओर घना अंधेरा और असहनीय सन्नाटा फैल गया।
धीरे-धीरे उसकी आँखें खुलीं। सामने सैकड़ों लोग खड़े थे, लेकिन किसी के चेहरे पर जीवन का कोई भाव नहीं था।
उन लोगों में मकान मालिक भी था। उसके पीछे उसकी पत्नी, बच्चे और कई अनजान चेहरे पत्थर की मूर्तियों की तरह खड़े थे।
मकान मालिक की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “बेटी… तुम भी अब इस श्राप का हिस्सा बन गई हो।”
सुनीता ने घबराकर पूछा, “यह जगह कौन-सी है? हम सब यहाँ कैसे आए?”
एक बूढ़ी महिला बोली, “यह आईने की काली दुनिया है। जो एक बार यहाँ आता है, वह कभी लौट नहीं पाता।”
तभी पूरे अंधकार में वही तस्वीर वाला बूढ़ा दिखाई दिया। उसकी लाल आँखें जलते अंगारों जैसी चमक रही थीं।
उसकी हँसी इतनी भयावह थी कि पूरी काली दुनिया काँप उठी। दूर खड़े सभी कैद लोग डर से सिर झुका गए।
उधर गाँव में अगले दिन खबर फैल गई कि सुनीता रात से कहीं दिखाई नहीं दे रही। उसका घर खुला था, लेकिन वह गायब थी।
अमर काका दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने कमरे के भीतर झाँका और अचानक उनकी चीख निकल गई।
आईने के भीतर सुनीता दोनों हाथ फैलाकर मदद माँग रही थी। उसके साथ कई और लोग भी कैद दिखाई दे रहे थे।
अमर काका ने घबराकर आईने को छूना चाहा, लेकिन अचानक एक सड़ी हुई काली उँगली बाहर निकली।
उस उँगली ने उनका गला पकड़ने की कोशिश की। अमर काका किसी तरह पीछे गिरकर अपनी जान बचा पाए।
उन्होंने पूरे गाँव को बुला लिया। अब हर किसी को विश्वास हो चुका था कि वर्षों पुरानी बातें सच थीं।
बारह साल के बच्चे ने बता दिया शाप तोड़ने का रहस्य

गाँव वालों ने उसी शाम एक प्रसिद्ध तांत्रिक को बुलाया। उसने घर के बाहर बैठकर कई घंटे तक मंत्र पढ़े।
जैसे ही वह घर के भीतर गया, अचानक पूरा मकान ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। चारों ओर काली धूल उड़ने लगी।
तांत्रिक ने आईने की ओर देखा तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसने पहली बार अपने जीवन में ऐसा दृश्य देखा था।
आईने के भीतर कैद सभी लोग रोते हुए मदद माँग रहे थे। उनकी आवाज़ बाहर सुनाई नहीं दे रही थी।
तांत्रिक ने कई शक्तिशाली मंत्र पढ़े, लेकिन तस्वीर में बना बूढ़ा ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
अचानक एक अदृश्य शक्ति ने तांत्रिक को हवा में उठाकर दूर फेंक दिया। उसके हाथ से सारी पूजा सामग्री बिखर गई।
तांत्रिक काँपते हुए बोला, “यह साधारण आत्मा नहीं… बहुत पुराना और अत्यंत शक्तिशाली जिन्न है।”
गाँव में सन्नाटा छा गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए।
उसी समय लगभग बारह वर्ष का एक बालक खेलते-खेलते वहाँ आ पहुँचा। उसने सबकी बातें ध्यान से सुनीं।
वह मुस्कुराकर बोला, “अरे अमर काका… इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है?”
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किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। सबको लगा, बच्चा खेल-खेल में कुछ भी बोल रहा है।
बालक वापस मुड़ने लगा, तभी अमर काका ने उसे आवाज़ देकर रोक लिया।
उन्होंने प्यार से पूछा, “बेटा… तुम क्या कहना चाहते थे? खुलकर बताओ।”
बालक बोला, “जिस तस्वीर की आँखें हिलती हैं, पहले उसे जला दीजिए। फिर उसी समय आईना तोड़ दीजिए। शायद सब लोग बाहर आ जाएँ।”
यह सुनते ही वहाँ खड़े सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। किसी ने इस उपाय के बारे में कभी नहीं सोचा था।
अमर काका उस बच्चे को धन्यवाद कहना चाहते थे, लेकिन वह अचानक हँसते हुए वहाँ से चला गया।
कई लोगों ने पीछे मुड़कर देखा, मगर वह बालक कुछ ही क्षणों में न जाने कहाँ गायब हो चुका था।
अमर काका ने धीमी आवाज़ में कहा, “आज रात हमें यह काम करना ही होगा… लेकिन बहुत सावधानी से।”
उन्होंने गाँव के कुछ जवान और बुज़ुर्ग लोगों को साथ लिया। सबने हाथों में जलती मशालें पकड़ लीं।
जैसे ही वे शापित घर के भीतर पहुँचे, अचानक अंधेरे में किसी की भयानक हँसी गूँज उठी…
और अगले ही पल एक अदृश्य शक्ति ने सब पर हमला कर दिया।
अंधेरे में गूँजी वह भयानक हँसी पूरे शापित मकान में फैल गई। अगले ही पल एक अदृश्य शक्ति ने सब पर हमला कर दिया।
अमर काका और उनका पोता रवि पहुँचे शापित घर के भीतर

गाँव वालों के हाथों से मशालें छूटकर ज़मीन पर गिर गईं। पूरा कमरा डरावनी चीखों और फुसफुसाहटों से भर उठा।
अदृश्य शक्ति ने एक युवक की टाँग पकड़कर उसे कई कदम दूर घसीट दिया। वह दर्द से चीखता रहा, लेकिन कोई बचा नहीं सका।
दूसरे ही पल दो लोगों को किसी अनदेखी ताकत ने हवा में उठाकर घर के बाहर खड़े पेड़ की मोटी डाल पर लटका दिया।
यह भयानक दृश्य देखकर बाकी गाँव वाले डरकर जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। कुछ लोग रोते हुए सीधे मंदिर पहुँच गए।
अब शापित मकान के सामने केवल अमर काका अकेले खड़े थे। उनकी आँखों में डर था, लेकिन उससे कहीं अधिक चिंता थी।
उन्होंने आसमान की ओर देखकर कहा, “हे बजरंगबली! उस मास्टरनी को हर हाल में बचाना होगा।”
अगली सुबह अमर काका ने अपने शहर में पढ़ रहे पोते रवि को बुलाने का निर्णय लिया।
रवि पढ़ा-लिखा, समझदार और भगवान हनुमान का परम भक्त था। वह हर कार्य से पहले हनुमान चालीसा का पाठ करता था।
शाम होते-होते रवि गाँव पहुँच गया। अमर काका ने उसे पूरी घटना शुरू से अंत तक विस्तार से बता दी।
रवि ने बिना डरे कहा, “दादाजी, जब तक भगवान की कृपा साथ है, कोई भी अंधेरी शक्ति हमेशा नहीं जीत सकती।”
उसी समय गाँव की एक बुज़ुर्ग औरत गुस्से में बोली, “अमर काका, पूरे गाँव में किसी की हिम्मत नहीं हुई और तुम अपने पोते की जान जोखिम में डाल रहे हो।”
अमर काका शांत स्वर में बोले, “अगर हम डरकर बैठ गए, तो कल यह श्राप पूरे गाँव को निगल जाएगा।”
उनकी बात सुनकर धीरे-धीरे पूरा गाँव फिर इकट्ठा हो गया। सभी ने उस शापित मकान को चारों ओर से घेर लिया।
तांत्रिक भी दोबारा आ गया। इस बार उसके चेहरे पर आत्मविश्वास नहीं, बल्कि सावधानी साफ़ दिखाई दे रही थी।
रवि ने अपने हाथ में भगवान हनुमान की पवित्र तस्वीर मजबूती से पकड़ ली। दूसरे हाथ में उसने जलती मशाल थाम ली।
अमर काका, रवि और तांत्रिक धीरे-धीरे शापित मकान के भीतर प्रवेश करने लगे। पूरे घर में फिर वही बर्फ़ जैसी ठंड फैल गई।
तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान उठा। खिड़कियाँ अपने आप खुलने-बंद होने लगीं और दीवारें ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगीं।
एक अदृश्य शक्ति ने तांत्रिक और अमर काका को हवा में उठाकर घर के बाहर फेंक दिया। दोनों कई कदम दूर जाकर गिरे।
लेकिन रवि अपनी जगह से नहीं हिला। उसके हाथ में पकड़ी हनुमान जी की तस्वीर से जैसे अदृश्य सुरक्षा मिल रही थी।
उसी क्षण तस्वीर में कैद बूढ़े का चेहरा जीवित हो उठा। उसकी लाल आँखें अंगारों की तरह चमकने लगीं।
वह विकराल आवाज़ में गरजा, “निकल जाओ यहाँ से… मेरी दुनिया उजाड़ने आए हो, तो तुम्हारी दुनिया भी उजाड़ दूँगा।”
रवि ने बिना डरे हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया। कमरे में गूँजती उसकी आवाज़ सुनकर आत्मा क्रोध से काँप उठी।
तस्वीर जली, आईना टूटा… लेकिन श्राप अब भी ज़िंदा था
रवि जैसे ही आगे बढ़ा, रहस्यमयी आईना उसे अपनी ओर खींचने लगा। उसकी सतह फिर पानी की तरह लहराने लगी।
आईने के भीतर कैद सुनीता और बाकी लोग घबराकर चिल्लाने लगे। उनकी आँखों में उम्मीद की आखिरी किरण दिखाई दे रही थी।
अचानक काले धुएँ से बना विशाल जिन्न रवि के सामने प्रकट हो गया। उसके लंबे दाँत और जलती आँखें किसी भी इंसान का साहस तोड़ सकती थीं।
जिन्न ने ज़ोरदार हमला किया, लेकिन हनुमान जी की तस्वीर के पास पहुँचते ही उसकी शक्ति कमज़ोर पड़ने लगी।
रवि ने एक पल भी देर नहीं की। वह दौड़ता हुआ बाहर गया और जलती हुई मशाल लेकर वापस लौट आया।
एक हाथ में मशाल थी, दूसरे हाथ में भगवान हनुमान की तस्वीर। उसके कदम अब बिल्कुल नहीं काँप रहे थे।
तस्वीर में बना बूढ़ा ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगा। उसकी आँखों से काला धुआँ निकलने लगा और पूरा कमरा हिल उठा।
जिन्न गरजते हुए बोला, “अगर यह तस्वीर जली, तो तुम सब भी नहीं बचोगे।”
रवि ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी। उसने जलती मशाल सीधे उस तस्वीर के नीचे लगा दी।
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कुछ ही क्षणों में तस्वीर आग की लपटों में घिर गई। उसके भीतर से ऐसी भयानक चीख निकली कि पूरा जंगल काँप उठा।
जलती तस्वीर से वही विकराल जिन्न बाहर निकला। उसका चेहरा इतना भयावह था कि तांत्रिक भी आँखें बंद करने पर मजबूर हो गया।
रवि ने पूरी शक्ति से हनुमान जी का नाम लिया और मशाल उठाकर रहस्यमयी आईने पर ज़ोरदार प्रहार कर दिया।
धड़ाम…
पूरा आईना अनगिनत टुकड़ों में बिखर गया।
उसी क्षण पूरे घर में तेज़ दिव्य प्रकाश फैल गया। ऐसा लग रहा था, जैसे वर्षों का अंधकार एक ही पल में समाप्त हो रहा हो।
आईने के भीतर कैद सुनीता, मकान मालिक और बाकी सभी लोग एक-एक करके बाहर आने लगे।
सुनीता बाहर आते ही ज़मीन पर गिर पड़ी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह अब आज़ाद थी।
कुछ ही क्षणों बाद वह शापित मकान धीरे-धीरे ढहने लगा। उसकी दीवारें धूल बनकर ज़मीन में समा गईं।
पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। लोगों ने अमर काका और रवि को गले लगा लिया।
तांत्रिक ने गहरी साँस लेकर कहा, “आज यह श्राप समाप्त हो गया… शायद हमेशा के लिए।”
रवि चुपचाप टूटे हुए आईने के टुकड़े इकट्ठा करने लगा, ताकि कोई उन्हें फिर कभी न छू सके।
तभी उसकी नज़र एक बहुत छोटे काले टुकड़े पर पड़ी।
उसने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।
अचानक उस छोटे से टुकड़े में वही लाल आँखें फिर से खुल गईं।
एक धीमी, डरावनी हँसी सुनाई दी…
“आईना टूट गया… लेकिन मैं अभी भी ज़िंदा हूँ…”
रवि घबराकर पीछे हट गया।
अगले ही पल वह छोटा टुकड़ा अपने आप हवा में उठा…
और घने जंगल की ओर उड़ता हुआ अंधेरे में हमेशा के लिए गायब हो गया।
उस रात के बाद किसी ने उस टुकड़े को फिर कभी नहीं देखा।
लेकिन आज भी उस गाँव के जंगल से गुज़रने वाले कुछ लोग दावा करते हैं कि आधी रात को किसी पुराने आईने में दो लाल आँखें उन्हें घूरती हुई दिखाई देती हैं…
और फिर वही भयानक हँसी जंगल के सन्नाटे में गूँज उठती है।
कहते हैं, उस शापित आईने का आख़िरी टुकड़ा आज भी अपने अगले शिकार का इंतज़ार कर रहा है…
____कहानी समाप्त ____




